गोदावरी के तेलंगाना राज्य में बहने वाले हिस्से के पानी के रंग में बदलाव आया है। नदी के कई हिस्सों में पानी का रंग काला पड़ रहा है।

 

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

नदी और तालाब

तेलंगाना में क्यों काला पड़ रहा है गोदावरी नदी का पानी? कारण और चुनौतियां!

बीते कुछ वर्षों में गोदावरी नदी के पानी का रंग बदला है। इस बदलते रंग के पीछे क्या कारण हो सकते हैं, इसके पीछे छिपा विज्ञान और बदलते रंग की वजह से सामने खड़ी चुनौतियों को पेश करती यह रिपोर्ट।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

दक्षिण की गंगा कही जाने वाली गोदावरी नदी एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल गोदावरी के तेलंगाना राज्य में बहने वाले हिस्से के पानी के रंग में बदलाव आया है। नदी के कई हिस्सों में पानी का रंग काला पड़ रहा है। इस बदलाव के पीछे तमाम कारण हैं। इसे न केवल विज्ञान की दृष्टि से समझने की जरूरत है बल्कि नदी के स्वास्थ्य, जल-शासन और पर्यावरणीय नियामक तंत्र के बीच समन्वय की कमी होने के कारण सामने खड़ी चुनौतियों के बारे में भी जानना जरूरी है। 

यह बात सर्वविदित है कि रंग बदलने का मुख्‍य कारण प्रदूषण है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस नदी के पानी के प्रदूषित होने की समस्या केवल सतही नहीं है। इस समस्या का समाधान नदी में जमा कचरा निकालने से नहीं होगा। क्योंकि नदियां निर्जीव नहीं होतीं!

जब किसी नदी में जैविक प्रदूषण बढ़ता है, तो जलीय जीवन कमजोर पड़ता है और नदी का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने लगता है। इसका प्रभाव जलीय जीवों के अलावा नदी पर निर्भर लोगों के जीवन पर भी पड़ता है।

एक पीआईएल, एक नदी और जवाबदेही की कमी

नवंबर 2025 में गोदावरी के प्रदूषण को लेकर दायर जनहित याचिका और उस पर तेलंगाना हाई कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की कार्यवाही ने एक अहम सवाल उठाया है। 

इस जनहित याचिका में याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की कि गोदावरी में औद्योगिक और शहरी स्रोतों से हो रहे अनुपचारित अपशिष्ट के निर्वहन को तत्काल रोका जाए, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की जवाबदेही तय की जाए तथा नदी की जल-गुणवत्ता की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच कराई जाए। 

याचिका में यह भी आग्रह किया गया कि निगरानी रिपोर्ट और अनुपालन स्थिति को सार्वजनिक डोमेन में अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराया जाए।

जब किसी नदी में जैविक प्रदूषण बढ़ता है, तो जलीय जीवन कमजोर पड़ता है और नदी का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ने लगता है।

उनका कहना है कि क्या हमारी न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं नदी-स्वास्थ्य को केवल कानूनी प्रक्रिया का विषय मान रही हैं, या इसे एक जीवित पारिस्थितिक संकट की तरह देख पा रही हैं? 

गोदावरी के मामले में यह सवाल और तीखा हो जाता है क्योंकि उपलब्ध आंकड़े यह दिखाते हैं कि समस्या केवल “तकनीकी विवाद” नहीं है। उदाहरण के लिए, आईआईटी- हैदराबाद राष्ट्रीय पर्यावरणीय इंजीनियरिंग शोध संस्थान (NEERI) द्वारा किए गए अध्ययन में नदी के कुछ हिस्सों में बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) का स्तर 6 mg/L से 36 mg/L तक पाया गया। यह तब है जब नहाने योग्य पानी के लिए मानक लगभग 3 mg/L से कम होना चाहिए।

इस तरह के स्तर स्पष्ट संकेत देते हैं कि नदी में जैविक अपशिष्ट की मात्रा अत्यधिक है और घुलित ऑक्सीजन कम हो रही है, जो जलीय जीवन के लिए प्रत्यक्ष खतरा है।

भारत की नदियों के जल-गुणवत्ता अध्ययन से जुड़े रहने वाले पर्यावरण वैज्ञानिक और विशेषज्ञ साई भास्कर रेड्डी नक्का का भी कहना है कि, “प्रदूषण का स्तर जितना अधिक होता है, पानी में ऑक्सीजन का स्तर उतना ही कम होता है। इससे नदी का स्थानीय जैविक विविधता प्रभावित होती है, क्योंकि कई मछलियां और पौधे ऐसे बिना-ऑक्सीजन वाले वातावरण में जीवित नहीं रह पाते।”

एनजीटी ने इस मामले में केंद्र और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से जवाब मांगा है।

प्रदूषण का स्तर जितना अधिक होता है, पानी में ऑक्सीजन का स्तर उतना ही कम होता है। इससे नदी का स्थानीय जैविक विविधता प्रभावित होती है, क्योंकि कई मछलियां और पौधे ऐसे बिना-ऑक्सीजन वाले वातावरण में जीवित नहीं रह पाते।
साई भास्कर रेड्डी नक्का, पर्यावरण वैज्ञानिक और विशेषज्ञ

कई बार भेजे गए नोटिस में अनुपचारित और औद्योगिक प्रदूषण के निर्वहन पर स्पष्टीकरण देने को कहा गया। लेकिन पर्यावरणीय मुकदमों का अनुभव बताता है कि नोटिस और जवाब-तलब के बीच अक्सर लंबा समय निकल जाता है। इस दौरान नदी का प्रवाह अपनी क्षति झेलता रहता है।

कई वर्षों से गोदावरी नदी का नाम केंद्रीय जल प्रदूषण बोर्ड और तेलंगाना राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समय-समय पर जारी की जाने वाली देश की प्रदूषित नदियों की सूची में स्थायी रूप से बना हुआ है।

आंकड़े बताते हैं कि गोदावरी के किनारों पर बसे आदिलाबाद, करीमनगर और वारंगल जैसे ज़िलों में शहरी सीवेज उपचार क्षमता और वास्तविक सीवेज उत्पादन के बीच बड़ा अंतर है। जहां सीवेज उपचार संयंत्र (एसटीपी) हैं भी, वहां उनकी क्षमता पूरी तरह उपयोग में नहीं लाई जाती या वे मानकों के अनुरूप अपना काम नहीं कर रहे। नतीजतन, अनुपचारित या आंशिक रूप से उपचारित पानी नदी में पहुंचता है और इसकी वजह से पानी का रंग काला पड़ने लगा है।

यह अंतर केवल तकनीकी नहीं है। इसका अर्थ है कि नदी का एक हिस्सा धीरे-धीरे “डेड ज़ोन” में बदल सकता है। डेड ज़ोन वह जलीय क्षेत्र होता है जहां घुलित ऑक्सीजन (डीओ) का स्तर इतना कम (आमतौर पर 2 mg/L से नीचे) हो जाता है कि अधिकांश मछलियां और जलीय जीव जीवित नहीं रह पाते। यह स्थिति अक्सर अत्यधिक जैविक प्रदूषण और पोषक तत्वों के कारण उत्पन्न यूट्रोफिकेशन से जुड़ी होती है।

जहां-जहां नदी का रंग काला पड़ता
जहां-जहां नदी का रंग काला पड़ता दिखाई दे समझ ल‍ीजिए वहां या तो डेड-ज़ोन बन रहा है। ऐसा आम तौर पर ऐसा फैक्‍ट्र‍ियों से निकलने वाले अपशिष्‍ट और अनुपचारित सीवेज की वजह से होता है। जब बीओडी बढ़ जाती है तब पानी काला दिखता है। ऐसी जगह पर पानी में तीखी बदबू होती है।

एनजीटी की कार्रवाई: आदेश या समीक्षा?

29 मई 2025 को एनजीटी ने प्रदूषण के बढ़ते स्तर को देखते हुए तेलंगाना, केंद्र और संबंधित प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के समक्ष जवाब देने को कहा। कोर्ट ने तेलंगाना राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और गोदावरी नदी प्रबंधन बोर्ड से इस पर प्रतिक्रिया मांगी।

तेलंगाना हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अपारश कुमार सिंह और न्यायमूर्ति जी एम मोइनुद्दीन की न्यायपीठ ने कहा कि, “यह मामला केवल एक राज्य का नहीं है। यह सभी नदी-तटीय राज्यों के लिए चिंता का विषय है और इसका समाधान व्यापक पर्यावरण न्याय दृष्टिकोण से होना चाहिए।”

अभी तक उपलब्ध रिपोर्टों में एनजीटी द्वारा दिया गया जवाब-दाखिल करने का निर्देश दर्ज है, लेकिन इसकी प्रकृति और जवाबों की गुणवत्ता सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इससे एक मुख्य समस्या खड़ी होती है कि आदेश जारी करने के बाद सूचना का पारदर्शी प्रकटीकरण और ठोस कार्रवाई का खुलासा क्यों नहीं किया गया? यह सिर्फ कोर्ट के आदेश की समीक्षा तक सीमित क्यों रह जाता है?

यह मामला केवल एक राज्य का नहीं है। यह सभी नदी-तटीय राज्यों के लिए चिंता का विषय है और इसका समाधान व्यापक पर्यावरण न्याय दृष्टिकोण से होना चाहिए।
अपारश कुमार सिंह और न्यायमूर्ति जी एम मोइनुद्दीन, तेलंगाना हाई कोर्ट

शिकायतें और निरीक्षण रिपोर्ट क्या कहती हैं?

एनजीटी की कार्रवाई ने संयुक्त रूप से सीपीसीबी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को मामले पर जवाब देने के लिए कहा, लेकिन इसी क्रम में एक और रिपोर्ट सामने आई। इसमें एनजीटी के तहत गठित एक संयुक्‍त समिति ने महाराष्ट्र के नांदेड़ में गोदावरी नदी की ‘खतरनाक’ स्थिति की पहचान की।

उस रिपोर्ट में न केवल अनुपचारित दूषित पानी का बहाव दर्ज किया गया, बल्कि पानी के नमूनों में BOD और COD का स्तर भी बेहद ऊंचा पाया गया। BOD मान 75-110 mg/L और COD मान 284-376 mg/L तक, जो राष्ट्रीय मानकों से बहुत ऊपर है। यह अध्ययन यह भी बताता है कि नालों के माध्यम से अनुपचारित दूषित पानी नदी में सीधे जाता है और कई एसटीपी निष्क्रिय या अधूरा पड़े हैं।

गोदावरी के जल गुणों में उभरते रसायनिक प्रदूषण का विश्लेषण करने वाली वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिकों की टीम का भी कहना है कि, “जल नमूने अव्यवस्थित अपशिष्ट, भारी धातुओं और पोषक तत्वों के समागम को दर्शाते हैं, जिससे नदी में जैविक ऑक्सीजन की कमी और जलीय जीवों के विलुप्त होने का जोखिम बन रहा है।” 

यह आंकड़ा एक तरह से एनजीटी के आदेश की समीक्षा का मूल संकेतक है क्योंकि संस्थाओं की निगरानी और रिपोर्ट में तालमेल का नहीं होना न केवल यह साफ तौर पर दर्शाता है कि अनुपचारित दूषित पानी अब भी प्रवाह में है, बल्कि वह स्तर इतना अधिक है कि नदी का पानी न तो पीने लायक़ है और न ही खेती के लायक़ ही।

जहां तक आदेशों के पालन का मामला है तो एसटीपी को चालू करने, औद्योगिक अपशिष्ट को नदी में बहाने से को रोकने, और नियमित गुणवत्ता जांच और उसकी रिपोर्ट का कोई स्पष्ट सार्वजनिक ट्रैक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि न्यायालय का आदेश जारी होना और उस पर अमल होना दो अलग-अलग चीज़ें हैं।

जल नमूने अव्यवस्थित अपशिष्ट
जल नमूने अव्यवस्थित अपशिष्ट, भारी धातुओं और पोषक तत्वों के समागम को दर्शाते हैं, जिससे नदी में जैविक ऑक्सीजन की कमी और जलीय जीवों के विलुप्त होने का जोखिम बन रहा है।

ऐसे में यह स्पष्ट है कि जब तक आदेश का अनुपालन, उसकी निगरानी और परिणाम प्रकाशित नहीं होंगे, तब तक प्रदूषण का यह चक्र चलता ही रहेगा। और किसी भी तरह का प्रणालीगत सुधार देखने को नहीं मिलेगा।

न्याय एक प्रक्रिया या सार?

जब किसी मामले को यह कहते हुए एनजीटी के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित किया जाता है कि यह पर्यावरणीय विवाद का विषय है, तो यह केवल न्यायिक प्रक्रिया का तकनीकी पहलू नहीं होता। यह संकेत भी देता है कि पर्यावरणीय शासन की प्राथमिक जिम्मेदारी रखने वाली संस्थाएं, जैसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और तेलंगाना राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (टीएसपीसीबी) निगरानी, प्रवर्तन और अनुपालन सुनिश्चित करने में अपेक्षित स्तर तक प्रभावी नहीं रही हैं।

गोदावरी के मामले में सवाल यह नहीं है कि इसके प्रदूषण का मुद्दा किस मंच पर विचाराधीन है, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या उपलब्ध नियामक तंत्र नदी-स्वास्थ्य के मानकों को सुनिश्चित कर पा रहा है। यदि बीओडी और सीओडी जैसे संकेतक लगातार मानकों से ऊपर दर्ज हो रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि:

  • या तो प्रदूषण नियंत्रण तंत्र पर्याप्त नहीं है,

  • या निगरानी और प्रवर्तन में संरचनात्मक कमी है,

  • या अनुपालन संबंधी डेटा सार्वजनिक रूप से पारदर्शी नहीं है।

पर्यावरणीय न्याय केवल आदेश जारी करने तक सीमित नहीं होता। इसकी प्रभावशीलता इस बात से मापी जाती है कि क्या आदेशों के बाद प्रदूषण स्तर में मापनीय कमी आई, क्या अनुपचारित सीवेज का प्रवाह रुका, और क्या नियमित जल-गुणवत्ता आंकड़े सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराया गया।

यदि न्यायिक हस्तक्षेप के बाद भी नदी की स्थिति में ठोस सुधार दर्ज नहीं होता, तो यह न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक अमल के बीच मौजूद अंतर को रेखांकित करता है। इस अंतर को पाटना ही नदी-शासन की केंद्रीय चुनौती है।

सीपीसीबी और टीएसपीसीबी द्वारा मासिक जल-गुणवत्ता डेटा, एसटीपी संचालन स्थिति और औद्योगिक निर्वहन रिपोर्ट को सार्वजनिक पोर्टल पर नियमित रूप से अपडेट किया जाना चाहिए। पारदर्शिता, प्रवर्तन का पहला चरण है।

क्या आगे कोई संस्थागत राह है?

समस्या का समाधान केवल न्यायिक स्थानांतरण या नोटिस जारी करने से संभव नहीं होगा। इसके लिए बहु-स्तरीय संस्थागत सुधार और समयबद्ध निगरानी तंत्र की आवश्यकता है। संभावित कदम निम्नलिखित हो सकते हैं:

आंकड़ों की पारदर्शिता और सार्वजनिक प्रकटीकरण: सीपीसीबी और टीएसपीसीबी द्वारा मासिक जल-गुणवत्ता डेटा, एसटीपी संचालन स्थिति और औद्योगिक निर्वहन रिपोर्ट को सार्वजनिक पोर्टल पर नियमित रूप से अपडेट किया जाना चाहिए। पारदर्शिता, प्रवर्तन का पहला चरण है।

समयबद्ध अनुपालन रिपोर्टिंग: एनजीटी द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुपालन की स्थिति पर त्रैमासिक प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि आदेश के बाद क्या ठोस परिवर्तन हुए।

समयबद्ध अनुपालन रिपोर्टिंग: एनजीटी द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुपालन की स्थिति पर त्रैमासिक प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। इससे यह स्पष्ट होगा कि आदेश के बाद क्या ठोस परिवर्तन हुए।

सीवेज उपचार अवसंरचना का कार्यात्मक ऑडिट: केवल एसटीपी स्थापित होना पर्याप्त नहीं है। उनकी वास्तविक क्षमता उपयोग, आउटफ्लो गुणवत्ता और तकनीकी स्थिति का स्वतंत्र ऑडिट आवश्यक है।

अंतर्संस्थागत समन्वय: गोदावरी बहु-राज्यीय नदी है। अतः राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों, केंद्रीय एजेंसियों और नदी प्रबंधन बोर्ड के बीच डेटा-साझाकरण और संयुक्त निगरानी तंत्र विकसित करना अनिवार्य है।

प्रवर्तन की जवाबदेही: यदि औद्योगिक या शहरी निकाय मानकों का उल्लंघन करते पाए जाते हैं, तो दंडात्मक कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। इससे नियामक संस्थाओं की विश्वसनीयता और निवारक प्रभाव दोनों मजबूत होते हैं।

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