राजस्थान के कई इलाकों में किसान आज भी अपने पारंपरिक तरीकों से खेती करते दिखाई देते हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
राजस्थान जैसे शुष्क और जल-संकट से जूझते मरुस्थली राज्य में खेती हमेशा से ही एक मुश्किल भरा काम रही है। इसे देखते हुए राजस्थान सरकार ने किसानों को कृषि की ओर आकर्षित करने के लिए एक नई पहल की है। एग्रीकल्चर कार्बन क्रेडिट पायलट प्रोजेक्ट के ज़रिये राज्य में खेती को दोगुना लाभकारी बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे जहां एक ओर खेती के साथ-साथ कार्बन क्रेडिट से किसानों की दोहरी आमदनी होगी, वहीं कार्बन कैप्चर से पर्यावरण के संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।
राज्य के कृषि विभाग ने निजी क्षेत्र की कंपनी IORA इकोलॉजिकल सॉल्यूशंस के साथ मिलकर एक एग्रीकल्चर कार्बन क्रेडिट पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। राजस्थान के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने एक साथ राज्य के तीन जिलों कोटपुतली-बहरोड़, दौसा और टोंक में इस पायलट प्रोजेक्ट को शुरू करने की घोषणा की है। यह पहल ऐसे समय में आई है जब जलवायु परिवर्तन, भूमि क्षरण और किसानों की आय का संकट जैसी तीनों समस्याएं एक साथ चुनौती बनकर खड़ी हुई हैं।
इस तरह इस योजना के ज़रिये खेती अब राजस्थान के किसानों के लिए एक नए आय स्रोत कार्बन क्रेडिट का दरवाज़ा खोल रही है। माना जा रहा है कि यह इनोवेटिव प्रोजेक्ट सिर्फ खेती की तकनीक नहीं, बल्कि पूरी कृषि अर्थव्यवस्था को बदलने की क्षमता रखता है। इस पहल के ज़रिेये यह सबकुछ कैसे होगा? यह प्रोजेक्ट क्या है, कैसे काम करेगा, इसके पीछे की सोच क्या है, इससे राज्य की अर्थव्यवस्था किसानों के जीवन और पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा इस लेख में हम आपको सबकुछ आसान भाषा में समझाने जा रहे हैं।
प्रायोगिक स्तर पर शुरू की जा रही इस परियोजना के जरिये राजस्थान कृषि विभाग ने ‘एग्रीकल्चरल लैंड मैनेजमेंट कार्बन प्रोजेक्ट’ के तहत किसानों को कार्बन फाइनेंस से जोड़ने का प्रयास किया है। इसके लिए पर्यावरण वित्त और कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट्स में विशेषज्ञ संस्था इओरा (IORA) इकोलॉजिकल सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के साथ समझौता किया गया है। इओरा भारत की एक प्रमुख पर्यावरण सलाहकार कंपनी है, जिसे प्राकृतिक संसाधन संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन में विशेषज्ञता हासिल है। सन् 2009 में स्थापित इस कंपनी के पास वित्त, कार्यक्रम कार्यान्वयन, नीति सलाहकार और वैज्ञानिक अनुसंधान सहित विभिन्न क्षेत्रों में काम करने का अनुभव और विशेषज्ञता है।
इस योजना का मूल उद्देश्य ऐसी खेती को बढ़ावा देना है, जो कार्बन उत्सर्जन कम करे या मिट्टी में कार्बन को संग्रहित (sequester) करे और इसके बदले किसानों को आर्थिक लाभ मिले। राजस्थान सरकार ने इसे फिलहाल पायलट के रूप में राज्य के तीन ब्लॉकों बांसूर (कोटपुतली-बहरोड़), महुवा (दौसा) और मालपुरा (टोंक) में शुरू किया है। इस प्रयोग के सफल रहने पर आगे चलकर परियोजना को पूरे राज्य में विस्तार दिया जा सकता है।
मरुस्थली इलाकों में मिट्टी को उर्वरा बनाकर कुछ इस तरीके से खेती करते हैं राजस्थान के किसान।
राजस्थान सरकार का यह प्रोजेक्ट केवल एक राज्य की योजना नहीं, बल्कि भारत में जलवायु के प्रति सरकारों की बढ़ती संवदेनशीलता और इसके मद्देनज़र नीतियों में हो रहे बदलावों का संकेत भी है। इस पहल से पता चलता है कि -
सरकार अब प्राकृतिक संसाधनों को आर्थिक मूल्य देने की दिशा में बढ़ रही है।
किसानों को अन्न उत्पादक के साथ ही “कार्बन प्रोड्यूसर” के रूप में भी देखा जा रहा है।
कृषि क्षेत्र के विकास में सरकारी प्रयासों के साथ ही निजी कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ रही है और IORA जैसी संस्थाएं इस पूरे इकोसिस्टम को तकनीकी और वित्तीय आधार देती दिखाई दे रही हैं।
राजस्थान सरकार ने प्रदेश में 'ग्रीन क्रेडिट नीति' लागू कर दी है। ग्रीन क्रेडिट वाउचर इनिशिएटिव-2025 योजना को मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद जनवरी 2026 में सरकार ने 'राजस्थान ग्रीन क्रेडिट नीति' की अधिसूचना जारी कर दी थी। इस नीति के तहत अब पेड़ लगाने, जल संरक्षण करने और प्रदूषण कम करने वाली परियोजनाओं में निवेश करने वाली कंपनियों और निवेशकों को सरकार आर्थिक प्रोत्साहन देगी। इसके तहत पर्यावरण प्रोजेक्ट्स में निवेश पर 10 फीसदी तक क्रेडिट वाउचर व 2.5 करोड़ रुपए तक का लाभ मिलेगा। इसे बेचा भी जा सकेगा। ग्रीन क्रेडिट्स से सर्कुलर इकोनॉमी को प्रोत्साहन मिलेगा। इसके जरिये राज्य में बिगड़ते पर्यावरण को बचाने के उपाय करके 2070 तक राजस्थान को कार्बन मुक्त बनाने का लक्ष्य है।
ग्रीन क्रेडिट नीति, कार्बन क्रेडिट की तर्ज पर शुरू की गई एक योजना है। यदि कोई निवेशक राजस्थान में पर्यावरण को सुधारने वाली किसी परियोजना में धन निवेश करता है। तो सरकार उसे 'ग्रीन क्रेडिट वाउचर' देगी। इस वाउचर का उपयोग निवेशक अपनी अगली परियोजना में वित्तीय छूट पाने या इसे किसी दूसरी कंपनी को बेच भी सकता है।कन्हैया लाल, जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी मंत्री, राजस्थान सरकार
खेती में कार्बन कैप्चर मुख्य रूप से पौधों और मिट्टी की प्राकृतिक प्रक्रियाओं के जरिए होता है। फसलें और पेड़ प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) के दौरान वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को अवशोषित करते हैं और उसे अपने तनों, पत्तियों और जड़ों में संग्रहीत कर लेते हैं। फसल कटने के बाद जब जड़ें और अवशेष मिट्टी में रह जाते हैं, तो यह कार्बन धीरे-धीरे मिट्टी में जमा होकर “मिट्टी कार्बन” (soil carbon) का हिस्सा बन जाता है।
इसके अलावा, जैविक खाद, कवर क्रॉपिंग और कम जुताई जैसी तकनीकों से मिट्टी में कार्बन लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। एग्रोफॉरेस्ट्री यानी खेतों में पेड़ लगाने से यह प्रक्रिया और तेज हो जाती है, क्योंकि पेड़ अधिक मात्रा में कार्बन को लंबे समय तक स्टोर कर सकते हैं। इस तरह खेती केवल खाद्यान्न उत्पादन का माध्यम नहीं रह जाती, बल्कि वातावरण से कार्बन हटाकर उसे सुरक्षित रखने का एक प्रभावी प्राकृतिक तंत्र भी बन जाती है।
फसल काटने के बाद बैलों के ज़रिये इस तरह किया जाता है मड़ाई का काम।
कार्बन क्रेडिट को एक “पर्यावरणीय मुद्रा” (environmental currency) के तौर पर समझा जा सकता है। जब कोई व्यक्ति, कंपनी या किसान वातावरण में मौजूद ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने वाले कार्य करता है, तो उसे कार्बन क्रेडिट मिलता है। इन क्रेडिट्स को बाजार में बेचकर पैसा कमाया जा सकता है। इन क्रेडिट्स को कंपनियाँ खरीदती हैं ताकि वे अपने प्रदूषण की भरपाई (offset) कर सकें—यही लेन-देन बाजार में होता है, जिससे किसान को अतिरिक्त आय मिलती है। कार्बन क्रेडिट का लेन-देन सीधे “खुले बाजार” में नहीं, बल्कि खास तरह के कार्बन मार्केट प्लेटफॉर्म्स और रजिस्ट्रियों के जरिए होता है।
सबसे पहले किसान या प्रोजेक्ट डेवलपर (जैसे IORA Ecological Solutions) खेत में किए गए बदलावों का डेटा तैयार करता है। फिर इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार प्रमाणित (verify) कराया जाता है। इसके बाद ही “कार्बन क्रेडिट” जारी (issue) होते हैं। अब इन क्रेडिट्स की बिक्री दो तरह के बाजारों में होती है—
यह सबसे आम तरीका है, जहां कंपनियां खुद अपनी पर्यावरणीय छवि सुधारने या नेट-जीरो लक्ष्य के लिए क्रेडिट खरीदती हैं। विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर प्रोजेक्ट रजिस्टर होते हैं, क्रेडिट जारी होते हैं और फिर कंपनियां इन्हें खरीदती हैं। सबसे ज़्यादा प्रचलित प्लेटफॅार्म हैं -
वेर्रा (वीसीएस स्टैंडर्ड) / Verra (VCS Standard)
गोल्ड स्टैंडर्ड / Gold Standard
अमेरिकन कार्बन रजिस्ट्री / American Carbon Registry
यह सरकार द्वारा नियंत्रित होता है, जहां कंपनियों के लिए उत्सर्जन सीमा तय होती है। अगर वे अधिक प्रदूषण करती हैं, तो उन्हें कार्बन क्रेडिट खरीदने पड़ते हैं। भारत में भी Carbon Credit Trading Scheme (2023) के तहत ऐसा बाजार विकसित किया जा रहा है।
फसल की मड़ाई के बाद निकले अनाज को एकत्र कर लिया जाता है, जबकि भूंसे को अकसर इस तरह ट्रॉलियों में भर कर पशुपालकों को बेच दिया जाता है।
इस परियोजना के तहत किसान जिन गतिविधियों को अपनाएंगे, वे सीधे कार्बन उत्सर्जन को प्रभावित करेंगी -
रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ाता है। संतुलित और जरूरत के अनुसार उर्वरक इस्तेमाल करने से यह उत्सर्जन कम होता है और मिट्टी की सेहत भी बेहतर बनी रहती है।
ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों से पानी की खपत कम होती है, जिससे ऊर्जा की बचत होती है और अप्रत्यक्ष रूप से कार्बन उत्सर्जन घटता है। इसके साथ ही फसल को नियंत्रित मात्रा में पानी मिलने से उत्पादन क्षमता भी बढ़ती है।
खेतों के आसपास या बीच में पेड़ लगाने से वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर अपने अंदर संग्रहित करते हैं। इससे न केवल कार्बन कम होता है, बल्कि किसानों को लकड़ी, फल और चारे के रूप में अतिरिक्त आय भी मिलती है।
फसल कटाई के बाद बचे अवशेषों को जलाने से भारी मात्रा में कार्बन और प्रदूषक गैसें निकलती हैं। इन्हें जलाने के बजाय खाद या मल्च के रूप में उपयोग करने से उत्सर्जन घटता है और मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है।
जैविक खाद, कवर क्रॉपिंग और कम जुताई जैसी तकनीकों से मिट्टी में कार्बन का भंडारण बढ़ाया जाता है। इससे मिट्टी अधिक उपजाऊ बनती है और लंबे समय तक कार्बन को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।
इन सभी गतिविधियों से प्रति हेक्टेयर उत्सर्जन में जो कमी आएगी, उसी के आधार पर किसानों को कार्बन क्रेडिट के रूप में भुगतान किया जाएगा, जो उनकी आय का एक नया स्रोत बनेगा।
इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा पहलू यह है कि यह सरकार की अन्य कृषि योजनाओं की तहर महज़ एक सब्सिडी वाली योजना नहीं है, बल्कि खेती के तौर-तरीकों में बदलाव लाने वाली एक व्यवहार परिवर्तन आधारित मॉडल है।
इसके मानकों पर खरा उतरने के लिए किसानों को पारंपरिक खेती से हटकर “क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर” यानी पर्यावरण हितैषी कृषि पद्यतियों को अपनाना होगा। इसके लिए उन्हें अपनी खेती के तरीकों में निम्नलिखित बदलाव करने होंगे -
खेती के लिए मिट्टी की कम से कम जुताई (reduced tillage) का तरीका अपनाना।
उर्वरक, कीटनाशक और दवाओं के रूप में जैविक पदार्थों का उपयोग।
पानी की खपत घटाने और बचत के लिए जल संरक्षण तकनीकों को अपनाना।
सोलर पंप जैसी चीजों से वैकल्पिक ऊर्जा का उपयोग।
ये सभी तरीके न सिर्फ कार्बन उत्सर्जन घटाते हैं, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता और जल उपयोग दक्षता भी बढ़ाते हैं।
राजस्थान सरकार की इस पहल को भारत में 2023 में लागू कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) से जोड़कर देखा जा रहा है, जिसने देश में कार्बन के औपचारिक बाजार की नींव रखी है। इस स्कीम के तहत उत्सर्जन को मापने, प्रमाणित करने और ट्रेड करने की प्रक्रिया को व्यवस्थित किया जा रहा है, जिससे कृषि क्षेत्र भी अब इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है।
साथ ही यह पायलट प्रोजेक्ट खास इसलिए है, क्योंकि इसे स्थानीय किसानों को वैश्विक कार्बन बाजार से जोड़ने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह छोटे और मध्यम किसानों को भी इस वैश्विक तंत्र से जोड़ने की कोशिश करता है। अब तक कार्बन बाजार में बड़ी कंपनियों और औद्योगिक परियोजनाओं का दबदबा रहा है, लेकिन इस मॉडल के जरिए किसान भी तेजी से बढ़ते इस बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी दर्ज कर सकते हैं।
इसका मतलब है कि किसान केवल फसल बेचकर ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के जरिए भी आय अर्जित करेंगे। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा देने के साथ-साथ भारत को वैश्विक जलवायु बाजार में मजबूत स्थिति दिला सकता है।
खेतों की मिट्टी बनेगी ‘कार्बन बैंक’ मिट्टी को अकसर सिर्फ उत्पादन का माध्यम समझा जाता है, लेकिन अब इसे “कार्बन बैंक” के रूप में देखा जाने लगा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, स्वस्थ मिट्टी वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर उसे लंबे समय तक अपने भीतर सुरक्षित रख सकती है, जिसे कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन कहा जाता है। यही प्रक्रिया आज किसानों के लिए आय का नया जरिया बन रही है। एक केस स्टडी के अनुसार, राजस्थान में 3000 हेक्टेयर भूमि पर आधारित कार्बन प्रोजेक्ट से हर साल लगभग 15,000 टन CO₂ समकक्ष (tCO2e) कार्बन क्रेडिट उत्पन्न हुआ। इससे करीब ₹45 लाख वार्षिक आय संभव हुई, जो यह दर्शाता है कि मिट्टी की सही देखभाल सीधे आर्थिक लाभ में बदल सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि जैविक खाद, कवर क्रॉपिंग और कम जुताई जैसी तकनीकों को बड़े स्तर पर अपनाया जाए, तो यह मॉडल न केवल मिट्टी की गुणवत्ता सुधार सकता है, बल्कि किसानों के लिए एक स्थायी और पर्यावरण-अनुकूल आय स्रोत भी बन सकता है।
राजस्थान में अरावली की पहाडि़यों की घाटियों में भी अच्छी खासी खेती देखने को मिलती है।
राजस्थान के इस प्रोजेक्ट का पैमाना और सरकारी भागीदारी इसे खास बनाती है। हालांकि यह प्रोजेक्ट कोई पहला प्रयास नहीं है। इस तरह के प्रयोग देश के कुछ राज्यों में पहले से चल रहे हैं। राजस्थान का नया पायलट उसी श्रृंखला का अगला कदम माना जा सकता है। अन्य राज्यों में चल रहे ऐसे कार्यक्रमों के प्रमुख उदाहरण इस प्रकार हैं -
उदाहरण के तौर पर पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय में इसी प्रकार का MegCare प्रोग्राम चल रहा है। मेघालय के इस कार्यक्रम की एक बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसमें प्रति टन कार्बन का मूल्य 40 यूरो तक पहुंचा, जो वैश्विक औसत से कई गुना अधिक है। राजस्थान इसी मॉडल से सीख लेकर अपने राज्य में इसे लागू कर रहा है। इसकी कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं-
10,000 से अधिक किसानों को शामिल किया गया
22,000 हेक्टेयर क्षेत्र कवर हुआ
किसानों को सीधे कार्बन भुगतान मिला
उत्तर प्रदेश सरकार ने Indian Institute of Technology Roorkee के साथ मिलकर एक बड़ा कार्बन क्रेडिट मॉडल शुरू किया है। इस योजना में किसान खेतों में पेड़ लगाकर, जैविक तरीकों को अपनाकर और मिट्टी में कार्बन बढ़ाकर क्रेडिट कमाते हैं। इस प्रोजेक्ट में खास बात यह है कि कार्बन की वैज्ञानिक माप (soil testing + remote sensing) की जाती है और क्रेडिट बेचने से होने वाली आय का हिस्सा सीधे किसानों को दिया जाता है।
पंजाब और हरियाणा में Grow Indigo के जरिए किसानों को कार्बन क्रेडिट दिए जा रहे हैं।
यहां किसान डायरेक्ट सीडिंग, कम जुताई और उर्वरकों के सीमित उपयोग जैसी तकनीक अपनाते हैं, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय संस्था Verra द्वारा प्रमाणित किया जाता है। इसके बाद ये क्रेडिट कंपनियों को बेचे जाते हैं।
कर्नाटक में National Bank for Agriculture and Rural Development ने एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है, जिसमें किसानों को पेड़ लगाने और बायोमास मैनेजमेंट के जरिए कार्बन क्रेडिट कमाने का मौका दिया गया है। इस योजना में हजारों आम (mango) किसानों को शामिल किया गया है और इसे भविष्य में बड़े स्तर पर लागू करने की योजना है।
तेलंगाना के कई जिलों में सामुदायिक स्तर पर एग्रोफॉरेस्ट्री और पेड़ लगाने के जरिए कार्बन क्रेडिट तैयार किए जा रहे हैं। यहां छोटे किसान भी शामिल हैं और परियोजना को अंतरराष्ट्रीय मानकों के तहत मॉनिटर किया जा रहा है, जिससे इन्हें वैश्विक बाजार में बेचा जा सके।
राजस्थान के कृषि क्षेत्र की एक खास बात यह है कि यहां महिलाएं भी खेती के काम में बराबर हाथ बटाती हैं। कई मामलों में तो, महिलाएं एकल किसान की भूमिका में भी नज़र आती हैं।
इस प्रोजेक्ट का दोहरा लाभ मिलने की उम्मीद है, और यह फायदे सिर्फ आर्थिक नहीं हैं, बल्कि प्रकृति और हमारे पर्यावरण को भी इसका लाभ मिलने वाला है। जब किसान पेड़ लगाएंगे, मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाएंगे और पानी का कुशल उपयोग करेंगे, तो इससे यह बदलाव देखने को मिलेंगे -
मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी
भूजल स्तर में सुधार होगा
जैव विविधता बढ़ेगी
और सूखे का प्रभाव कम होगा
राजस्थान जैसे राज्य में, जहां मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण बड़ी समस्या है, यह पहल इकोलॉजिकल रिस्टोरेशन का माध्यम भी बन सकती है।
हालांकि यह पहल काफी संभावनाओं से भरी है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं—
1. तकनीकी जटिलता
कार्बन क्रेडिट को मापने और प्रमाणित करने के लिए MRV (Monitoring, Reporting, Verification) सिस्टम की जरूरत होती है, जिसमें डेटा संग्रह, सैटेलाइट मॉनिटरिंग और वैज्ञानिक विश्लेषण शामिल होता है। यह प्रक्रिया न केवल जटिल है, बल्कि इसके लिए प्रशिक्षित विशेषज्ञों और तकनीकी संसाधनों की भी आवश्यकता होती है। छोटे किसानों के लिए इस पूरी प्रक्रिया को समझना और अपनाना आसान नहीं होता।
2. किसानों की जागरूकता
ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश किसानों को कार्बन बाजार, उसके नियमों और लाभों की पर्याप्त जानकारी नहीं है। ऐसे में नई तकनीकों और प्रक्रियाओं को अपनाने में अकवर संकोच और जोखिम की भावना बनी रहती है। इसलिए जागरूकता और ज़रूरी प्रशिक्षण के बिना इस योजना को लागू किए जाने से इसका व्यापक प्रभाव सीमित रह सकता है।
3. भुगतान में देरी
कार्बन क्रेडिट का भुगतान तुरंत नहीं मिलता, बल्कि उत्सर्जन में कमी के सत्यापन के बाद ही जारी होता है। इस प्रक्रिया में महीनों या कभी-कभी वर्षों का समय लग सकता है, जिससे छोटे और सीमांत किसानों के लिए नकदी प्रवाह की समस्या पैदा हो सकती है। नियमित आय के अभाव में वे इस मॉडल को अपनाने से हिचक सकते हैं।
4. बाजार पर निर्भरता
कार्बन क्रेडिट की कीमतें वैश्विक बाजार की मांग और नीतियों पर निर्भर करती हैं, जो समय-समय पर बदलती रहती हैं। यदि बाजार में कीमतें गिरती हैं, तो किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। इस अनिश्चितता के कारण यह आय स्रोत पूरी तरह स्थिर या भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।
सरकार लंबे समय से किसानों की आय बढ़ाने के प्रयास कर रही है। कार्बन क्रेडिट मॉडल इस दिशा में एक नया विकल्प देता है। इसके ज़रिये किसानों को फसल के अलावा एक “ग्रीन इनकम” भी मिल सकती है, अगर किसान खेती के साथ-साथ यह काम करता है-
अपनी जमीन पर पेड़ लगाता है
मिट्टी में कार्बन बढ़ाता है
और जल संरक्षण करता है
इस तरह राजस्थान सरकार का यह प्रोजेक्ट खेती को सिर्फ उत्पादन से निकालकर सेवा आधारित अर्थव्यवस्था (ecosystem services economy) की ओर ले जाने की ओर एक प्रयोगात्मक पहल है।
राजस्थान का एग्रीकल्चर कार्बन क्रेडिट पायलट प्रोजेक्ट सिर्फ देश में खेती के भविष्य की झलक दिखाता है। साथ ही यह दिखाता है कि आने वाले समय में किसान सिर्फ अन्नदाता नहीं, बल्कि जलवायु योद्धा (climate warriors) की भूमिका में भी दिखाई देंगे। अगर यह मॉडल सफल होता है, तो इससे किसानों की आय बढ़ेगी और उसके साथ ही पर्यावरण भी सुधरेगा। इससे निश्चित रूप से भारत की 2070 तक नेट ज़ीरो कार्बन जैसी महत्वाकांक्षी जलवायु प्रतिबद्धताओं को भी मजबूती मिलेगी। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या यह योजना जमीन पर किसानों के लिए सरल, भरोसेमंद और लाभकारी साबित होती है या नहीं। इसी बात से तय होगा कि राजस्थान का यह पायलट प्रोजेक्ट महज़ एक प्रयोग बनकर रह जाएगा या देश के कृषि क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत करेगा।
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