देवहा नदी, पीलीभीत 

 

फोटो- विकीकॉमन्स

नदी और तालाब

पीलीभीत की देवहा नदी - जीवनरेखा से बनी नाला, खेती और भूजल पर मंडरा रहा खतरा

नालों और सीवर का पानी और कचरा सीधे नदी में गिरने के कारण नाले से भी बदतर हो गई है देवहा नदी की हालत, सरकारी प्रक्रियाओं में अटका सीवेज ट्रीटमेंट प्‍लान का निर्माण

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

कभी पीलीभीत की जीवन-रेखा मानी जाने वाली देवहा नदी के दिन बहुरने का नाम नहीं ले रहे। देश में पर्यावरण की सबसे बड़ी संरक्षक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी NGT का आदेश भी गुम होती इस नदी की बदहाली में कोई तब्‍दीली नहीं ला पा रहा है। खुद पीलीभीत के जिला प्रशासन का लापरवाही भरा रवैया इस नदी की राह का रोड़ा बना हुआ है। हालत यह है कि हाल ही में दिल्ली से आई NGT की विशेषज्ञों की टीम के दौरे और समीक्षा के बाद भी नदी की दशा सुधारने की ओर कोई कदम नहीं उठाया गया है।

NGT टीम के दौरे के महीने भर बाद भी जमीन पर कोई बदलाव नजर नहीं आ रहा है, जिससे लोगों को लग रहा है कि यह दौरा भी महज एक कानूनी औपचारिकता भर थी, जिसका कोई भी सार्थक नतीजा नहीं निकलने वाला। 

उत्‍तर प्रदेश के तराई क्षेत्र के जिले पीलीभीत को सींचने वाली देवहा नदी आज अपनी  पहचान और अस्तित्व की सबसे मुश्किल लड़ाई लड़ रही है। एक बड़े इलाके के खेतों को हराभरा करने वाली इस नदी में कई वर्षों से शहर के नालों का काला जहर घोला जा रहा है।

फरवरी में एनजीटी की टीम ने किया था दौरा

पिछले साल 28 अक्टूबर को पीलीभीत स्थित वकील और सामाजिक स्वयंसेवक शिवम कश्यप द्वारा दायर एक आवेदन का संज्ञान लेने के बाद किया गया था, जिसमें उन्होंने न्यायाधिकरण से प्रदूषण को रोकने और नदी के धार्मिक और प्राचीन महत्व को संरक्षित करने के लिए हस्तक्षेप करने का आग्रह किया था। इसपर फरवरी में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के विशेषज्ञों की टीम ने यहां का दौरा किया था, तो लोगों की आंखों में एक उम्मीद जगी थी कि शायद अब नदी के प्रति लगातार लापरवा बने प्रशासन की नींद टूटेगी और  देवहा के दिन बहुरेंगे। लेकिन, हफ्तों बाद भी नदी की हालत में रत्‍ती भर का भी सुधार न दिखाई देना और सरकारी सिस्टम की यह चुप्पी जिले की जीवन रेखा रही इस नदी के प्रति संवेदनहीनता की गवाही दे रही है। नदी में सीधे गिरने वाले सीवेज की सफाई के लिये बायोरिमेडिएशन तकनीक पर आधारित एक प्रस्ताव  एक वर्ष पूर्व प्रस्तुत किया गया था, किंतु प्रस्ताव का अनुमोदन अभी तक लंबित है, जिससे समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।

नक्शे में देवहा नदी 

निरीक्षण में खुली प्रशासनिक लापरवाही की पोल

टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक एनजीटी द्वारा नियुक्त दो सदस्यीय दल ने गुरुवार को शहर की नौ अत्यधिक प्रदूषित नालियों का निरीक्षण किया, जो बिना उपचारित कचरा सीधे देवहा नदी में बहाती हैं। एनजीटी पैनल में छोटी नदियों के पुनरुद्धार विशेषज्ञ हरीश कुमार महावर और स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन से जुड़ी कीर्ति वर्मा शामिल थीं। 

अधिकारियों ने अपने निरीक्षण में पाया कि नालों से बिना उपचारित मल-मूत्र, प्लास्टिक कचरा, पॉलीथीन और अन्य कूड़ा नदी में बहाया जा रहा था। दो नालों में वध किए गए जानवरों के अवशेष भी पाए गए, हालांकि जिले में कोई लाइसेंस प्राप्त बूचड़खाना नहीं है। टीम ने शहर के बाहरी इलाकों में सड़कों के किनारे घरेलू कचरे के ढेर, साथ ही सीवेज और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों की भी समीक्षा की। हालांकि इस बारे में टीओआई से बात करते हुए पीलीभीत के जिला मजिस्ट्रेट (जिलाधिकारी) ज्ञानेंद्र सिंह ने कहा कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन संयंत्र के संचालन के लिए निविदाएं आमंत्रित की जा चुकी हैं और प्रदूषित नालियों के जैव उपचार का प्रस्ताव राज्य सरकार को भेज दिया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि नालियों में पशु अवशेष फेंकने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और शहर के भीतर संचालित डेयरियों को शहर के बाहरी इलाकों में स्थानांतरित किया जाएगा।

देवहा नदी का उद्गम और इतिहास

देवहा नदी को शास्त्रों में ‘देवहूति गंगा’ के नाम से पुकारा गया है और इसे गंगा से भी पुरानी नदी बताया गया है। देवहा रामगंगा की एक सहायक नदी है। देवहा नदी उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में स्थित हिमालय के शिवालिक क्षेत्र से निकलती है और पीलीभीत से उत्‍तर प्रदेश में प्रवेश करने के बाद फर्रुखाबाद के पास गंगा में मिल जाती है। कुमाऊं क्षेत्र में इसे नन्दा या नन्धौर के नाम से जाना जाता है। यूपी के मैदानी भाग में प्रवेश करने पर इसका नाम देवहा पड़ जाता है। इसे गर्रा नाम से भी जाना जाता है। इसकी सहायक नदी खकरा पीलीभीत के बाहरी क्षेत्र में ब्रह्मचारी घाट पर देवहा में मिलती है। सिखों का पवित्र तीर्थस्थल, नानकमत्ता देवहा के तट पर ही स्थित है, और यहीं पर नदी के ऊपर नानक सागर बांध का निर्माण भी किया गया है। पीलीभीत, बीसलपुर, शाहजहाँपुर और सांडी इसके तट पर स्थित अन्य प्रमुख नगर हैं।

बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई के लिए महत्‍वपूर्ण 

यह नदी नानक सागर बांध और देउनी बैराज जैसी संरचनाओं के माध्यम से सिंचाई में सहायक है, और कई नहरें इससे पानी निकालती हैं। इसके अलावा तराई इलाके में बाढ़ के नियंत्रण में भी यह अहम भूमिका निभाती है। पिछले साल मानसून में हुई भारी बारिश के बाद इस नदी में भयंकर बाढ़ देखने को मिली थी। मैदानी और पहाड़ी क्षेत्र में लगातार हो रही बारिश के बाद देवहा नदी में करीब 51 हजार क्यूसेक पानी ड्यूनी डैम से छोड़े जाने से देवहा नदी में उफान आ गया। इससे देवहा नदी के आसपास स्थित शहर और निचले इलाकों में बाढ़ आ गई थी। पानी छोड़े जाने के बाद शहर के बेनी चौधरी, फीलखाना इलाके बाढ़ की जद में आ गया। देवहा नदी में वैसे तो 35 हजार से अधिक पानी आने पर निचले इलाकों में जलभराव की संभावना बढ़ जाती है, लेकिन 55 हजार क्यूसेक पानी पास होने के बाद स्थिति बिगड़ जाती है। पिछले साल आई बाढ़ के बाद देवहा नदी में 56 हजार क्यूसेक तक पानी पास हुआ था। जिसके बाद शहर के आधे हिस्से में जलभराव की स्थिति बदतर हो गई थी। दिसंबर 2025 में भौरुआ गांव के पास स्थित देवहा नदी पर पुल निर्माण को स्वीकृति मिलने से क्षेत्रीय लोगों ने राहत महसूस की है। इससे क्षेत्रीय लोगों को दस किलोमीटर लंबे फेर से राहत मिलेगी। इलाके के लोग काफी लंबे समय से देवहा नदी पर पुल बनाने की मांग कर रहे थे। 

जलीय जीवों के लिए रहने योग्य नहीं है देवहा नदी

पीलीभीत की Devha River आज गंभीर प्रदूषण संकट का सामना कर रही है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार नदी का पानी अब स्वच्छ जलधारा जैसा नहीं, बल्कि काले रंग का, झागदार और तेज दुर्गंध वाला मिश्रण बन चुका है। शहर के नालों से गिरने वाला untreated सीवेज, घरेलू कचरा और कथित औद्योगिक अपशिष्ट मिलकर नदी के घुलित ऑक्सीजन स्तर (DO) को बेहद कम कर रहे हैं, जो मछलियों और अन्य जलीय जीवों के जीवन के लिए अनिवार्य होता है। कई स्थानों पर पानी की सतह पर मोटी परत और ठहरे हुए प्रवाह जैसी स्थिति दिखाई देती है, जिससे स्व-शुद्धिकरण क्षमता (self-purification) लगभग खत्म हो गई है। स्थानीय मछुआरे बताते हैं कि पहले जहां छोटी-बड़ी मछलियां आसानी से मिल जाती थीं, वहां अब जलीय जीवन लगभग गायब हो चुका है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल्द प्रदूषण नियंत्रण के ठोस उपाय नहीं किए गए, तो नदी का पारिस्थितिक तंत्र लंबे समय के लिए क्षतिग्रस्त हो सकता है।

भूजल पर मंडराता खतरा और प्रशासनिक सुस्ती

देवहा नदी में बढ़ते प्रदूषण का असर केवल सतही जल तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आसपास के भूजल पर भी खतरा मंडराने लगा है। तराई क्षेत्र की मिट्टी अपेक्षाकृत अधिक जलधारण क्षमता वाली होती है, इसलिए नदी में मौजूद जहरीले तत्व रिसाव (leaching) के जरिए धीरे-धीरे जमीन के भीतर जा सकते हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि सीवर लाइनें दुरुस्त नहीं की गईं और नालों का वैज्ञानिक तरीके से उपचार नहीं हुआ, तो हैंडपंप और बोरवेल के पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक लंबे समय तक दूषित पानी के संपर्क में रहने से त्वचा रोग, पेट संबंधी बीमारियां और गंभीर मामलों में कैंसर जैसी आशंकाएं बढ़ सकती हैं। पर्यावरण संगठनों को उम्मीद थी कि निरीक्षण और शिकायतों के बाद नालों की टैपिंग, सफाई और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट जैसे कदम तेजी से उठेंगे, लेकिन स्थानीय स्तर पर कार्रवाई की धीमी रफ्तार लोगों की चिंता को और बढ़ा रही है।

देवहा नदी की विशेषताएं

सीमित लंबाई और स्थानीय प्रभाव : देवहा नदी की लंबाई मुख्‍यत: करीब 55–60 किमी मानी जाती है और इसका प्रभाव मुख्य रूप से पीलीभीत जिले के शहरी-ग्रामीण इलाकों तक ही सीमित रहता है। यानी यह एक लोकल लाइफलाइन नदी है, जिस पर सीधे आसपास की आबादी निर्भर है।

तराई क्षेत्र की जलधारा : देवहा नदी तराई (भाबर-तराई) भू-भाग से होकर गुजरती है, जहां भूजल स्तर पहले से ऊंचा रहता है। ऐसे में नदी का प्रदूषण न केवल सतही जल बल्कि आसपास के हैंडपंप और खेतों के भूजल को भी प्रभावित कर सकता है।

शहरी नालों का सीधा दबाव : पीलीभीत शहर के कई प्रमुख नालों का आउटफॉल इसी नदी में बताया जाता है। कम प्रवाह और मौसमी जलस्तर के कारण गर्मी के महीनों में नदी का स्व-शुद्धिकरण (self-purification) काफी घट जाता है, जिससे प्रदूषण का असर ज्यादा दिखता है।

बाढ़ निकासी की प्राकृतिक धारा : देवहा नदी तराई क्षेत्र में बरसात के समय अतिरिक्त पानी की निकासी (natural drainage) का अहम माध्यम मानी जाती है। नदी के प्रवाह में रुकावट या अतिक्रमण से स्थानीय जलभराव और शहरी बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।

खेती और नमी पर सीधा असर : देवहा के किनारे के गांवों में नदी का पानी और उससे जुड़ी मिट्टी की नमी धान-गन्ना जैसी फसलों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। जल गुणवत्ता बिगड़ने पर सिंचाई और मिट्टी की उर्वरता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

मौसमी प्रवाह और सूखे की संवेदनशीलता :  यह नदी मानसून पर काफी निर्भर रहती है—बरसात में जलस्तर बढ़ता है, जबकि गर्मियों में कई हिस्सों में प्रवाह बहुत कम या टूट-टूट कर रह जाता है। ऐसे हालात में प्रदूषण का असर तेजी से केंद्रित (concentrate) होकर पानी की गुणवत्ता को ज्यादा खराब कर सकता है।

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