पहाड़ों, घने जंगलों और ढाल वाले मैदानों की अपनी खास भौगोलिक स्थिति के कारण छत्तीसगढ़ राज्य नदियों से भरपूर है। महानदी जैसी बड़ी नदी से लेकर दर्ज़नों छोटी नदियां इस राज्य के भूभाग को सिंचित करती हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
छत्तीसगढ़ को “धान का कटोरा” कहने के साथ-साथ नदियों का प्रदेश भी माना जाता है। राज्य की भौगोलिक बनावट, घने वन क्षेत्र और पर्वतीय संरचना यहां समृद्ध नदी तंत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहां की अधिकांश नदियां महानदी बेसिन का हिस्सा हैं, जबकि दक्षिणी क्षेत्र की कई नदियां गोदावरी बेसिन से जुड़ी हुई हैं। महानदी, शिवनाथ, हसदेव, इंद्रावती और खारुन जैसी नदियां न केवल सिंचाई और पेयजल का प्रमुख स्रोत हैं, बल्कि राज्य की कृषि, उद्योग, जैव विविधता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधारशिला भी हैं।
छत्तीसगढ़ की नदियां सदियों से यहां की आदिवासी संस्कृति, लोक परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं से भी जुड़ी रही हैं। राजिम का त्रिवेणी संगम, बस्तर क्षेत्र की इंद्रावती नदी और दंतेवाड़ा की डंकिनी-शंखिनी नदियां इसका प्रमुख उदाहरण हैं। राज्य के कई बड़े बांध, जलविद्युत परियोजनाएं और सिंचाई योजनाएं भी इन्हीं नदियों पर आधारित हैं। हालांकि, तेजी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगिक विस्तार, खनन गतिविधियों और बिना उपचारित सीवेज के कारण इन नदियों पर प्रदूषण का दबाव लगातार बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में कई नदियों का पानी काला पड़ने, जलीय जीवों की मौत और भूजल प्रदूषण जैसी घटनाओं ने चिंता बढ़ाई है।
ऐसे समय में छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदियों की भौगोलिक, पर्यावरणीय और सामाजिक महत्ता को समझना और उनके संरक्षण की जरूरत पर गंभीरता से विचार करना बेहद आवश्यक हो गया है। राज्य की प्रमुख नदियां इस प्रकार हैं:
| क्रम सं | नदी का नाम | राज्य में बहने वाला भाग | उद्गम स्थल |
|---|---|---|---|
| 1 | महानदी | 286 किमी | सिहावा पर्वत, धमतरी जिला |
| 2 | शिवनाथ नदी | 290 किमी | पानाबरस पहाड़ियां, राजनांदगांव |
| 3 | खारुन नदी | 80 किमी | दुर्ग क्षेत्र की पहाड़ियां |
| 4 | अरपा नदी | 150 किमी | मैकाल पर्वतमाला, पेंड्रा क्षेत्र |
| 5 | हसदेव नदी | 333 किमी | सोनहत पहाड़ियां, कोरिया जिला |
| 6 | इंद्रावती नदी | 240 किमी | कालाहांडी क्षेत्र, ओडिशा |
| 7 | शबरी नदी | 200 किमी | पूर्वी घाट पर्वतमाला, ओडिशा |
| 8 | मांड नदी | 241 किमी | सरगुजा की पहाड़ियां |
| 9 | पैरी नदी | 160 किमी | गरियाबंद वन क्षेत्र |
| 10 | जोंक नदी | 120 किमी | नुआपाड़ा क्षेत्र की पहाड़ियां |
| 11 | केलो नदी | 100 किमी | लैलूंगा क्षेत्र, रायगढ़ |
| 12 | लीलागर नदी | 135 किमी | मैकाल पर्वत क्षेत्र |
| 13 | ईब नदी | 90 किमी | जशपुर क्षेत्र |
| 14 | कन्हार नदी | 160 किमी | सरगुजा क्षेत्र |
| 15 | रिहंद नदी | 140 किमी | सरगुजा की पहाड़ियां |
| 16 | सोंढूर नदी | 110 किमी | गरियाबंद वन क्षेत्र |
| 17 | कांगेर नदी | 95 किमी | कांगेर घाटी क्षेत्र, बस्तर |
| 18 | रेहर नदी | 70 किमी | सरगुजा क्षेत्र |
| 19 | डंकिनी नदी | 85 किमी | बस्तर की पहाड़ियां |
| 20 | शंखिनी नदी | 80 किमी | बैलाडीला क्षेत्र, दंतेवाड़ा |
| 21 | कोटरी नदी | 90 किमी | अबूझमाड़ क्षेत्र |
| 22 | सुरही नदी | 75 किमी | रायगढ़ क्षेत्र |
| 23 | सक्री नदी | 70 किमी | मैकाल क्षेत्र |
| 24 | मनियारी नदी | 95 किमी | बिलासपुर क्षेत्र |
| 25 | जोंक (उप-नदी) | 120 किमी | ओडिशा सीमा क्षेत्र |
महानदी छत्तीसगढ़ की सबसे प्रमुख और जीवनदायिनी नदी मानी जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 851 किलोमीटर है। इसका उद्गम धमतरी जिले के सिहावा पर्वत क्षेत्र से होता है। यह छत्तीसगढ़ से निकलकर ओडिशा में बहती हुई बंगाल की खाड़ी में समाहित हो जाती है। हीराकुंड बांध इसी नदी पर बना है। छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा कही जाने वाली महानदी भी शहरी सीवेज, औद्योगिक कचरे और रेत खनन के दबाव में है, खासकर रायपुर और महासमुंद क्षेत्र के आसपास।
शिवनाथ महानदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है। इसकी लंबाई लगभग 290 किलोमीटर मानी जाती है। यह राजनांदगांव जिले की पानाबरस पहाड़ियों से निकलती है और दुर्ग, बेमेतरा तथा जांजगीर-चांपा क्षेत्रों से बहते हुए महानदी में मिल जाती है। औद्योगिक प्रदूषण के कारण यह हाल के वर्षों में काफी चर्चा में रही है। यह फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। कोर्ट में पेश रिपोर्टों और मीडिया रिपोर्ट्स में शिवनाथ नदी के पानी के काला पड़ने, जहरीले अपशिष्ट मिलने और मछलियों की मौत की घटनाओं का उल्लेख किया गया है। आरोप है कि शराब फैक्ट्री और अन्य उद्योग बिना उपचारित अपशिष्ट नदी में छोड़ रहे हैं।
खारुन नदी रायपुर शहर की मुख्य नदी है। इसका उद्गम दुर्ग जिले के निकटवर्ती क्षेत्र से माना जाता है। यह रायपुर और आसपास के शहरी इलाकों से गुजरती हुई शिवनाथ नदी में मिल जाती है। घरेलू सीवेज और शहरी कचरे के कारण यह सबसे अधिक प्रदूषित नदियों में गिनी जाती है। रायपुर और दुर्ग-भिलाई शहरी क्षेत्र से गुजरने वाली यह नदी घरेलू सीवेज, प्लास्टिक कचरे और औद्योगिक प्रदूषण से गंभीर रूप से प्रभावित है। हाईकोर्ट ने इसे लेकर भी राज्य सरकार को फटकार लगाई है।
अरपा नदी का उद्गम पेंड्रा क्षेत्र की मैकाल पहाड़ियों से होता है। यह बिलासपुर शहर से होकर बहती है और आगे चलकर शिवनाथ नदी में मिल जाती है। इसकी लंबाई लगभग 150 किलोमीटर के आसपास मानी जाती है। अतिक्रमण और सीवेज प्रदूषण इसकी बड़ी समस्या हैं। अरपा नदी लंबे समय से सीवेज और अतिक्रमण की समस्या झेल रही है। अदालत की टिप्पणियों में इसे भी गंभीर रूप से प्रदूषित नदियों में शामिल किया गया।
हसदेव नदी महानदी की महत्वपूर्ण सहायक नदी है। इसका उद्गम कोरिया जिले के सोनहत क्षेत्र से होता है। यह कोरबा और जांजगीर-चांपा जिलों से गुजरते हुए महानदी में मिलती है। हसदेव बांगो बांध इसी नदी पर स्थित है। कोयला खनन क्षेत्र और ताप विद्युत परियोजनाओं के कारण हसदेव नदी पर प्रदूषण का दबाव बढ़ा है। कई पर्यावरणीय समूहों ने फ्लाई ऐश और औद्योगिक अपशिष्ट के आरोप लगाए हैं।
इंद्रावती नदी गोदावरी नदी की प्रमुख सहायक नदी है। इसकी कुल लंबाई लगभग 535 किलोमीटर है। यह ओडिशा के कालाहांडी क्षेत्र से निकलती है और बस्तर संभाग से बहते हुए महाराष्ट्र सीमा के पास गोदावरी नदी में मिल जाती है। चित्रकोट जलप्रपात इसी नदी पर स्थित है।
शबरी नदी पूर्वी घाट की पहाड़ियों से निकलती है और दक्षिण बस्तर क्षेत्र से बहती हुई गोदावरी नदी में मिल जाती है। इसे कोलाब नदी के नाम से भी जाना जाता है। यह छत्तीसगढ़ और ओडिशा के बीच कई स्थानों पर प्राकृतिक सीमा भी बनाती है।
मांड नदी सरगुजा क्षेत्र की पहाड़ियों से निकलती है। यह रायगढ़ जिले से होकर बहती है और अंततः महानदी में समाहित हो जाती है। यह क्षेत्र की सिंचाई और ग्रामीण जलापूर्ति के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पैरी नदी का उद्गम गरियाबंद जिले के वन क्षेत्रों से होता है। यह धमतरी और महासमुंद क्षेत्रों से बहते हुए राजिम में महानदी से मिलती है। राजिम का प्रसिद्ध त्रिवेणी संगम पैरी, सोंढूर और महानदी के मिलन से बनता है।
जोंक नदी छत्तीसगढ़ और ओडिशा दोनों राज्यों में बहती है। इसका उद्गम नुआपाड़ा क्षेत्र की पहाड़ियों से माना जाता है। यह महानदी की सहायक नदी है। जोंक बांध इस नदी पर बनाया गया है।
केलो नदी रायगढ़ जिले की प्रमुख नदी है। यह लैलूंगा क्षेत्र की पहाड़ियों से निकलती है और महानदी में मिल जाती है। केलो परियोजना क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल का प्रमुख स्रोत है।
लीलागर नदी बिलासपुर और मुंगेली क्षेत्रों से होकर बहती है। इसका उद्गम मैकाल पर्वत श्रृंखला से होता है। यह आगे चलकर शिवनाथ नदी में मिल जाती है। कृषि कार्यों में इसका महत्वपूर्ण योगदान है।
ईब नदी का उद्गम जशपुर क्षेत्र से होता है। यह छत्तीसगढ़ और ओडिशा से बहते हुए महानदी में समाहित हो जाती है। कोयला खनन क्षेत्रों के कारण इस नदी पर पर्यावरणीय दबाव बढ़ा है।
कन्हार नदी सरगुजा क्षेत्र से निकलती है। यह छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तर प्रदेश से होकर बहती हुई सोन नदी में मिलती है। यह गंगा बेसिन की महत्वपूर्ण सहायक नदी मानी जाती है।
रिहंद नदी का उद्गम सरगुजा क्षेत्र की पहाड़ियों से होता है। यह उत्तर प्रदेश तक बहती हुई सोन नदी में मिल जाती है। रिहंद बांध और गोविंद बल्लभ पंत सागर इसी नदी पर स्थित हैं।
सोंढूर नदी गरियाबंद जिले के जंगलों से निकलती है। यह पैरी नदी से मिलकर आगे महानदी में समाहित होती है। सोंढूर बांध क्षेत्र की महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजना है।
कांगेर नदी बस्तर के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र से बहती है। यह इंद्रावती नदी की सहायक नदी है। इसके आसपास घने वन और प्रसिद्ध कुटुमसर गुफाएं स्थित हैं।
रेहर नदी सरगुजा क्षेत्र की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण नदी है। यह कृषि और ग्रामीण जल जरूरतों को पूरा करती है। आगे चलकर यह बड़ी नदी प्रणाली में समाहित हो जाती है।
डंकिनी नदी बस्तर क्षेत्र की प्रमुख नदियों में शामिल है। यह शंखिनी नदी के साथ मिलकर दंतेवाड़ा क्षेत्र में संगम बनाती है। स्थानीय आदिवासी संस्कृति में इसका धार्मिक महत्व भी है।
शंखिनी नदी बस्तर क्षेत्र में बहती है और डंकिनी नदी के साथ संगम करती है। दंतेश्वरी मंदिर के पास दोनों नदियों का मिलन धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यह अंततः गोदावरी बेसिन का हिस्सा बन जाती है।
पहाड़ी और पथरीले पठारों से बहती हुई छत्तीसगढ़ की नदियां कई सुंदर झरने और जल प्रपात भी बनाती हैं।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में बसे बेलगाहाना गांव के लिए घोंगा नदी पीढ़ियों से जीवन रेखा रही है। इसका चमकीला जल धीरे-धीरे बहता हुआ खेतों को सींचता, प्यास बुझाता और 40 गांवों में फैले अनगिनत परिवारों को आजीविका प्रदान करता था। लेकिन 2000 के दशक के मध्य तक, यह नदी सूखकर एक धब्बा मात्र रह गई थी, जिससे बेलगाहाना की संस्कृति, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को खतरा मंडरा रहा था। 980 में जल संसाधन विभाग द्वारा सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए एक बांध (और कई अन्य चेक डैम) के निर्माण के साथ शुरू हुआ, जो अनजाने में नदी के लिए खतरा बन गया। इसने नदी के प्रवाह को अनिवार्य रूप से बदल दिया, जिससे जलीय जीवों के प्रवास के पैटर्न में गड़बड़ी हुई और पानी का तापमान भी बदल गया। कभी बारहमासी रही यह नदी सिंचाई नहरों द्वारा पानी सोख लिए जाने के कारण एक नश्वर धारा में तब्दील हो गई। इसके अलावा, नदी के जलक्षेत्रों में वर्षों से अनियंत्रित पत्थर खनन ने उस महत्वपूर्ण जल प्रवाह को अवरुद्ध कर दिया जो घोंघा नदी के प्रवाह को बनाए रखता था। इस संकट के बीच, एक खामोश क्रांति की चिंगारी भड़क उठी। नदी के टूटे-फूटे तल पर खड़े होकर, स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) की नेता जुगनी बाई पटेल और जायसवाल ने एक फैसला किया: घोंघा नदी को फिर से बहना चाहिए। श्रेयांश बुधिया से संपर्क करके और उनके जमीनी स्तर के गैर-लाभकारी संगठन एनपीएन के साथ साझेदारी करके नदी को पुनर्जीवित करने का काम शुरू किया। जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया। इन प्रयासों ने न केवल जानकारी प्रदान की, बल्कि कार्रवाई को भी प्रेरित किया, जिससे संरक्षण के लिए व्यापक और सर्वसम्मत समर्थन प्राप्त हुआ। समुदाय के प्रयासों ने जल्द ही स्थानीय अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया। अप्रैल 2024 तक, सिंचाई, बागवानी और मत्स्य पालन जैसे विभागों ने बेलगाहाना में कल्याणकारी योजनाओं को लागू करना शुरू कर दिया। इन प्रयासों से घोंघा नदी धीरे-धीरे पुनर्जीवित हो गई।
छत्तीसगढ़ की लगभग 75% से अधिक नदियां सीधे या परोक्ष रूप से महानदी बेसिन से जुड़ी हुई हैं, इसलिए महानदी को राज्य की “जीवनरेखा” कहा जाता है।
महानदी का उद्गम छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सिहावा पर्वत से होता है, लेकिन इसका पानी ओडिशा तक करोड़ों लोगों की जरूरतें पूरी करता है।
इंद्रावती नदी को “बस्तर की जीवनरेखा” कहा जाता है। इसी नदी पर स्थित चित्रकोट जलप्रपात को भारत का “नियाग्रा फॉल” भी कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ की कई नदियां केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा भी हैं। दंतेवाड़ा में डंकिनी नदी और शंखिनी नदी का संगम धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
शिवनाथ नदी महानदी की सबसे बड़ी सहायक नदी है और यह राज्य के औद्योगिक बेल्ट से होकर गुजरती है।
राजिम में पैरी नदी, सोंढूर नदी और महानदी का संगम होता है, जिसे “छत्तीसगढ़ का प्रयागराज” कहा जाता है।
छत्तीसगढ़ की नदियां दो बड़े नदी बेसिनों महानदी बेसिन और गोदावरी बेसिन में विभाजित हैं। उत्तर और मध्य भाग की नदियां महानदी तंत्र से जुड़ी हैं, जबकि दक्षिण बस्तर की नदियां गोदावरी प्रणाली का हिस्सा हैं।
हसदेव नदी पर बना हसदेव बांगो बांध राज्य की सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई और बिजली परियोजनाओं में गिना जाता है।
छत्तीसगढ़ में बहने वाली कई नदियों का उद्गम घने वन क्षेत्रों और पहाड़ी इलाकों से होता है, इसलिए ये राज्य की जैव विविधता को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं।
खारुन नदी रायपुर शहर की प्रमुख नदी है, लेकिन शहरीकरण के कारण यह राज्य की सबसे अधिक प्रदूषण प्रभावित नदियों में भी शामिल हो चुकी है।
कांगेर नदी के आसपास स्थित कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान अपनी गुफाओं, झरनों और समृद्ध वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध है।
छत्तीसगढ़ की कई छोटी नदियां बरसाती होते हुए भी ग्रामीण इलाकों की खेती और पेयजल व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं।
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