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उत्तर बंगाल में मानसून के दौरान भारी बारिश के बाद तीस्ता, तोर्सा, जलढाका, रायडाक और संकोश जैसी नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ जाता है। कई जगह नदी के किनारे टूटने लगते हैं। खेत बह जाते हैं। गांव खाली करने पड़ते हैं और सड़कों पर भी इसका असर होता है। हर मानसून में स्थिति कमोबेश ऐसी ही होती है। अब सवाल यह है कि उत्तर बंगाल की नदियां हर साल ऐसा क्यों करती हैं?
पहली नज़र में लगता है कि साल दर साल होने वाले इस कटाव की वजह केवल भारी बारिश है। लेकिन उत्तर बंगाल की नदियों की कहानी केवल मानसून से नहीं जुड़ी है। इसकी जड़ें हिमालय की बनावट, नदियों के स्वभाव और मैदानों की भूगोल में छिपी हैं।
उत्तर बंगाल की अधिकांश नदियां युवा हिमालय से निकलती हैं। वे स्वभाव से ही तेज, गतिशील और लगातार बदलने वाली हैं। यही कारण है कि ये नदियां समय-समय पर अपना रास्ता बदलती हैं और पुराने किनारों को काटते हुए नए किनारे बनाती हैं।
हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। इसका निर्माण भारतीय और यूरेशियाई भू-प्लेटों की टक्कर से हुआ था। यह प्रक्रिया आज भी पूरी तरह रुकी नहीं है। इसलिए हिमालय आज भी धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है। इसी वजह से यहां की चट्टानें कई जगह कमजोर हैं, उनमें दरारें हैं और वे आसानी से टूट जाती हैं।
उत्तर बंगाल की तीस्ता, तोर्सा, जलढाका, रायडाक और संकोश जैसी अधिकांश नदियां पूर्वी हिमालय से निकलती हैं। ये अपने साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी, बालू और पत्थर मैदानों तक लाती हैं। आगे चलकर ये सभी नदियां ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का हिस्सा बन जाती हैं।
Geochemistry में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार तीस्ता बेसिन में कटाव (erosion) की अधिक दर का कारण भी यही है। अध्ययन में पाया गया कि तीस्ता नदी बेसिन में हर साल औसतन करीब 2 मिलीमीटर चट्टानें और मिट्टी टूटकर नदियों में पहुंच जाती हैं। यह दिखाता है कि हिमालय आज भी लगातार बदल रहा है।
International Journal of Sediment Research के एक शोध के अनुसार सिक्किम-दार्जिलिंग हिमालय दक्षिणी हिमालय के सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में से एक है। मानसून के दौरान यहां बार-बार भूस्खलन, मलबा प्रवाह (debris flow) और जमीन की बनावट में बदलाव होते रहते हैं। यानी कमजोर चट्टानें और भारी बारिश मिलकर बड़ी मात्रा में मिट्टी और पत्थर नदियों तक पहुंचाती हैं।
यही बात ICIMOD की तकनीकी रिपोर्ट भी बताती है। रिपोर्ट के अनुसार युवा हिमालय में लगातार भू-उत्थान, अस्थिर ढलान और नदी कटाव की प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। इसी कारण पहाड़ों से टूटकर आई मिट्टी, बालू, कंकड़ और बोल्डर बड़ी मात्रा में नदियों तक पहुंचते हैं और आगे चलकर तलछट का रूप लेते हैं।
2024 में तीस्ता बेसिन पर प्रकाशित एक अध्ययन में भी यही पाया गया कि भारी बारिश के बाद नदी के पानी में बहने वाली महीन मिट्टी और गाद की मात्रा सामान्य परिस्थितियों की तुलना में चार गुना तक बढ़ सकती है। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि कुछ वर्षों में तलछट का उत्पादन 20,000 टन प्रति वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष तक पहुंच गया, जो हिमालय ही नहीं, दुनिया के सबसे अधिक तलछट वाले नदी बेसिनों में गिना जाता है।
इन सभी अध्ययनों से एक बात साफ होती है। उत्तर बंगाल की हिमालयी नदियों की सबसे बड़ी पहचान केवल उनका तेज बहाव नहीं है, बल्कि उनके साथ बहने वाली विशाल मात्रा में तलछट भी है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि तीस्ता नदी में बहकर आने वाली मिट्टी और पत्थर केवल मानसून की देन नहीं हैं। हिमालय की चट्टानों का लगातार टूटना, पहाड़ों में होने वाले प्राकृतिक बदलाव और जलवायु, तीनों मिलकर तय करते हैं कि नदी अपने साथ कितनी और किस तरह की तलछट लेकर आएगी।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि तीस्ता पर हुए ये अध्ययन केवल एक नदी की कहानी नहीं बताते। उत्तर बंगाल की तोर्सा, जलढाका, रायडाक और संकोश जैसी दूसरी प्रमुख नदियां भी लगभग समान भूगर्भीय और जलवायु परिस्थितियों से होकर बहती हैं। इसलिए हिमालय की कमजोर चट्टानों, तेज ढाल, भारी मानसूनी वर्षा और अधिक तलछट जैसी प्रक्रियाएं इन नदियों के व्यवहार पर भी उसी तरह असर डालती हैं। अंतर केवल इतना है कि हर नदी का जलग्रहण क्षेत्र, बहाव और तलछट की मात्रा अलग-अलग होती है।
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH) के अनुसार अधिक ढाल वाले क्षेत्रों में नदी की ऊर्जा (stream power) भी अधिक होती है। इसी ऊर्जा की मदद से नदी चट्टानों को काटती है, घाटियां बनाती है और बड़ी मात्रा में मिट्टी, बालू, कंकड़ और पत्थर नीचे मैदानों तक ले जाती है।
दूसरे शब्दों में, उत्तर बंगाल की नदियों की सबसे बड़ी विशेषता उनका जलप्रवाह नहीं, बल्कि उनके साथ बहने वाली विशाल मात्रा में तलछट है। यही तलछट आगे मैदानों में पहुंचकर नदी के बहाव, किनारों और रास्ते को लगातार बदलती रहती है। इसलिए इन नदियों का व्यवहार भारत के अधिकांश प्रायद्वीपीय नदी तंत्र से अलग दिखाई देता है।
कहीं नया रेत का टापू बन जाता है, कहीं पुराना किनारा टूट जाता है और कहीं नदी की मुख्य धारा कुछ दूरी खिसक जाती है। इसलिए यहां नदी को समझने के लिए केवल जलस्तर नहीं, बल्कि उसके साथ आने वाली तलछट और बदलते रास्ते को भी समझना जरूरी है।
पहाड़ों से उतरने के बाद उत्तर बंगाल का भूभाग अचानक समतल होने लगता है। यहां पहुंचते-पहुंचते नदी का बहाव पहले जितना तेज नहीं रहता और उसके व्यवहार में भी बड़ा बदलाव आने लगता है। तेज बहाव वाली नदी अपने साथ ज्यादा मिट्टी, बालू और पत्थर बहा सकती है। लेकिन रफ्तार कमते ही वह इन्हें रास्ते में ही छोड़ने लगती है। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH) भी अपने अध्ययनों में यही प्रक्रिया बताता है।
इसी वजह से उत्तर बंगाल के मैदानों में पहुंचकर तीस्ता, तोर्सा और जलढाका जैसी नदियां बड़ी मात्रा में बालू, मिट्टी और कंकड़ जमा करने लगती हैं। धीरे-धीरे नदी के बीच बालू और मिट्टी जमा होकर रेत के टापू (sand bars) बनने लगते हैं। पानी इन टापुओं से टकराकर नया रास्ता खोजता है। देखते-ही-देखते एक धारा कई धाराओं में बंट जाती है।
उत्तर बंगाल में हर मानसून के दौरान इस प्रक्रिया का असर साफ दिखाई देता है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) की बाढ़ पूर्वानुमान रिपोर्टों में जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार और कूचबिहार जिलों की तीस्ता, जलढाका, तोर्सा, रायडाक और संकोश नदियों में जलस्तर बढ़ने और बहाव बदलने की नियमित चेतावनी दी जाती है।
कई बार मेखलीगंज, डोमोहानी और जलढाका एनएच-31 जैसे निगरानी केंद्रों पर जलस्तर सामान्य से ऊपर दर्ज किया जाता है। यानी उत्तर बंगाल की नदियों का बार-बार रास्ता बदलना कोई असामान्य घटना नहीं है। यह उनके स्वाभाविक व्यवहार का हिस्सा है। इसी तरह की नदियों को नदी वैज्ञानिक ब्रेडेड नदी (Braided River) कहते हैं।
उत्तर बंगाल के तोर्सा और कलजानी नदियों पर 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि पिछले लगभग 50 वर्षों में इन नदियों ने कई स्थानों पर अपना किनारा और मुख्य धारा बदली है।
इसे समझने का सबसे आसान तरीका बालों की गूंथी हुई चोटी है। जैसे चोटी में कई लटें एक-दूसरे से मिलती और अलग होती रहती हैं, वैसे ही ब्रेडेड नदी में भी कई धाराएं बनती, टूटती और फिर जुड़ती रहती हैं।
नदी वैज्ञानिक प्रो. स्टुअर्ट लेन कहते हैं कि ब्रेडेड नदियों को स्थिर मानना ही सबसे बड़ी भूल है। उनके अनुसार ऐसी नदियां लगातार अपना रास्ता बदलती रहती हैं। कहीं नई धारा बनती है, कहीं पुरानी धारा खत्म हो जाती है। समय के साथ नदी का सक्रिय हिस्सा भी इधर-उधर खिसकता रहता है। यही उनका स्वाभाविक व्यवहार है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के अध्ययन के अनुसार ब्रेडेड नदी का निर्माण तब होता है, जब नदी में मिट्टी, बालू और कंकड़ इतने अधिक हो जाएं कि नदी उन्हें आगे न बहा सके। ऐसे में नदी के बीच में बने रेत के टापू मुख्य धारा को अलग-अलग दिशाओं में मोड़ देते हैं और धीरे-धीरे बहु-धाराओं वाला स्वरूप विकसित हो जाता है। निचली तीस्ता पर हुए अध्ययन और पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की State of Environment Report भी इसकी पुष्टि करती है।
यही वजह है कि उत्तर बंगाल का नदी मानचित्र इतिहास में कई बार बदला है। माना जाता है कि 1787 की विनाशकारी बाढ़ के बाद तीस्ता के मार्ग परिवर्तन की प्रक्रिया तेज हुई और अंततः उसने अपना पुराना रास्ता छोड़ दिया। यानी उत्तर बंगाल की नदियों में रास्ता बदलना कोई नई या असामान्य घटना नहीं है। यह उनके स्वभाव का हिस्सा है।
उत्तर बंगाल की नदियों को समझाते हुए अनुपम मिश्र ने अपने लेखन में इसी विचार को व्यक्त करते हुए लिखा है कि “प्रकृति ‘आईएसआई मार्का’ तराजू लेकर पानी बांटने नहीं निकलती।” उनके कहने का मतलब था कि नदियों और मानसून का व्यवहार पूरी तरह एक जैसा या स्थिर नहीं होता। इसलिए नदी का प्रबंधन भी उसके अपने प्राकृतिक स्वभाव के अनुसार बदलने की प्रक्रिया पर आधारित होना चाहिए।
केवल जलस्तर सामान्य हो जाने का मतलब यह नहीं होता कि नदी पहले जैसी हो गई है। कई बार पानी उतरने के बाद पता चलता है कि कहीं खेत कट चुके हैं, कहीं रेत का नया टापू बन गया है और कहीं नदी अपना किनारा बदल चुकी है।
IIT कानपुर के एक अध्ययन के अनुसार नदी का कटाव और तलछट का जमाव एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। जहां बहाव अधिक होता है, वहां कटाव बढ़ता है। जहां बहाव धीमा पड़ता है, वहां तलछट जमा होने लगती है।
उत्तर बंगाल में हर मानसून के दौरान गांवों में आमतौर पर लोग कहते पाए जाते हैं कि नदी इस साल हमारी ओर बढ़ आई है। लेकिन नदी वैज्ञानिक कहते हैं कि असल में नदी किसी गांव की ओर नहीं बढ़ती। वह अपने स्वाभाविक तरीके से अपना रास्ता बदलती रहती है। नदी किनारे का कटाव भी इसी स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है।
NIH के अनुसार नदी किनारे का कटाव (Bank Erosion) नदी के स्वाभाविक व्यवहार का हिस्सा है। नदी कितनी तेज बह रही है, वह अपने साथ कितनी मिट्टी और बालू ला रही है, नदी की ढाल कैसी है और किनारे की मिट्टी कितनी मजबूत है, इन सभी बातों पर ही यह निर्भर करता है कि किसी जगह कटाव होगा या वहां नई मिट्टी जमा होगी।
जब नदी किसी मोड़ पर बहती है, तो उसका सबसे तेज बहाव बाहरी किनारे से टकराता है। तेज पानी लगातार मिट्टी को काटता रहता है। धीरे-धीरे किनारा कमजोर होने लगता है और उसका हिस्सा नदी में गिर जाता है। इसी प्रक्रिया को किनारे का कटाव कहा जाता है।
इसके ठीक उलट, मोड़ के भीतरी हिस्से में नदी की गति कम हो जाती है। यहां नदी अपने साथ लाई हुई मिट्टी, बालू और कंकड़ जमा करने लगती है। यानी नदी एक ओर ज़मीन काटती है, तो दूसरी ओर नई ज़मीन बनाती भी है। यही कारण है कि कटाव और मिट्टी का जमाव हमेशा साथ-साथ चलते हैं। एक जगह जो मिट्टी कटती है, वह अक्सर किसी दूसरी जगह जाकर जमा हो जाती है।
IIT कानपुर के एक अध्ययन के अनुसार नदी का कटाव और तलछट का जमाव एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। जहां बहाव अधिक होता है, वहां कटाव बढ़ता है। जहां बहाव धीमा पड़ता है, वहां तलछट जमा होने लगती है।
यह प्रक्रिया एक-दो दिन में नहीं होती बल्कि सालों तक धीरे-धीरे चलती रहती है। धीरे-धीरे नदी की मुख्य धारा भी अपनी जगह बदलने लगती है। वैज्ञानिक इसे चैनल माइग्रेशन (Channel Migration) कहते हैं। उपग्रह चित्रों से यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि उत्तर बंगाल की कई नदियों की धाराएं हर कुछ वर्षों में कुछ मीटर से लेकर कई सौ मीटर तक खिसक जाती हैं।
उत्तर बंगाल के तोर्सा और कलजानी नदियों पर 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि पिछले लगभग 50 वर्षों में इन नदियों ने कई स्थानों पर अपना किनारा और मुख्य धारा बदली है।
इस बदलाव से खेती की जमीन, घनी वनस्पति और नदी किनारे बसे गांव प्रभावित हुए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि नदी किनारे का कटाव केवल प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका और भूमि उपयोग को भी सीधे प्रभावित करता है।
राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) और विभिन्न विश्वविद्यालयों के उपग्रह आधारित अध्ययनों में भी पाया गया है कि तीस्ता और उसकी सहायक नदियों के कई हिस्सों में चैनल माइग्रेशन लगातार होता रहता है। इसलिए इन नदियों के किनारे स्थायी नहीं माने जाते। अक्सर यह बदलाव धीरे-धीरे होता है।
लेकिन कुछ परिस्थितियों में नदी बहुत कम समय में भी अपना रास्ता बदल सकती है। ऐसा तब होता है, जब नदी के पुराने मार्ग में बहुत अधिक बालू और तलछट जमा हो जाती है या बाढ़ के समय पानी को कहीं और अपेक्षाकृत आसान रास्ता मिल जाता है। इस प्रक्रिया को एवल्शन (Avulsion) कहा जाता है।
Earth Surface Processes and Landforms तथा Journal of Hydrology में प्रकाशित हिमालयी नदियों पर कई अध्ययनों के अनुसार ब्रेडेड नदियों में एवल्शन असामान्य घटना नहीं है। इन परिस्थितियों में नदी नया रास्ता अपना सकती है।
यह केवल वैज्ञानिकों की व्याख्या नहीं है, बल्कि उत्तर बंगाल के लोगों का दशकों पुराना अनुभव भी है। साल 2011 में जलपाईगुड़ी के तत्कालीन सांसद महेंद्र कुमार राय ने लोकसभा में कहा था कि तीस्ता, तोर्सा, रायडाक, कलजानी और महानंदा जैसी नदियों के कटाव से जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और सिलीगुड़ी के गांव प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि अपलचंद, मेखलीगंज, मागुमारी और कुचलीबाड़ी जैसे इलाकों में कई बस्तियां नदी कटाव के कारण पूरी तरह बह चुकी हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उत्तर बंगाल में नदी का बदलता रास्ता केवल भूगोल का विषय नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की रोजमर्रा की हकीकत भी है।
IPCC की नवीनतम आकलन रिपोर्ट भी इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है कि पिछले कुछ सालों में दक्षिण एशिया में कम समय में बहुत तेज बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं।
हर मानसून के बाद जब किसी नदी का किनारा टूटता है, तो सबसे पहले बारिश को जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन नदी वैज्ञानिकों का कहना है कि कहानी केवल बारिश की नहीं है। नदी का कटाव कई प्राकृतिक और मानवीय कारणों के एक साथ काम करने का परिणाम होता है।
भारत में बाढ़ और नदी कटाव का असर कितना व्यापक है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय बाढ़ आयोग (1980) ने देश के लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को बाढ़ संभावित बताया था। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार भी भारत का बड़ा हिस्सा बाढ़ जोखिम वाले क्षेत्रों में आता है। हालांकि हर बाढ़ क्षेत्र में नदी कटाव नहीं होता, लेकिन हिमालयी नदियों वाले इलाकों में दोनों समस्याएं अक्सर साथ-साथ दिखाई देती हैं।
पिछले कुछ सालों में दक्षिण एशिया में कम समय में बहुत तेज बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं। IPCC की नवीनतम आकलन रिपोर्ट भी इसी प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है। ऐसी बारिश से नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ता है और कटाव का खतरा भी बढ़ जाता है।
लेकिन केवल पानी बढ़ने से नदी अपना रास्ता नहीं बदलती। हिमालय से आने वाली नदियों में बड़ी मात्रा में तलछट भी आती है। इसमें मिट्टी, बालू, कंकड़ और बड़े पत्थर शामिल होते हैं। जब भारी बारिश के साथ भूस्खलन भी होता है, तो यह तलछट कई गुना बढ़ जाती है। नदी को फिर इस अतिरिक्त सामग्री को कहीं न कहीं जमा करना पड़ता है। यही प्रक्रिया आगे चलकर चैनल बदलने और किनारे कटने का कारण बनती है।
तलछट का पूरा असर हमेशा एक जैसा नहीं होता। इसका एक हिस्सा बाढ़ के दौरान नदी से बाहर निकलकर खेतों में फैलता है, जिससे कई जगह उपजाऊ मिट्टी भी मिलती है। लेकिन जब यही तलछट बड़ी मात्रा में नदी के भीतर ही जमा होने लगती है, तो नदी का तल ऊंचा होने लगता है। इससे नदी का बहाव बदल सकता है और कटाव या बाढ़ का जोखिम भी बढ़ सकता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों में यह प्रक्रिया और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। उत्तर बंगाल की नदियां इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं।
जब सिक्किम और दार्जिलिंग हिमालय में लगातार भारी बारिश होती है, तो कुछ ही घंटों या दिनों में उसका असर तीस्ता, जलढाका, तोर्सा, रायडाक और संकोश जैसी नदियों में दिखने लगता है। केंद्रीय जल आयोग की बाढ़ बुलेटिनों में लगभग हर मानसून के दौरान दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार और कूचबिहार जिलों के लिए जलस्तर बढ़ने और बाढ़ की चेतावनी जारी की जाती है।
क्या इसका मतलब यह है कि उत्तर बंगाल में नदी कटाव पहले से ज्यादा हो गया है? इसका सीधा जवाब देना आसान नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी नदियां हमेशा से अपना रास्ता बदलती रही हैं। लेकिन हाल के दशकों में अत्यधिक बारिश, तेज बाढ़, भूस्खलन और बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के कारण कई इलाकों में कटाव और उससे होने वाले नुकसान का खतरा पहले की तुलना में बढ़ा है।
2026 में तोर्सा-कलजानी क्षेत्र पर प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि पिछले लगभग 50 सालों के दौरान इन नदियों ने कई जगह अपने किनारे और मुख्य धारा बदली है। इसका असर खेती की जमीन, जंगलों और बाढ़ क्षेत्र में भूमि उपयोग पर भी पड़ा है। यानी नदी कटाव केवल प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है। इसका असर सीधे लोगों की जमीन, खेती और आजीविका पर भी पड़ता है।
कोसी हिमालय से भारी मात्रा में तलछट लेकर आती है। पिछले लगभग दो सौ वर्षों में इसका मुख्य प्रवाह पश्चिम की ओर लगभग 110-120 किलोमीटर तक खिसक चुका है।
कई बार नदी का स्वभाव नहीं, बल्कि हमारे विकास के तरीके जोखिम बढ़ा देते हैं। जब बाढ़ क्षेत्र में सड़कें, मकान और अन्य निर्माण होते हैं, तो नदी के फैलने की जगह कम हो जाती है। ऐसे में बाढ़ का पानी कम जगह से गुजरता है। इससे बहाव का दबाव बढ़ सकता है और कटाव किसी एक स्थान पर अधिक तेज हो सकता है। पुलों के संकरे जलमार्ग, तटबंध और सड़कें भी कई बार नदी के प्राकृतिक बहाव को बदल देते हैं। IPCC अपनी रिपोर्ट में भी कहता है कि बाढ़ की तीव्रता केवल वर्षा से नहीं, बल्कि भूमि उपयोग में बदलाव और मानव हस्तक्षेप से भी प्रभावित होती है।
इसी तरह पुलों के संकरे जलमार्ग (waterway opening), तटबंध और सड़कें भी कई बार नदी के प्राकृतिक बहाव को बदल देती हैं। यदि नदी का रास्ता संकरा कर दिया जाए, तो वही पानी कम जगह से गुजरता है। इससे बहाव तेज होता है और कटाव बढ़ सकता है।
उत्तर बंगाल में यह स्थिति कई जगह और जटिल हो जाती है। तीस्ता, तोर्सा और जलढाका जैसी नदियों के किनारे बसे गांव, खेती की जमीन और कुछ स्थानों पर चाय बागान भी नदी कटाव के जोखिम का सामना करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जहां नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में निर्माण या अन्य हस्तक्षेप बढ़ते हैं, वहां कटाव का असर लोगों की आजीविका पर और अधिक गहरा पड़ सकता है।
अक्टूबर 2023 में सिक्किम की दक्षिण ल्होनाक (South Lhonak) हिमनदीय झील के फटने (GLOF) के बाद तीस्ता नदी में अचानक आई बाढ़ ने सिक्किम और उत्तर बंगाल दोनों को प्रभावित किया। इस घटना में केवल पानी ही नहीं, बल्कि बड़ी मात्रा में चट्टानें, मिट्टी और मलबा भी नदी के साथ नीचे आया। कई पुल बह गए, नदी का तल और किनारे कई स्थानों पर बदल गए तथा उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों में नदी का व्यवहार सामान्य मानसूनी बाढ़ से अलग दिखाई दिया। इस घटना ने साफ कर दिया कि हिमालयी नदियों को केवल बारिश के आधार पर नहीं समझा जा सकता। ग्लेशियर, भूस्खलन और तलछट भी उनके व्यवहार को उतना ही प्रभावित करते हैं।
कोसी हिमालय से भारी मात्रा में तलछट लेकर आती है। पिछले लगभग दो सौ वर्षों में इसका मुख्य प्रवाह पश्चिम की ओर लगभग 110-120 किलोमीटर तक खिसक चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे केवल बाढ़ नहीं, बल्कि हिमालय से आने वाली भारी तलछट भी एक बड़ा कारण है।
2008 में नेपाल के कुसाहा क्षेत्र में तटबंध टूटने के बाद कोसी ने कई दशक पुराना रास्ता पकड़ लिया। लाखों लोग प्रभावित हुए और बड़ी कृषि भूमि जलमग्न हो गई। इस घटना ने दिखाया कि केवल तटबंध बनाकर हिमालयी नदियों को हमेशा नियंत्रित नहीं किया जा सकता।
ब्रह्मपुत्र दुनिया की सबसे अधिक तलछट ढोने वाली नदियों में गिनी जाती है। Earth-Science Reviews में प्रकाशित एक समीक्षा के अनुसार नदी में लगातार जमा हो रही तलछट के कारण कई हिस्सों में नदी उथली होती जा रही है और उसका पाट चौड़ा हो रहा है। इससे बाढ़ का खतरा बढ़ता है, खेती की जमीन प्रभावित होती है और तटबंधों पर दबाव भी बढ़ता है। कई जगह नदी का तल आसपास की जमीन से ऊंचा होने का खतरा भी पैदा हो जाता है।
असम में हर वर्ष हजारों परिवार नदी कटाव के कारण विस्थापित होते हैं। राज्य सरकार और केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्टें भी मानती हैं कि यहां की समस्या केवल बाढ़ नहीं, बल्कि लगातार होने वाला नदी तट कटाव भी है। इन सभी उदाहरणों से एक बात साफ होती है कि हिमालयी नदियों को केवल बाढ़ के नजरिए से समझना पर्याप्त नहीं है। उनका स्वभाव ही लगातार बदलने वाला है।
भारतीय जल विशेषज्ञ अनुपम मिश्र बार-बार कहते थे कि नदियों को केवल पानी की धारा समझना भूल है। उनका मानना था कि नदी का अपना स्वभाव होता है और समाज को उसी के अनुरूप जीना सीखना चाहिए। यदि हम नदी के बाढ़ क्षेत्र में लगातार निर्माण करेंगे या उसके प्राकृतिक रास्ते को पूरी तरह रोकने की कोशिश करेंगे तो अंततः नुकसान भी हमें ही उठाना पड़ेगा।
उत्तर बंगाल में भी हर मानसून के दौरान यही तस्वीर दिखाई देती है। भारी बारिश, सिक्किम और दार्जिलिंग हिमालय में होने वाले भूस्खलन और तीस्ता जैसी नदियों में बढ़ती तलछट, ये सभी मिलकर नदी के बहाव और कटाव को प्रभावित करते हैं। इसलिए हर साल होने वाला कटाव केवल स्थानीय बारिश का परिणाम नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी जलग्रहण क्षेत्र में हो रहे बदलावों की कहानी भी है।
जब नदी बार-बार बाढ़ लाती है और किनारे काटती है, तो सबसे पहले तटबंध बनाने की मांग उठती है। भारत में भी दशकों से बाढ़ से बचाव के लिए तटबंध सबसे अधिक अपनाए गए उपायों में शामिल रहे हैं। इनका उद्देश्य नदी के पानी को एक निश्चित दायरे में रखना और आसपास की बस्तियों, खेतों तथा बुनियादी ढांचे को बाढ़ से बचाना होता है।
केंद्रीय जल आयोग (CWC) की बाढ़ प्रबंधन रिपोर्ट के अनुसार देश में हजारों किलोमीटर लंबे तटबंध बनाए गए हैं। इसी वजह से कई राज्यों में बाढ़ प्रबंधन की रणनीति लंबे समय तक मुख्य रूप से तटबंधों पर आधारित रही।
बिहार, उत्तर प्रदेश, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में दशकों से बाढ़ प्रबंधन का बड़ा हिस्सा इन्हीं पर आधारित रहा है। ससे कई इलाकों में लोगों और खेती की जमीन को बाढ़ से राहत मिली। लेकिन समय के साथ यह सवाल भी उठने लगा कि क्या केवल तटबंधों के सहारे हिमालयी नदियों को लंबे समय तक संभाला जा सकता है।
तटबंधों ने कई इलाकों में लाखों लोगों को बाढ़ से सुरक्षा दी है। इसलिए उनकी उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन नदी वैज्ञानिकों का कहना है कि हिमालयी नदियों में केवल तटबंधों पर निर्भर रहना लंबे समय में नई चुनौतियां भी पैदा कर सकता है। इसलिए सवाल यह है कि क्या हर नदी के लिए यही सबसे कारगर उपाय है।
हिमालयी नदियां अपने साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी, बालू और कंकड़ लेकर आती हैं। सामान्य स्थिति में बाढ़ के दौरान इनका एक बड़ा हिस्सा नदी के दोनों ओर फैले मैदानों में फैल जाता है। इससे खेतों तक उपजाऊ मिट्टी भी पहुंचती है।
लेकिन जब नदी को दोनों ओर तटबंधों के बीच सीमित कर दिया जाता है, तो यह तलछट बाहर नहीं फैल पाती। इसका बड़ा हिस्सा नदी के भीतर ही जमा होने लगता है। समय के साथ इससे नदी का तल ऊंचा हो सकता है।
इसी वजह से कई नदी वैज्ञानिक मानते हैं कि केवल ऊंचे तटबंध बना देना हमेशा पर्याप्त समाधान नहीं होता। शोध के अनुसार नदियों को लंबे समय तक तटबंधों के बीच सीमित रखने से उनकी प्राकृतिक प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं और जोखिम किसी दूसरे स्थान पर बढ़ सकता है। भारत में इसका सबसे चर्चित उदाहरण कोसी नदी है, जहां तटबंधों और तलछट के संबंध पर लंबे समय से चर्चा होती रही है।
1950 और 1960 के दशक में बिहार और नेपाल में कोसी पर लंबे तटबंध बनाए गए। इनका उद्देश्य बार-बार आने वाली बाढ़ से लाखों लोगों की रक्षा करना था। लेकिन कोसी हर साल हिमालय से भारी मात्रा में मिट्टी, बालू और कंकड़ लेकर आती है। तटबंधों के बीच सीमित रहने के कारण इस तलछट का बड़ा हिस्सा नदी के भीतर ही जमा होता रहा।
कोसी पर काम करने वाले नदी विशेषज्ञ प्रो. दिनेश कुमार मिश्र अपनी किताब Trapped! Between the Devil and Deep Waters में लिखते हैं कि तटबंधों ने कुछ क्षेत्रों को सुरक्षा जरूर दी, लेकिन उन्होंने नदी के प्राकृतिक फैलाव को भी सीमित कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि तटबंधों के भीतर तलछट लगातार जमा होती रही और नदी तल ऊंचा होता गया।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की कोसी बाढ़ रिपोर्ट के अनुसार 2008 में नेपाल के कुसाहा क्षेत्र में पूर्वी तटबंध टूटने के बाद कोसी ने लगभग अपना पुराना रास्ता पकड़ लिया। इस बाढ़ से 30 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए और हजारों गांवों को भारी नुकसान पहुंचा। इस घटना ने दिखाया कि हिमालयी नदियों में केवल तटबंधों के भरोसे रहना हमेशा पर्याप्त नहीं होता।
असम में भी ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों पर बड़ी संख्या में तटबंध बनाए गए हैं। लेकिन जल संसाधन विभाग, असम और ब्रह्मपुत्र बोर्ड की रिपोर्टें बताती हैं कि हर साल कई जगह तटबंधों की मरम्मत करनी पड़ती है। नदी का लगातार बदलता रास्ता, तेज कटाव और भारी तलछट इन पर लगातार दबाव बनाए रखते हैं। ब्रह्मपुत्र बोर्ड का कहना है कि केवल तटबंध पर्याप्त नहीं हैं। नदी प्रशिक्षण, कटाव नियंत्रण, तलछट प्रबंधन और बाढ़ क्षेत्र की वैज्ञानिक योजना जैसे उपायों को साथ लेकर चलना होगा।
ऐसा अनुभव केवल भारत का नहीं है। दुनिया के कई देशों में भी लंबे समय तक तटबंधों पर निर्भर रहने के बाद नदी प्रबंधन के तरीके बदले गए। अमेरिका में मिसिसिपी नदी पर एक सदी से अधिक समय तक ऊंचे तटबंध बनाए गए। बाद में अमेरिकी सेना की इंजीनियरिंग एजेंसी (US Army Corps of Engineers) और कई अध्ययनों ने पाया कि तटबंधों ने कई क्षेत्रों में बाढ़ से सुरक्षा तो दी, लेकिन नदी के प्राकृतिक बाढ़ मैदान सिकुड़ गए। इससे कुछ स्थानों पर बाढ़ का पानी अधिक ऊंचाई तक पहुंचने लगा और नीचे के क्षेत्रों में जोखिम बढ़ गया।
चीन की ह्वांगहो (Yellow River) भी लंबे समय तक तलछट और तटबंधों की चुनौती से जूझती रही। नदी में अत्यधिक तलछट जमा होने के कारण कई हिस्सों में उसका तल आसपास की जमीन से ऊंचा हो गया। इसी कारण इसे कभी-कभी सस्पेंडेड रिवर भी कहा जाता है। इसके बाद चीन ने केवल तटबंधों पर निर्भर रहने के बजाय तलछट प्रबंधन और पूरे नदी बेसिन को ध्यान में रखकर योजना बनाने पर अधिक जोर देना शुरू किया।
जल विशेषज्ञ प्रो. आद्रियान गेउज़े (Adriaan Geuze) और "Room for the River" कार्यक्रम से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि जहां संभव हो, नदी को सुरक्षित रूप से फैलने की जगह दी जानी चाहिए। बाढ़ मैदानों और प्राकृतिक जलधारण क्षेत्रों को बचाना लंबे समय में अधिक टिकाऊ उपाय साबित हो सकता है।
दिलचस्प बात यह है कि यही सोच भारतीय जल विशेषज्ञ भी लंबे समय से रखते रहे हैं। जल विशेषज्ञ अनुपम मिश्र भी अपने लेखन में बार-बार कहते हैं कि समाज को नदियों के स्वभाव को समझना चाहिए, न कि हर कीमत पर उन्हें अपनी सुविधानुसार बदलने की कोशिश करनी चाहिए। उनका मानना था कि पानी और नदी के साथ टकराव नहीं, बल्कि समझदारी से सह-अस्तित्व ही लंबी अवधि वाला समाधान है। तटबंध कई जगह जरूरी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे हर जगह पर्याप्त हैं?
इसी सोच को अब केंद्रीय जल आयोग (CWC), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (NIH) और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी आगे बढ़ा रही हैं। उनका जोर केवल तटबंधों पर नहीं, बल्कि बाढ़ क्षेत्र की वैज्ञानिक योजना, तलछट की निगरानी, जलग्रहण क्षेत्र के संरक्षण, समय पर चेतावनी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर भी है।
यानी सवाल यह नहीं है कि तटबंध हों या नहीं, बल्कि यह है कि उनका इस्तेमाल नदी के स्वभाव को समझते हुए अन्य उपायों के साथ कैसे किया जाए। उत्तर बंगाल की नदियों के लिए भी यही सबसे बड़ी सीख है। जहां शहरों और घनी आबादी की सुरक्षा के लिए तटबंध जरूरी हो सकते हैं, वहीं हर नदी को एक ही तरीके से बांधने की कोशिश नए जोखिम पैदा कर सकती है। इसलिए यहां नदी के स्वभाव और स्थानीय भूगोल के अनुसार अलग-अलग रणनीतियां अपनानी होंगी।
हिमालयी नदियों के साथ रहने का मतलब यह नहीं कि बाढ़ और कटाव को पूरी तरह रोका जा सकता है। बल्कि चुनौती यह है कि इनके जोखिम को कम किया जाए और नदी के प्राकृतिक व्यवहार को समझते हुए विकास की योजना बनाई जाए।
विशेषज्ञों का कहना है कि नदी को केवल किसी एक जिले या राज्य की समस्या मानकर नहीं समझा जा सकता। इसलिए नदी को उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र के साथ समझना जरूरी है। यानी नदी जहां से निकलती है, जिन पहाड़ों, जंगलों और सहायक नदियों से होकर गुजरती है और आखिर में जिन मैदानों तक पहुंचती है, उन सभी को साथ लेकर योजना बनानी होती है।
दुनिया के कई देशों में अब नदी प्रबंधन का तरीका बदल रहा है। केवल तटबंध और कंक्रीट के ढांचे बनाने के बजाय पूरी नदी और उसके बाढ़ क्षेत्र को साथ लेकर योजना बनाई जा रही है। संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक, ICIMOD और IPCC भी हिमालयी नदियों के लिए इसी तरह के समग्र दृष्टिकोण की सिफारिश करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ क्षेत्र (Floodplain) केवल वह जमीन नहीं है जिस पर कभी-कभी पानी भर जाता है। यह नदी का ही हिस्सा है। इसीलिए CWC चाहता है कि राज्यों में फ्लडप्लेन ज़ोनिंग (Floodplain Zoning) लागू हो। इसका मतलब है यह तय करना कि नदी के किनारे कहां निर्माण किया जा सकता है और किन इलाकों को नदी के लिए खुला छोड़ देना चाहिए।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) भी अपनी Flood Management Guidelines में कहता है कि बाढ़ मैदानों में अनियोजित शहरीकरण और अतिक्रमण भविष्य के जोखिम को बढ़ाते हैं। इसलिए नदी के किनारे बसावट, खेती और दूसरे निर्माण की योजना बनाते समय उसके स्वभाव को ध्यान में रखना जरूरी है। लेकिन सुरक्षित नदी प्रबंधन केवल बाढ़ क्षेत्र बचाने से पूरा नहीं होता। यह समझना भी जरूरी है कि नदी अपने साथ कितना पानी और कितनी तलछट लेकर चल रही है।
भारत में नदियों की निगरानी मुख्य रूप से जलस्तर और बहाव को देखकर की जाती है। लेकिन हिमालयी नदियों के लिए इतना जानना ही काफी नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि नदी अपने साथ कितनी मिट्टी, बालू और पत्थर ला रही है।
यही तलछट आगे चलकर नदी का रास्ता और किनारे बदलती है। इसलिए NIH और CWC का मानना है कि तलछट की नियमित निगरानी भी नदी प्रबंधन का हिस्सा होनी चाहिए। इससे पहले से अंदाजा लगाया जा सकता है कि किन इलाकों में आगे चलकर कटाव बढ़ सकता है या नदी अपना रास्ता बदल सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि नदी का प्रबंधन केवल मैदानों में नहीं किया जा सकता। यदि पहाड़ों में लगातार भूस्खलन हो रहे हैं, जंगल कम हो रहे हैं या ढलानों पर बिना योजना के सड़कें और दूसरे निर्माण हो रहे हैं, तो उसका असर नीचे बहने वाली नदियों पर भी पड़ता है।
ICIMOD के अनुसार जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण, ढलानों पर मिट्टी का कटाव कम करना, स्थानीय पेड़-पौधों को बढ़ावा देना और भूस्खलन वाले इलाकों पर नजर रखना नीचे के मैदानों में आने वाली तलछट को कम करने में मदद कर सकता है।
दुनिया के कई देशों में अब ऐसे उपायों पर जोर दिया जा रहा है, जिनमें प्रकृति भी समाधान का हिस्सा बने। इन्हें प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions) कहा जाता है।
IPCC और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) दोनों मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन के दौर में प्रकृति-आधारित समाधान कई बार सिर्फ़ कंक्रीट के ढांचों की तुलना में अधिक टिकाऊ साबित हो सकते हैं।
राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC), इसरो (ISRO) और IIT गुवाहाटी जैसे संस्थान उपग्रह चित्रों की मदद से यह देख रहे हैं कि नदी का रास्ता कब और कहां बदल रहा है।
इन अध्ययनों की मदद से पहले से पता लगाया जा सकता है कि किन इलाकों में नदी किनारे कटाव बढ़ रहा है और भविष्य में किन गांवों या सड़कों पर खतरा हो सकता है National Remote Sensing Centre (NRSC) के अनुसार उपग्रह आधारित निगरानी अब बाढ़ का नक्शा बनाने, नदी का बदलता रास्ता समझने और आपदा की तैयारी में अहम भूमिका निभा रही है।
IIT गुवाहाटी और अन्य संस्थानों ने ब्रह्मपुत्र तथा उसकी सहायक नदियों पर किए गए अध्ययन में भी दिखाया है कि रिमोट सेंसिंग और GIS की मदद से नदी के लंबे समय में होने वाले बदलावों का बेहतर आकलन किया जा सकता है।
असम, बिहार और उत्तर बंगाल के कई इलाकों में स्थानीय समुदाय वर्षों से यह पहचानते आए हैं कि नदी का बहाव किस दिशा में बदल रहा है, किन खेतों में पहले कटाव हुआ था और कौन-से गांव अधिक जोखिम में हैं।
विश्व बैंक और Integrated Flood Management Programme का भी मानना है कि स्थानीय लोगों का अनुभव और वैज्ञानिक आंकड़े साथ मिलकर अधिक प्रभावी बाढ़ प्रबंधन में मदद करते हैं।
भारतीय जल विशेषज्ञ अनुपम मिश्र कहा करते थे कि पानी के साथ लड़ाई नहीं, समझदारी का रिश्ता बनाना चाहिए। हिमालयी नदियों के संदर्भ में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
तीस्ता, तोर्सा और कोसी जैसी हिमालयी नदियां अपने स्वभाव से गतिशील हैं। इसलिए भविष्य का नदी प्रबंधन केवल ऊंचे तटबंध बनाने तक सीमित नहीं रह सकता। बाढ़ क्षेत्र की सुरक्षा, तलछट की निगरानी, जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण, आधुनिक तकनीक और स्थानीय समुदायों के अनुभव, इन सभी को साथ लेकर ही ऐसी नीति बनाई जा सकती है, जो लोगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे और नदी के प्राकृतिक प्रवाह का सम्मान भी।
उत्तर बंगाल की नदियां समस्या नहीं हैं, उनका स्वभाव ही ऐसा है। चुनौती उन्हें रोकने की नहीं, बल्कि समझने की है। टिकाऊ समाधान नदी को बांधने में नहीं, बल्कि उसके स्वभाव के साथ सुरक्षित और संतुलित सह-अस्तित्व बनाने में है।
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