तमिलनाडु में जलाशयों और टैंकों पर फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) भी ऊर्जा उत्पादन के लिए जल-निकायों का उपयोग करने पर ज़ोर देता है।

 

चित्र: PIB

संघर्ष और विवाद

फ्लोटिंग सोलर का विस्तार: क्या जलाशयों को “खाली ज़मीन” मानने की कीमत चुकाएगा कारियापट्टी गांव?

जलाशयों को “खाली ज़मीन” मानकर ऊर्जा परियोजनाएं लगाने का चलन बढ़ रहा है, लेकिन इसके असर पानी, खेती और स्थानीय जीवन पर गहरे सवाल खड़े कर रहे हैं।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

उत्तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश, असम, तेलंगाना और केरल के बाद अब तमिल नाडु भी फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट लगाने की ओर कदम बढ़ा चुका है। पहले फेज़ में जगहों को चिन्हित किया जा चुका है। इनमें एक जगह विरुधनगर जिले का कारियापट्टी गांव है। सरकार यहां फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट लगाने जा रही है, लेकिन स्थानीय लोग इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। विरोध की वजह वजह सिर्फ सोलर पैनल नहीं, बल्कि वह बदलाव है जो पानी, खेती और रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित कर सकता है।

तमिलनाडु में जलाशयों और टैंकों पर फ्लोटिंग सोलर परियोजनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) भी ऊर्जा उत्पादन के लिए जल-निकायों का उपयोग करने पर ज़ोर देता है।

क्या है कारियापट्टी फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट का प्रस्ताव?

कारियापट्टी जैसे इलाकों में प्रस्तावित फ्लोटिंग सोलर परियोजनाएं किसी एक गांव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक बड़े नीतिगत ढांचे का हिस्सा हैं। हाल ही में प्रेस इनफार्मेशन ब्यूरो ने बताया कि केंद्र और राज्य मिलकर ऐसे जल-निकाय चिन्हित कर रहे हैं, जहां फ्लोटिंग सोलर लगाई जा सकती है।

तमिलनाडु में इस प्रक्रिया में सिंचाई टैंकों और जलाशयों को शामिल किया जा रहा है, क्योंकि इन्हें “उपलब्ध सतह” के रूप में देखा जा रहा है। इस मॉडल का तर्क साफ़ है: जमीन की कमी को देखते हुए जलाशयों और झीलों का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाए, जिससे जमीन अधिग्रहण का दबाव कम हो और क्षमता बढ़े।

विश्व बैंक की Where Sun Meets Water रिपोर्ट भी बताती है कि फ्लोटिंग सोलर की संभावित क्षमता बहुत बड़ी है और भारत में यह 280 गीगावॉट तक पहुंच सकती है।

यहीं से समस्या शुरू होती है। कागज़ पर दिखने वाला यह मॉडल ज़मीन पर नए सवाल खड़े करता है। ऐसी परियोजनाओं के लागू होने के बाद इन जलाशयों की मौजूदा भूमिका का क्या होगा?

विश्व बैंक की Where Sun Meets Water रिपोर्ट भी बताती है कि फ्लोटिंग सोलर की संभावित क्षमता बहुत बड़ी है और भारत में यह 280 गीगावॉट तक पहुंच सकती है।

फ्लोटिंग सोलर पैनल क्या होता है और कैसे काम करता है?

फ्लोटिंग सोलर पैनल असल में फोटोवोल्टाइक (PV) मॉड्यूल ही होते हैं जो ज़मीन पर लगाए जाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इन्हें पानी की सतह पर तैरते प्लेटफॉर्म (HDPE) पर लगाया जाता है। इन्हें फ्लोट्स और एंकरिंग सिस्टम से स्थिर रखा जाता है, ताकि जलस्तर बदलने पर भी पैनल अपनी जगह बने रहें।

पानी की सतह पर होने से पैनल ठंडे रहते हैं, जिससे उनकी दक्षता थोड़ी बढ़ सकती है। इन पैनलों से बनने वाली DC बिजली को इन्वर्टर के जरिए AC में बदलकर ग्रिड तक पहुंचाया जाता है। तकनीक वही रहती है, लेकिन पानी का वातावरण इसे अधिक जटिल बना देता है।

विश्व बैंक की उसी Where Sun Meets Water रिपोर्ट में बताया गया है कि पानी का यह शीतलन प्रभाव (cooling effect) ऊर्जा उत्पादन को बेहतर बना सकता है और कुछ मामलों में वाष्पीकरण भी कम करता है। यहीं पर तकनीकी समाधान और पारिस्थितिकी की जरूरतों के बीच टकराव दिखने लगता है।

टैंक से रिसने वाला पानी अक्सर 100-200 मीटर के दायरे में भूजल स्तर को सीधे प्रभावित करता है।

जलाशय ‘सतह’ नहीं, जीवन-तंत्र होते हैं

नीतिगत दस्तावेज़ों में जलाशयों को अक्सर एक “सतह” के रूप में देखा जाता है, लेकिन तमिलनाडु जैसे क्षेत्रों में यह समझ अधूरी है। यहां के टैंक केवल पानी जमा करने की संरचनाएं नहीं, बल्कि आसपास के भूजल और खेती को जोड़ने वाली प्रणाली हैं।

दक्षिण भारत के अध्ययनों से पता चलता है कि टैंकों का पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर आसपास के जलभृत को रिचार्ज करता है। अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि टैंक से रिसने वाला पानी अक्सर 100-200 मीटर के दायरे में भूजल स्तर को सीधे प्रभावित करता है। 

दूसरे शोध बताते हैं कि ये टैंक सिर्फ रिचार्ज नहीं करते, बल्कि बारिश के पानी को साल भर उपलब्ध कराते हैं। इससे खेती और ग्रामीण जीवन टिके रहते हैं।

दक्षिण भारत की टैंक प्रणालियों पर फ़ूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइज़ेशन (FAO) के अध्ययन के अनुसार ये जलाशय सिंचाई के साथ-साथ भूजल रिचार्ज, पशुपालन और स्थानीय आजीविका को एक साथ जोड़े रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हाल के अध्ययन दिखाते हैं कि टैंक साल भर भूजल को रिचार्ज करते हैं। इसी वजह से सूखे मौसम में भी खेतों और कुओं में पानी बना रहता है।

जलाशयों की सतह पर बड़े पैमाने के ढकाव जैसे हस्तक्षेप जलाशय के अंदर होने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाएं बदल सकते हैं।

कारियापट्टी जैसे इलाकों में, जहां बारिश सीमित होती है, ये टैंक पानी को साल भर उपयोग लायक बनाए रखते हैं।

असल चुनौती यहीं से सामने आती है, क्योंकि इसी तंत्र की अपनी एक संवेदनशीलता भी है। अध्ययन बताते हैं कि फ्लोटिंग सोलर पैनल धूप और हवा के प्रवाह को बदलकर जलाशयों के तापमान, ऑक्सीजन स्तर और जलीय जीवन को प्रभावित कर सकते हैं।

साथ ही यह भी सामने आया है कि जलाशयों की सतह पर बड़े पैमाने के ढकाव जैसे हस्तक्षेप जलाशय के अंदर होने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाएं बदल सकते हैं।

कारियापट्टी के संदर्भ में इसका असर कई स्तरों पर दिख सकता है। पानी और हवा का संपर्क बदलने से तापमान और वाष्पीकरण प्रभावित होंगे, और इसके साथ जलीय पौधों, सूक्ष्म जीवों व पानी के जमीन में रिसने की प्रक्रिया भी बदल सकती है।

कारियापट्टी में ये जलाशय एक बहु-स्तरीय, परतदार व्यवस्था (layered system) का हिस्सा हैं, जिसमें पानी, जमीन और जीवन एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।

जब इन जलाशयों को तकनीकी ढांचे में बदला जाता है, तो असर केवल सतह तक सीमित नहीं रहता बल्कि उसका असर ज़मीन के नीचे पूरे तंत्र तक पहुंचता है।

फाउंडेशन फॉर इकोलॉजी सिक्योरिटी (FES)
भी अपने अध्ययन में बताती है कि जब स्थानीय समुदायों का नियंत्रण कम होता है, तो संसाधनों का उपयोग और उनका संरक्षण दोनों प्रभावित होते हैं।

विरोध क्यों हो रहा है?

कारियापट्टी में किसानों का विरोध केवल तकनीकी नहीं, बल्कि अपनी आजीविका से जुड़ा हुआ है। यह असल में संसाधनों पर बदलते नियंत्रण के खिलाफ प्रतिक्रिया है, जो जल, ज़मीन और जीवन तीनों को प्रभावित करता है।

तमिलनाडु के किसान संगठनों ने बार-बार यह चिंता जताई है कि नई नीतियों और परियोजनाओं में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ रही है। उदाहरण के लिए, टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक खबर के अनुसार तमिलनाडु ऑल फार्मर्स एसोसिएशंस कोऑर्डिनेशन कमेटी (TAFACC) के नेता पी.आर. पांडियन ने एक बयान में आरोप लगाया कि सरकार की नीतियां “कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देती हैं” और इससे जमीन व जल संसाधनों पर किसानों का नियंत्रण कम हो सकता है।

राज्य के दूसरे हिस्सों में हुए विरोध भी यही दिखाते हैं कि जल, ज़मीन या खेती से जुड़े संसाधनों पर बाहरी हस्तक्षेप को किसान सीधे अपनी आजीविका से जोड़ते हैं।

कोयंबटूर में प्रस्तावित ईस्टर्न बायपास परियोजना के खिलाफ किसानों ने साफ़ कहा कि ऐसी परियोजनाएं “खेती, भूजल और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाती हैं” और इन्हें या तो रोका जाए या बदला जाए।

यही पैटर्न कारियापट्टी में भी साफ़ दिखता है। स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी चिंता पानी के उपयोग और उस पर नियंत्रण को लेकर है:

सिंचाई पर असर: जलाशयों पर पैनल लगने से पानी के उपयोग और प्रवाह में बदलाव आ सकता है। किसानों को डर है कि इससे सिंचाई के पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी।

मवेशियों और स्थानीय उपयोग पर रोक: ये टैंक सिर्फ खेती के लिए नहीं, बल्कि पशुओं के पानी, कपड़े धोने और अन्य घरेलू कामों में भी इस्तेमाल होते हैं। सोलर पैनल लगने के बाद इन तक पहुंच सीमित हो सकती है।

जलीय जीवन और पारिस्थितिकी: सूरज की रोशनी कम होने से जलाशयों में पनपने वाले पौधे और जीव प्रभावित हो सकते हैं। यह पूरी आहार श्रृंखला को बदल सकता है।

सामुदायिक नियंत्रण का खत्म होना: पहले ये जलाशय गांव के सामूहिक संसाधन (commons) थे। अब इनके ऊपर बाहरी कंपनियों का नियंत्रण बढ़ सकता है।

किसानों की यह चिंता आधारहीन भी नहीं है। क्योंकि साझा संसाधनों पर काम करने वाली फाउंडेशन फॉर इकोलॉजी सिक्योरिटी (FES) भी अपने अध्ययन में बताती है कि जब स्थानीय समुदायों का नियंत्रण कम होता है, तो संसाधनों का उपयोग और उनका संरक्षण दोनों प्रभावित होते हैं।

यानी कारियापट्टी का विरोध एक अलग-थलग घटना नहीं है। यह उसी बड़े पैटर्न का हिस्सा है, जहां किसान जल, ज़मीन और संसाधनों से जुड़े बदलावों को अपने अस्तित्व का सवाल मानते हैं।

नीतिगत दावे बनाम ज़मीनी हक़ीकत

फ्लोटिंग सोलर को बढ़ावा देने के पीछे नीति का तर्क साफ़ है। इसका उद्देश्य बिना अतिरिक्त ज़मीन लिए नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना है। और MNRE इसे एक उभरते विकल्प के रूप में आगे बढ़ा रहा है। 

ज़मीन पर तस्वीर अलग है। यहां सवाल क्यों का नहीं, बल्कि कैसे और कहां का है। अभी की नीतियों की सबसे बड़ी कमी यही है कि जलाशयों के चुनाव के लिए सामाजिक और पारिस्थितिक मानदंड (criteria) अभी तय नहीं हैं। यानी किस जलाशय का उपयोग हो और किसे बचाया जाए, यह प्रक्रिया स्पष्ट नहीं है।

इसी वजह से अलग-अलग तरह के जलाशयों, चाहे वे सिंचाई के टैंक हों या स्थानीय उपयोग के स्रोत को एक ही नज़र से देखा जाता है। 

हालांकि नीति आयोग की जल रिपोर्ट यह ज़रूर बताती है कि भारत में जल संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है, लेकिन ऊर्जा और जल के इस टकराव को समझने का ढांचा अभी भी कमजोर है।

साफ़ है कि नीति का फोकस संभावना पर है, लेकिन संवेदनशीलता को पहचानने की व्यवस्था अभी कमजोर है। यही वह जगह है जहां योजना और हकीकत के बीच फासला साफ़ हो जाता है।

आगे की राह: कैसे बने संतुलन

कारियापट्टी जैसे मामलों से यह साफ़ है कि हमें ग्रीन एनर्जी बनाम पानी की बहस से आगे बढ़ना होगा। इसके लिए कुछ ठोस कदम ज़रूरी हैं:

स्थान-विशिष्ट मूल्यांकन (Site-specific assessment): हर जलाशय की अपनी भूमिका होती है। किसी भी परियोजना से पहले उसके सामाजिक, पारिस्थितिक और जल-वैज्ञानिक प्रभावों का गहन अध्ययन ज़रूरी है।

स्थानीय समुदाय की भागीदारी: फैसले ऊपर से थोपने के बजाय गांव के लोगों को शामिल करना ज़रूरी है। क्योंकि वे ही इन जल-स्रोतों के वास्तविक संरक्षक हैं।

“नो-गो” ज़ोन तय करना: कुछ जलाशय ऐसे हो सकते हैं जिन्हें पूरी तरह संरक्षित रखा जाए। यानी वहां किसी भी तरह का निर्माण या हस्तक्षेप न हो।

वैकल्पिक स्थानों की तलाश: सोलर पैनल लगाने के लिए परती ज़मीन, छतें, या औद्योगिक क्षेत्र बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

कारियापट्टी का विरोध एक सीधा सवाल उठाता है: हर “ग्रीन” समाधान अपने आप में टिकाऊ नहीं होता। सवाल यह नहीं है कि ऊर्जा कहां से आएगी, बल्कि यह है कि उसकी कीमत कौन चुकाएगा। अगर ऊर्जा के लिए पानी को ही खतरे में डालेंगे, तो यह समाधान नहीं, एक नया संकट होगा। क्योंकि पूरी जीवन-व्यवस्था पानी पर ही टिकी है।

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