दो जून की रोटी, जिसके लिए इंसान दिन-रात मेहनत करता है। पर्यावरण के बिगड़ते हालात के चलते अब इसपर भी खतरा मंडराता दिख रहा है। 

 

स्रोत : विकी कॉमंस

जलवायु परिवर्तन

नहीं बचाया पर्यावरण तो आने वाली पीढ़ियों के लिए मुश्किल हो जाएगी ‘दो जून की रोटी’

2 जून को जानिए, पर्यावरण का ‘दो जून की रोटी’ से है कितना गहरा रिश्ता? जारी रहा खिलवाड़ तो छिन सकते हैं करोड़ों लोगों के हाथों के निवाले

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

रोटी, कपड़ा और मकान इंसान की बुनियादी ज़रूरतें हैं और ‘दो जून की रोटी’ का मुहावरा नहीं, जीवन की इसी मूलभूत आवश्‍यकता की याद दिलाता है। आज की तारीख यानी 2 जून को सोशल मीडिया पर ‘दो जून की रोटी’ की पोस्‍ट, रील्‍स और भरमार देखने को मिलती है। लोग अकसर इसे हल्‍के-फुल्‍के और मज़ाकिया अंदाज़ में पेश करते हैं। पर ‘दो जून की रोटी’ वास्‍तव में हमारी धरती और  पर्यावरण से भी जुड़ा एक गंभीर विषय है। आज के दौर में यह इसलिए भी और भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण और प्रासंगिक होता जा रहा है कि आज अगर हमने अपनी धरती और पर्यावरण की बिगड़ती हालत की ओर ध्‍यान नहीं दिया तो कल को शायद हमारी आने वाली पीढि़यों को ‘दो जून की रोटी’ भी नसीब होना मुश्किल हो जाएगा। 

आज हमें यह समझने की सख्‍त ज़रूरत है कि हमारी थाली में आने वाला हर दाना कहीं न कहीं मिट्टी, पानी, जलवायु और जैव विविधता जैसी पर्यावरणीय चीजों पर निर्भर करता है। मिसाल के तौर पर अगर  मिट्टी की उर्वरता कम हो जाए, नदियां सूखने लगें, भूजल घट जाए और मौसम अनिश्चित या धरती का तापमान (ग्‍लोबल वॉर्मिंग) यूं ही बढ़ता जाए, तो खाद्य उत्पादन प्रभावित होना तय है। यही कारण है कि पर्यावरण के संरक्षण का सवाल केवल जंगलों और वन्यजीवों तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर हमारी रोटी यानी हमारी खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। आज दुनिया भर में वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण का सबसे बड़ा असर भविष्य की खाद्य व्यवस्था पर पड़ सकता है। यानी यदि पर्यावरण नहीं बचा तो आने वाले समय में दो जून की रोटी भी आसानी से उपलब्ध नहीं होगी।

बढ़ती गर्मी घटा रही है गेहूं, धान और मक्‍के की पैदावार

गेहूं, चावल और मक्‍का मुख्‍य भोजन (Staple Food) के रूप में दुनिया भर में सबसे ज्‍़यादा खाए जाने वाले अनाज हैं। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार दुनिया की आधे से अधिक आबादी की कैलोरी जरूरतें इन्‍हीं तीन फसलों से पूरी होती हैं। पर जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और बढ़ता तापमान (Global Warming) इन तीनों फसलों को सीधे तौर पर प्रभावित करके अरबों लोगों की खाद्य सुरक्षा पर असर डाल रहा है। गेहूं, धान और मक्का जैसी प्रमुख फसलें तापमान में मामूली वृद्धि से भी प्रभावित होती हैं। इसलिए इनकी खेती साल दर साल चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान मार्च-अप्रैल में पड़ने वाली असामान्य गर्मी ने गेहूं उत्पादन पर असर डाला है। वैज्ञानिकों का मानना है कि फसल पकने के समय अधिक तापमान आने पर दाने का आकार छोटा रह जाता है और पैदावार घट जाती है। इसी तरह अनियमित मानसून, बेमौसम बारिश और लंबे सूखे के दौर भी कृषि उत्पादन को प्रभावित कर रहे हैं। यदि वैश्विक तापमान इसी गति से बढ़ता रहा तो आने वाले दशकों में खाद्यान्न उत्पादन और मांग के बीच बड़ा अंतर पैदा हो सकता है, जिसका असर सीधे आम लोगों की थाली पर पड़ेगा।

भूजल संकट और बारिश के बदलते पैटर्न का खेती पर पड़ रहा बुरा असर

खेती और पानी का संबंध उतना ही गहरा है जितना हमारे जीवन का सांसों से। भारत दुनिया के सबसे बड़े भूजल उपयोगकर्ताओं में शामिल है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (Central Ground Water Board) के 2024 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में भूजल दोहन की दर 60.5% है। इसकी वजह देश में खेती की सिंचाई का बड़ा हिस्सा भूजल पर ही निर्भर होना है। इस कारण खेती के लिए बेलगाम तरीके से भूजल का दोहन किया जा रहा है। गन्‍ने और धान जैसी ज्‍यादा पानी की खपत वाली फसलों को उगाने वाले राज्यों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। देश में सिंचाई का दूसरा प्रमुख जरिया मानसूनी वर्षा से मिलने वाला पानी है। पर, जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का पैटर्न भी तेजी से बदल रहा है। कहीं अत्यधिक बारिश हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बन रही है। इससे किसानों के लिए खेती करना और कठिन होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में कृषि क्षेत्र को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। इसका असर केवल किसानों पर नहीं बल्कि फसल में कमी के रूप में खाद्यान्‍न की उपलब्धता और कीमतों पर भी दिखाई देगा।

2050 तक 80 करोड़ टन तक घट सकता है दुनिया में खाद्यान्न उत्पादन
वैज्ञानिक पत्रिका Nature और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार यदि वैश्विक तापमान बढ़ता रहा तो वर्ष 2050 तक दुनिया में प्रमुख खाद्यान्न फसलों गेहूं, मक्का, चावल और सोयाबीन की कुल पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है। कुछ आकलनों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक खाद्य उत्पादन में करीब 80 करोड़ टन तक की कमी आ सकती है। यह मात्रा करोड़ों लोगों का पेट भरने के लिए पर्याप्त है। यानी जलवायु संकट अब भविष्य की नहीं, बल्कि भोजन की सुरक्षा से जुड़ी वर्तमान चुनौती बन चुका है।

मिट्टी की बिगड़ती सेहत भी खेती के लिए खतरा

स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ भोजन की नींव होती है। लेकिन रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग, भूमि क्षरण, कटाव और प्रदूषण के कारण दुनिया भर में मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीव, कार्बनिक पदार्थ और पोषक तत्व फसलों की उत्पादकता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब मिट्टी की सेहत बिगड़ती है तो फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं। भारत में भी कई कृषि क्षेत्रों में जैविक कार्बन की मात्रा चिंताजनक रूप से कम होती जा रही है। यदि मिट्टी का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में खाद्य उत्पादन को बनाए रखना और कठिन हो सकता है। 

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार दुनिया की लगभग 95% खाद्य उत्पादन प्रणाली मिट्टी पर निर्भर है, जबकि विश्व की करीब एक-तिहाई मिट्टी पहले से ही विभिन्न स्तरों पर क्षरण (Degradation) का शिकार हो चुकी है। भारत में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण से जुड़े अध्ययनों के अनुसार देश के कई हिस्सों में मिट्टी में ऑर्गेनिक कार्बन (Soil Organic Carbon) की मात्रा आदर्श स्तर से काफी कम पाई गई है। यही कार्बन मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ाने, पोषक तत्वों को संरक्षित रखने और सूखे जैसी परिस्थितियों में फसलों को सहारा देने का काम करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मिट्टी में जैविक पदार्थों की कमी, कटाव और पोषक तत्वों के असंतुलन की समस्या को नहीं रोका गया, तो भविष्य में अधिक उर्वरक और अधिक सिंचाई के बावजूद खेती से पहले जैसी उपज लेना मुश्किल हो सकता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो आने वाले समय में ‘दो जून की रोटी’ की लड़ाई मिट्टी की सेहत बचाने से शुरू होगी। 

मधुमक्खियां और तितलियां नहीं रहीं, तो हमारी थाली भी हो जाएगी खाली 

दुनिया की बड़ी संख्या में फल, सब्जियां, तिलहन और अन्य फसलें परागण (Pollination) करने वाले जीवों पर निर्भर हैं। मधुमक्खियां, तितलियां, भौंरे, पतंगे और कुछ पक्षी एक फूल से दूसरे फूल तक पराग पहुंचाकर पौधों को फल और बीज बनाने में मदद करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो यदि ये जीव अपना काम बंद कर दें, तो कई पौधे फल और बीज ही नहीं बना पाएंगे। लेकिन कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग, प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया भर में परागणकर्ताओं की संख्या में गिरावट दर्ज की जा रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो अनेक खाद्य फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर केवल किसानों की आय पर नहीं बल्कि खाद्य विविधता और पोषण सुरक्षा पर भी पड़ेगा।

दरअसल, परागण का महत्व केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं है। सेब, आम, बादाम, सरसों, सूरजमुखी, टमाटर, लौकी, खीरा, कद्दू और कई अन्य फल-सब्जियों की बेहतर पैदावार में मधुमक्खियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया की लगभग 75% खाद्य फसलें किसी न किसी स्तर पर परागणकर्ताओं पर निर्भर हैं, जबकि वैश्विक कृषि उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा इनके योगदान से संभव हो पाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मधुमक्खियों और अन्य परागणकर्ताओं की आबादी में भारी गिरावट आती है, तो सबसे पहले हमारी थाली से फल, सब्जियां और पोषक तत्वों से भरपूर कई खाद्य पदार्थ कम होने लगेंगे। यानी भविष्य में खाद्य संकट केवल अनाज की कमी का नहीं, बल्कि पौष्टिक भोजन की कमी का भी हो सकता है। यही वजह है कि आज मधुमक्खियों और तितलियों का संरक्षण केवल जैव विविधता का

रोटी, कपड़ा और मकान जैसी इंसान की बुनियादी ज़रूरतों की पहली कड़ी है रोटी, जो देती है हमें जीवन की ऊर्जा। 

सबसे ज्यादा खतरा गरीबों की रोजी-रोटी पर

पर्यावरणीय संकट का सबसे अधिक प्रभाव गरीब और कमजोर वर्गों पर पड़ता है। जब सूखा, बाढ़, लू या अन्य चरम मौसम घटनाएं फसलों को नुकसान पहुंचाती हैं तो खाद्यान्न की कीमतें बढ़ जाती हैं। इसका असर उन परिवारों पर सबसे पहले पड़ता है जो अपनी आय का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च करते हैं। संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्टें बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन खाद्य असुरक्षा और कुपोषण के जोखिम को बढ़ा रहा है। भारत जैसे देश में, जहां आज भी बड़ी आबादी कृषि और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है, पर्यावरणीय क्षरण का अर्थ केवल पारिस्थितिक संकट नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र के अनुसार वर्ष 2023 में दुनिया भर में लगभग 73.3 करोड़ लोग भूख का सामना कर रहे थे, जबकि करोड़ों लोग ऐसे थे जिन्हें पर्याप्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। दूसरी ओर, भारत की लगभग 45% कार्यशक्ति (Workforce) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है। जब बाढ़, सूखा या असामान्य गर्मी फसलों को नुकसान पहुंचाती है, तो केवल अनाज का उत्पादन ही नहीं घटता, बल्कि किसानों, खेतिहर मजदूरों, डेयरी और मत्स्य क्षेत्र से जुड़े लोगों की आय पर भी असर पड़ता है। यही कारण है कि पर्यावरणीय संकट सबसे पहले गरीबों की थाली और उनकी रोजी-रोटी पर चोट करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को नहीं रोका गया, तो भविष्य में खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें, कृषि आय में गिरावट और कुपोषण जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो पर्यावरण संरक्षण अब केवल प्रकृति बचाने का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि करोड़ों लोगों के भोजन और रोजगार को सुरक्षित रखने का भी सवाल है।

हर साल 10 करोड़ से अधिक लोग मौसम संबंधी आपदाओं से प्रभावित
संयुक्त राष्ट्र और आपदा निगरानी एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार बाढ़, सूखा, चक्रवात और लू जैसी मौसम संबंधी आपदाएं हर वर्ष 10 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करती हैं। कृषि पर निर्भर देशों में इसका असर और गंभीर होता है क्योंकि एक खराब मानसून या एक बड़ी बाढ़ लाखों किसानों की फसल बर्बाद कर सकती है। इससे न केवल किसानों की आय घटती है, बल्कि बाजार में खाद्यान्न की उपलब्धता और कीमतों पर भी असर पड़ता है।

'रोटी' की जगह दुनिया में क्‍या-क्‍या खाते हैं लोग

भारतीय उप महाद्वीप के भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में गेहूं या बाजरे की रोटी रोजमर्रा के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में मुख्य भोजन के रूप में रोटी की जगह अन्य खाद्य पदार्थ खाए जाते हैं। हालांकि नाम और स्वरूप अलग हैं, लेकिन इनका महत्व वही है जो भारतीय थाली में रोटी का है।

  • चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया में चावल मुख्य भोजन है। यहां करोड़ों लोगों के लिए एक कटोरी चावल वही महत्व रखती है जो भारत में रोटी का है।

  • यूरोप और उत्तरी अमेरिका में ब्रेड (Bread) सबसे आम मुख्य खाद्य पदार्थों में शामिल है। गेहूं से बनी विभिन्न प्रकार की ब्रेड वहां के दैनिक भोजन का आधार हैं।

  • मेक्सिको और मध्य अमेरिका में मकई से बनी टॉर्टिला (Tortilla) भोजन का प्रमुख हिस्सा है। यह आकार में भारतीय रोटी जैसी दिखती है और लगभग हर भोजन के साथ खाई जाती है।

  • अफ्रीका के कई देशों में मक्का, बाजरा या कसावा से बने खाद्य पदार्थ मुख्य भोजन हैं। पूर्वी अफ्रीका में उगाली (Ugali) और पश्चिमी अफ्रीका में फूफू (Fufu) लाखों लोगों का प्रमुख आहार हैं।

  • मध्य-पूर्व और भूमध्यसागरीय देशों में पीटा ब्रेड (Pita Bread) और अन्य फ्लैटब्रेड व्यापक रूप से खाए जाते हैं। इनका उपयोग सब्जियों, मांस और अन्य व्यंजनों के साथ किया जाता है।

  • दक्षिण अमेरिका के कई हिस्सों में मकई, आलू और कसावा आधारित खाद्य पदार्थ लोगों की खाद्य सुरक्षा का आधार हैं।

दरअसल, चाहे वह भारत की रोटी हो, चीन का चावल, मेक्सिको की टॉर्टिला या अफ्रीका का उगाली—इन सभी के पीछे एक समान पर्यावरणीय आधार है: उपजाऊ मिट्टी, पर्याप्त पानी, अनुकूल जलवायु और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र। यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षरण केवल किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।

निष्कर्ष : पर्यावरण पर ही टिकी है हमारी खाद्य सुरक्षा

आज पर्यावरण संरक्षण को अक्सर पेड़ लगाने या प्लास्टिक कम करने जैसे अभियानों तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि इसका वास्तविक अर्थ हमारी जीवन-व्यवस्था को सुरक्षित रखना है। मिट्टी, पानी, जंगल, जैव विविधता और स्थिर जलवायु ही वह आधार हैं जिन पर हमारी खाद्य सुरक्षा टिकी हुई है। यदि इन संसाधनों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल स्वच्छ हवा या पानी की नहीं, बल्कि ‘दो जून की रोटी’ की भी हो सकती है। इसलिए पर्यावरण बचाना दरअसल हमारी आने वाली पी‍ढि़यों की थाली को बचाना है।

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