द्रवघनत्वमापी (Hydrometer) ऐसे यंत्र को कहते हैं जिससे बिना किसी गणना के, द्रवों के घनत्व पढ़े जा सकते हैं। इन यंत्रों की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान अत्यंत प्राचीन समय से था और इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि आर्किमीडीज़ (187- 212 ई.पू.) को इनकी जानकारी थी।
द्रवधनत्वमापी की रचना इस सिद्धांत पर आधारित है कि द्रव में अंशत: निमज्जित और संतुलित पिंड का भार उतने द्रव के भार के बराबर है जो पिंड का डूबा हुआ भाग विस्थापित करता है। जब द्रवघनत्वमापी को ऐसे द्रव में छोड़ते हैं जिसमें यह स्वतंत्र रूप से तैर सकता है, तब उसके दंड और द्रव के समतल पृष्ठ के प्रतिच्छेदन से द्रव का घनत्व पढ़ लिया जाता है। पढ़ने के लिए दंड के भीतर एक मापनी चिपकी रहती है। यदि इस मापनी के किसी विशिष्ट अंशांकन चिन्ह से नीचे द्रवघनत्वमापी का आयतन आ'(V') है और द्रव का घनत्व घ ( ) है, तो विस्थापित द्रव का द्रव्यमान आफ़ घ (V' ) हुआ। यदि द्रवघनत्वमापी का द्रव्यमान द्र (M) है तो आघ = द्र [V' =M] अर्थात् घ = द्र/आ'[ =M/V']अतएव यदि दंड पर अंकित निम्नतम चिन्ह के नीचे आयतन आ (V) और उच्चतम तथा निम्नतम चिन्हों के बीच आयतन अ (v) है, तो उन घनत्वों का परास जो द्रवघनत्वमापी से नापे जा सकते हैं द्र/(आ + अ) [M/(V+v)] से द्र/आ [M/V]तक है। इन सूत्रों को प्राप्त करने में पृष्ठतनाव और तापपरिवर्तन के लघु प्रभावों की उपेक्षा की गई है। मापनी पर क्रमिक अंशांकन चिन्हों के बीच इतना संभव होता है कि वे सुविधापूर्वक पढ़े जा सकें। इन भी क्रमानुसार लिखी होती हैं, जिनसे घनत्व तुरंत जाना जा सके। घनतव का एकक प्राय: ग्राम प्रति मिलीलिटर लिया जाता है। यह एकक द्रव्यमान और लंबाई के मूलभूत एककों पर आधारित रहता है।
द्रवघनत्वमापी के उपयोग- एक प्रायोगिक उपयोग द्रव की शुद्धता का अनुमान करना है। पेट्रोलियम उद्योग में पेट्रोलियम उत्पादों के घनत्व को उनके गुण का मापदंड माना जाता है। प्रायः घनत्व के स्थान में आपेक्षिक घनत्व का प्रयोग होता है, जिसका अर्थ है, उत्पाद और पानी दोनों के 15रू सें. ताप पर के घनत्वों का अनुपात। जिन द्रवों से काम पड़ता है उनके प्रसार-गुणांक बड़े होने के कारण उनके घनत्वों की तुलना के लिए एक विशिष्ट ताप का चुना जाना वांछनीय है और यह ताप सामान्यतया 25रू सें. लिया जाता है। द्रवघनत्वमापी की मापनी के अंशांकन चिन्हों पर वे घनत्व लिखे रहते हैं जो इस ताप के उस द्रव का होता जिसमें द्रवघनत्वमापी इस अंश तक डूबता। किंतु द्रव का सदा इस ताप पर लाना असुविधाजनक होता है, इसलिए नीचे जैसी एक द्विक् सारणी दी रहती है, जिसमें द्रवघनत्वमापी के पाठ्यांक और द्रवताप के संगत, 15रू सें. पर घनत्व प्राप्त करने के लिए संशोधन पढ़ा जा सकता है :
| द्विक् सारणी का प्रतिदर्श | ||||
| द्रवघनत्वमापी का पाठ्यांक, ग्राम प्रति मिलि. | सें. डिग्री में ताप, | |||
| 10° | 11° | 17° | 21° | |
| 0.700 | - 0.0048 | - 0.0038 | + 0.001 | + .0048 |
| 0.750 | - 0.0044 | - 0.0035 | + .0001 | + .0043 |
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