राजस्‍थान की सांभर झील में हर साल के मुक़ाबले इस बार काफ़ी ज्‍़यादा फ्लेमिंगो पक्षी प्रवास के लिए आए हैं।  स्रोत : विकी कॉमंस
मौसम

हज़ारों मील उड़कर सांभर झील क्यों आते हैं फ्लेमिंगो? फिर कैसे घर वापस जाते हैं ये पक्षी?

फ्लेमिंगो का प्रवास राजस्‍थान की सांभर झील के जैविक स्वास्थ्य और पारिस्थितिक तंत्र के लिए अच्‍छा माना जाता है। इस साल अच्‍छी बारिश के कारण फ्लेमिंगो भारी तादाद में यहां पहुंचे हैं। इस लेख में हम फ्लेमिंगो से जुड़े रोचक तथ्‍यों के साथ यह भी जानेंगे कि कैसे ये विदेशी मेहमान अपने घर लौटते हैं और कैसा होता है उनका वापसी का सफ़र !

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

नमक उत्‍पादन के लिए मशहूर राजस्थान की विश्व प्रसिद्ध सांभर झील का नज़ारा इन दिनों 'गुलाबी' हो गया है। झील गुलाबी रंग के हज़ारों खूबसूरत प्रवासी फ्लेमिंगो (Flamingo) पक्षियों की चहचहाहट से गुलज़ार हो गई है। उनकी अटखेलियों का यह खूबसूरत नज़ारा दुनिया भर के पक्षी प्रेमियों (बर्डवॉचर), प्रकृति प्रेमियों, फोटोग्राफ़रों और सैलानियों को भी आकर्षित कर रहा है।

सेंट्रल एशियन फ्लाईवे से हज़ारों मील की उड़ान भर कर हर साल नवंबर-दिसंबर में प्रवास के लिए सांभर झील पहुंचने वाले फ्लेमिंगो इस साल भी भारी तादाद में यहां पहुंचे हैं। इन विदेशी पक्षियों को राजस्‍थान की स्‍थानीय भाषा में 'पावणे' कहा जाता है। उनके इस आगमन ने इस नमकीन झील को  'गुलाबी समंदर' का रूप दे दिया है। 

यूं तो करीब 240 वर्ग किलोमीटर में फैली सांभर झील दशकों से फ्लेमिंगो के लिए सर्दियों का एक खास ठिकाना (स्टॉपओवर) है, जहां पहुंचने के लिए यह झील रूस, साइबेरिया और मंगोलिया जैसे देशों से हर साल लंबी दूरी तय कर राजस्‍थान पहुंचते हैं। पर, इस साल अपेक्षाकृत ज्‍़यादा संख्‍या में फ्लेमिंगो के यहां पहुंचने की वजह मौसम है जिसकी बदौलत इस बार इन विदेशी पंछियों के लिए ज्‍़यादा अनुकूल परिस्थितियां बनना बताया जा रहा है। 

इस साल ज्यादा बारिश ने इनके प्रवास के लिए बेहतर स्थितियां बनाई हैं। इससे झील में पानी का अच्छा स्तर बना हुआ है और भोजन की प्रचुरता ने बड़ी संख्या में इन प्रवासी पक्षियों के बड़-बड़े झुंडों को झील में प्रवास और प्रजनन के लिए प्रोत्साहित किया है। इसमें इनकी दोनों मुख्‍य प्रजातियां लेसर फ्लेमिंगो और ग्रेटर फ्लेमिंगो शामिल हैं। इनके साथ ही 10 से 12 प्रजाति के बतख, वेडर्स, पिंटेल, केंटिश, ब्लॉवर्स, बार हेडेड गूज, ग्रे लेग गूज, ट्रफ्टेड डक, सुर्खाब, नॉर्दन शॉवलर, कॉमन क्रेन और पेराग्रीन फाल्कन यहां देखे जा सकते हैं। आमतौर पर सांभर झील में इनका सालाना प्रवास अक्टूबर-नवंबर में शुरू होकर फरवरी-मार्च तक चलता है, पर इस बार सबसे ज्यादा माइग्रेशन दिसंबर से देखने को मिल रहा है। इसके चलते इस समय झील के इलाके में लगभग 2 से 2.5 लाख फ्लेमिंगो देखे जा सकते हैं।

सांभर झील में मौजूद नीली-हरी शैवाल का भोजन करके फ्लेमिंगो की गुलाबी रंगत और भी निखर उठती है।

फ्लेमिंगो की विशेषताएं

फ्लेमिंगो पक्षियों के फोनीकोप्टेरिडे (Phoenicopteridae) परिवार से संबंधित है। फ्लेमिंगो की छह प्रजातियां हैं, जिनके नाम हैं ग्रेटर फ्लेमिंगो (गुजरात का राज्य पक्षी), चिली फ्लेमिंगो, लेसर फ्लेमिंगो, कैरेबियन फ्लेमिंगो, एंडियन फ्लेमिंगो और पुना फ्लेमिंगो। ये पक्षी उत्‍तरी अमेरिका, अफ्रीका, एशिया और यूरोप की झीलों, कीचड़युक्त भूमियों और उथले लैगूनों में पाए जाते हैं। यह अपने चमकीले गुलाबी पंखों वाले विशिष्ट स्वरूप के लिये जाने जाते हैं। 

फ्लेमिंगो के पैर और गर्दन बाकी शरीर की तुलना में काफ़ी लंबे होते हैं। जालदार पंजे तैरने में मदद करते हैं और ये कीचड़ में आसानी से चल सकते हैं। दोनों कार्यों में मदद के लिए पंजों में जालीदार संरचना होती है। मछलियों के शिकार और कीड़ों को खाने के लिए नीचे की ओर मुड़ी हुई चोंच होती है, जो फिल्टर-फीडिंग के लिए यानी भोजन को कीचड़ व पानी से अलग करने के लिए अनुकूलित होती है। फ्लेमिंगो के आवास और भोजन के स्रोत स्थान तथा मौसम के अनुसार बदलते रहते हैं, जिसके कारण उनका रंग गहरे या चमकीले गुलाबी से लेकर नारंगी, लाल या शुद्ध सफेद तक देखने को मिलता है। 

लेजर फ्लेमिंगो का आकार ढाई से साढ़े तीन फीट होता है, जबकि ग्रेटर फ्लेमिंगो पांच फीट तक का होता है। लेजर फ्लेमिंगो के पंख और शरीर का बड़ा हिस्सा गुलाबी होता है, जबकि ग्रेटर फ्लेमिंगो का रंग सफेद होता है। प्रजनन (मेटिंग) की प्रक्रिया में मादा को आकर्षित करने में नर फ्लेमिंगो के शरीर के गुलाबी रंग की अहम भूमिका होती है। 

लेजर फ्लेमिंगो का गुलाबी रंग ब्लू ग्रीन एल्गी (नील-हरित शैवाल) खाने से ज्यादा गहरा होता है, ये शैवाल (Cyanobacteria) सांभर झील में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसीलिए फ्लेमिंगो हज़ारों मील की उड़ान भरकर प्रजनन और प्रवास के लिए यहां हर साल आते हैं। फ्लेमिंगो एक खास प्रक्रिया से जोड़ा बनाते हैं। जिसे कोर्टशिप डिस्प्ले कहा जाता है। इसमें नर और मादा गोला बनाकर चलते हैं, जिससे ऐसा लगता है जैसे वे डांस कर रहे हैं। 

फ्लेमिंगो ने खुद को उच्च लवणता और तापमान वाले चरम वातावरण के लिये अनुकूलन कर लिया है, जहां उनके शिकारी सीमित हैं। इनकी पारिस्थितिक भूमिका की बात करें, तो यह शैवाल, कीटों और मछलियों को खाकर इनकी आबादी को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इस तरह ये अपने आहार संबंधी गतिविधियों के ज़रिये अपने आवास के पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जो पोषक चक्रण (Nutrient cycling) को दुरुस्‍त रखता है।

रूस के साइबेरियाई इलाके़ और मंगोलिया के बर्फी़ले इलाक़ों में रहने वाले फ्लेमिंगो नवंबर से जनवरी के बीच भारत सहित दुनिया के विभिन्‍न हिस्‍सों में प्रवास करते हैं।

सांभर झील में इतनी संख्या में फ्लेमिंगो क्यों आते हैं?

दरअसल, रूस, मंगोलिया और साइबेरिया के सुदूर ठंडे इलाकों में स्‍थ‍ित इनके मूल निवास में अक्‍तूबर से जनवरी तक कड़ाके की सर्दी पड़ती है और सब कुछ जम जाता है। इन हालातों में ये पक्षी हजारों किलोमीटर की उड़ान भरकर प्रवास और प्रजनन के लिए सांभर आते हैं, जहां उन्हें प्रचुर मात्रा में एल्गी और उस पर पनपने वाले छोटे-छोटे कीड़े भोजन के रूप में मिल जाते हैं। 

सांभर झील 240 वर्ग किलोमीटर में फैली भारत की एक प्रमुख सैलाइन वेटलैंड यानी खारी आर्द्रभूमि है। इसके पारिस्थितिक महत्त्व के कारण इसे वर्ष 1990 में रामसर स्थल घोषित किया गया। खारे पानी की झील होने के कारण यह फ्लेमिंगो जैसे तमाम प्रवासी पक्षियों के लिए एक नैचुरल हैबिटैट है। प्रवासी पक्षियों को यहां प्रचुर मात्रा में भोजन के अलावा पर्याप्‍त मात्रा में पानी का भराव (कम से कम एक फुट) है। यह भी इन प्रवासी पक्षियों को आकर्षित यहां आने के लिए करने का एक बड़ा कारण है। 

प्रवासी पक्षी आमतौर पर सितंबर-अक्टूबर से लेकर फरवरी मार्च तक सांभर में रहते हैं। सांभर झील में मौजूद शैवाल और ब्राइन श्रिम्प फ्लेमिंगो का मनपसंद भोजन हैं, जिसकी चाहत उन्हें दूर-दूर से यहां खींच लाते हैं। पिछले साल के प्रवास के दौरान जनवरी 2025 में हुई पक्षियों की गिनती के अनुसार, यहां 1 लाख से ज्यादा प्रवासी पक्षी दर्ज किए गए थे। जिनमें ज्यादातर फ्लेमिंगो थे। यह संख्या इससे पहले के सालों की तुलना में काफी ज्यादा थी। जिसकी वजह इस बार अच्छा मानसून और अनुकूल तापमान होना माना जा रहा है। फ्लेमिंगो की तरह ही भारत में प्रतिवर्ष 250 से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियां आती हैं, जिनके प्रमुख स्थलों में चिल्का झील, खीचन और भरतपुर शामिल हैं।

पक्षियों की सुरक्षा के लिए क्‍या हैं इंतजाम 

जयपुर डीएफओ केतन कुमार ने ईटीवी भारत को बताया कि प्रवासी पक्षियों की सुरक्षा के पर्याप्‍त इंतजाम किए गए हैं। वन विभाग का ग्राउंड स्टाफ नियमित रूप से पेट्रोलिंग करके यह सुनिश्चित करता है, ताकि कहीं भी इन पक्षियों के शिकार, इन्‍हें जाल में फंसाने या कोई व्‍यवधान वाली गतिविधियां न हों। किसी भी गैर कानूनी गतिविधि या वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के उल्लंघन को रोकने के लिए दूरबीनों से भी सांभर वेटलैंड के पूरे इलाक़े में लगातार निगरानी रखी जा रही है। 

उन्‍होंने आगे बताया कि इस बात का भी ध्यान रखा जा रहा है कि प्रवासी पक्षियों के प्राकृतिक आवास को खराब करने वाली कोई भी गतिविधि न हो। कोई भी पक्षी अगर किसी कारण से घायल होता है तो उसके उपचार की व्‍यवस्‍था है। इलाज करके कुछ समय तक ज़रूरी देखभाल के बाद उन्‍हें वापस झील में छोड़ दिया जाता है।

अक्टूबर में शुरुआती तौर पर कुछ पक्षियों की मौत होने की जानकारी वन विभाग को मिली थी। जांच में एवियन बॉटुलिज्म रोग के कारण पक्षियों की मौत की बात सामने आई थी, जिसके बाद बीमार पक्षियों को तत्काल रेस्क्यू कर उपचार मुहैया करवाया गया। अब हालात सामान्य हैं। वन विभाग ने उस समय पक्षियों के उपचार और मृत पक्षियों के शवों के निस्तारण के लिए स्‍थानीय प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित कर काम किया। प्रवासी पक्षियों की आवक जारी है।

पिछले साल (जनवरी 2025) में की गई गणना में सांभर झील में 1.04 लाख से अधिक प्रवासी पक्षी दर्ज किये गए थे, जो वर्ष 2024 में दर्ज 7,147 पक्षियों की तुलना में काफी अधिक है। इनमें बड़ी संख्या में छोटे और बड़े फ्लेमिंगो भी शामिल थे।
अपने साथी को रिझाने के लिए नर फ्लेमिंगो एक खास तरह से अपने गुलाबी पंखों को फड़फड़ा कर प्रदर्शित करते हैं, जिसे 'कोर्टशिप डिस्‍प्‍ले' के नाम से जाना जाता है।

सर्दियों के बाद अपने घर लौट जाएंगे परिंदे

ये पक्षी केवल सर्दियों में दो-तीन महीने ही यहां ठहरते हैं और मौसम बदलने पर वापस अपने मूल स्थानों की ओर लौट जाते हैं। सांभर झील फ्लेमिंगो के लिए “एनर्जी रिचार्ज स्टेशन” की तरह काम करती है। यहां 2–3 महीने में वे अपने शरीर का वज़न 10–15% तक बढ़ा लेते हैं, जिससे लंबी वापसी उड़ान संभव हो पाती है। 

इस तरह भारत में बिताया गया समय उनके लिए “फ्यूलिंग फेज” होता है, जिसके बाद वह प्रजनन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हैं। तकनीकी रूप से देखा जाए, तो सांभर में फ्लेमिंगो प्रजनन की क्रियाएं नहीं करते। हालांकि उनके शरीर में प्रजनन के लिए आवश्‍यक हार्मोनल बदलावों की प्रक्रिया यहीं शुरू होती है। यहां नीले-हरे शैवालों से पर्याप्त कैरोटिनॉइड मिलने से उनके शरीर में ब्रीडिंग रेडीनेस विकसित होती है, जो आगे अफ्रीका या पश्चिम एशिया में घोंसला बनाने में मदद करती है। सांभर झील में फ्लेमिंगो की मौजूदगी को झील के जैविक स्वास्थ्य का संकेतक (Bio-indicator) माना जाता है। झील का रंग बदलना (गुलाबी-भूरा/हरा) सीधे फ्लेमिंगो की संख्या से जुड़ा होता है। जिन वर्षों में झील का पानी ज्यादा गुलाबी या हरा दिखता है, उन वर्षों में लेसर फ्लेमिंगो की संख्या असामान्य रूप से बढ़ जाती है। यह एल्गी ब्लूम यानी शैवाल विस्‍फोट की स्थिति होती है। इस साल बेहतर हालात की वजह से न सिर्फ इनकी संख्या बढ़ी है, बल्कि ठहरने की अवधि भी लंबी हो गई है। इसे सांभर झील के पारिस्थितिक तंत्र के लिए अच्‍छा माना जा रहा है और उसके संरक्षण (कंजर्वेशन) को भी बढ़ावा मिल रहा है। साथ ही, इससे पर्यटन को बढ़ावा मिल रहा है। 

फ्लेमिंगो का रूट - कैसा होता है फ्लेमिंगो का वापसी का सफ़र? 

भारत में सर्दियां बिताने के बाद फ्लेमिंगो आमतौर पर मार्च के अंत से मई के बीच वापसी प्रवास शुरू करते हैं, जब झीलों का जलस्तर घटने लगता है और तापमान बढ़ता है। उनकी यह वापसी यात्रा एक ही उड़ान में पूरी नहीं होती, बल्कि अलग-अलग पड़ावों के साथ लगभग 10 से 20 दिन में पूरी होती है। सांभर झील या कच्छ जैसे भारतीय वेटलैंड्स से निकलकर ये झुंड पहले पाकिस्तान के सिंध और रन ऑफ कच्छ क्षेत्र में रुकते हैं, फिर ईरान और खाड़ी देशों के वेटलैंड्स होते हुए कुछ समूह कज़ाकिस्तान, तुर्की या पूर्वी अफ्रीका के प्रजनन स्थलों तक पहुंचते हैं। हर झुंड एक ही अंतिम गंतव्य तक नहीं जाता। इस तरह इनके लिए भारत से वापसी के इस सफ़र का मक़सद घर जाना नहीं, बल्कि प्रजनन स्थलों (Breeding Grounds) की ओर बढ़ना होता है। जहां वे मानसून/वसंत के अनुकूल हालात में अंडे देते हैं।

वापसी के सफ़र के दौरान फ्लेमिंगो प्रायः रात में 50–60 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से 3,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ान भरते हैं और दिन में खारे, उथले जल क्षेत्रों में आराम व भोजन करते हैं। पूरी यात्रा के दौरान उनका व्यवहार बेहद अनुशासित और ऊर्जा-संरक्षण पर केंद्रित होता है। खुद की सुरक्षा और ऊर्जा बचाने के लिए ये झुंड में V या लाइन फॉर्मेशन में उड़ते हैं। वापसी के सफ़र में इनकी सामाजिक गतिविधियां न्यूनतम रहती हैं और कमजोर या बीमार पक्षी कई बार झुंड से अलग भी हो जाते हैं। 

कुल मिलाकर 10 से 20 दिन, लेकिन यह स्टॉपओवर (बीच-बीच में रुकने) पर निर्भर करता है। भारत में बिताया गया समय उनके लिए ऊर्जा संचित करने का चरण होता है, जबकि वापसी का यह सफर उनके जीवन का सबसे जोखिम भरा दौर माना जाता है, क्योंकि इसी दौरान मृत्यु दर अपेक्षाकृत अधिक दर्ज की जाती है।

अपने विशालकाय और दमदार पंखों की बदौलत फ्लेमिंगों ऊंचे आकाश में सैकड़ों किलोमीटर लंबी उड़ानें भरने में सक्षम होते हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते साइबेरियन ‘कुरजां’ ने इस बार बदल दिया रास्ता

राजस्‍थान के फलोदी जिले में खीचन गांव में हर साल प्रवास पर आने वाले साइबेरियन पक्षी ‘कुरजां’ इस बार काफी घूम कर लंबा रास्ता तय करके आए हैं। खीचन में हर साल सितंबर में डोमिसाइल क्रेन आने लगते हैं, जो मार्च तक रहते हैं। माना जा रहा है इसकी वजह रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते वहां व्‍यवधान पैदा होना और उस इलाके की आबोहवा बिगड़ना हो सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दशकों से नेपाल के रास्ते राजस्‍थान के खीचन पहुंचने वाली कुरजां पक्षियों ने इस बार पाकिस्तान के रास्ते से जैसलमेर से होकर भारत की सीमाओं में प्रवेश किया है। इसका खुलासा एक साढ़े सात महीने के मेल साइबेरियन बर्ड के पैर में लगी रिंग से हुआ, जिसमें सारी जानकारी दर्ज की गई है। 

प्रवासी पक्षियों के सरंक्षण अभियान से जुड़े सेवाराम माली ने बताया कि 24 नवंबर को ऑस्ट्रेलियन टूरिस्ट के साथ कुरजां देख रहे थे। इस दौरान एक क्रेन के पैर में रिंग नजर आई थी। यह रिंग जुलाई में साइबेरिया के टाइवा में एलिना और उसकी टीम ने लगाई थी, जब यह क्रेन तीन माह का था। आज यह साढ़े सात माह का है। इससे अनुमान लगाया जा रहा है कि वह घूम कर लंबे रास्‍ते से आ रहा है। यह रास्‍ता रूस, कजाकिस्तान, तुर्किस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान का रूट हो सकता है, जिसकी दूरी 3676 किमी है। इसके बाद जैसलमेर सीमा से इसने भारत की सीमा में प्रवेश किया होगा। ये प्रवासी पक्षी द्वारा तय किया गया अब तक सबसे लंबा मार्ग है। आमतौर पर इनके रूट की लंबाई 2800 किलोमीटर की होती है।

साइबेरियन क्रेन की तरह ही फ्लेमिंगो भी अपने विशाल आकार, शर्मीले स्‍वभाव और दोस्‍ताना व्‍यवहार के लिए जाने जाते हैं।

फ्लेमिंगो के बारे में कुछ रोचक बातें

  • फ्लेमिंगो की गुलाबी रंगत जन्मजात नहीं होती, बल्कि झील के खारे पानी में पनपने वाले एल्गी और ब्राइन श्रिम्प खाने से यह रंग विकसित होता है।

  • फ्लेमिंगो कई घंटों तक झील में एक पैर पर खड़े होकर आराम करते हैं, जिससे शरीर से ऊष्मा का ह्रास (Heat Loss) कम होता है, यह बात वैज्ञानिक शोधों में सामने आई है।

  • फ्लेमिंगो रात के समय भी भोजन खोज सकते हैं, क्योंकि उनकी सुनने और स्पर्श की क्षमता बेहद विकसित होती है।

  • फ्लेमिंगो का घुमावदार चोंच वाला फिल्टर-फीडिंग सिस्टम बेहद खास होता है, जिसकी बदौलत वे अपना सिर उल्टा करके पानी से सूक्ष्म जीवों को छानते हैं।

  • लेसर फ्लेमिंगो की चोंच का फिल्टर इतना सूक्ष्म होता है कि वह 5 से 10 माइक्रॉन आकार के शैवाल भी छान लेता है, जबकि ग्रेटर फ्लेमिंगो अपेक्षाकृत बड़े जलीय जीवों पर निर्भर होते हैं ।इसी कारण दोनों एक ही झील में अलग-अलग माइक्रो-ज़ोन में भोजन करते हैं।

  • सांभर झील के खारे कीचड़ (Saline Mud) में मौजूद खनिज फ्लेमिंगो के पैरों की त्वचा को संक्रमण से बचाते हैं। यह एक कारण है कि वे घंटों खारे पानी में खड़े रह पाते हैं, जबकि अन्य पक्षी ऐसा नहीं कर पाते।

  • सांभर झील में नमक के अवैध खनन और जल निकासी फ्लेमिंगो के प्रवास के लिए लगातार खतरा बना रहता है। इसके अलावा शिकारी और बहेलियों के बिछाए जाल में भी इनके फंसने की आशंका रहती है।

  • नमक खनन के लिए बनाए गए कृत्रिम जल-चैनल कई बार फ्लेमिंगो के लिए ‘ट्रैप ज़ोन’ बन जाते हैं, जहां पानी अचानक सूखने पर भोजन खत्म हो जाता है और पक्षी कुपोषण का शिकार हो सकते हैं। हालांकि यह समस्या बहुत कम रिपोर्ट होती है।

  • स्थानीय नमक मजदूर फ्लेमिंगो को “लू के मौसम का संकेत” मानते हैं, क्योंकि पक्षियों की असामान्य और जल्दी आमद अक्सर अत्यधिक गर्मी और तेज़ वाष्पीकरण का संकेत देती है। यह पारंपरिक ज्ञान वैज्ञानिक डेटा से भी मेल खाता है। इस तरह सांभर झील में आने वाले फ्लेमिंगो की तादाद और प्रवास की अविध पर्यावरणीय और जलवायु परिवर्तन के संकेत भी देती है।

SCROLL FOR NEXT