पश्चिमी घाट में बाढ़ और भूस्खलन को हमेशा अलग-अलग खतरे के रूप में देखना काफ़ी नहीं है। पहाड़ी इलाकों में एक घटना दूसरी घटना को शुरू कर सकती है या उसका असर बढ़ा सकती है।

 

फ़ोटो: हेमंत ब्याट्रॉय / ह्यूमेन सोसाइटी इंटरनेशनल, इंडिया

जलवायु परिवर्तन

बदलती बारिश के बीच क्यों बढ़ता है पश्चिमी घाट में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा

बदलती बारिश के साथ पश्चिमी घाट में बाढ़ और भूस्खलन का जोखिम भी बदल रहा है। समझें कि बारिश, ढलान, शुरुआती चेतावनी और स्थानीय योजना को साथ देखने की जरूरत क्यों है।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

केरल में बारिश हमेशा से अधिक होती रही है। लेकिन अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि साल भर में कितनी बारिश होती है। अब यह भी देखना जरूरी है कि बारिश कब होती है, कितनी तेज होती है और कितनी देर तक रहती है।

2026 में Journal of Agrometeorology में प्रकाशित एक अध्ययन ने 1901 से 2024 तक के 124 वर्षों के दैनिक बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें केरल के अलग-अलग हिस्सों में बारिश के पैटर्न में अंतर पाया गया। विश्लेषण के अनुसार, उत्तर और मध्य-पश्चिमी केरल में बारिश कुछ खास समय और इलाकों में अधिक केंद्रित रही है। इन इलाकों में अत्यधिक बारिश की घटनाओं में भी बदलाव के संकेत मिले हैं।

पश्चिमी घाट में बारिश के इस बदलाव का असर ज्यादा गंभीर हो सकता है। यहां कई जगहों पर पहाड़ी ढलान काफ़ी खड़ी हैं। बारिश का पानी तेजी से नीचे की ओर बह सकता है। लंबे समय तक या बहुत तेज बारिश होने पर मिट्टी में पानी बढ़ जाता है और कमजोर ढलानों पर भूस्खलन का खतरा बढ़ने की संभावना होती है। भूस्खलन के साथ नीचे आने वाले मलबे छोटी धाराओं और नदियों के बहाव के रास्ते की बाधा बन सकते हैं। 

पश्चिमी घाट की ढलानों पर भारी बारिश का असर

पश्चिमी घाट में भारी बारिश का असर सिर्फ नदियों के बढ़ते जलस्तर तक नहीं रहता। यहां कई जगहों पर ढलान खड़ी हैं और मिट्टी की परतें चट्टानों के ऊपर मौजूद हैं। तेज या लंबे समय तक होने वाली बारिश में पानी इन मिट्टी की परतों में पहुंचता है। इससे ढलान कमजोर पड़ सकती है।

बारिश का पानी मिट्टी में पहुंचने पर उसके भीतर पानी का दबाव बढ़ सकता है। इससे मिट्टी के कणों के बीच पकड़ कमजोर पड़ सकती है और ढलान अस्थिर हो सकती है। केरल में बारिश के कारण ढलान के अस्थिर होने पर किए गए एक अध्ययन में भी पानी के दबाव बढ़ने और मिट्टी की मजबूती घटने के बीच संबंध पाया गया।

भूस्खलन का खतरा केवल उसी दिन हुई बारिश से तय नहीं होता। लगातार बारिश से मिट्टी पहले ही काफी नम हो सकती है। इसके बाद कम समय में हुई तेज बारिश से ढलान पर खतरा बढ़ सकता है। इसलिए शुरुआती चेतावनी में बारिश की तीव्रता, अवधि और उससे पहले हुई बारिश को साथ देखना जरूरी है। वायनाड के अध्ययन में भी अलग-अलग इलाकों के लिए बारिश की सीमाएं अलग पाई गईं। इसलिए पूरे पश्चिमी घाट के लिए एक ही बारिश की सीमा तय करना पर्याप्त नहीं होगा।

लेकिन हर भारी बारिश में भूस्खलन नहीं होता। इसका खतरा बारिश की तीव्रता और अवधि के साथ ढलान, मिट्टी, चट्टान और जल निकासी जैसी स्थितियों पर भी निर्भर करता है।

अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि ऊंचाई वाले कुछ हिस्सों में बड़े और दूर तक जाने वाले मलबे के तेज बहाव (debris flows) देखे गए हैं। दूसरी ओर, कम ऊंचाई वाले इलाकों में नदी किनारे या सड़क और दूसरी कटिंग वाली ढलानों पर मिट्टी और चट्टान खिसकने की घटनाएं भी दर्ज की गई हैं। यानी एक जैसी बारिश का असर हर भू-भाग में एक जैसा नहीं होगा।

2018 के बाद क्या बदला?

केरल में 2018 की बाढ़ ने भारी बारिश के खतरे को एक नए स्तर पर सामने रखा। 1 जून से 19 अगस्त 2018 के बीच राज्य में 2,346.6 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से करीब 42 प्रतिशत अधिक थी। इसी दौरान वायनाड और इडुक्की में भारी बारिश के कारण गंभीर भूस्खलन हुए।

2018 के अनुभव ने यह दिखाया कि आपदा का खतरा केवल बारिश की मात्रा से तय नहीं होता। लगातार हुई बारिश से जमीन में नमी और जलाशयों का जलस्तर बढ़ सकता है। इसके बाद हुई बहुत तेज बारिश का असर और गंभीर हो सकता है। सरकारी आकलन में भी लगातार बारिश के कारण कई जलाशयों का जलस्तर बढ़ने और बाद में तेज बारिश से बाढ़ की स्थिति बिगड़ने की पुष्टि की गई है।

2018 के बाद के अध्ययनों में भूस्खलन के जोखिम को समझने के लिए बारिश के साथ अब यह भी देखा जा रहा है कि ढलान कितनी खड़ी है, जमीन की ऊंचाई कितनी है, वहां किस तरह की मिट्टी और चट्टान है और पानी किस तरह बहता है। कई अध्ययन अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि पुराने भूस्खलनों का किन भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियों से संबंध रहा है।

वायनाड पर 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन ने 2007 से 2018 के बीच दर्ज भूस्खलनों के आंकड़ों के साथ बारिश, ऊंचाई और दूसरी भौगोलिक सूचनाओं का इस्तेमाल किया। शोधकर्ताओं ने मशीन लर्निंग की मदद से यह समझने की कोशिश की कि भूस्खलन का खतरा किन इलाकों में और किन परिस्थितियों में बढ़ सकता है। इसके आधार पर जिले का खतरे का नक्शा (hazard map) तैयार किया गया।

इससे एक बात साफ होती है कि किसी इलाके में भूस्खलन का खतरा केवल इस बात से तय नहीं होता कि वहां पहले भूस्खलन हुआ है या नहीं। एक ऐसी ढलान जहां अभी तक बड़ी घटना नहीं हुई है, वह भी कुछ खास परिस्थितियों में अस्थिर हो सकती है।

बाढ़ और भूस्खलन को अलग-अलग क्यों नहीं देख सकते?

पश्चिमी घाट में विकास को रोकने के बजाय जोखिम के हिसाब से विकास की योजना बनाना जरूरी है।

पश्चिमी घाट में बाढ़ और भूस्खलन को हमेशा अलग-अलग खतरे के रूप में देखना काफ़ी नहीं है। पहाड़ी इलाकों में एक घटना दूसरी घटना को शुरू कर सकती है या उसका असर बढ़ा सकती है।

30 जुलाई 2024 को वायनाड के मुंडक्काई-चूरलमाला क्षेत्र में हुई घटना इसका एक उदाहरण है। भारी बारिश के बाद कई जगहों पर ढलान खिसक गई। इनसे बड़ी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और मलबा नीचे आया। यह मलबा नदी और उसकी सहायक धाराओं तक पहुंचा। इससे पानी के बहाव में बदलाव आया और कुछ जगहों पर तेज मलबा वाला बहाव और अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई।

वायनाड के लिए बारिश, भूस्खलन और बाढ़ के इस क्रम को ध्यान में रखते हुए तत्काल निगरानी और खतरे के अलग-अलग चरणों के आधार पर चेतावनी देने की जरूरत बताई है।

2026 में Scientific Reports में प्रकाशित एक शोध ने वायनाड की इस घटना को कई आपदाओं की श्रृंखला के रूप में देखा। शोधकर्ताओं का कहना है कि यहां अत्यधिक बारिश के बाद भूस्खलन हुए। इसके बाद अचानक बाढ़, मलबे का बहाव और नदी के किनारों के कटाव जैसी घटनाएं हुईं। ऐसी स्थिति को बहु-आपदा जोखिम कहा जाता है, जहां एक खतरे के बाद दूसरा खतरा पैदा हो सकता है या उसका असर बढ़ सकता है।

लेकिन हर स्थिति में घटनाओं का क्रम एक जैसा नहीं होता। तेज बारिश सीधे बाढ़ ला सकती है, जबकि भूस्खलन से आया मलबा नदी या धारा के प्रवाह को बदल सकता है। कुछ मामलों में भूस्खलन से बना अस्थायी अवरोध बाद में टूटने पर नीचे की ओर तेज पानी और मलबा भेज सकता है।

इसलिए किसी इलाके के लिए सिर्फ बाढ़ का खतरा या भूस्खलन का खतरा बताना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि एक खतरा दूसरे पर क्या असर डाल सकता है।

इसका असर शुरुआती चेतावनी की व्यवस्था पर भी पड़ता है। अगर किसी पहाड़ी क्षेत्र में बहुत तेज बारिश के बाद भूस्खलन होता है, तो चेतावनी सिर्फ उस ढलान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। नीचे की धाराओं और नदी किनारे बसे इलाकों को भी समय पर सूचना देनी होगी।

2026 के अध्ययन ने भी वायनाड के लिए बारिश, भूस्खलन और बाढ़ के इस क्रम को ध्यान में रखते हुए तत्काल निगरानी और खतरे के अलग-अलग चरणों के आधार पर चेतावनी देने की जरूरत बताई है।

इसलिए पश्चिमी घाट में आपदा प्रबंधन का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि “कहां भूस्खलन हो सकता है?” यह भी देखना जरूरी है कि “अगर वहां भूस्खलन हुआ, तो उसके बाद पानी और मलबा किस दिशा में जाएगा और रास्ते में किन बस्तियों को खतरा हो सकता है?”

2026 में Scientific Reports में प्रकाशित एक शोध ने वायनाड की इस घटना को कई आपदाओं की श्रृंखला के रूप में देखा। शोधकर्ताओं का कहना है कि यहां अत्यधिक बारिश के बाद भूस्खलन हुए।

क्या शुरुआती चेतावनी व्यवस्था स्थानीय स्तर तक पहुंच रही है?

भारी बारिश की चेतावनी और भूस्खलन की चेतावनी एक जैसी नहीं होती। मौसम विभाग किसी जिले में बहुत भारी बारिश की संभावना बता सकता है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि कौन-सी ढलान अस्थिर हो सकती है। इसके लिए बारिश की तीव्रता और अवधि के साथ मिट्टी की नमी, ढलान, चट्टान और जल निकासी जैसी सूचनाओं को भी देखना पड़ता है।

2024 की वायनाड आपदा ने इस चुनौती को स्पष्ट कर दिया। सरकारी आकलन के अनुसार, घटना के समय वहां कोई ऐसी भूस्खलन पूर्व चेतावनी प्रणाली नहीं थी, जिसका नियमित रूप से इस्तेमाल किया जा रहा हो। Geological Survey of India (GSI) की बारिश की सीमा पर आधारित प्रणाली प्रयोग के स्तर पर थी। इस प्रणाली ने 29-30 जुलाई के लिए जुलाई के लिए वायनाड के व्यथिरी तालुक के लिए ‘ग्रीन अलर्ट’ का पूर्वानुमान दिया था।

वायनाड के विभिन्न ग्राम पंचायतों में 29 जुलाई को ही निकासी शुरू कर दी गई थी। यह IMD के ऑरेंज अलर्ट जारी करने से पहले हुआ था। यह उदाहरण दिखाता है कि चेतावनी मिलने के साथ स्थानीय स्तर पर समय पर कार्रवाई भी जरूरी है।

वायनाड के अध्ययनों में अलग-अलग इलाकों के लिए बारिश की अलग सीमाएं मिली हैं। इसलिए पूरे पश्चिमी घाट के लिए एक ही बारिश की सीमा (rainfall threshold) तय करना पर्याप्त नहीं होगा।

केरल में KaWaCHaM जैसी पहलें भी शुरू की गई हैं, जिनका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करना है। इसके तहत मौसम, जलस्तर, मिट्टी की नमी और दूसरे संकेतकों की निगरानी की जाती है। लेकिन इनसे मिली जानकारी का फायदा तभी होगा, जब वह समय पर स्थानीय प्रशासन और समुदाय तक पहुंचे।

सिर्फ तकनीक पर्याप्त नहीं है। चेतावनी को स्थानीय कार्रवाई से जोड़ना भी जरूरी है। अगर पंचायत को पहले से पता हो कि किन ढलानों और बस्तियों पर खतरा ज्यादा है, तो चेतावनी मिलने पर वह जल्दी कार्रवाई कर सकती है।

2026 में राज्य ने आपदा से निपटने की व्यवस्था को तहसील स्तर तक भी लागू किया है। इसका उद्देश्य आपदा के समय राज्य और जिला स्तर की व्यवस्था को स्थानीय प्रशासन से बेहतर तरीके से जोड़ना है ताकि जरूरत पड़ने पर राहत और बचाव का काम तेजी से किया जा सके। लेकिन चेतावनी तभी कारगर होगी, जब वह समय पर उन लोगों तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

सिर्फ मौसम का पूर्वानुमान काफी नहीं होगा। पंचायत को यह भी पता होना चाहिए कि उसके क्षेत्र में कौन-सी ढलान संवेदनशील है, कौन-सा रास्ता भारी बारिश में बंद हो सकता है और किन बस्तियों को पहले सुरक्षित जगह पहुंचाना है। इसके लिए स्थानीय बारिश, मिट्टी की नमी और ढलान की स्थिति की जानकारी को पहले से तैयार बचाव योजना से जोड़ना होगा।

केरल में KaWaCHaM जैसी पहलें भी शुरू की गई हैं, जिनका उद्देश्य स्थानीय स्तर पर चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करना है।

अगर यह पता हो कि किसी संवेदनशील ढलान पर कितनी तेज और कितनी देर तक हुई बारिश के बाद भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है तो पंचायत समय रहते लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचा सकती है। लेकिन इसके लिए स्थानीय स्तर पर बारिश मापने वाले उपकरण, जमीन और ढलान पर नजर रखने की व्यवस्था और पहले से तैयार बचाव योजनाएं जरूरी होंगी। 

आखिर में सवाल यही है कि क्या चेतावनी उस व्यक्ति तक समय पर पहुंच रही है, जिसे अपना घर छोड़कर सुरक्षित जगह जाना है? असली पैमाना यह होना चाहिए कि किसी संवेदनशील ढलान पर रहने वाले परिवार को खतरे की जानकारी कितनी जल्दी मिली और उसके पास सुरक्षित निकलने के लिए कितना समय था।

क्या निर्माण जोखिम को बढ़ा रहा है?

पश्चिमी घाट में सड़क, भवन और पर्यटन परियोजनाओं का विस्तार हो रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या निर्माण गतिविधियां भूस्खलन के खतरे को बढ़ा रही हैं। इसका जवाब इतना सीधा नहीं है। किसी जगह भूस्खलन होने के लिए केवल निर्माण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। बारिश, ढलान, मिट्टी और चट्टान की प्रकृति, जल निकासी और भूमि उपयोग जैसे कई कारकों से मिलकर जोखिम तय होता है।

लेकिन निर्माण कुछ परिस्थितियों में जोखिम बढ़ा सकता है। पहाड़ी इलाकों में सड़क बनाने के लिए ढलान काटने से उसका आकार और कोण बदल सकता है। सड़क के ऊपर और नीचे पानी के बहाव का रास्ता भी बदल सकता है। अगर तेज बारिश के दौरान पानी कटे हुए हिस्से या उसके आसपास की मिट्टी में जमा होता है, तो ढलान की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। 

अध्ययन के अनुसार बारिश, ढलान, मिट्टी, भूगर्भीय संरचना, जल निकासी और भूमि उपयोग जैसे कारकों को साथ लेकर भूस्खलन की संवेदनशीलता का आकलन किया गया। अध्ययन में सड़क के आसपास के कुछ हिस्सों में अधिक जोखिम पाया गया।

दूसरी ओर, 2018 के केरल भूस्खलनों पर किए गए एक अध्ययन में हाल के भूमि उपयोग बदलावों को उस आपदा का मुख्य कारण नहीं पाया गया। इससे यह समझना जरूरी है कि हर निर्माण परियोजना को भूस्खलन का कारण मानना सही नहीं होगा। सवाल यह है कि निर्माण कहां हो रहा है, ढलान को किस तरह बदला जा रहा है और बारिश के पानी की निकासी की व्यवस्था कैसी है।

इसलिए पश्चिमी घाट में विकास को रोकने के बजाय जोखिम के हिसाब से विकास की योजना बनाना जरूरी है। संवेदनशील ढलानों, जल निकासी के प्राकृतिक रास्तों और भूस्खलन के पुराने स्थानों की जानकारी को सड़क, भवन और दूसरी परियोजनाओं की योजना में शामिल करना होगा।

पुराने नक्शे बदलती बारिश के लिए पर्याप्त हैं या नहीं इसका भी ध्यान रखना होगा। किसी जगह का संवेदनशील होना और किसी खास समय वहां भूस्खलन का खतरा बढ़ जाना एक ही बात नहीं है। संवेदनशीलता से पता चलता है कि किसी जगह की भौगोलिक और भूगर्भीय स्थिति भूस्खलन के लिए कितनी अनुकूल है। 

लेकिन तेज बारिश होने पर उसी ढलान पर वास्तविक खतरा बढ़ सकता है। उदाहरण के लिए, पहले से संवेदनशील ढलान पर कुछ घंटों की तेज बारिश, खासकर लगातार हुई बारिश के बाद, खतरा तेजी से बढ़ा सकती है।

हर निर्माण परियोजना को
भूस्खलन का कारण मानना सही नहीं होगा। सवाल यह है कि निर्माण कहां हो रहा है, ढलान को किस तरह बदला जा रहा है और बारिश के पानी की निकासी की व्यवस्था कैसी है।

नक्शे यह दिखा सकते हैं कि कौन-से इलाके भूस्खलन के लिए ज्यादा संवेदनशील हैं। इसलिए संवेदनशीलता और किसी खास समय के खतरे को अलग-अलग समझना जरूरी है। 2024 के एक अध्ययन ने वायनाड में पुराने भूस्खलनों, बारिश और इलाके की भौगोलिक स्थितियों को साथ लेकर जोखिम का आकलन किया था। इससे पता चलता है कि केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि पहले कहां भूस्खलन हुआ था। यह भी देखना जरूरी है कि किन परिस्थितियों में वहां खतरा बढ़ सकता है।

  • जमीन की जानकारी: ढलान, ऊंचाई, मिट्टी, चट्टान और जल निकासी।

  • बारिश की जानकारी: बारिश की मात्रा, तीव्रता, अवधि और उससे पहले हुई बारिश।

  • लोगों और बुनियादी ढांचे की जानकारी: घर, सड़कें, स्कूल, अस्पताल और दूसरी महत्वपूर्ण सुविधाएं।

खतरे के नक़्शे को समय-समय पर

खतरे के नक़्शे को समय-समय पर अपडेट करना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि पुराने नक्शे बेकार हो गए हैं। वे जमीन की स्थायी स्थितियों को समझने के लिए जरूरी हैं। लेकिन इन्हें अंतिम मानकर नहीं चला जा सकता। नए भूस्खलनों, बारिश के आंकड़ों और भूमि उपयोग में बदलावों को भी इनमें शामिल करना होगा।

इसलिए बदलती बारिश के दौर में सवाल यह नहीं है कि पुराने नक्शे सही हैं या गलत। सवाल यह है कि क्या उनमें नए बारिश के आंकड़ों, नए भूस्खलनों और भूमि उपयोग में बदलावों को समय-समय पर शामिल किया जा रहा है।

खतरे के नक्शे पंचायत स्तर तक पहुंचना:  एक और सवाल है कि ये नक्शे कितने बड़े इलाके के लिए बनाए जाएं। जिले का नक्शा यह बता सकता है कि कौन-से हिस्से ज्यादा संवेदनशील हैं। लेकिन पंचायत और गांव के स्तर पर इससे ज्यादा बारीक जानकारी की जरूरत होगी। 

उदाहरण के लिए, किसी पंचायत में एक ढलान के ऊपर सड़क है और दूसरी ढलान के नीचे बस्ती है। दोनों जगहों पर बारिश एक जैसी होगी, लेकिन खतरा एक जैसा नहीं होगा। इसलिए भविष्य में खतरे के नक्शों को पंचायत, गांव या किसी खास संवेदनशील ढलान के स्तर तक ले जाना उपयोगी हो सकता है। वहां बारिश, ढलान, पानी की निकासी और आबादी की जानकारी को एक साथ देखा जा सकता है।

इस तरह नक्शे सिर्फ खतरे की पहचान तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि उनसे स्थानीय स्तर पर कार्रवाई की योजना भी बनाई जा सकेगी। नक्शा बताए कि कहां खतरा है। बारिश का आंकड़ा बताए कि खतरा कब बढ़ रहा है। और आबादी की जानकारी बताए कि खतरा बढ़ने पर सबसे पहले किसे सुरक्षित जगह पहुंचाना है।

बारिश का पानी सिर्फ निकालना नहीं, संभालना भी होगा

भारी बारिश के समय पहली कोशिश अक्सर पानी को जल्द से जल्द निकालने की होती है। नालों की सफाई, जल निकासी और पंप जैसी व्यवस्थाएं जरूरी हैं। लेकिन हर जगह पानी को तेजी से आगे भेजना ही बाढ़ का समाधान नहीं है।

पश्चिमी घाट में बारिश का पानी ढलानों से तेजी से नीचे आता है। छोटी धाराएं और जलधाराएं भी थोड़े समय में बहुत ज्यादा पानी ले जा सकती हैं। इसलिए जहां संभव हो, पानी की रफ्तार कम करनी होगी और उसे कुछ समय के लिए फैलने की जगह उपलब्ध करानी होगी। KSDMA के दस्तावेज में भी सतही बहाव, जमीन में पानी के जाने और नदी-नालों की क्षमता के बीच संबंध को रेखांकित किया गया है।

स्थानीय योजनाओं में भी जरूरत
के मुताबिक बदलाव होते रहने चाहिए। नई सड़क, नई बस्ती, नया भूस्खलन या बारिश के बदलते पैटर्न के साथ इनमें बदलाव जरूरी है

छोटी धाराएं, वेटलैंड और बाढ़क्षेत्र मिलकर पानी के प्राकृतिक बहाव का हिस्सा हैं। इन्हें नुकसान पहुंचने या इनके रास्ते बदलने से पानी के बहाव का तरीका बदल सकता है। केरल में बाढ़ प्रबंधन से जुड़ी सिफारिशों में छोटी धाराओं और बाढ़क्षेत्रों के जल निकायों को बेहतर बनाने की जरूरत भी बताई गई है।

बारिश के पूरे पानी को सीधे नदी तक पहुंचाना भी जरूरी नहीं है। जहां जमीन पानी सोख सकती है, वहां उसे जमीन में जाने का मौका देना उपयोगी है। लेकिन बहुत तेज बारिश या पहले से संतृप्त मिट्टी की स्थिति में सुरक्षित जल निकासी भी जरूरी है। इसलिए हर जगह एक ही समाधान काम नहीं करेगा।

पानी के लिए जगह भी बचानी होगी

नदी और छोटी धाराओं के आसपास कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहां भारी बारिश के समय पानी फैल सकता है। अगर इन जगहों पर घर, सड़क या दूसरी स्थायी संरचनाएं बन जाती हैं, तो बाढ़ का नुकसान बढ़ सकता है। इसलिए बाढ़ के नक्शों को केवल आपदा के समय इस्तेमाल करने के बजाय सड़क, आवास और दूसरी परियोजनाओं की योजना में भी शामिल करना जरूरी है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर जगह सिर्फ प्राकृतिक व्यवस्था के भरोसे रहा जा सकता है। शहरों और घनी बस्तियों में नालियां, पुलिया और दूसरी जल निकासी व्यवस्थाएं जरूरी हैं। लेकिन इनके साथ छोटी धाराओं, वेटलैंड और बाढ़क्षेत्रों को बचाना भी जरूरी है। बदलती बारिश के दौर में सिर्फ निकासी की क्षमता बढ़ाने के बजाय यह भी देखना होगा कि पानी को सुरक्षित रूप से फैलने और बहने की जगह कहां मिलेगी।

इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पानी को कितनी जल्दी बाहर निकाला जाए। यह भी तय करना होगा कि पानी को कहां फैलने, जमीन में जाने और सुरक्षित रूप से आगे बढ़ने की जगह मिलेगी। स्थानीय विकास और आपदा योजनाएं बनाते समय इन बातों को भी ध्यान में रखना होगा।

स्थानीय योजना ही अगली कड़ी है

मौसम का पूर्वानुमान राज्य स्तर पर जारी हो सकता है। खतरे का नक्शा जिला स्तर पर बनाया जा सकता है। लेकिन आपदा के समय सबसे पहले कार्रवाई स्थानीय स्तर पर ही होती है। अब स्थानीय योजनाओं को भी बदलते जोखिम के हिसाब से तैयार करना होगा। पंचायत को पता होना चाहिए कि उसके क्षेत्र में कौन-सी ढलान संवेदनशील है, कौन-सी सड़क या छोटी धारा भारी बारिश में प्रभावित हो सकती है और किन बस्तियों को पहले सुरक्षित जगह पहुंचाना होगा।

आखिरकार जोखिम का सवाल केवल यह नहीं है कि पहाड़ का कौन-सा हिस्सा अस्थिर है। यह भी देखना होगा कि उस ढलान के आसपास कौन रहता है और खतरा बढ़ने पर लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचने के लिए कितना समय मिलेगा।

स्थानीय योजनाओं में भी जरूरत के मुताबिक बदलाव होते रहने चाहिए। नई सड़क, नई बस्ती, नया भूस्खलन या बारिश के बदलते पैटर्न के साथ इनमें बदलाव जरूरी है। राज्य का पूर्वानुमान बताए कि बारिश कब और कितनी हो सकती है। जोखिम का नक्शा बताए कि खतरा कहां है। स्थानीय योजना यह तय करे कि खतरा बढ़ने पर लोगों को सुरक्षित कैसे निकाला जाएगा।

बदलती बारिश के बीच बदलना होगा पश्चिमी घाट का प्रबंधन

केरल में बारिश के वितरण और भारी बारिश की घटनाओं में बदलाव के संकेत मिले हैं। लेकिन हर बाढ़ या भूस्खलन को सिर्फ जलवायु परिवर्तन से नहीं समझा जा सकता। आपदा का असर बारिश, जमीन, ढलान, मिट्टी, भूमि उपयोग और वहां रहने वाली आबादी जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।

इसलिए पश्चिमी घाट में आपदा से निपटने का तरीका भी बदलना होगा। मौसम की जानकारी को भूस्खलन और बाढ़ के खतरे के नक्शों के साथ जोड़ना होगा। विकास की योजना में भी ढलान, जल निकासी और प्राकृतिक जल तंत्रों को ध्यान में रखना होगा।

सबसे जरूरी बदलाव यह है कि राज्य की चेतावनी, स्थानीय जोखिम की जानकारी और पंचायत स्तर की कार्रवाई एक साथ काम करें।

बारिश को रोका नहीं जा सकता। लेकिन उसके बदलते तरीके को समझकर पहाड़ों, नदियों और बस्तियों की योजना जरूर बदली जा सकती है। बदलती बारिश के बीच यही तैयारी भविष्य में बाढ़ और भूस्खलन से होने वाले नुकसान को कम कर सकती है।

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