कश्मीर की वादियों में ग्लेशियरों की शक्ल में 'हज़ारों साल से जमी बर्फ़' तेज़ी से पिघल रही है। जलवायु परिवर्तन के चलते बिगड़ते मौसम, बढ़ते तापमान और सैलानियों की आवाजाही अब लाखों लोगों को पानी देने वाले इन ग्लेशियरों के लिए ख़तरा बनती जा रही है।
सितंबर (2025) की एक खुशनुमा सुबह गांदरबल ज़िले में थाजीवास ग्लेशियर के बेस पर खड़े 48 साल के टूरिस्ट गाइड गुलाम मोहम्मद मगरे टट्टुओं पर सवार टूरिस्टों उस जगह जाते हुए देख रहे हैं, जिसे स्थानीय लोग "हजारों साल की बर्फ़" कहते हैं। अपनी ऊनी टोपी ठीक करते हुए, वह सोच रहे हैं कि ग्लेशियर के आखिरी सिरे पर इन टूरिस्टों को आखि़र क्या नज़ारा देखने को मिलेगा?
बीते 25 सालों से सैलानियों को टट्टू की सवारी करवा रहे मगरे कहते हैं कि बदलाव साफ़ दिख रहे हैं। "पिछले आठ सालों में, मैंने बर्फ़ को तेज़ी से घटते देखा है। 2000 में, हम अप्रैल से नवंबर के आखिर तक काम करते थे, जब तक सड़क बंद नहीं हो जाती थी। अब थाजीवास ग्लेशियर की निचली ढलानों पर बर्फ़ अप्रैल के आखिर या मई की शुरुआत में पिघल जाती है।"
"यह सर्दी इनके लिए भी पिछले चार दशकों में देखे गए सीजनों से काफ़ी अलग है," ग्लेशियर के मुहाने की ओर इशारा करते हुए गुलाम कहते हैं, "खुली चट्टानी ढलानों पर महीनों पहले बर्फ़ की चादर बिछी होनी चाहिए थी। जनवरी तक, आमतौर पर इन घास के मैदानों पर 12 फीट बर्फ़ होती है। इस साल, मुश्किल से छह इंच ही बर्फ़ थी। टूरिस्ट आते रहे, कश्मीर की मशहूर बर्फ़ के दीदार की उम्मीद में, लेकिन हमारे पास उन्हें दिखाने के लिए कुछ नहीं था। बर्फ़ साल दर साल पीछे हटती जा रही है।" पहाड़ी की ओर इशारा करते हुए वह बताते हैं, "बर्फ़ उस पूरे हिस्से को ढक लेती थी, लेकिन अब वहां सिर्फ़ मिट्टी और चट्टानें नज़र आती हैं। टूरिस्ट पूछते हैं कि ग्लेशियर कहां है। मैं उन्हें बताता हूं, अब बस यही बचा है।"
सोनमर्ग से कुछ किलोमीटर दूर ग्रेट हिमालयन रेंज में, लगभग 3500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित थाजीवास ग्लेशियर एक हैंगिंग ग्लेशियर है। घाटी वाले बड़े ग्लेशियरों के विपरीत, एक हैंगिंग ग्लेशियर पहाड़ की चोटी पर ऊंचाई पर होता है और घाटी में मुख्य ग्लेशियर के साथ मिलने के बजाय नीचे बहने से पहले ही रुक जाता है।
कई छोटे हिमालयी ग्लेशियरों की तरह, थाजीवास भी जलवायु परिवर्तन के प्रति बहुत संवेदनशील है। इसके तेज़ी से घटते आकार का मतलब है कि यह बढ़ते तापमान पर तेज़ी से प्रतिक्रिया कर रहा है। कभी यह काफ़ी विशालकाय हुआ करता था, जो अपने आप में एक पहाड़ जैसा था, पर आज बिखरे हुए अवशेषों में सिकुड़ गया है। सर्दियों में भी तापमान ज़्यादा रहने के चलते यह सिमट कर पीछे हटता जा रहा है। रिसर्च बताती है कि 1992 और 2020 के बीच, थाजीवास ग्लेशियर का मुख्य हिस्सा 34 प्रतिशत सिकुड़ गया। हाल के वर्षों में सर्दियां असामान्य रूप से शुष्क हो गई हैं, जिसमें पहले की तुलना में काफ़ी कम बर्फ़़बारी हुई है, जो इस ग्लेशियर के सिमटने की वजह है।
शोधकर्ता डॉ. इरफ़ान राशिद ने अपने अध्ययन में इस बात को गहराई से समझाया है कि किस तरह पूरे कश्मीर में, ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। कालाहोई और माछोई जैसे बड़े ग्लेशियर 1960 और 1970 के दशक से ही अपना एक बड़ा हिस्सा खो चुके हैं। झेलम बेसिन में ग्लेशियरों का कुल दायरा लगभग 25% तक घट चुका है।
श्रीनगर स्थित कश्मीर विश्वविद्यालय में अपने कार्यालय में बात करते हुए डॉ. राशिद ने बताया, "आज पर्यटक जो तस्वीरें खींचते हैं, वे असल में उस चीज़ के लटकते हुए अवशेष हैं जो कभी एक सुसंगत ग्लेशियर प्रणाली थी। घाटी पर हावी रहने वाली बर्फ़़ का यह विशालकाय ढांचा आज काफ़ी हद तक गायब हो चुका है। सर्दियों में बर्फ़़ न जमने के कारण यह ग्लेशियर अपने आकार को बरक़रार नहीं रख सकते।
वे आगे कहते हैं, '’बीते कुछ दशकों से हम इतनी तेज़ी से बदलाव होता देख रहे हैं, जो आम तौर पर सदियों में होते हैं। पानी की सुरक्षा, कृषि और बिजली उत्पादन पर इसके गहरे प्रभाव होंगे।"
कश्मीर में पर्यटकों की संख्या में आए उछाल का सीधा संबंध भी ग्लेशियर का तेज़ी से पीछे हटने के साथ साफ़ दिखाई देता है। इस क्षेत्र में 2023 में 31.55 लाख पर्यटक आए, जबकि 2021 में इनकी तादाद महज़ 6.65 लाख थी। यह एक बड़ा उछाल है। पिछले साल यानी 2024 में 34.98 लाख पर्यटकों ने कश्मीर घाटी का दौरा किया। इसमें से हज़ारों लोग थाजीवास ग्लेशियर को देखने आते हैं, जो तेज़ी से सिमटता जा रहा है। ग्लेशियर के पीछे हटने के बावजूद, थाजीवास में पर्यटन लगातार बढ़ रहा है। पीक सीज़न के दौरान सुबह से शाम 5 बजे तक, ग्लेशियर तक 5 किलोमीटर का ट्रेक पर्यटकों की चहल-पहल से गुलज़ार रहता है। लगभग 500 घोड़े खड़ी पगडंडियों के रास्ते पर्यटकों को ग्लेशियर की ओर ले जाते हैं, जबकि दर्जनों टैक्सियां और बसें ग्लेशियर के बेस तक आती है।
सोनमर्ग गांव के 33 साल के टूर गाइड और पोनी ऑपरेटर रियाज़ अहमद मीर ने कहा, "हम सोनमर्ग से ग्लेशियर तक घोड़े की आने-जाने की सवारी के लिए 850 रुपये लेते हैं। अमरनाथ यात्रा के मौसम में मुझे मुश्किल से ही आराम मिलता है। उसके बाद भी, पतझड़ के मौसम में हमें रोज़ एक या दो टूरिस्ट मिल ही जाते हैं।"
18 साल से सैलानियों को ग्लेशियर की सैर करा रहे मीर कहते हैं कि बदलावों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। "जब मैंने पहली बार काम शुरू किया था, तब से यह जगह बहुत अलग लगती है। आज यहां बहुत सारे होटल और नई इमारतें बन गई हैं। जो बर्फ़ पहले गर्मियों की शुरुआत तक रहती थी, वह अब बहुत तेज़ी से पिघल जाती है। सोनमर्ग का पुराना रूप खत्म हो गया है।" गाइड और स्थानीय लोग 5 किलोमीटर लंबे रास्ते पर टूरिस्ट को ले जाते हैं, जबकि सैकड़ों खच्चर और अस्थायी स्टॉल यहां भीड़भाड़ को और बढ़ा देते हैं। इस भीड़ से पर्यावरण को नुकसान भी होता है।
कश्मीर यूनिवर्सिटी में टूरिज्म स्टडीज़ के प्रोफेसर डॉ. रियाज़ कुरैशी, थजीवास में जो हो रहा है, उसे "ओवर-टूरिज्म" कहते हैं, यानी ऐसी स्थिति जब आने वाले लोगों की संख्या किसी जगह की पर्यावरणीय वहन क्षमता से ज़्यादा हो जाती है। वह कहते हैं कि ‘ओवर-टूरिज्म’ ग्लेशियर के नाजुक इकोसिस्टम पर दबाव डाल रहा है, जिससे इलाके की वहन क्षमता पार हो रही है और ग्लेशियर के आसपास का पर्यावरण तेज़ी बिगड़ता जा रहा है। वह समझाते हुए कहते हैं, "कश्मीर का इकोसिस्टम बहुत नाज़ुक है। हर सिस्टम की एक वहन क्षमता (थ्रेशहोल्ड लेवल) होती है, जिसे पार करने के बाद लोगों की भीड़ इकोसिस्टम को डिस्टर्ब करने लगती है।" लोगों की संख्या पर कोई रेगुलेशन न होने और कचरा प्रबंधन का पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर न होने के कारण ग्लेशियर संकट से जूझ रहा है। इसे टूरिज्म की पर्यावरणीय कीमत चुकानी पड़ रही है, जो ग्लेशियर के खत्म होने की प्रक्रिया को तेज़ कर रही है। थजीवास जाने वाले रास्ते पर प्लास्टिक की बोतलें और खाने के पैकेट बिखरे पड़े हैं। ग्लेशियर के मुहाने पर, अस्थायी दुकानों में पानी की बोतलें, पैकेट वाले स्नैक्स, सिगरेट और बर्फ़ पर चलने के लिए किराए के उपकरण बेचे जाते हैं। सैकड़ों खच्चर कैंपिंग साइट्स पर जमा हो जाते हैं, जिससे जानवरों के मल का घुटनों तक गहरा ढेर लग जाता है, जिससे पर्यटकों को गुज़रना पड़ता है।
गुलाम ने याद करते हुए बताया कि "सर्दियों में हमारे घर मोटी बर्फ़ से ढक जाते थे, छत तक पहुंचने के लिए 21 सीढ़ियां बनानी पड़ती थीं। इसी तरह पर्यटकों को स्लेज किराए पर देने वाले 45 साल के अब्दुल राशिद भट्ट ने कहा, "यह हमारी रोज़ी-रोटी है, पर हम तभी तक यह करते हैं, जब तक मौसम इजाज़त देता है। लेकिन ग्लेशियर धूल और प्रदूषण से पूरी तरह काला हो गया है। यह मेरे बचपन की साफ बर्फ़ जैसा नहीं दिखता।" अब्दुल राशिद ने आगे कहा, "आमतौर पर हम नवंबर में गांव छोड़कर चले जाते हैं और वसंत में लौटते हैं। पिछली सर्दियों में, हम सिर्फ 15 दिन बाद ही वापस आ गए, क्योंकि बहुत थोड़ी ही बर्फ़ मुश्किल से जमी थी। जनवरी में अपने घरों को बिना बर्फ़ के देखना अजीब लग रहा था।"
राशिद, जो 15 सालों से ट्रेकिंग भी करवाते हैं, ने समझाया, "हमारी कमाई बर्फ़ और ग्लेशियर पर निर्भर करती है। इसके बिना, बर्फ़ कम होने पर हम पूरी राइड नहीं दे पाते हैं, तो कमाई भी घट जाती है।" उन्होंने रुककर कहा, “यह काम हमारे लिए सब कुछ है, लेकिन इस साल यह पूरी तरह फेल हो गया। अब मैं मज़दूरी कर रहा हूं, क्योंकि मेरे चार बच्चे हैं, जिनका पेट भरना है। ये ग्लेशियर कभी मेरे परिवार का पेट भरते थे, लेकिन अब हम ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।”
ग्लेशियर की बिगड़ती हालत अब सीधे तौर पर उन सैकड़ों परिवारों की रोज़ी-रोटी के लिए खतरा बन गई है, जो इस छोटे से मौसम पर निर्भर हैं। ये व्यक्तिगत अनुभव पूरे कश्मीर में हो रहे बड़े बदलावों को दिखाते हैं। हालांकि कुल बारिश में ज़्यादा कमी नहीं आई है, लेकिन बढ़ते तापमान के चलते जो पानी पहले बर्फ़ के रूप में गिरता था, अब बारिश के रूप में गिरता है। घाटी में ब्लैक कार्बन 5.9 mg/m² के के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है और गर्म गर्मियों के साथ मिलकर, ये बदलाव ग्लेशियर पिघलने की गति को तेज़ कर रहे हैं। ये बर्फ़ की चादर को पतला कर रहे हैं और सिंध, फिरोज़पुर नाला और रिंबियारा जैसी नदियों पर दबाव डाल रहे हैं, जिससे पानी की उपलब्धता और इकोसिस्टम प्रभावित होते हैं।
डॉ. रियाज़ कुरैशी ने कहा, “हम साफ़ तौर पर देख रहे हैं कि ओवर-टूरिज्म हमारी सीमाओं को पार कर रहा है। सरकार को पर्यटकों की संख्या को नियंत्रित करना चाहिए, इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना चाहिए। साथ ही ग्लेशियर और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा के लिए ज़मीन के इस्तेमाल को लेकर सावधानी से योजना बनानी चाहिए।”
ग्लेशियर का पीछे हटना सिर्फ़ सुंदर नज़ारों का ही नहीं, बल्कि कुदरत का भी नुकसान है। थाजीवास सिंध नदी को पानी देता है, जो झेलम की एक प्रमुख सहायक नदी है। यह सैकड़ों गांवों को पीने का पानी देती है, हज़ारों एकड़ खेती की ज़मीन की सिंचाई करती है और पूरे कश्मीर घाटी में हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स को बिजली बनाने के लिए पानी देती है। इस नदी प्रणाली में ग्लेशियर का घटता योगदान नीचे की ओर लाखों लोगों के लिए पानी की सुरक्षा के लिए खतरा है। इसलिए असर सिर्फ़ टूरिज्म तक ही सीमित नहीं हैं।
रज़ान गांव के 35 साल के मोहम्मद शरीफ़ ने ग्लेशियर से नीचे बह रही पतली धारा की ओर इशारा करते हुए कहा, "हम पीने के पानी, अपने मवेशियों और सिंचाई के लिए इसी पानी पर निर्भर हैं।अगर बर्फ़बारी इसी तरह कम होती रही, तो गर्मियों में हमारे पास कुछ नहीं होगा।"
गांदरबल ज़िले के किसान चिंतित हैं। सिंध नदी के किनारे वुस्सान गांव के 52 साल के किसान अली मोहम्मद भट्ट ने ग्लेशियर पर पड़ते असर को महसूस कर लिया है। अपने सेब के बाग के पास खड़े होकर उन्होंने कहा, "हमारे धान के खेतों को पानी देने वाली धाराएं सूख रही हैं। मैंने अपनी ज़्यादातर ज़मीन पर चावल की खेती की जगह सेब की बागवानी शरू कर दी है, पानी के बिना चावल की खेती करना नामुमकिन होता जा रहा है।" चावल से सेब की खेती की ओर रुख करने का चलन पूरे कश्मीर में देखने को मिल रहा है। मीर कहते हैं, "जब मैंने खेती शुरू की थी, तो बाग के चारों ओर झरने और नहरें थीं,"
उन्होंने कहा। "जैसे-जैसे पानी का स्तर कम होता गया और नहरें सूख गईं, हमें बोरवेल खोदने पड़े। यह महंगा है; हमें सिंचाई के लिए पानी उठाने के लिए जनरेटर की ज़रूरत होती है, और तब भी, सिंचाई पर्याप्त नहीं हो पाती है।"
इसके परिणाम कश्मीर से कहीं आगे तक फैलते हैं। थाजीवास से सिंधु नदी झेलम में मिलती है, इससे पहले कि वह सिंधु नदी में बहती है, यह एक ऐसा सिस्टम है जो पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिमी भारत में लाखों लोगों का सहारा है। पूर्वी हिमालय के विपरीत, जहां नदियां मुख्य रूप से बारिश के पानी पर निर्भर करती हैं, सिंधु नदी कश्मीर से बर्फ़ और ग्लेशियर पिघलने पर बहुत ज़्यादा निर्भर करती है। पाकिस्तान की सिंचाई प्रणाली, जो दुनिया की सबसे बड़ी प्रणालियों में से एक है, इसी प्रवाह पर निर्भर करती है, जिसका 80 फीसदी तक पानी हिमालयी ग्लेशियरों से आता है।
ग्लेशियोलॉजी के विशेषज्ञ प्रोफेसर शकील रोमशू ने कहा कि पीर पंजाल रेंज में ग्लेशियर सालाना एक मीटर से ज़्यादा बर्फ़ की मोटाई खो रहे हैं। इस साल रिकॉर्ड तापमान और सर्दियों में बर्फ़ की कमी के कारण ग्लेशियर के तेज़ी से पिघलने से कश्मीर में पानी की उपलब्धता, कृषि और ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
यूरोपीय वैज्ञानिकों ने भी कश्मीर के ग्लेशियरों के खतरे में होने की चेतावनी दी है। ओस्लो विश्वविद्यालय में एंड्रियास काब के नेतृत्व में 2023 के एक अध्ययन में, जो नेचर में प्रकाशित हुआ था, पाया गया कि कश्मीर हिमालय में ग्लेशियर हिंदू कुश-हिमालय के कई अन्य हिस्सों की तुलना में तेज़ी से पीछे हट रहे हैं।
आठ देशों में फैले हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र, जिसे अपने विशाल बर्फ़ भंडार के लिए "तीसरा ध्रुव" कहा जाता है, उन नदियों को पानी देता है जो एशिया भर में लगभग दो अरब लोगों का भरण-पोषण करती हैं। एक चेतावनी है कि अगर ग्लोबल वार्मिंग की मौजूदा स्थिति बनी रही तो इस सदी के अंत तक यह क्षेत्र अपनी 75% बर्फ़ गंवा सकता है। थाजीवास ग्लेशियर अकेला नहीं है जो सिमट रहा है। अनंतनाग जिले में बड़ा कोल्होई ग्लेशियर, जो झेलम नदी की मुख्य सहायक नदियों को पानी देता है, वह भी नाटकीय रूप से पीछे हट गया है, पिछले तीन दशकों में 11 वर्ग किलोमीटर से घटकर सिर्फ़ 2.63 वर्ग किलोमीटर के दायरे में रह गया है।
मौसम के मुताबिक क्षेत्र में अलग-अलग ऊंचाइयों वाले चरागाहों में घूमने वाले 62 वर्षीय मुहम्मद खानाबदोश चरवाहे अयूब खटाना ने इन बदलावों को अपनी आंखों से देखा है। उन्होंने कहा, "पुराने दिनों में, थाजीवास से निकलने वाली धारा ग्लेशियर की मोटी बर्फ़ से ढकी रहती थी। अब पानी कम हो गया है, और बर्फ़़ गायब हो गई है। पहले नाला इतना गहरा होता था कि उसे पार करना मुश्किल होता था। अब यह बस एक पतली धारा रह गई है।"
ग्लेशियर के पीछे हटने से पारंपरिक आजीविकाएं बदल रही हैं। खेती की जगह टूरिज्म से जुड़े काम लेते जा रहे हैं। अयूब ने यह भी बताया कि उनका परिवार कभी ऊंची घास के मैदानों में 5,000 भेड़ें चराता था। अब उनके पास सिर्फ़ 400 जानवर हैं। टूरिज्म ने चरवाहा जीवन की जगह ले ली है। अब हम भेड़ें चराने के बजाय टूरिस्ट को स्लेज राइड कराते हैं।
खटाना ने बताया, "चरवाहा जीवन से टूरिज्म पर निर्भरता का यह बदलाव नई परेशानियां पैदा कर रहा है। जैसे कि सीज़न में अच्छी कमाई तो होती है, लेकिन घास के मैदानों में बहुत भीड़भाड़ हो जाती है। इसके चलते हमने अपने पारंपरिक चरागाह खो दिए हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम अपना ग्लेशियर खो रहे हैं।"
ग्लेशियर के आसपास पर्यावरण का नुकसान संकट के स्तर तक पहुंच गया है। कचरा प्रबंधन अध्ययनों के अनुसार, पीक सीज़न के दौरान सोनमर्ग के आसपास के कैंपिंग इलाकों से कचरा बीनने वाले रोज़ाना लगभग 10,000 प्लास्टिक की बोतलें इकट्ठा करते हैं। पर्याप्त सुविधाएं न होने के कारण इस कचरे का ज़्यादातर हिस्सा ठीक से प्रोसेस नहीं हो पाता, जिससे अनियंत्रित डंपिंग होती है जो ग्लेशियर से निकलने वाली धाराओं को और प्रदूषित करती है।
सोनमर्ग डेवलपमेंट अथॉरिटी का रेवेन्यू 2022-23 में ₹2.20 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में ₹2.34 करोड़ हो गया, जबकि इसी अवधि में कैपिटल फंड ₹5.15 करोड़ से बढ़कर ₹6.35 करोड़ हो गया। CEO बिलाल मुख्तार डार ने कहा कि रेवेन्यू एक साल में 6.5 लाख रुपये से बढ़कर 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा हो गया है। आलोचकों का तर्क है कि शॉर्ट-टर्म फ़ायदों पर ध्यान देकर लॉन्ग-टर्म पर्यावरणीय लागतों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है।
2018 के रिसर्च में चेतावनी दी गई थी कि गुलमर्ग जैसी लोकप्रिय जगहों पर क्षमता से ज़्यादा लोग आ रहे हैं। फिर भी, गुलमर्ग गोंडोला में 2023-24 में दस लाख से ज़्यादा टूरिस्ट आए। नियोजित इंफ्रास्ट्रक्चर, जिसमें गागनगीर को सोनमर्ग से जोड़ने वाली छह किलोमीटर लंबी सुरंग और 10 करोड़ रुपये से ज़्यादा के नए होटल शामिल हैं, ग्लेशियरों पर साल भर दबाव डाल सकते हैं।
सोनमर्ग में स्नो लैंड्स होटल के मालिक 45 वर्षीय फ़ारूक ए. हाफ़िज़, टूरिज्म और स्थानीय विकास के बीच सीधा संबंध बताते हुए कहते हैं, "हमने 22 कमरों से शुरुआत की थी और अब हम 44 कमरे चला रहे हैं। हमने 6 करोड़ रुपये से ज़्यादा का निवेश किया है और आगे भी विस्तार की योजना है। हमारा बिज़नेस सीधे यात्रा और ग्लेशियर टूरिज़्म से जुड़ा हुआ है।"
श्रीनगर से मिले मौसम संबंधी डेटा से पता चलता है कि निवासियों ने जो देखा है, वह सच है। पिछले तीन दशकों में सर्दियों का औसत तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। हालांकि यह बढ़ोतरी मामूली लग सकती है, लेकिन यह बर्फ़ और बारिश के बीच तेज़ी से बढ़ते अंतर को दर्शाती है।
एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, बढ़ते तापमान, साथ ही आस-पास की बस्तियों और पर्यटन गतिविधियों से ब्लैक कार्बन और धूल के जमाव में वृद्धि, थाजिवास ग्लेशियर के पिघलने की गति को तेज कर रही है।
अध्ययन चेतावनी देता है कि अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो ग्लेशियर 20 साल के भीतर गायब हो सकता है, जिससे स्थानीय जल आपूर्ति और क्षेत्रीय पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में पड़ जाएंगे। इसमें यह भी बताया गया है कि पिछले 50 वर्षों में गांदरबल में बर्फ़ के पानी के बराबर (SWE) गिरावट आई है, जिससे बर्फ़ पिघलने में कमी आई है और ग्लेशियरों और उनसे निकलने वाली धाराओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।
अध्ययन के अनुसार, यह क्षेत्र लगभग 0.0016°C प्रति वर्ष की दर से गर्म हो रहा है। लगातार बढ़ती गर्मी बर्फ़बारी की अवधि कम कर रही है और बर्फ़ को तेज़ी से पिघला रही है। धाराओं का प्रवाह भी कमज़ोर पड़ रहा है। कम बर्फ़ कृषि और पनबिजली के लिए पानी की उपलब्धता को भी प्रभावित कर रही है। इस सबके चलते थाजिवास ग्लेशियर के पिघलने से उठते सवाल गंभीर होते जा रहे हैं। अब ये घाटी के बिगड़ते माहौल से कहीं आगे बढ़कर सतत विकास, जलवायु अनुकूलन, और आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे गंभीर विषयों तक पहुंच गए हैं।
गाइड गुलाम के लिए, जिन्होंने दशकों तक आगंतुकों को कश्मीर की ग्लेशियरों की सुंदरता दिखाई है, ये बदलाव व्यक्तिगत नुकसान और पेशेवर अनिश्चितता दोनों की ही वजह बनते जा रहे हैं। डॉ. शकील रामशू स्थिति पर चिंता जताते हुए कहते हैं, "थाजिवास दरअसल, अब एक ग्लेशियर नहीं रह गया, आज ये बर्फ़ का एक अवशेष बन कर रह गया है, जिसे हम साल दर साल सिमटता देख रहे हैं। अगर सरकार बेलगाम होते पर्यटन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को सीमित करने के कदम नहीं उठाती, तो शायद ये अवशेष भी जल्द ही गायब हो जाएंगे। हमारे पास अभी भी कार्रवाई करने का वक्त है, लेकिन यह तेज़ी से हाथ से निकलता जा रहा है।"
थाजिवास की कहानी बताती है कि जलवायु परिवर्तन न केवल धरती तापमान में वृद्धि कर रहा है, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर बड़े बदलावों को किस तरह अंजाम देकर स्थितियों को बिगाड़ता जा रहा है, जिससे कुदरत से लेकर लोगों की रोज़ी-रोटी तक पर मार पड़ रही है।
वाहिद भट की यह ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया वाटर पोर्टल रीजनल स्टोरी फेलोशिप 2025 तहत लिखी गई है। इसका अनुवाद कौस्तुभ उपाध्याय ने किया है। यह रिपोर्ट आप अंग्रेजी में भी पढ़ सकते हैं।