यमुना की असली व्यथा वह नहीं जो सफेद झाग में दिखती है, बल्कि वह है जो धीरे-धीरे नदी के जैविक तंत्र को ख़त्म कर रही है और उसे मिटा रही है।

 

चित्र: पीटीआई

नदी और तालाब

विलुप्त होने की कगार पर यमुना की मछलियां, पर क्यों?

यमुना में देशी मछलियों की लगातार घटती संख्‍या पहले ही का तेज़ी से लोप केवल प्रदूषण का नहीं, बल्कि पर्यावरणीय प्रवाह, सीवेज प्रबंधन और जैव-विविधता संरक्षण नीतियों की विफलता का संकेत है। एनजीटी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद क्रियान्वयन की कमी नदी-तंत्र और उस पर निर्भर समुदायों को लगातार संकट में डाल रही है।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

यमुना सिर्फ एक नदी नहीं है। खेतों को पानी देने, शहरों की प्यास बुझाने से लेकर मछुआरों के घर चलाने कार्य यह बखूबी करती आयी है। यह हमेशा से लोक-संस्कृति की स्मृति रही है। आज दिल्ली-आगरा में जब हम इसी यमुना पर काले, झागदार पानी को देखते हैं, तो चर्चा अक्सर सतही प्रदूषण तक सिमट जाती है। असल संकट उससे कहीं गहरा है, यह संकट पानी की सतह के नीचे, वहां है जहां जीवन का आधार छिपा है।

यमुना की असली व्यथा वह नहीं जो सफेद झाग में दिखती है, बल्कि वह है जो धीरे-धीरे नदी के जैविक तंत्र को ख़त्म कर रही है और उसे मिटा रही है। आज यमुना केवल एक ‘प्रवाह’ न रहकर एक विस्थापित पारिस्थितिकी तंत्र बन चुकी है। कभी यमुना नदी भारतीय प्रमुख कार्प, महाशीर, ईल और हिल्सा जैसी मछलियों का प्रमुख घर हुआ करती थी। आज इसी यमुना में मछलियों की कई प्रजातियां खतरे में हैं।

गायब होती मछलियां: कटला से महासीर तक

यमुना के घाटों पर कभी मछुआरों की टोकरियां रोहू-कटला से भरी होती थीं। नदी का मिज़ाज देखकर अनुभवी मछुआरे बता देते थे कि आज जाल में किस प्रजाति की मछलियों की संख्या ज़्यादा होगी। आज वही मछुआरे दिन भर जाल डालने के बाद या तो खाली हाथ लौटते हैं, या फिर ‘तिलापिया’ जैसी विदेशी मछलियां उनके हाथ लगती हैं। 

इन विदेशी मछलियों के लिए न तो बाजार में ठीक कीमत मिलती है और न ही स्थानीय भोजन संस्कृति में इनकी कोई जगह ही है। ऐसे में मछुआरों को आजीविका का संकट झेलने पर मजबूर होना पड़ता है।
हालांकि, यह बदलाव अचानक नहीं हुआ। यह दशकों से चल रही उपेक्षा, प्रदूषण और गलत नीतिगत प्राथमिकताओं का नतीजा है।

हिल्सा, बड़ी ईल्स और गोल्डन कार्प जैसी प्रजातियां अब केवल लोगों की स्मृतियों और इतिहास के पन्नों पर ही बची रह गई हैं।

वैज्ञानिक सर्वेक्षण से मिलने वाले तथ्य

भारतीय अंतःस्थलीय मत्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर- सीआईएफ़आरआई), प्रयागराज द्वारा विभिन्न दशकों में किए गए सर्वेक्षणों में यमुना की जैव-विविधता में आई गिरावट साफ दिखती है।

  • 1950 - 60 के दशक में यमुना में मछलियों की 126 से अधिक प्रजातियां दर्ज की गई थीं। इनमें भारतीय प्रमुख कार्प, महासीर और कई प्रवासी प्रजातियां शामिल थीं। लेकिन अब इनकी संख्या लगातार गिर रही है।

  • हाल के सर्वेक्षणों (2020-24) के अनुसार दिल्ली-एनसीआर और आगरा के हिस्सों में अब सिर्फ 15-20 प्रजातियां नियमित रूप से पाई जाती हैं। इनमें से अधिकांश आक्रामक विदेशी प्रजातियां हैं - जैसे नील तिलापिया, कॉमन कार्प और थाई मांगुर।

  • ‘टोर पुटिटोरा’ यानी सुनहरी महासीर, जो कभी यमुना की शान मानी जाती थी, अब मैदानी हिस्सों से लगभग गायब हो चुकी है और केवल हिमाचल-उत्तराखंड के कुछ पहाड़ी प्रवाहों तक सिमट गई है। महासीर, जो 1990 के दशक में लगभग 9 फ़ीसद हिस्सेदारी रखती थी, अब घट कर लगभग 1.7 फ़ीसद हो चुकी है।

हिल्सा, बड़ी ईल्स और गोल्डन कार्प जैसी प्रजातियां अब केवल लोगों की स्मृतियों और इतिहास के पन्नों पर ही बची रह गई हैं

ये आंकड़े सिर्फ प्रजातियों की संख्या नहीं बताते, बल्कि यह दिखाते हैं कि नदी का पूरा खाद्य-तंत्र (food web) ढह रहा है।

आईसीएआर-सीआईएफ़आरआई के अनुसार 126 से अधिक प्रजातियों में से स्थानीय कार्प और महासीर जैसी प्रजातियों का प्रतिशत लगातार घट रहा है, जबकि विदेशी प्रजातियां बढ़ती जा रही हैं।
इंडियन जर्नल ऑफ एनिमल साइंसेज़

क्यों मर रही हैं मछलियां?

यमुना की जैव-विविधता पर हमला एक नहीं, तीन दिशाओं से हो रहा है। यानि मछलियों के मरने के तीन बड़े कारण हैं:

प्रदूषण और ‘डेड ज़ोन’ का बनना: दिल्ली से होकर गुजरने वाला यमुना का लगभग 22 किलोमीटर का हिस्सा जैविक रूप से लगभग मृत घोषित किया जा चुका है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़े बताते हैं कि यमुना में गिरने वाला 70 फ़ीसद से अधिक प्रदूषण अकेले दिल्ली से आता है।

  • अमोनिया का स्तर कई बार 1.5 ppm से ऊपर दर्ज किया गया है, जबकि मछलियों के लिए सुरक्षित स्तर 0.1 ppm से कम माना जाता है।

  • लिए गए नमूनों में ओखला बैराज जैसे इलाक़े के आसपास कई मौकों पर घुलनशील ऑक्सीजन (डीओ) शून्य mg/L तक मिला है जबकि आवश्यक मानक स्तर लगभग 4-5 mg/L से ऊपर होना चाहिए।

बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) मानक 3 mg/L से कम होना चाहिए, लेकिन कई हिस्सों में यह संख्या 42 गुना अधिक पायी गई।

जहां ऑक्सीजन नहीं होता वहां जीवन की कल्पना असंभव है। यही कारण है कि गर्मियों में यमुना में बार-बार फिश किल्स (सामूहिक मछली मृत्यु) की घटनाएं और ख़बरें सामने आती रहती हैं।

दिल्ली से होकर गुजरने वाला यमुना का लगभग 22 किलोमीटर का हिस्सा जैविक रूप से लगभग मृत घोषित किया जा चुका है।

बांध, बैराज और टूटा हुआ प्रवाह: मछलियां स्थिर जीव नहीं होतीं। महासीर जैसी प्रजातियां प्रजनन के लिए धारा के विपरीत ऊपर की ओर जाती हैं। लेकिन हथनीकुंड, ताजेवाला, वजीराबाद और ओखला जैसे बैराजों ने यमुना को टुकड़ों में बांट दिया है। जिसकी वजह से - 

  • नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो गया है।

  • मछलियों के प्रवास मार्ग (माइग्रेशन रूट्स) टूट गए हैं।

  • रेत और गाद का प्राकृतिक बहाव रुकने से स्पॉनिंग ग्राउंड्स नष्ट हो गए हैं।

नतीजा यह कि मछलियां अब अंडे देने के लिए सुरक्षित स्थानों तक पहुंच ही नहीं पातीं।

विदेशी प्रजातियों का कब्ज़ा: तिलापिया और थाई मांगुर जैसी विदेशी प्रजातियां कम ऑक्सीजन, अधिक प्रदूषण और स्थिर पानी में भी जीवित रह सकती हैं। उनकी यही ‘क्षमता’ यमुना के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई है। जैसे-जैसे इन मछलियों की संख्‍या बढ़ी, वैसे-वैसे इनका वर्चस्व भी। आलम यह है कि अब:

  • प्रजनन क्षमता बहुत अधिक होने के कारण तेजी से बढ़ रही हैं।

  • ये देशी मछलियों के अंडे और भोजन खा जाती हैं।

आज यमुना से पकड़ी जाने वाली मछलियों में करीब 70-80 फ़ीसद हिस्सा तिलापिया का है। हालांकि, सांस्कृतिक और व्यावसायिक रूप से मछलियों की इन प्रजातियों का मूल्य बहुत कम है, लेकिन पारिस्थितिकी पर इसका प्रभाव बहुत महंगा साबित हो रहा है

संकट में मछुआरों का की आजीविका

यमुना के किनारे बसे मल्लाह, केवट और निषाद समुदायों के लिए नदी उनकी ‘अन्नपूर्णा’ थी। मछलियों की कमी ने उनकी पूरी सामाजिक संरचना को हिला दिया है। देशी मछलियों की कमी का सीधा प्रभाव उनकी आजीविका पर पड़ रहा है। इलाक़े के मछुआरों का कहना है कि पहले नदी उन्हें पहचानती थी और वे नदी के व्यवहार को जानते थे। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है, बढ़ते प्रदूषण और बदलती पारिस्थितिकी के कारण अब नदी और इससे जुड़े लोग दोनों एक दूसरे के लिए अजनबी होते जा रहे हैं।

नदी के समय प्रवाह वाले दिनों में पहले एक मछुआरा रोज़ 10-15 किलो रोहू या म्रिगल पकड़ लेता था। जिसे बेचकर एक दिन में लगभग 1000-1200 रुपये की कमाई हो जाती थी। आज वहीं 2-3 किलो तिलापिया भी मुश्किल से मिलती है, नतीजतन दिन की कमाई घटकर 100-200 रुपये तक पहुंच गई है। 

नई पीढ़ी मछली पकड़ने का पारंपरिक ज्ञान छोड़कर दिहाड़ी मजदूरी की ओर जा रही है। यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और नदी-संस्कृति का लोप है। नदी की समझ, स्थानीय मौसम, प्रवाह और प्रजातियों का ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी मिट रहा है।

नई पीढ़ी मछली पकड़ने का पारंपरिक ज्ञान छोड़कर दिहाड़ी मजदूरी की ओर जा रही है। यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और नदी-संस्कृति का लोप है।

खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य का प्रश्न

यमुना किनारे के कई गांवों के लिए मछली प्रोटीन का सस्ता और सुलभ स्रोत थी। अब प्रदूषित पानी और विदेशी मछलियों के कारण:

  • स्थानीय लोगों का भरोसा नदी के भोजन से उठ रहा है।

  • पोषण असुरक्षा और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं।

  • मछली अब दूसरे राज्यों से मंगानी पड़ रही है, जिससे कीमतें बढ़ गई हैं।

हालांकि विभिन्न एजेंसियों ने स्थानीय मछली प्रजातियों के संरक्षण के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन इन कार्यक्रमों के बावजूद देशी मछलियों की संख्या में गिरावट देखी जा रही है। इसलिए यह आवश्यक है कि नीतिगत प्रयासों को ज़मीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और ए. सेंथिल वेल की पीठ

क्या अब भी उम्मीद है?

यमुना को पुनर्जीवित करने की ज़िम्मेदारी सरकार के साथ-साथ समुदायों और ग़ैर-सरकारी समूहों की भी है। न ही यह केवल पर्यावरणवादियों का काम है। बल्कि यह सामुदायिक, प्रशासनिक और नीति-निर्माण का संगम है। ठोस कदम और दृढ़ निश्चय के साथ नदी को प्रदूषण-मुक्त करने का लक्ष्य पूरा किया जा सकता है। 

इसके लिए निम्न कार्यों को सुनिश्चित करना होगा- 

  • न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) को सुनिश्चित करना: नदी में साल भर पर्याप्त मात्रा में पानी का होना और उसका प्रवाह ज़रूरी है ताकि प्रदूषण फैल कर नहीं घुल कर कम हो।

  • सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का जवाबदेह संचालन: केवल एसटीपी बनाना काफी नहीं, बल्कि उनका संचालन यह सुनिश्चित करे कि आउटफ्लो जलीय जीवों के लिये सुरक्षित हो।

  • इनवेसिव प्रजाति नियंत्रण योजना: विदेशी प्रजातियों की अनियंत्रित हो रही आबादी पर रोक लगाना होगा, विशेषकर धार्मिक या अनियमित रिलीज के लिये सख़्त नीतियों का निर्माण ज़रूरी है।

  • स्थानीय समुदायों की भागीदारी: मछुआरों को नदी के ‘निगरानीकर्ता’ के रूप में प्रशिक्षित करना, अवैध शिकार रोकने, डेटा संग्रह में मदद करने तथा सफाई अभियानों को ज़मीनी स्तर पर मजबूत बनाने का काम कर सकते हैं।

एनजीटी के आदेश: कागज पर संरक्षण, ज़मीन पर संकट

सीआईएफ़आरआई, सीपीसीबी और एनजीटी के आदेशों को ज़मीनी स्तर पर लागू करना: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पांच राज्यों, हिमाचल, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को स्वजातीय मशीली देशी मछली जैव विविधता बचाने और विदेशी प्रजातिओं के अतिक्रमण पर नियंत्रण के लिए सख़्त आदेश दिए हैं। 29 जनवरी 2026 के इस आदेश में निम्नलिखित बिंदु शामिल थे:

मछली जैव-विविधता संरक्षण के निर्देश

  • केंद्रीय अंतःस्थलीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (ICAR-CIFRI) की सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश सरकारों को ज़ोरदार निर्देश।

  • देशी प्रजातियों के संरक्षण और विदेशी प्रजातियों (जैसे तिलापिया, थाई मांगुर) के नियंत्रण के लिए रणनीति बनाना।

  • अवैध मछली पकड़ने के उपकरणों की रोक।

  • संरक्षण ज़ोन घोषित करना, मछली प्रजनन/स्टॉकिंग प्रथाओं को अपनाना।

  • रैंचिंग (fish ranching) और उपयुक्त रिकॉर्ड रखना।

पर्यावरणीय और प्रवाह-संबंधी आदेश

  • सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का कार्यान्वयन तेज़ करना ताकि निकलने वाला पानी जलीय जीवन के लिए सुरक्षित हो।

  • न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ़्लो) सुनिश्चित करना, ताकि मछलियों के प्रवास और प्रजनन के मार्ग खुले रहें।

  • सैंड माइनिंग और प्रवास मार्गों में अवरोधों को हटाना, तथा बैराज़ पर फिश लैडर जैसे उपाय लागू करना।

यह स्पष्ट करता है कि यमुना का पुनर्जीवन केवल सफ़ाई परियोजना नहीं, बल्कि एक समग्र नदी-प्रबंधन नीति की मांग करता है। हालांकि मौजूदा हालातों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि इन आदेशों का सख़्ती से पालन नहीं हो रहा है। 

इसके मुख्य कारणों में क्रियान्वयन और जवाबदेही का अभाव, दिल्ली जल बोर्ड, सीपीसीबी और एनएमसीजी जैसी संस्थाओं के बीच समन्वय की कमी, तथा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का निर्धारित पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप संचालन न हो पाना शामिल है।

स्रोतों की अस्पष्ट जवाबदेही, प्रशासनिक विलम्ब और नीति तथा ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच बढ़ता अंतर इस दिशा में अब तक ठोस और व्यापक बदलाव आने से रोक रहा है।

यमुना की देशी मछलियां हमें यह बताने का काम करती हैं कि नदी कितनी जीवित है। अगर वे लुप्त हो रही हैं, तो इसका संबंध नदी की पारिस्थितिकी से है और यह बताता है कि नदी-तंत्र ख़तरे में है।

एक मरी हुई नदी के किनारे कोई सभ्यता लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकती। यमुना को उसकी मछलियां लौटाना, दरअसल न केवल यमुना को उसका जीवन लौटाना है बल्कि उस पर निर्भर लोगों और जीव-जंतुओं के आसरे को भी बचाना है।

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