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अपरदन (Erosion) एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसमें मिट्टी, रेत और चट्टानों का क्षरण होकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर चला जाता है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से पानी, हवा, बर्फ और गुरुत्वाकर्षण के कारण होती है। यह भूमि की उर्वरता, जल स्रोतों और कृषि उत्पादन को सीधे प्रभावित करता है।
अपरदन वह प्रक्रिया है जिसमें प्राकृतिक शक्तियों (जैसे जल, वायु या हिम) द्वारा मिट्टी और चट्टानों का धीरे-धीरे कटाव और स्थानांतरण होता है।
जल अपरदन (Water Erosion) सबसे सामान्य प्रकार है, जिसमें वर्षा का पानी, नदियाँ और बाढ़ मिट्टी को बहाकर ले जाती हैं। जब पेड़-पौधे कम हो जाते हैं, तो मिट्टी खुली रह जाती है और अपरदन की गति बढ़ जाती है।
इसके निम्न उदाहरण है -
भारी बारिश के बाद खेतों की ऊपरी उपजाऊ मिट्टी बह जाना
नदियों के किनारों का कटाव
बांधों में गाद (sediment) जमा होना
जल अपरदन (Water Erosion): वर्षा, नदी और बाढ़ के कारण
शीट अपरदन, रील अपरदन, गली अपरदन (Gully erosion)
वायु अपरदन (Wind Erosion): सूखे और रेगिस्तानी क्षेत्रों में तेज हवाओं द्वारा राजस्थान जैसे क्षेत्रों में आम
हिम अपरदन (Glacial Erosion): ग्लेशियर के खिसकने से चट्टानों का कटाव
तटीय अपरदन (Coastal Erosion): समुद्री लहरों द्वारा तटों का क्षरण
भारत के सन्दर्भ में देखे तो चंबल क्षेत्र (मध्य प्रदेश/राजस्थान) में गली अपरदन के कारण बीहड़ बन गए है।गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों के किनारों पर हर साल कटाव होता है। कर्नाटक और महाराष्ट्र में भारी बारिश से खेतों की मिट्टी बह जाती है।
मिट्टी की उर्वरता कम होती है
कृषि उत्पादन घटता है
जलाशयों में गाद जमा होती है
बाढ़ की संभावना बढ़ती है
पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है
अपरदन किसानों के लिए एक बड़ी समस्या है। जब उपजाऊ मिट्टी बह जाती है, तो फसल की पैदावार कम हो जाती है। इसके समाधान के लिए:
कंटूर प्लाउइंग (Contour Ploughing)
टेरेस खेती (Terrace Farming)
वृक्षारोपण (Afforestation)
चेक डैम और जल संरक्षण संरचना
भारत सरकार और FAO (Food and Agriculture Organization) ने कई मिट्टी संरक्षण कार्यक्रम चलाए हैं, जैसे वाटरशेड मैनेजमेंट प्रोग्राम, जो अपरदन को कम करने में मदद करते है।
वनों की कटाई
अत्यधिक चराई
असंतुलित कृषि पद्धतियाँ
जलवायु परिवर्तन
अपरदन एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन मानव गतिविधियों के कारण इसकी तीव्रता बढ़ गई है। इसे नियंत्रित करना आवश्यक है ताकि भूमि की उर्वरता, जल संसाधन और पर्यावरण संतुलन सुरक्षित रह सके।
मृदा अपरदन के कारण मिट्टी को मुख्य रूप से पांच प्रकार की हानियां होती हैं जो इस प्रकार हैं-
भूमि कि ऊपरी उपजाऊ पर्त जिसे जीवित पर्त भी कहते हैं, लगातार कटाव के कारण घटती रहती है। उपजाऊ पर्त के बहने से भूमि की उपजाऊ क्षमता घटती जाती है परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में अपरदन ग्रस्त भूमि (Eroded Soil) कृषि योग्य नहीं रह जाती।
मिट्टी के उपरी पर्त में कार्बनिक पदार्थ (Organic Matter), पोषक तत्व (Nutrient Elements)तथा सूक्ष्मजीव (Micro Organisms) पाये जाते हैं। मृदा अपरदन (Soil erosion) एवं अनियंत्रित अपवाह (Uncontrolled runoff) अपने साथ पोषक तत्वों एवं सूंक्ष्मजीवों को भी बहा कर ले जाता है। फलस्वरूप भूमि की उत्पादकता दिन पर दिन घटती जाती है तथा भूमि बंजर में परिवर्तित होने लगती है।
अनियंत्रित अपवाह की स्थिति में वर्षाजल का भूमि के अन्दर रिसाव के लिए कम समय मिलता है। वर्षा जल का अधिकांश हिस्सा भूमि के उपर बहते हुए नदी नालों में चला जाता है। अधिक अपवाह (Runoff) मृदा अपरदन की समसयां को और बढ़ाता है।
मृदा की उर्वरता (Fertility) घटने के कारण भूमि का वानस्पतिक आवरण घटने लगता है परिणामस्वरूप वर्षा की बूंदे तीव्र वेग से सीधे जमीन पर गिरती है और मृदा अपरदन को बढ़ावा देती है । कम वानस्पतिक आवरण (Vegetative Cover) की परिस्थित में वर्षाजल का अपवाह वेग अनियंत्रत हो जाता है जो मृदा अपदरन की समस्या को और बढ़ा देता है ।
अनियंत्रित वर्षाजल का बहाव जमीन पर गहरी नालियां बना देता है जिससे अपदरन ग्रस्त भूमि पर कृषि कार्य करना तथा कृषि यंत्रों का प्रयोग असंम्भव हो जाता है।
ऐसी कोई भी जगह जहां पर दो चीजों के बीच घर्षण होता है, वहां अपरदन की संभावना रहती है। प्राकृतिक घटनाओं की बात करें तो निम्न अपरदन प्रमुख माने जाते हैं-
समुद्रतट पर लहरों और ज्वारभाटा की क्रिया के कारण पृथ्वी के भाग टूटकर समुद्र में विलीन होते जाते हैं। मिट्टी अथवा कोमल चट्टानों के सिवाय कड़ी चट्टानों का भी इन क्रियाओं से धीरे धीरे अपक्षय होता रहता है।
वर्षा और तुषार भी इस क्रिया में सहायक होते हैं। वर्षा के जल में घुली हुई गैसों की रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप, कड़ी चट्टानों का अपक्षय होता है। ऐसा जल भूमि में घुसकर अधिक विलेय पदार्थों के कुछ अंश को भी घुला लेता है और इस प्रकार अलग्न हुए पदार्थों को बहा ले जाता है। वर्षा, पिघली हुई ठोस बर्फ और तुषार निरंतर भूमि का क्षरण करते हैं। इस प्रकार टूटे हुए अंश नालों या छोटी नदियों से बड़ी नदियों में और इनसे समुद्र में पहुँचते रहते हैं।
नदियों का अथवा अन्य बहता हुआ जल किनारों तथा जल की भूमि को काटकर, मिट्टी को ऊँचे स्थानों से नीचे की ओर बहा ले जाता है। ऐसी मिट्टी बहुत बड़े परिणाम में समुद्र तक पहुँच जाती है और समुद्र पाटने का काम करती है। समुद्र में गिरनेवाले जल में मिट्टी के सिवाय विभिन्न प्रकार के घुले हुए लवण भी होते हैं।
दिन में धूप से तप्त चट्टानों में पड़ी दरारें फैल जाती हैं तथा उनमें अड़े पत्थर नीचे सरक जाते हैं। रात में ठंड पड़ने या वर्षा होने पर चट्टानें सिकुड़ती है और दरारों में पड़े पत्थरों के कारण दरारें और बड़ी हो जाती है। शीतप्रधान देशों में इन्हीं दरारों तथा भूमि के अंदर रिक्त स्थानों में जल भर जाता है। अधिक शीत पड़ने पर जल हिम में परिवर्तित हो जाता है और तब उन स्थानों या दरारों को फाड़कर तोड़ देता है। इन क्रियाओं के बार बार दोहराए जाने से चट्टानों के टुकड़े टुकड़े हो जाते है।
इन टुकड़ों को जल और वायु अन्य स्थान पर ले जाते हैं। जिन प्रदेशों में दिन और रात के ताप में अधिक परिवर्तन होता है वहाँ की मिट्टी निरंतर प्रसार और आकुंचन के कारण ढ़ीली हो जाती है एवं वायु अथवा जल द्वारा अन्य स्थानों पर पहुँच जाता है।
शुष्क प्रांतों में, जहाँ वनस्पति से ढंकी नहीं होती, वायु अपार बालुकाराशि एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाती है। इस प्रकार सहारा मरुभूमि की रेत, एक ओर सागर पार सिसिली द्वीप तक और दूसरी ओर नाइजीरिया के समुद्र तट तक, पहुँच जाती है। वायु द्वारा उड़ाया हुआ बालू ढूहों अथवा ऊँची चट्टानों के कोमल भागों को काटकर उनकी आकृति में परिवर्तन कर देता है। जल में बहा हुआ पदार्थ सदा ऊँचे स्थान से नीचे को ही जाता है, किंतु वायु द्वारा उड़ाई हुई मिट्टी नीचे स्थान से ऊँचे स्थानों को भी जा सकती है।
गतिशील हिम जिन चट्टानों पर से होकर जाता है उनका क्षरण करता है और इस प्रकार मुक्त हुए पदार्थ को अपने साथ लिए जाता है। वायु तथा नदियों के कार्य की तुलना में, ध्रुव प्रदेश को छोड़कर पृथ्वी के अन्य भागों में, हिम की क्रिया अल्प होती है।
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