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स्वच्छता क्यों और कैसे?

Author : महात्मा गांधी

शारीरिक स्वच्छता

साफ-सुथरी आदतें

साफ-सुथरी आदतें लगाने के लिए नीचे के नियमों का पालन करना चाहिएः



4. पानी लिए बिना पाखाने नहीं जाना चाहिए।

5. पाखाने से आकर हाथ-पाँव को मलकर धोना चाहिए और पाखाने का लोटा-खास उसी के लिए न हो तो-अच्छी तरह मलकर माँजना चाहिए।

6.पानी के पानी के मटके में डुबोने को अलग बरतन रखना चाहिए। जूठा बरतन तो उसमें कदापि न डालना चाहिए। मटके के पास इस तरह खड़े रहकर पानी नहीं पीना चाहिए कि पानी के छींटे मटके पर पड़ें।

7. जहाँ बहुत से लोगों के लिए पीने का एक ही बरतन हो, वहाँ प्याले या गिलास को मुँह से लगाकर पानी पीना अनुचित है। ऊपर से पीने की आदत डालनी चाहिए और जो इस तरह न पी सकें, उन्हें अपना बरतन अलग रखना चाहिए या चुल्लू या अंजली से पीना चाहिए।

8.जहाँ भोजन किया हो, वहाँ यदि खाने की चीजें बिखरी हों, तो उन्हें उठाकर उस जगह को घर के अन्दर हो, तो धोकर और खुले में हों, तो अच्छी तरह बुहारकर, साफ कर देना चाहिए। ऐसा होने के पहले उस जगह में घूमना-फिरना, जूठन-चिपके पाँवों से साफ जगहों और कमरे में आना-जाना तथा उस जगह दूसरों को भोजन कराना अनुचित है। इसके सिवा ऐसा स्थान मक्खियों की बला को न्योता देने के समान है।

9. साधारणतः कलछी या चमचे से ही परोसना चाहिए। साग, दाल या भात जैसी चीजें हाथ से नहीं परोसनी चाहिए। इससे भी ज्यादा खराब है जूठे हाथों से परोसना। रोटी अथवा पूरी जैसी सूखी चीजें भी जूठे हाथ से नहीं देनी चाहिए।

10. परोसने का बरतन खानेवाले की थाली या कटोरी से छुआ-कर परोसना अस्वच्छता है औऱ छू जाने के डर से परोसने के बजाय थाली में दूर से फेंकना या बिखेरना असभ्यता है।

11. गंदे पाँवों अपने बिछौने पर भी पैर नहीं रखना चाहिए। अनेक मनुष्य जहाँ साथ सोये हों, वहाँ चलने-फिरनेवाले को किसी का बिछौना रौंदना न चाहिए।

12. काम से आकर अथवा लघुशंका करके हाथ धोये बिना खाने की चीज को न छूना चाहिए, न पीने के पानी के मटके में हाथ डालना चाहिए। पान, तंबाकू, बीड़ी आदि के व्यसनवालों को इस विषय में खास एहतियात रखना चाहिए। कितनों के शरीर में बराबर खुजली होती रहती है। कितनों को बार-बार नाक साफ करनी पड़ती है। ऐसे आदमियों को भी हाथ धोकर ही खाने-पीने की चींजें छूनी चाहिए।

13. जिस डोल या बाल्टी में कपड़े धोये हों, उसे माँजे और उसकी चिकनाई दूर किए बिना उसे कुएं में नहीं डालना चाहिए और न पीने–पकाने का पानी उससे भरना चाहिए।

14. पेशाब, कुल्ली करने, थूक वगैरह के लिए मोरियों का उपयोग करने का रिवाज बहुत ही गंदा है और बहुत ही अच्छा हो कि ऐसी मोरियाँ घर में रखी ही न जायँ। इसके लिए खास बरतन काम में लाना और उन्हें दूर ले जाकर साफ करना अच्छे-से-अच्छा फायदा है। जिन गाँवों में गंदे पानी के निकास के लिए अच्छी नहर (गटर) की व्यवस्था नहीं है, वहां मोरियों से काम नहीं लेना चाहिए।

15. तथापि जहाँ मोरियों से ही काम लेना पड़े, वहाँ नाली में पेशाब करने के लिए बैठने वाले को चाहिए कि नजदीक कोई बरतन आदि पड़ा हो, तो उसे इतनी दूर रख दे, जिससे उस पर छींटे न पड़ने पायें। इसके सिवा इस तरह हाथ धोना या कुल्ला नहीं करना चाहिए, जिससे उस पर छींटे पड़ें।

16. मुँह से भद्दी गालियाँ निकालने की आदत भी एक प्रकार की अस्वच्छता ही है। जिस जीभ से परमात्मा का नाम लिया जाता है, उसी जीभ से गंदी गालियाँ निकालना नहाकर धूल पर लोटने से भी ज्यादा गंदा काम है, क्योंकि इससे जीभ के साथ-साथ मन भी अपवित्र होता है।

बाह्य स्वच्छता

शौच

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