पूर्वी हिमालय भारत का वह क्षेत्र है, जहां पानी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि पूरे भू-दृश्य और जीवन को आकार देने वाली शक्ति है।

 

फोटो: indianetzone.wordpress.com

जलवायु परिवर्तन

अरुणाचल की बाढ़ से आगे: क्या बदल रहा है पूर्वी हिमालय का जल तंत्र?

अरुणाचल प्रदेश की हालिया बाढ़ एक बड़ा सवाल भी उठाती है कि क्या पूर्वी हिमालय का जल परिदृश्य बदल रहा है और क्या हमारी जल नीतियां इसके लिए तैयार हैं?

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी
  • अरुणाचल की हालिया बाढ़ केवल एक आपदा नहीं, बल्कि पूर्वी हिमालय के बदलते जल तंत्र का संकेत है, जिसका असर पूरे ब्रह्मपुत्र बेसिन तक पहुंच सकता है।

  • पूर्वी हिमालय में नदियां, झरने, आर्द्रभूमियां, जंगल और जलग्रहण क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े हुए तंत्र हैं। इन्हें अलग-अलग नहीं, बल्कि एक समग्र जल परिदृश्य के रूप में समझने की ज़रूरत है।

  • भारी वर्षा के साथ-साथ सड़क, सुरंग और जलविद्युत परियोजनाओं जैसे विकास कार्य भी नदी तंत्र और ढालों पर असर डाल सकते हैं, इसलिए नदी घाटी (River Basin) आधारित योजना की आवश्यकता बढ़ गई है।

  • विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वी हिमालय की जल सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों के साथ स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को भी जल प्रबंधन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

जून 2026 के आख़िरी सप्ताह में लगातार हुई भारी बारिश के बाद अरुणाचल प्रदेश की कई छोटी नदियां और पहाड़ी धाराएं अचानक उफान पर आ गईं। कुछ ही घंटों में सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हो गए, कई गांवों का संपर्क टूट गया और सामान्य जनजीवन प्रभावित हो गया। लेकिन यह कहानी सिर्फ़ बाढ़ की नहीं, पूर्वी हिमालय और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन को आकार देने वाले पूरे नदी तंत्र की भी कहानी है।

पहाड़ों में मानसून के दौरान ऐसी घटनाएं नई नहीं हैं। लेकिन इस बार भी, हर बार की तरह, इससे जुड़ी चर्चा राहत और पुनर्वास तक ही सीमित दिखाई पड़ रही है। कुछ दिन बाद पानी उतर जाएगा, सड़कों की मरम्मत कर दी जाएगी और खबरें फिर से पीछे छूट जाएंगी। लेकिन क्या पानी उतरने के साथ वे सवाल भी पीछे छूट जाते हैं, जो हर ऐसी बाढ़ हमारे सामने खड़ी कर जाती है?

पूर्वी हिमालय भारत का वह क्षेत्र है, जहां पानी केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि पूरे भू-दृश्य और जीवन को आकार देने वाली शक्ति है। यहां देश के सबसे अधिक वर्षा वाले इलाके हैं। 

सियांग, सुबनसिरी, लोहित और दिबांग जैसी नदियां यहीं से निकलकर आगे ब्रह्मपुत्र का हिस्सा बनती हैं और उनका असर असम के मैदानों तक पहुंचता है।

लेकिन पूर्वी हिमालय की कहानी केवल बड़ी नदियों की नहीं है। झरने, छोटी पहाड़ी धाराएं, आर्द्रभूमियां, जंगल और जलग्रहण क्षेत्र मिलकर यहां के जल परिदृश्य को बनाते हैं। इसलिए इस तंत्र में होने वाला कोई भी बदलाव दूर तक असर डालता है।

लेकिन पिछले कुछ सालों में इसी इलाक़े से फ्लैश फ्लड, भूस्खलन, अचानक बढ़ते नदी प्रवाह और बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान की खबरें लगातार सामने आई हैं। हर ऐसी घटना एक सवाल फिर सामने खड़ा कर देती है कि क्या पूर्वी हिमालय की नदियों का स्वभाव अब पहले जैसा नहीं रहा?

अगर ऐसा है, तो यह सिर्फ़ अरुणाचल प्रदेश का नहीं, पूरे ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन का सवाल है। और उससे भी आगे बढ़कर, यह भारत की जल सुरक्षा, पहाड़ी विकास और बदलती जलवायु के बीच संबंधों को नए सिरे से समझने का सवाल भी है।

सुबनसिरी ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदियों में से एक है।
इसी नदी पर 2,000 मेगावाट क्षमता की लोअर सुबनसिरी जलविद्युत परियोजना (NHPC) विकसित की जा रही है। पूरी तरह से चालू होने पर इसे भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में गिना जाएगा।

पूर्वी हिमालय को अलग नज़र से देखने की ज़रूरत क्यों है?

जब हिमालय की बात होती है, तो अक्सर उसे एक ही भौगोलिक क्षेत्र मान लिया जाता है। लेकिन पानी के नज़रिए से देखें, तो पूर्वी हिमालय की अपनी अलग पहचान है।

यहां देश के सबसे अधिक वर्षा वाले इलाके हैं। पहाड़ अपेक्षाकृत युवा हैं, ढाल खड़ी है और नदियां तेज़ रफ्तार से नीचे उतरती हैं। यही वजह है कि बारिश के दौरान इनका स्वभाव बहुत तेज़ी से बदल सकता है। कुछ घंटों की लगातार बारिश भी छोटी धाराओं को उफनती नदियों में बदलने की क्षमता रखती है।

पूर्वी हिमालय की अधिकांश नदियां अपने साथ पानी के अलावा बड़ी मात्रा में मिट्टी, चट्टानें और तलछट भी बहाकर लाती हैं। यह तलछट भी नदी का एक स्वाभाविक हिस्सा है। 

यही तलछट आगे चलकर नदी के किनारों, बाढ़ के मैदानों और खेती लायक ज़मीन को आकार देती है। लेकिन अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन या बड़े पैमाने पर ढालों में आने वाले बदलाव से तलछट की मात्रा और उसके प्रवाह में बदलाव की आशंका रहती है। इसका असर नीचे पूरे ब्रह्मपुत्र बेसिन में भी दिखाई देता है।

पूर्वी हिमालय में बाढ़ हमेशा सिर्फ़ नदी का पानी बढ़ने भर की घटना नहीं होती। कई बार नदी अपना रास्ता बदल लेती है। कहीं तेज़ कटाव शुरू हो जाता है तो कहीं भूस्खलन का मलबा नदी का रास्ता रोक देता है या उसका बहाव बदल देता है।

इस पूरे नदी तंत्र में सियांग, सुबनसिरी, लोहित और दिबांग जैसी नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। सियांग तिब्बत से भारत में प्रवेश करने के बाद आगे चलकर ब्रह्मपुत्र का मुख्य प्रवाह बनती है। 

सुबनसिरी ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदियों में से एक है। इसी नदी पर 2,000 मेगावाट क्षमता की लोअर सुबनसिरी जलविद्युत परियोजना (NHPC) विकसित की जा रही है। पूरी तरह से चालू होने पर इसे भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में गिना जाएगा। 

लोहित और दिबांग भी अरुणाचल के ऊंचे पर्वतीय इलाकों से निकलकर ब्रह्मपुत्र में मिलती हैं। इन सभी नदियों का पानी, तलछट और प्रवाह अंततः असम के मैदानों तक पहुंचता है।

इसी वजह से अरुणाचल प्रदेश में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता। किसी नदी में बढ़ी तलछट, किसी ढाल पर हुआ बड़ा भूस्खलन या किसी सहायक नदी में आया तेज़ उफान नीचे पूरे ब्रह्मपुत्र बेसिन को प्रभावित कर सकता है।

इसी वजह से पूर्वी हिमालय को केवल एक पहाड़ी क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का ऊपरी हिस्सा है, इसलिए यहां होने वाले बदलावों का असर अरुणाचल तक सीमित नहीं रहता। यही सवाल आगे हमें यह समझने की ओर ले जाता है कि क्या पूर्वी हिमालय की नदियों का स्वभाव बदल रहा है।

क्या नदियों का स्वभाव बदल रहा है?

पूर्वी हिमालय की अधिकांश नदियां अपने साथ पानी के अलावा बड़ी मात्रा में मिट्टी, चट्टानें और तलछट भी बहाकर लाती हैं। यह तलछट भी नदी का एक स्वाभाविक हिस्सा है।

क्या पूर्वी हिमालय में नदियों का स्वभाव सचमुच बदल रहा है? इसका सीधा जवाब देना आसान नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार हर बाढ़ का कारण सिर्फ़ जलवायु परिवर्तन नहीं है। लेकिन वे इस बात पर सहमत हैं कि गर्म होती जलवायु के साथ चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं। IPCC की AR6 रिपोर्ट भी कई क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा की बढ़ती तीव्रता की ओर संकेत करती है।

इसी संदर्भ में International Centre for Integrated Mountain Development (ICIMOD) का कहना है कि हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में पानी को नदियों के रूप में सीमित करके नहीं समझा जा सकता। झरने, जलग्रहण क्षेत्र, हिमनद, जंगल और नदी घाटियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई प्रणालियां हैं।

इसलिए इस क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन या जल संकट जैसी घटनाओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि पूरे पर्वतीय नदी तंत्र के संदर्भ में देखने की ज़रूरत है।

यही वजह है कि पूर्वी हिमालय में बाढ़ का स्वरूप मैदानी इलाकों से अलग होता है। यहां कई बार नदियां धीरे-धीरे नहीं बढ़तीं, बल्कि कुछ ही घंटों में उफान पर पहुंच जाती हैं। कई बार भूस्खलन नदी का रास्ता रोक देता है। बाद में जब यह प्राकृतिक अवरोध टूटता है, तो अचानक बड़ी मात्रा में पानी नीचे की ओर बहता है और नुकसान बढ़ जाता है।

ऐसे में सिर्फ़ यह जान लेना काफ़ी नहीं है कि कितनी बारिश हुई। यह समझना भी उतना ही ज़रूरी है कि बारिश कहां हुई, कितनी देर तक हुई और उसका असर नदी घाटी पर कैसे पड़ा।

लेकिन इस कहानी में केवल नदियां ही नहीं हैं। झरने, छोटी पहाड़ी धाराएं, आर्द्रभूमियां और जलग्रहण क्षेत्र मिलकर पूरे जल परिदृश्य को बनाते हैं। इसलिए इनमें होने वाला कोई भी बदलाव आगे चलकर पूरी नदी घाटी को प्रभावित कर सकता है।

ICIMOD की HKH Springs Outlook रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी हिमालय में झरने केवल पेयजल का स्रोत नहीं हैं, बल्कि स्थानीय जल सुरक्षा का आधार भी हैं। रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन, भूमि उपयोग में बदलाव और जलग्रहण क्षेत्रों के क्षरण का असर झरनों के प्रवाह पर पड़ रहा है। 

इसलिए नदी घाटी की योजना बनाते समय केवल नदियों पर नहीं, बल्कि झरनों और उनके पुनर्भरण क्षेत्रों के संरक्षण पर भी समान रूप से ध्यान देना ज़रूरी है।

क्या बारिश ही एकमात्र कारण है?

अरुणाचल प्रदेश में सियांग, सुबनसिरी और दिबांग नदी घाटियों में कई बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं या उन पर काम चल रहा है। इसी तरह सीमा क्षेत्रों तक पहुंच बेहतर बनाने के लिए Trans Arunachal Highway और अन्य सड़क परियोजनाओं पर भी तेज़ी से काम हुआ है। 

पूर्वी हिमालय में बाढ़ और भूस्खलन को सिर्फ़ बारिश से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में सड़कों, सुरंगों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं का विस्तार भी तेज़ हुआ है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण यह विकास ज़रूरी है, लेकिन ऐसे संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में हर निर्माण का असर आसपास की नदियों, ढालों और पानी के बहने के प्राकृतिक रास्तों पर भी पड़ता है।

उदाहरण के लिए, अरुणाचल प्रदेश में सियांग, सुबनसिरी और दिबांग नदी घाटियों में कई बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं या उन पर काम चल रहा है। इसी तरह सीमा क्षेत्रों तक पहुंच बेहतर बनाने के लिए Trans Arunachal Highway और अन्य सड़क परियोजनाओं पर भी तेज़ी से काम हुआ है। 

इन परियोजनाओं का उद्देश्य विकास और संपर्क बढ़ाना है, लेकिन इनके साथ यह सवाल भी जुड़ा है कि पहाड़ों की ढाल, नदी घाटियों और पानी के प्राकृतिक बहाव पर इनका दीर्घकालिक असर क्या होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ों में किसी भी निर्माण का प्रभाव निर्माण स्थल तक सीमित नहीं रहता। ढालों की कटाई, मलबे के निस्तारण और नदी किनारों में बदलाव का असर नीचे बहने वाली नदियों, तलछट के प्रवाह और आसपास के गांवों तक पहुंच सकता है। इसलिए अब कई वैज्ञानिक यह सुझाव दे रहे हैं कि ऐसी परियोजनाओं का आकलन परियोजना-वार नहीं, बल्कि पूरी नदी घाटी के स्तर पर किया जाना चाहिए।

ICIMOD की HKH Springs Outlook रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी हिमालय में झरने केवल पेयजल का स्रोत नहीं हैं, बल्कि स्थानीय जल सुरक्षा का आधार भी हैं।

नदी भूगोलवेत्ता कल्याण रुद्र ने गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र पर लंबे समय तक अध्ययन किया है। उन्होंने अपनी किताब Rivers of the Ganga-Brahmaputra-Meghna Delta: A Fluvial Account of Bengal में गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का विस्तृत विश्लेषण किया है। 

कल्याण रुद्र कहते हैं कि नदी को सिर्फ़ बहते पानी के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसमें तलछट, सहायक नदियां, बाढ़ के मैदान और आसपास का पूरा भू-दृश्य शामिल होता है। पूर्वी हिमालय की नदियों को समझने में भी यही तरीका काम आता है।

पूर्वी हिमालय पर हुए कई अध्ययन बताते हैं कि ऊपर के हिस्से में होने वाले बदलाव नीचे तक असर डालते हैं। अगर किसी जलग्रहण क्षेत्र में जंगल कम होते हैं, ढाल अस्थिर होती है या पानी के रास्ते रुकते हैं, तो इसका असर नीचे की नदियों पर दिखता है। इससे बाढ़ का जोखिम भी बढ़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञ पूरी नदी घाटी को ध्यान में रखकर योजना बनाने की बात करते हैं।

इसका मतलब यह नहीं है कि हर बाढ़ के लिए विकास परियोजनाएं ही ज़िम्मेदार हैं। लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में विकास करते समय सावधानी ज़रूरी है। नदियों, ढालों और जल निकासी पर असर कम रखना चाहिए। तभी यह समझा जा सकेगा कि बाढ़ के पीछे सिर्फ़ बारिश नहीं, बल्कि कई कारण मिलकर काम करते हैं।

लेकिन क्या हर बाढ़ के बाद हमारी चर्चा राहत और पुनर्निर्माण तक ही सीमित रह जाती है, या हम यह भी समझने की कोशिश करते हैं कि पूरे नदी तंत्र में क्या बदल रहा है?

क्या पूर्वी हिमालय की याद सिर्फ़ बाढ़ के समय ही आएगी?

भारत में हिमालय की चर्चा अक्सर ग्लेशियरों, गंगा नदी, जलविद्युत परियोजनाओं या किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के संदर्भ में होती है। लेकिन पूर्वी हिमालय की नदी प्रणाली इन सबसे कहीं अधिक व्यापक है। 

इस क्षेत्र में सिर्फ़ ऊंचे पहाड़ ही नहीं हैं। यह झरनों, आर्द्रभूमियों, घने जंगलों, छोटी पहाड़ी धाराओं और ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र का भी घर है। इसलिए यहां होने वाले बदलावों का असर अरुणाचल प्रदेश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नीचे असम के मैदानों और पूरे ब्रह्मपुत्र बेसिन तक पहुंचता है। 

पूर्वी हिमालय की चर्चा अक्सर किसी बाढ़ या भूस्खलन के बाद तेज़ हो जाती है। लेकिन इसे केवल राहत और पुनर्वास के संदर्भ तक सीमित नहीं देखा जा सकता। इसे पूरे नदी तंत्र और जलग्रहण क्षेत्र के दीर्घकालिक प्रबंधन के संदर्भ में भी समझने की ज़रूरत है।

जबकि ICIMOD की हिंदू कुश हिमालय एसेसमेंट इस पूरे क्षेत्र को एशिया की जल सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। इसी तरह Observer Research Foundation (ORF) के एक विश्लेषण में हिमालयी नदी तंत्र को भारत की जल नीति में अधिक केंद्रीय स्थान देने की आवश्यकता बताई गई है।

क्या हमारी जल नीतियां इस बदलाव के लिए तैयार हैं?

पिछले कुछ वर्षों में बाढ़, जलवायु परिवर्तन और आपदा जोखिम को लेकर भारत में कई नीतियां और कार्यक्रम बने हैं। मौसम का पूर्वानुमान पहले की तुलना में बेहतर हुआ है और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था भी मजबूत हुई है। लेकिन पूर्वी हिमालय जैसे क्षेत्रों की चुनौतियां मौसम का अनुमान लगाने भर से हल नहीं होतीं।

भारत की National Water Policy 2012 भी नदी घाटी आधारित और समन्वित जल प्रबंधन की आवश्यकता पर बल देती है।

यहां एक सवाल बार-बार सामने आता है। क्या हम नदियों को पूरी नदी घाटी (River Basin) के रूप में देखते हैं, या उन्हें अलग-अलग विभागों और परियोजनाओं में बांटकर समझते हैं?

उदाहरण के लिए, एक ही नदी से जुड़े मुद्दों को कई अलग-अलग संस्थाएं देखती हैं। कहीं सड़क निर्माण की योजना बनती है, कहीं जलविद्युत परियोजना पर काम होता है, कहीं बाढ़ प्रबंधन की ज़िम्मेदारी होती है और कहीं जंगलों के संरक्षण की। लेकिन नदी इन प्रशासनिक सीमाओं को नहीं मानती। उसके लिए पहाड़, जंगल, सहायक नदियां, तलछट और मैदानी इलाक़े एक ही नदी घाटी का हिस्सा हैं।

पूर्वी हिमालय में यह चुनौती और भी बड़ी हो जाती है। अरुणाचल प्रदेश की नदियां कुछ ही घंटों में असम के मैदानी क्षेत्रों तक पहुंच जाती हैं। इसलिए किसी एक हिस्से में होने वाला बदलाव कई बार पूरी नदी घाटी को प्रभावित करता है। ऐसे में परियोजना-वार या विभाग-वार योजना ही पर्याप्त नहीं हो सकती।

इसलिए जल विशेषज्ञ लंबे समय से नदी घाटी आधारित योजना (River Basin Planning) पर ज़ोर देते रहे हैं। भारत की National Water Policy 2012 भी नदी घाटी आधारित और समन्वित जल प्रबंधन की आवश्यकता पर बल देती है। इसके अनुसार नदी को सिर्फ़ पानी की धारा नहीं, बल्कि एक पूरे नदी बेसिन के रूप में समझने की ज़रूरत है। इसका मतलब सिर्फ़ नदी के पानी का प्रबंधन करना नहीं है। वर्षा, जंगल, ढाल, तलछट, भूस्खलन, जल निकासी और स्थानीय समुदाय, इन सभी को एक-दूसरे से जुड़ा मानकर योजना बनानी होती है। तभी नदी घाटी की असली तस्वीर सामने आती है।

पूर्वी हिमालय पर ICIMOD के कई अध्ययनों में भी यह बताया गया है कि पहाड़ों में पानी को केवल नदियों के रूप में नहीं समझा जा सकता। आर्द्रभूमियां, झरने, जंगल और जलग्रहण क्षेत्र मिलकर पूरे जल तंत्र को बनाए रखते हैं। नतीजतन नदी घाटी आधारित योजना में इन सभी घटकों को साथ लेकर चलना ज़रूरी है।

लेकिन पूर्वी हिमालय को समझने के लिए क्या वैज्ञानिक आँकड़े और तकनीकी अध्ययन ही पर्याप्त हैं? शायद नहीं। इस क्षेत्र को समझने के लिए उन समुदायों के अनुभव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जो पीढ़ियों से इन नदियों, जंगलों और झरनों के साथ रह रहे हैं।

अरुणाचल प्रदेश के आदि (Adi) समुदाय पर हुए अध्ययनों से पता चलता है कि स्थानीय लोग मौसम, वर्षा, नदियों और जंगलों में होने वाले बदलावों को लंबे समय से अपने पारंपरिक ज्ञान के आधार पर समझते और दर्ज करते रहे हैं। वे खेती, जंगलों के उपयोग और जल स्रोतों के संरक्षण से जुड़े कई फैसले इन्हीं अनुभवों के आधार पर लेते हैं।

Indian Journal of Traditional Knowledge में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार आदि (Adi) समुदाय के लोग मौसम के बदलते पैटर्न और उसके आजीविका पर पड़ने वाले असर को महसूस कर रहे हैं। 

अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन के अनुकूल ढलने में स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसी कारण कई समुदाय खेती के तरीकों में बदलाव, जल स्रोतों की देखभाल और जंगलों के संरक्षण जैसे स्थानीय प्रयास भी कर रहे हैं।

यही वजह है कि पूर्वी हिमालय की योजना केवल इंजीनियरिंग या आपदा प्रबंधन का विषय नहीं हो सकती। इसमें स्थानीय समुदायों के अनुभव और वैज्ञानिक अध्ययनों, दोनों को साथ लेकर चलना होगा।

इसी दिशा में नीति आयोग की Composite Water Management Index रिपोर्ट भी जल संसाधनों के समन्वित प्रबंधन, राज्यों के बीच बेहतर तालमेल और नदी बेसिन स्तर पर योजना की आवश्यकता पर ज़ोर देती है। इन दोनों दस्तावेज़ों का साझा संदेश यही है कि पानी से जुड़ी समस्याओं का समाधान अलग-अलग विभागों में नहीं, बल्कि एकीकृत दृष्टिकोण से तलाशना होगा।

Indian Journal of Traditional Knowledge में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार आदि (Adi) समुदाय के लोग मौसम के बदलते पैटर्न और उसके आजीविका पर पड़ने वाले असर को महसूस कर रहे हैं। 

पूर्वी हिमालय से मिलने वाली सबसे बड़ी सीख

अरुणाचल प्रदेश की हालिया बाढ़ एक बार फिर याद दिलाती है कि पूर्वी हिमालय को सिर्फ़ आपदा-प्रभावित क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण जल क्षेत्रों में से एक है, जहां झरने, जंगल, आर्द्रभूमियां, छोटी पहाड़ी धाराएं और बड़ी नदियां मिलकर एक-दूसरे से जुड़ा हुआ जल परिदृश्य बनाती हैं। इस तंत्र का असर पहाड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ब्रह्मपुत्र के मैदानों और उससे जुड़े लाखों लोगों तक पहुंचता है।

पूर्वी हिमालय हमें याद दिलाता है कि पानी को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर नहीं समझा जा सकता। नदी, झरना, जंगल, आर्द्रभूमि, तलछट और समुदाय, ये सभी मिलकर पूर्वी हिमालय के जल परिदृश्य को आकार देते हैं। 

यदि भविष्य की योजनाओं में भी इन सभी घटकों को एक साथ शामिल किया जाए, तो बाढ़ जैसी घटनाओं के जोखिम को बेहतर ढंग से समझना और कम करना संभव होगा।

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