उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में ठोस कचरे की समस्या अक्सर सफ़ाई या पर्यटन से जुड़े सौंदर्य के सवाल के रूप में देखी जाती है, लेकिन इसका सबसे गहरा असर उन जलस्रोतों पर पड़ता है जिन पर ग्रामीण आबादी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी निर्भर है। नालों, जल-धाराओं और झरनों में फेंका गया कचरा धीरे-धीरे उन्हीं स्रोतों को प्रदूषित करता है, जिनसे पहाड़ों में पीने का पानी आता है। जहां जलस्रोत छोटे, सतही और पूरी तरह वर्षा पर निर्भर होते हैं, वहां कचरे का अव्यवस्थित निपटान जल-सुरक्षा को सीधे जोखिम में डाल देता है।
देहरादून जिले के सहस्त्रधारा क्षेत्र और उससे सटी छह ग्राम पंचायतों में यह संकट लंबे समय से महसूस किया जा रहा था। लेकिन यहीं स्थानीय महिलाओं के नेतृत्व में शुरू हुई एक सामुदायिक पहल ने यह साफ़ कर दिया कि ठोस कचरा प्रबंधन केवल सफ़ाई का सवाल नहीं, बल्कि पहाड़ी जलस्रोतों को बचाने की एक प्रभावी रणनीति भी हो सकता है।
पहाड़ी भूगोल में ठोस कचरे की समस्या केवल मात्रा की नहीं, बल्कि उसके बहाव और असर की है। ढलान पर बसी बस्तियों और औपचारिक संग्रह प्रणालियों की कमी के कारण घरेलू कचरा अक्सर खुले में फेंका जाता है। बारिश के साथ यही कचरा नालों और अस्थायी जलधाराओं के ज़रिये नीचे बहता है और अंत में उन्हीं झरनों व स्रोतों तक पहुंचता है, जिन पर ग्रामीण आबादी की पेयजल निर्भरता टिकी होती है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड रिपोर्ट (2022), नीति आयोग और वन्यजीव संस्थान जैसे संस्थानों के अध्ययनों से यह सामने आया है कि हिमालयी क्षेत्रों में ठोस और प्लास्टिक कचरे का बड़ा हिस्सा अब भी वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधित नहीं हो पा रहा है।
जल जीवन मिशन के अंतर्गत हुए जल गुणवत्ता परीक्षणों में भी कई जगहों पर जैविक गंदगी और सूक्ष्म प्रदूषकों की मौजूदगी दर्ज की गई है, जिसका सीधा संबंध आसपास के असंगठित कचरा निपटान से जोड़ा गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे और सतही जलस्रोतों में थोड़ी-सी हिमालयी क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे की समस्या पर पर्यावरण वैज्ञानिक डॉक्टर सुरेश अत्री कहते हैं, “प्लास्टिक कचरा एक गंभीर खतरा बनता जा रहा है। हिमालय के जंगलों में हमें लगभग 200 टन प्लास्टिक मिला है। अगर हिमालय क्षेत्र को बचाया नहीं गया, तो पूरा निचला इलाका प्रभावित होगा।”
देहरादून के सहस्त्रधारा और आसपास की पंचायतों में पारंपरिक जलस्रोत, जिन्हें कभी स्वच्छ और भरोसेमंद माना जाता था, धीरे-धीरे अपनी गुणवत्ता खोने लगे थे। यह संकट किसी एक घर या मोहल्ले तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरे क्षेत्र की जल-सुरक्षा से जुड़ा सवाल बन चुका था।
सहस्त्रधारा में पर्यावरण सखी मॉडल के तहत काम करने वाली महिलाएं - रीमा, सीमा, मुक्ता, सुधा और आरती - सहस्त्रधारा की छह पंचायतों में कचरा प्रबंधन और जागरूकता का नेतृत्व कर रही हैं। वे स्थानीय लोगों के साथ मिलकर व्यवहारिक बदलाव ला रही हैं। जब उनसे प्रेरणा के बारे में पूछा गया, तो सभी सखियों ने एकजुट होकर कहा, “यह कम से कम हम अपने बच्चों के लिए कर सकते हैं। हमारे पूर्वजों ने हमें स्वच्छ हवा, पानी और जमीन दी है। अब यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इन्हीं संसाधनों को उसी रूप में अपने बच्चों को सौंपें।”
यूं तो पहाड़ों में अक्सर कचरा प्रबंधन को पुरुष-प्रधान स्थानीय व्यवस्थाओं द्वारा ही संचालित माना जाता रहा है, लेकिन सहस्त्रधारा के गांवों में महिला-केन्द्रीकृत कचरा योद्धाओं (वेस्ट वॉरियर्स) के ‘पर्यावरण सखी’ नेटवर्क और पंचायत द्वारा समर्थन प्राप्त स्वच्छता समितियों ने यह नियम बदल दिया।
दरअसल, सहस्त्रधारा और आसपास की छह ग्राम पंचायतों की महिलाओं ने कचरा प्रबंधन को केवल सफ़ाई अभियान के रूप में नहीं, बल्कि जल-सुरक्षा के एक जरूरी घटक के रूप में देखना शुरू किया।
इस पहल के तहत महिलाएं स्वयं घर-घर जाकर कचरे के पृथक्करण का प्रशिक्षण देती हैं, समुदाय के भीतर प्लास्टिक और अन्य सूखे कचरे को पुनर्चक्रण योग्य संसाधन के रूप में पहचानने की समझ विकसित करती हैं, और पंचायत व प्रशासन से सीधे संवाद कर ज़रूरी संसाधन जुटाने में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
इस काम से जुड़ने के बाद सुधा और मुक्ता जैसी पर्यावरण सखियों को अपने-अपने परिवारों का विरोध भी झेलना पड़ा है। अपना अनुभव साझा करते हुए वे कहती हैं, “हमें नहीं लगता है कि हम जो कर रहे हैं उसमें कुछ भी ग़लत है। इसलिए सामाजिक और पारिवारिक दबाव के बावजूद भी हम वही कर रहे हैं जो हमें ठीक लगता है।”
अपना अनुभव बताते हुए मुक्ता पवार कहती हैं, “लोगों ने मेरी सास से पूछा, 'क्या आपकी बहू को बस इसी तरह का काम मिल सकता है?' हालांकि मेरे पति ने मेरा साथ दिया, और मैंने अपनी सास को समझाया कि यह काम पर्यावरण के बचाव और देखभाल से जुड़ा हुआ है।”
सहस्त्रधारा में कार्यरत ये सखियां महिला नेताओं के रूप में सामने आईं, जिन्होंने जात‑पात, वर्ग और लिंग‑बाधाओं का सामना करते हुए सहस्त्रधारा को फिर से साफ़ करने की चुनौतियों को सीधा देखा और उसका सामना किया।
महिलाओं के इस सामुदायिक प्रयास से मिलने वाले सकारात्मक परिणामों की पुष्टि आंकड़े भी करते हैं-
अप्रैल 2024 से जुलाई 2025 के बीच सहस्त्रधारा और आसपास के पंचायत-बाज़ार क्षेत्रों से लगभग 800 मीट्रिक टन सूखा कचरा इकट्ठा किया गया। स्थानीय महिलाओं के अनुसार, इस स्रोत-स्तरीय संग्रहण से वह कचरा नालों तक पहुंचने से पहले ही रुक गया, जिससे बरसात के मौसम में जलस्रोतों में गंदगी का दबाव साफ़ तौर पर घटा है।
इस पहल के बाद लोगों की आदतों में साफ़ बदलाव दिखने लगा है। पहले जहां घरों का कचरा खुले में या नालों में फेंक दिया जाता था, अब वही कचरा घर पर ही अलग-अलग करके रखा जाने लगा है।
पंचायत की मदद से नियमित संग्रहण की व्यवस्था बनी है, जिससे कचरे का निपटान बेहतर और व्यवस्थित ढंग से हो रहा है। इससे गांवों में सफ़ाई भी बढ़ी है और लोगों में जिम्मेदारी का भाव भी मजबूत हुआ है।
जल-स्रोतों को प्रदूषण मुक्त करने और उनके उचित और ज़िम्मेदार निपटान के लिए ज़रूरी है कि गीला और सूखा कचरा को अलग-अलग रखा जाए। सहस्त्रधारा ग्राम पंचायतों की महिलाओं को यह समझ में आ गया था कि यह प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इससे कचरे का बड़ा हिस्सा नालों तक पहुंचने से पहले ही रोक लिया गया।
समुदाय के प्रयास से घरों से गीला (जैसे खाद्य अवशेष) और सूखा कचरा (जैसे प्लास्टिक, कागज आदि) अलग किया जाता है।
गीला कचरा स्थानीय स्तर पर खाद में बदलने (composting) की प्रक्रिया से गुजरता है, जिससे जैविक अपशिष्ट जीवित पोषक तत्व में बदलकर मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाता है और नालों में कचरा नहीं जाता।
सूखे प्लास्टिक और अन्य कचरे को स्थानीय स्तर पर संग्रहित, सॉर्ट और आगे के निपटान या रिसाइक्लिंग के लिए भेजा जाता है, जिससे यह भीतर-भीतर पहाड़ों की पारिस्थितिकी और जल स्रोतों को दूषित नहीं होने देता।
स्थानीय महिलाओं का कहना है कि कचरा प्रबंधन की शुरुआत के कुछ महीनों के भीतर ही इसके प्रभाव दिखने लगे। जिन नालों में पहले नियमित रूप से प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट जमा रहता था, वहां बहाव अपेक्षाकृत साफ़ दिखाई देने लगा। बारिश के मौसम में भी झरनों के पानी में गंदगी कम आने लगी।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन क्षेत्रों में कई परिवारों की निर्भरता इन्हीं पारंपरिक जलस्रोतों पर है। हैंडपंप या पाइपलाइन की पहुंच सीमित होने के कारण धाराओं और झरनों का पानी अब भी दैनिक उपयोग का प्रमुख स्रोत बना हुआ है।
स्थानीय संस्थाओं और साझेदारों की भूमिका: इस प्रयास में वेस्ट वॉरियर्स सोसायटी, पंचायत विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच साझेदारी है। जैसे, धनौला ग्राम पंचायत में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट यूनिट (पीडब्ल्यूएमयू) के तहत हर महीने करीब 6 टन प्लास्टिक कचरा जमा करने या फिर रिसाइक्लिंग के लिए उपलब्ध कराया जाता है। इसके पीछे का कारण यह सुनिश्चित करना है कि स्थानीय स्तर पर पैदा होने वाला कचरा सीधे प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रभावित न करे।
सहस्त्रधारा और आसपास की पंचायतों में ‘पर्यावरण सखी’ मॉडल के तहत महिलाओं ने कचरे के संग्रह और पृथक्करण की स्थानीय व्यवस्था खड़ी की है। सूखे प्लास्टिक और अन्य कचरे को पंचायत स्तर पर इकट्ठा कर आगे के निपटान के लिए भेजा जाता है, ताकि यह नालों और जलधाराओं में बहकर जलस्रोतों को प्रदूषित न करे।
इस विकेंद्रीकृत मॉडल ने यह दिखाया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद स्थानीय स्तर पर जल-सुरक्षा के लिए प्रभावी समाधान संभव हैं।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 कचरे के स्रोत पर पृथक्करण और वैज्ञानिक निपटान पर ज़ोर देते हैं। लेकिन हिमालयी राज्यों में इनका क्रियान्वयन अब भी चुनौती बना हुआ है। संकरी सड़कें, सीमित ज़मीन और संसाधनों की कमी के कारण कई जगह कचरा खुले में ही फेंका जा रहा है। ऐसे में सहस्त्रधारा का अनुभव यह दिखाता है कि जब नीति के प्रावधानों को स्थानीय भूगोल और समुदाय की क्षमता के अनुसार अपनाया जाता है, तो ज़मीनी बदलाव संभव हो पाता है।
कई नगरपालिका क्षेत्रों में वैज्ञानिक निपटान सुविधाएं पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं, और खुले में कचरा फेंका जाना अब भी गंभीर समस्या है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के कुछ क्षेत्रों में हाई कोर्ट ने भी कहा है कि ठोस कचरा प्रबंधन के नियमों का पालन नहीं हो रहा, और कई नगरपालिकाओं के पास अभी तक ठोस और वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था ठीक से विकसित नहीं हुई।
नीति बनाम ज़मीनी हकीकत: कचरा निपटान के लिए बनाई गईं नीतियां स्पष्ट हैं। स्रोत पर पृथक्करण, वैज्ञानिक निपटान, पुनर्चक्रण, उपयोगकर्ता शुल्क आदि जैसे नियम न केवल मौजूद हैं बल्कि राज्य सरकार भी इन्हें लागू करने की कोशिश कर रही है। लेकिन वास्तविक स्थिति कुछ और ही कहानी बयान करती है। दरअसल, ढलान वाले इलाक़ों और ग्रामीण-पहाड़ी बस्तियों में स्थिति बुरी है। यहां कचरा सही तरीके से न तो जमा किया जा रहा है और न ही उसका समुचित निपटान ही हो पा रहा है।
इसके अलावा अतिरिक्त ज़मीन और संसाधन, दोनों की कमी के कारण कई जगह तकनीकी समाधान जैसे कम्पोस्टिंग, वेस्ट-टू-एनेर्जी आदि व्यवस्थित रूप से नहीं चल पा रहे। इससे कचरा अक्सर खुले में जमा हो जाता है या जल स्रोतों के पास तक पहुंच जाता है जो जो प्राकृतिक तंत्र और स्थानीय जीवन दोनों के लिए जोखिम पैदा करता है। इसके अलावा, कई जगहों पर स्थानीय लोग और प्रशासन अब भी नियमों के पालन और व्यवहारिक बदलाव के अभ्यास में फंसे हुए हैं।
भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 कचरे के स्रोत पर पृथक्करण और विकेंद्रीकृत प्रबंधन पर ज़ोर देते हैं। हालांकि पहाड़ी राज्यों में इन नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन अब भी एक चुनौती है। लेकिन सहस्त्रधारा क्षेत्र की यह पहल दिखाती है कि जब नीति के प्रावधानों को स्थानीय भूगोल और समुदाय की जरूरतों के अनुसार अपनाया जाता है, तो उसके सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं।
यह मॉडल पूरी तरह बाहरी संसाधनों पर निर्भर नहीं है। महिलाओं की भागीदारी, पंचायत का सहयोग और स्थानीय स्तर पर विकसित की गई व्यवस्थाएं इसे अपेक्षाकृत टिकाऊ बनाती हैं। हालांकि यह पहल कई मायनों में सफल रही है, लेकिन चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। सूखे कचरे, विशेष रूप से प्लास्टिक के अंतिम निपटान के लिए सीमित विकल्प हैं। इसके अलावा, सभी परिवारों की नियमित भागीदारी सुनिश्चित करना भी एक सतत प्रयास है।
सहस्त्रधारा और आसपास की पंचायतों का अनुभव यह दिखाता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में जल-सुरक्षा की किसी भी रणनीति में ठोस कचरा प्रबंधन को केंद्रीय स्थान देना आवश्यक है, और महिला-नेतृत्व वाली सामुदायिक पहलें इसे सबसे प्रभावी ढंग से लागू कर सकती हैं।
उत्तराखंड की यह कहानी केवल कुछ पंचायतों तक सीमित नहीं; सहस्त्रधारा की महिलाओं के प्रयास दिखाते हैं कि कचरे का रास्ता बदलकर पूरे क्षेत्र के पानी का भविष्य बदला जा सकता है।