सिंचाई शब्द प्राय: भूसिंचन के लिए प्रयोग में आता है। कृषि के लिए जहाँ भूमि, बीज और परिश्रम की अनिवार्यता रहती है, वहाँ पौधों के विकास में जल अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य करता है। बीज से अंकुर फूटने से लेकर उससे फल फूल निकलने तक की समस्त क्रिया में जल व्यापक रूप में चाहिए; यदि जल पर्याप्त मात्रा में न हो तो उपज कम होती है।
सामान्यत: कृषि योग्य भूमि पर गिरा हुआ जल भूमि द्वारा सोख लिया जाता है और उसमें वह कुछ समय तक समाया रहता है। पौधा अपनी जड़ों के द्वारा इस जल का भूमि से तरल तत्व प्राप्त करने के लिए उपयोग करता है। इस प्रकार सिंचाई का उद्देश्य पौधों के जड़ क्षेत्र में जल तथा नमी बनाए रखना है।
मुख्यत: सिंचाई के तीन साधन हैं। प्रथम वे जिनमें नदी के बहते पानी में रोक लगाकर, वहाँ के नहरों द्वारा जल भूसिंचन के लिए लाया जाता है। दूसरे वे जहाँ जल को बाँधकर जलाशयों में एकत्र किया जाता है और फिर उन जलाशयों से नहरें निकालकर भूमि को सींचा जाता है। तीसरे ढंग से जल को पंपों अथवा अन्य साधनों द्वारा नदी या नालों से उठाकर उसे नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाया जाता है।
इनके आंतरिक भूगर्भ में संचित जल को भी, कूपों में लाया जाता है। यह तरीका अन्य सभी ढंगों से अधिक विस्तृत क्षेत्रों में फैला हुआ है क्योंकि इसमें सिंचाई क्षेत्र के आसपास ही कूप या नलकूप लगाकर जल प्राप्त करने की सुविधा रहती है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देशों में सिंचाई का प्रचलन बहुत पुराना है। इसमें छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की सिंचाई योजनाएँ भूसिंचन के लिए लागू की जाती रही हैं। इनमें से कई तो कई शताब्दियों पूर्व बनाई गई थीं। इनमें कावेरी का 'बड़ा एनीकट' उल्लेखनीय है। यह लगभग एक हजार वर्ष पूर्व बनाया गया था। किंतु सिंचाई के क्षेत्र में भारत ने वास्तविक प्रगति तो गत शताब्दी में ही की। तभी उत्तर प्रदेश में गंगा की बड़ी नहरों, पंजाब में सरहिंद और व्यास की विशाल नहरों के साथ अन्य प्रदेश में भी बहुत-सी अच्छी नहरों का निर्माण किया गया। बड़े-बड़े तालाबों का निर्माण तो सहस्रों वर्षों से हमारे देश में विशेषकर दक्षिण भारत में होता रहा है। ऐसे छोटे बड़े बाँधों और सरोवरों की बड़ी संख्या पठारी क्षेत्रों में विशेष रूप से विद्यमान है।
सन् 1947 से स्वतंत्रता के पश्चात् तो सिंचाई पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया है। पंचवर्षीय योजनाओं में सिंचाई कार्यों को उच्च प्राथमिकता दी गई है। पंचवर्षीय योजनाएँ शुरू होने से पूर्व समस्त साधनों से केवल 5.14 करोड़ एकड़ भूमि पर सिंचाई होती थी जिसमें 2.91 करोड़ एकड़ लघु सिंचाई कार्यों से और 2-23 करोड़ एकड़ भूमि को बड़े सिंचाई कार्यों द्वारा सींचा जाता था। पंचवर्षीय योजनाओं में लगातार सिंचन क्षेत्र बढ़ता ही गया। अनुमान है, पाँचवीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक अर्थात् 1975-76 ईं. के अंत में बड़े तथा मध्यवर्गीय सिंचाई कार्यों द्वारा 11.1 करोड़ एकड़ एवं छोटे सिंचाई कार्यों द्वारा 7.5 करोड़ एकड़ भूमि के लिए सिंचाई की व्यवस्था हो जाएगी।
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत सिंचाई के मामले में संसार के राष्ट्रों में अग्रणी है। चीन को छोड़कर संसार के बहुत से देशों में सिंचित क्षेत्र भारत की तुलना में बहुत कम हैं।
सिंचाई (Irrigation) तथा निकास (Drainage) के अंतर्राष्ट्रीय आयोग द्वारा 1963 ई. प्रकाशित आँकड़ों से यह बात स्पष्ट हो जाती है।
| सिंचित क्षेत्रफल | (करोड़ एकड़) |
| भारत | 6.34 |
| संयुक्त राज्य अमरीका | 3.77 |
| सोवियत यूनियन | 3.04 |
| पाकिस्तान | 2.66 |
| ईराक | 0.91 |
| इंडोनेशिया | 0.90 |
| जापान | 0.78 |
| संयुक्त अरब गणराज्य | 0.67 |
| मेक्सिको | 0.67 |
| इटली | 0.66 |
| सूडान | 0.62 |
| फ्रांस | 0.61 |
| स्पेन | 0.45 |
| चिली | 0.34 |
| पीरू | 0.30 |
| आर्जेंटीना | 0.27 |
| थाइलैंड | 0.26 |
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