सीगल चिड़िया की कई प्रजातियाँ समुद्र तटों, रेतीले टापुओं, द्वीपों और तटीय आर्द्रभूमियों में घोंसले बनाती हैं। समुद्री हीटवेव के कारण इनकी नेस्टिंग प्रभावित हो रही है।
फोटो - अजय मोहन
2024 में दुनिया भर में कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 56.8 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर रहा। यहअब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।
1991-2025 के बीच समुद्री हीटवेव के दिन तीन गुना से अधिक हुए; अकेले 2025 में 65 दिन रहे।
समुद्र हमारे ग्रह का सबसे बड़ा "हीट सिंक" है। लेकिन अब इस पर हमारी गलतियों का बोझ असहनीय होता जा रहा है।
"इंडिकेटर्स ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट चेंज" (IGCC) की ताज़ा रिपोर्ट ने दुनिया के सामने एक डरावनी तस्वीर रखी है। 11 जून 2026 को जारी हुई यह रिपोर्ट बताती है कि 2025 में मानव गतिविधियों के कारण वैश्विक तापमान में 1.37 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। यही रफ्तार जारी रही, तो अगले चार वर्षों में धरती का तापमान उस 1.5 डिग्री की खतरनाक सीमा को पार कर जाएगा, जिसे वैज्ञानिक “Point of no Return मानते हैं। यानी वहां से वापस आना नामुमकिन होगा।
इस रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाली बात सामने आयी है। वो है समुद्री हीटवेव जिसमें बीते वर्षों में तेज़ी से इज़ाफा हुआ है। दरअसल समुद्री हीटवेव अब हर साल ज्यादा लंबी, अधक तीव्र और बेहद विनाशकारी होती जा रही है। इसका प्रभाव भारत जैसे देश पर सबसे अधिक हो सकता है, जहां करोड़ों लोगों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और मौसम सीधे-सीधे समुद्र से जुड़ा है।
अरब सागर
गर्मियों के मौसम में जब आप घर से बाहर निकलते हैं तब आपके क्षेत्र में चलने वाली लू के थपेड़ों से अचानक तापमान में वृद्धि होती है। रातें भी गर्म हो जाती हैं और ऐसे क्षेत्र में रहने वाले लोगों में अकसर हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। ठीक उसी प्रकार जब समुद्र में जब गर्म लहरें आती हैं और सतह का तापमान अचानक औसत से ऊपर चला जाता है तब असामान्य गर्मी उत्पन्न होती है, जिसे समुद्री हीटवेव कहते हैं। इसका प्रभाव कम से कम पांच से छह दिनों तक रहता है।
फर्क यह है कि ज़मीन की लू को हम देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं, उससे बचाव कर सकते हैं। लेकिन समुद्री हीटवेव हमसे काफी दूर है और यह धीरे-धीरे समुद्री ईकोसिस्टम को विनाश की ओर ले जा रही है।
आम तौर पर हीटवेव के आंकड़े उन दिनों की संख्या को काउंट करके मापा जाता है, जितने दिन तापमान निर्धारित मानक से अधिक होता है। यही तरीका समुद्री हीटवेव पर भी लागू होता है। IGCC की रिपोर्ट के आँकड़ों के अनुसार 1991 से 2025 के बीच महज़ तीन दशकों में समुद्री हीटवेव वाले दिनों की संख्या तीन गुना से भी ज़्यादा हो गई है। अकेले 2025 में दुनियाभर के समुद्रों में 65 दिन समुद्री हीटवेव दर्ज की गई।
रिपोर्ट रिलीज़ करते वक्त पुसान नेशनल यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जून-यी ली ने स्पष्ट शब्दों में कहा, "समुद्री हीटवेव पहले की तुलना में अधिक बार आ रही हैं, जो समुद्र की सतह के लगातार गर्म होने का प्रमाण है। ये घटनाएं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाती हैं, खाद्य उत्पादन, अर्थव्यवस्था और तटीय सुरक्षा को खतरे में डालती हैं।"
कोची तट
समुद्री हीटवेव को समझने के लिए पहले यह समझना ज़रूरी है कि आखिर समुद्र इतने गर्म क्यों हो रहे हैं। IGCC रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष "पृथ्वी के ऊर्जा असंतुलन" यानी Earth's Energy Imbalance (EEI) से जुड़ा है। सरल भाषा में कहें तो सूर्य से पृथ्वी पर जितनी ऊर्जा आती है, उससे ज़्यादा ऊर्जा अब पृथ्वी के वायुमंडल में फंसती जा रही है। यह फंसी हुई अतिरिक्त ऊर्जा ही पृथ्वी को धीरे-धीरे एक विशाल भट्टी में बदल रही है।
इस अतिरिक्त गर्मी का 90 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा समुद्र सोख लेते हैं। समुद्र एक तरह से हमारे ग्रह के "कूलिंग सिस्टम" की तरह काम करते हैं। लेकिन अब यही कूलिंग सिस्टम हमारी गलतियों की कीमत चुका रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ दशकों में EEI दोगुने से भी ज़्यादा हो गया है। लीड्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पियर्स फोर्स्टर ने रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि मानव प्रभाव के बिना यह असंतुलन शून्य के करीब होना चाहिए था, लेकिन यह 1970 के दशक से लगातार बढ़ रहा है और अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है।
जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव पूरी दुनिया में महसूस किए जा रहे हैं, और तापमान बढ़ने के साथ ये और तेज़ होंगे।डॉ. सामंथा बर्गेस, कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस
भारत की 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा पर लगभग 15 करोड़ लोग रहते हैं। देश की मत्स्य पालन अर्थव्यवस्था, पर्यटन उद्योग, आदि समुद्र पर निर्भर हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह कि भारत का मॉनसून अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और भारतीय महासागर के स्वास्थ्य पर निर्भर हैं। इन जल निकायों में छोटी से छोटी हलचल भारत में बारिश को प्रभावित करती है। यही कारण है कि समुद्री हीटवेव के बढ़ते प्रकोप से भारत को कई मोर्चों पर एक साथ लड़ना पड़ रहा है।
समुद्र गर्म होते हैं तो मछलियां गहरे और ठंडे पानी की तरफ चली जाती हैं। तटीय मछुआरे, जिनकी नावें और जाल उथले पानी के लिए बने हैं अकसर खाली हाथ लौटते हैं। केरल, तमिलनाडु, गुजरात और आंध्र प्रदेश के लाखों मछुआरे परिवार इसकी सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं। मछलियों की उपलब्धता घटने से उनकी आमदनी गिर रही है, कर्ज़ बढ़ रहा है और परिवार टूट रहे हैं।
कोरल रीफ
अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप की प्रवाल भित्तियाँ यानी कोरल रीफ (coral reef) जिन्हें "समुद्र का उष्णकटिबंधीय वन" कहा जाता है, समुद्री हीटवेव की सबसे पहली शिकार होती हैं। पानी का तापमान अगर एक या दो डिग्री भी बढ़ जाता है, तो कोरल रीफ अपने अंदर रहने वाले रंगीन शैवाल को बाहर निकाल देती हैं। इस प्रक्रिया को "कोरल ब्लीचिंग" कहते हैं। इसके बाद कोरल रीफ सफेद पड़ जाती हैं और धीरे-धीरे मर जाती हैं।
समुद्र में स्कूबा डाइविंग के शौकीनों के लिए ये कोरल रीफ महज आकर्षण का केंद्र हो सकती हैं लेकिन वास्तव में ये हज़ारों समुद्री प्रजातियों का घर होती हैं। ये कोरल रीफ ही हैं जो तटों को तूफानों और बाढ़ से बचाने के लिए प्राकृतिक दीवारें का कार्य करती हैं। इसके अलावा तटीय मछली पालन अधिकांश रूप से इसी पर टिका है। इनके नष्ट होने का मतलब है, पूरी तटीय पारिस्थितिकी का धीरे-धीरे खत्म होना है।
गर्म समुद्र चक्रवातों को ऊर्जा देते हैं। यही कारण है कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में बनने वाले चक्रवात अब पहले से कहीं ज़्यादा तीव्र और तेज़ होते हैं और साथ में पहले से ज़्यादा विनाशकारी भी। ओशन हीटवेव के कारण ये अचानक पैदा होते हैं और इसलिए अब समुद्री चक्रवात अप्रत्याशित हो रहे हैं। ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात के तट पर रहने वाले लोग इस बदलाव को अपनी आँखों से देख सकते हैं और महसूस भी कर रहे हैं। चक्रवात फानी, अम्फान, बिपरजॉय, आदि बीते वर्षों में भारत में आये विनाशकारी चक्रवात हैं।
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था अधिकांश रूप से मानसून पर टिकी है और भारतीय मानसून हिंद महासागर की सतह के तापमान से गहराई से जुड़ा है। जब समुद्री हीटवेव के कारण तापमान असामान्य रूप से ऊपर जाता है तब, मानसून का स्वभाव बदल जाता है। ऐसे में कहीं बाढ़, कहीं सूखा, कहीं देर से आना, कहीं जल्दी जाना। किसान, जो पहले से ही जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं, इस अनिश्चितता में फंसते जाते हैं।
1970 से 2005 तक चक्रवात का पैटर्न
IGCC रिपोर्ट के प्रमुख आंकड़े इस संकट की विकरालता को और स्पष्ट करते हैं। 2024 में दुनिया भर में कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 56.8 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर रहा। यहअब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 2025 में 425.6 ppm तक पहुंच गई। 1901 से अब तक समुद्र का जलस्तर 23 सेंटीमीटर बढ़ चुका है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 1.5 डिग्री की सीमा में रहने के लिए हम केवल लगभग 130 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड और उत्सर्जित कर सकते हैं। मौजूदा दर पर यह बजट मात्र तीन साल में खत्म हो जाएगा और ऐसे में तापमान में 1.5 डिग्री वृद्धि की सीमा 2030 के आसपास पार हो सकती है।
IGCC की यह रिपोर्ट 17 देशों के 56 संस्थानों के 70 से अधिक वैज्ञानिकों व IPCC के प्रमुख लेखकों की सामूहिक मेहनत का नतीजा है। इसमें 40 से अधिक वैश्विक डेटासेट का उपयोग किया गया है। इसका निष्कर्ष एकमत और स्पष्ट है: पिछले दशक में हुई लगभग सारी वार्मिंग मानव गतिविधियों जैसे जीवाश्म ईंधन जलाने, जंगल काटने और औद्योगिक प्रदूषण के कारण है। यह कोई प्राकृतिक चक्र नहीं है। यह हमारी ही करनी है।
समुद्र हमारे ग्रह का सबसे बड़ा "हीट सिंक" है। इसमें कोई दो राय नहीं कि हम अपनी गलतियों का बोझ इस पर डाल रहे हैं। समुद्री हीटवेव यह बता रही हैं कि अब यह बोझ असहनीय होता जा रहा है। दरअसल जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं रहा बल्कि यह वर्तमान की जीती-जागती सच्चाई बन गया है।
यह सच्चाई तटों पर रहने वाले मछुआरों की खाली नावों में साफ दिखने लगी है। लक्षद्वीप की सफेद पड़ चुकी कोरल रीफ में दिख रही है, और बेमौसम आने वाले तूफान इसके जीते-जागते प्रमाण हैं। भारत जैसे देश के लिए, जहां 150 करोड़ लोग मानसून, नदियों और समुद्र के भरोसे जीते हैं, यह सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं है, बल्कि यह अस्तित्व का सवाल है।
2025 में वैश्विक तापमान वृद्धि: मानव-जनित वार्मिंग 1.37°C तक पहुँची। यह दर प्रति दशक 0.27°C है, जो अब तक की सर्वाधिक है।
2025 रिकॉर्ड में तीसरा सबसे गर्म साल रहा।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 2024 में 56.8 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य, अब तक का सर्वाधिक रहा।
2025 में कार्बन डाइऑक्साइड की सांद्रता 425.6 ppm, मीथेन की 1936.3 ppb और नाइट्रस ऑक्साइड 339.4 ppb रही।
2019 के बाद से कार्बन डाइऑक्साइड में 3.8%, मीथेन में 3.8%, नाइट्रस ऑक्साइड में 2.2% की वृद्धि दर्ज हुई।
1991-2025 के बीच समुद्री हीटवेव के दिन तीन गुना से अधिक हुए; अकेले 2025 में 65 दिन रहे।
पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन (EEI) पिछले कुछ दशकों में दोगुने से ज़्यादा हो गया
समुद्र स्तर 1901 से अब तक 23 सेंटीमीटर बढ़ा गया है। 2025 में नया रिकॉर्ड बना; वृद्धि की दर लगभग 1.8 मिमी प्रति वर्ष रही।
शेष कार्बन बजट 2026 की शुरुआत से केवल 130 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड, मौजूदा दर पर लगभग तीन वर्षों में समाप्त होगा।
भूमि तापमान: 2016-2025 दशक में पूर्व-औद्योगिक काल की तुलना में ज़मीन का तापमान 1.81°C और महासागर का 1.03°C अधिक
सल्फर डाइऑक्साइड (सल्फर डाइऑक्साइड) उत्सर्जन में कमी आई है, लेकिन इससे ग्रीनहाउस गैसों का "मास्किंग" प्रभाव घट रहा है, जिससे और अधिक वार्मिंग सामने आ रही है
IGCC के इस संस्करण में 40 से अधिक वैश्विक डेटासेट शामिल हैं, जिनमें से कई अब फंडिंग निर्णयों के कारण खतरे में हैं। हमें जलवायु के अवलोकन की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए ठोस अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई और समन्वय की आवश्यकता है। इसके बिना, जब तत्काल जलवायु कार्रवाई की ज़रूरत है, भविष्य के आकलन बहुत कठिन हो जाएँगे।डॉ. क्रिस स्मिथ, वरिष्ठ शोध विद्वान, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एप्लाइड सिस्टम्स एनालिसिस
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें