फोटो : विकी कॉमंस
भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को “स्थगित” रखने का फैसला किया था जिस पर हेग की अदालत बैठी।
भारत सरकार ने इस कोर्ट के गठन को ही अवैध बताया और सुनवाई में भाग नहीं लिया।
हेग का फैसला विवाद को खत्म करने के बजाय विवाद की अगली कानूनी और कूटनीतिक परत खोल सकता है।
हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने 31 अगस्त 2026 को संधि की स्थिति और जम्मू-कश्मीर में रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़े अंतरिम उपायों पर फैसला दिए जाने के बाद सिंधु जल संधि (IWT) पर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद अब एक नए कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। भारत ने इस फैसले केा सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि इस मामले में फैसला सुनाना यह अदालत के अधिकार क्षेत्र में ही नहीं है। भारत के मुताबिक संधि को स्थगित रखने का फैसला उसकी संप्रभुता से जुड़ा निर्णय है और इस तथाकथित अदालत के आदेशों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। क्योंकि, इसक आर्बिट्रेशन कोर्ट का गठन गैरकानूनी तरीके से किया गया है।
हेग स्थित Permanent Court of Arbitration (PCA) से जुड़ी Court of Arbitration ने भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित करने के निर्णय को दरकिनार करते हुए 31 अगस्त को अपना फैसला सुनाया है। 31 अगस्त के फैसले में इस अदालत ने कहा-
"भारत को संधि के तहत अपनी ज़िम्मेदारियों का पालन करना चाहिए, जिसमें पश्चिमी नदियों पर अपनी पनबिजली परियोजनाओं के डिज़ाइन और संचालन से जुड़ी ज़िम्मेदारियां भी शामिल हैं। भारत को पाकिस्तान के साथ पानी के बंटवारे की उस संधि का पालन करना चाहिए जिसे उसने दोनों देशों के बीच तनाव के कारण रोक दिया था। साथ ही भारत को कश्मीर इलाके में बन रहे हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट पर काम भी सीमित करना चाहिए।'’
इस फैसले में यह भी कहा गया है कि सिंधु जल संधि अभी भी प्रभावी है और भारत के पास इसे एकतरफा तरीके से स्थगित करने का पर्याप्त आधार नहीं है। हालांकि PCA की वेबसाइट पर मौजूद आधिकारिक रिकॉर्ड में इस मामले की स्थिति अभी “Pending” ही दिखाई जा रही है और “Date of issue of final award” भी खाली है। इसका मतलब है कि 31 अगस्त का फैसला अंतिम निर्णय (final award) नहीं, बल्कि एक अंतरिम आदेश (Interim Measures Order) है।
भारत ने इस फैसले को मानने से साफ इनकार कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी कर इस अदालत को ‘अवैध रूप से गठित’ और ‘तथाकथित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन’ बताया। भारत का कहना है कि इस अदालत को भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक अदालत के वर्तमान या भविष्य के किसी भी pronouncement का भारत की परियोजनाओं से जुड़े उसके फैसलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसलिए इस पूरे विवाद में असली सवाल केवल यह नहीं है कि अदालत ने क्या कहा, बल्कि यह भी है कि भारत इस अदालत को इस विवाद को सुलझाने का वैध मंच ही नहीं मानता है। यही वजह है कि भारत में इस मामले में अपना पक्ष रखने के लिए किसी प्रतिनिधि (एजेंट) को नियुक्त नहीं किया था। जबकि, पाकिस्तान की ओर से उसके एटार्नी जनरल, सचिव समेत करीब डेढ़ दर्जन प्रतिनिधियों को कोर्ट में भेजा गया था। इस बात की जानकारी PCA की वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को विश्व बैंक की मध्यस्थता में हस्ताक्षरित एक महत्वपूर्ण जल-बंटवारा समझौता है। इस पर भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। विश्व बैंक की मध्यस्थ भूमिका में हुई इस संधि ने सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल का ढांचा तय किया। पश्चिमी नदियां सिंधु, झेलम और चिनाब मुख्य रूप से पाकिस्तान के लिए निर्धारित की गईं, जबकि पूर्वी नदियां रावी, ब्यास और सतलुज भारत के लिए निर्धारित हुईं।
हालांकि संधि ने भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ सीमित उपयोग की अनुमति भी दी। इसी में रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इन प्रावधानों की व्याख्या को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से विवाद रहा है।
इसी विवाद में पाकिस्तान ने भारत की कुछ जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन और जल भंडारण से जुड़े प्रावधानों को चुनौती दी। भारत ने 23 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से “स्थगित” (abeyance) रखने का फैसला किया। भारत सरकार ने इसका कारण पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को लगातार समर्थन देने और उसके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की जरूरत को बताया। इसके बाद सिंधु जल संधि का विवाद केवल पानी के बंटवारे और जलविद्युत परियोजनाओं के तकनीकी डिजाइन तक सीमित नहीं रहा। यह भारत-पाकिस्तान संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक सवाल से जुड़ गया।
हेग की Court of Arbitration ने अब इसी स्थिति पर विचार करते हुए कहा है कि संधि प्रभावी बनी हुई है और भारत के पास इसे निलंबित करने का पर्याप्त आधार नहीं था। PCA के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार पाकिस्तान ने 19 अगस्त 2016 को सिंधु जल संधि के Annexure G के तहत मध्यस्थता कार्यवाही शुरू की थी। इस मामले में PCA केवल सचिवालय की भूमिका निभा रहा है, जबकि औपचारिक Court of Arbitration संधि के प्रावधानों के तहत गठित हुई है। लेकिन, भारत ने इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया है। यही वजह है कि दोनों पक्षों की स्थिति इस समय बिल्कुल विपरीत है। अदालत कह रही है कि संधि लागू है, जबकि भारत कह रहा है कि इस अदालत का फैसला ही उसके लिए मान्य नहीं है।
इस मामले को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सिंधु जल संधि में विवादों के समाधान के अलग-अलग स्तर निर्धारित हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच मतभेद किस प्रकृति का है, उसके आधार पर स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission), तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) या मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) की प्रक्रिया सामने आती है।
यहीं से मौजूदा विवाद और जटिल हो जाता है। भारत का तर्क रहा है कि पाकिस्तान ने एक ही तरह के विवाद को अलग-अलग तंत्रों में ले जाकर समानांतर प्रक्रियाएं खड़ी कर दीं। इसी वजह से भारत ने Court of Arbitration की कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया। यानी भारत का मौजूदा विरोध केवल 31 अगस्त के फैसले तक सीमित नहीं है। भारत पहले से ही इस Court of Arbitration की वैधता और अधिकार क्षेत्र को चुनौती देता रहा है।
दूसरी ओर, PCA के रिकॉर्ड में यह मामला संधि के Article IX और Annexure G के तहत शुरू की गई अंतर-राज्यीय मध्यस्थता के रूप में दर्ज है। अदालत पहले ही अपने अधिकार क्षेत्र पर फैसला दे चुकी थी और बाद में कार्यवाही आगे बढ़ी। PCA के रिकॉर्ड में 2023 में Court की competence पर award और 2025 में supplemental award भी दर्ज है।
फैसले का महत्वपूर्ण हिस्सा जम्मू-कश्मीर की रतले जलविद्युत परियोजना से जुड़ा है। Court of Arbitration ने पाकिस्तान की मांग से सहमति जताते हुए कहा कि रतले हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लांट में बांध की दीवार और पावर इंटेक स्ट्रक्चर को कुछ निर्धारित स्तरों से आगे तब तक नहीं बढ़ाया जाए, जब तक विश्व बैंक द्वारा नियुक्त Neutral Expert यह तय नहीं कर देता कि परियोजना संधि के अनुरूप है या नहीं। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी Reuters की एक रिपोर्ट के अनुसार Neutral Expert का निर्णय जुलाई 2027 तक आने की उम्मीद है और उसके बाद भी 90 दिनों की अवधि से जुड़ी पाबंदी लागू रहेगी।
रतले परियोजना चिनाब नदी पर प्रस्तावित महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाओं में है। पाकिस्तान लंबे समय से भारत की पश्चिमी नदियों पर बनने वाली जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन और जल भंडारण क्षमता पर आपत्ति करता रहा है।
भारत का तर्क इसके उलट है कि सिंधु जल संधि के तहत उसे पश्चिमी नदियों पर रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं बनाने का अधिकार प्राप्त है और परियोजनाओं का डिजाइन संधि में निर्धारित तकनीकी शर्तों के अनुरूप है।
सिंधु नदी- लद्दाख
इस विवाद में इस महत्वपूर्ण कानूनी पहलू को समझना बेहद जरूरी है कि हेग में स्थित Permanent Court of Arbitration कोई सामान्य राष्ट्रीय अदालत नहीं है, बल्कि यह एक अंतर-सरकारी संस्था है जो राज्यों के बीच मध्यस्थता समेत विभिन्न विवाद समाधान सेवाएं उपलब्ध कराती है।
इस मामले में Court of Arbitration का गठन खुद सिंधु जल संधि के Annexure G के प्रावधानों के तहत हुआ है। PCA इसकी सचिवालय संबंधी भूमिका निभा रहा है। इसलिए कानूनी दृष्टि से यही कहना ज्यादा सटीक होगा कि यह PCA का सामान्य ‘कोर्ट केस’ नहीं, बल्कि सिंधु जल संधि के तहत गठित Court of Arbitration की कार्यवाही है।
भारत इसी व्यवस्था की वैधता को चुनौती दे रहा है। उसका कहना है कि जब वह इस Court of Arbitration के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार ही नहीं करता और संधि को स्थगित रखने का अपना संप्रभु निर्णय लागू मानता है, तो अदालत के pronouncements उसके लिए बाध्यकारी नहीं हो सकते।
पाकिस्तान के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिंधु जल प्रणाली उसकी कृषि और जल सुरक्षा की रीढ़ है। Reuters के अनुसार सिंधु जल संधि पाकिस्तान के लगभग 80 प्रतिशत कृषि क्षेत्रों के लिए पानी की आपूर्ति से जुड़ी है। इसलिए पाकिस्तान के लिए संधि का प्रभावी बने रहना केवल कूटनीतिक मुद्दा नहीं है। इसका सीधा संबंध सिंचाई, कृषि उत्पादन और दीर्घकालिक जल सुरक्षा से है।
हेग की अदालत का यह कहना कि भारत संधि के तहत अपने दायित्वों का पालन करे, पाकिस्तान के लिए राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान ने फैसले को अपने पक्ष में बड़ी जीत के तौर पर देखा है। लेकि, इस फैसले का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत इसे कितना स्वीकार करता है। फिलहाल भारत ने साफ कर दिया है कि वह अदालत के pronouncements को अपनी परियोजनाओं और जल संसाधन संबंधी फैसलों पर प्रभावी नहीं मानेगा।
सिंधु जल संधि ने करीब छह दशकों तक भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध और गंभीर राजनीतिक तनाव के बावजूद काम किया। 1965, 1971 और 1999 के संघर्षों के बावजूद संधि बनी रही। लेकिन 2025 के बाद इसकी स्थिति पहली बार इतने बड़े राजनीतिक और कानूनी विवाद के केंद्र में आ गई है।
एक तरफ अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता प्रक्रिया संधि को लागू मान रही है, दूसरी तरफ भारत संधि को स्थगित रखने और संबंधित Court of Arbitration को अधिकारहीन मानने की अपनी स्थिति पर कायम है।
इसका मतलब यह है कि फिलहाल हेग का फैसला विवाद को खत्म करने के बजाय विवाद की अगली कानूनी और कूटनीतिक परत खोल सकता है।
आने वाले समय में सबसे अहम सवाल यह होगा कि Neutral Expert की प्रक्रिया किस दिशा में जाती है, रतले जैसी परियोजनाओं पर भारत क्या कदम उठाता है और क्या दोनों देश भविष्य में सिंधु जल संधि के विवाद समाधान तंत्र पर किसी नए समझौते की ओर बढ़ते हैं।
19 सितंबर 1960: सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर
भारत और पाकिस्तान ने विश्व बैंक की मध्यस्थता में कराची में सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए। संधि के तहत सिंधु, झेलम और चिनाब को पश्चिमी नदियां तथा रावी, ब्यास और सतलुज को पूर्वी नदियां माना गया। पश्चिमी नदियों के पानी पर पाकिस्तान को मुख्य उपयोग अधिकार मिला, जबकि भारत को निर्धारित शर्तों के तहत घरेलू उपयोग, सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति दी गई।
1960–1970: संक्रमण काल
संधि के तहत पाकिस्तान को अपनी नहर प्रणाली के पुनर्गठन और वैकल्पिक व्यवस्था के लिए संक्रमण अवधि दी गई। इस दौरान पूर्वी नदियों से पाकिस्तान को मिलने वाले पानी की व्यवस्था धीरे-धीरे समाप्त की गई और भारत को पूर्वी नदियों के पानी के इस्तेमाल की पूरी गुंजाइश मिली।
1965 और 1971: युद्धों के बावजूद संधि कायम
भारत-पाकिस्तान के बीच दो बड़े युद्ध हुए, लेकिन सिंधु जल संधि जारी रही। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक बनी कि दोनों देशों के गंभीर राजनीतिक और सैन्य तनाव के बावजूद जल-बंटवारे की व्यवस्था चलती रही।
1990 के दशक–2000 के दशक: जलविद्युत परियोजनाओं पर विवाद बढ़ा
भारत ने पश्चिमी नदियों पर संधि के तहत अनुमत रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाएं विकसित करनी शुरू कीं। पाकिस्तान ने कई परियोजनाओं के डिजाइन, जल भंडारण और संचालन संबंधी प्रावधानों पर आपत्ति जताई। इससे संधि के विवाद समाधान तंत्र का महत्व बढ़ा।
2007–2013: किशनगंगा विवाद
जम्मू-कश्मीर की किशनगंगा/नीलम नदी पर भारत की जलविद्युत परियोजना को पाकिस्तान ने चुनौती दी। मामला Court of Arbitration तक पहुंचा और 2013 में फैसला आया। इस मामले ने पश्चिमी नदियों पर भारत की जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर दोनों देशों के मतभेद को अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंच तक पहुंचा दिया।
2010–2013: किशनगंगा के साथ रतले विवाद भी उभरा
पाकिस्तान ने किशनगंगा और रतले परियोजनाओं के डिजाइन से जुड़े मुद्दों को उठाया। इससे यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया कि किसी विवाद को Neutral Expert के पास ले जाया जाए या Court of Arbitration के पास।
2016: विवाद समाधान तंत्र पर बड़ा टकराव
पाकिस्तान ने किशनगंगा और रतले परियोजनाओं से जुड़े विवादों के लिए Court of Arbitration की प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में कदम उठाया। भारत ने समानांतर प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताई और कहा कि एक ही विषय पर अलग-अलग विवाद समाधान तंत्रों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
2022–2023: विवाद फिर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता तक पहुंचा
पाकिस्तान ने रतले और किशनगंगा परियोजनाओं से जुड़े विवादों को Court of Arbitration के सामने आगे बढ़ाया। भारत ने इस प्रक्रिया में हिस्सा नहीं लिया और अदालत के गठन तथा अधिकार क्षेत्र पर आपत्ति जताई।
2023: Court of Arbitration ने अधिकार क्षेत्र पर सुनवाई आगे बढ़ाई
कोर्ट ने यह तय करने की प्रक्रिया शुरू की कि उसके पास इन विवादों पर सुनवाई का अधिकार है या नहीं। भारत का लगातार रुख रहा कि समान विवाद को Neutral Expert की प्रक्रिया में ले जाए जाने के बाद Court of Arbitration के समानांतर मंच का इस्तेमाल उचित नहीं है।
अप्रैल 2025: पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने संधि स्थगित की
23 अप्रैल 2025 को भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से “abeyance” यानी स्थगित रखने की घोषणा की। भारत ने पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को समर्थन देने और उसके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता को इसका कारण बताया। बाद में विदेश मंत्रालय ने भी स्पष्ट किया कि संधि “in abeyance” है।
2025: जलविद्युत परियोजनाओं पर भारत का रुख और कड़ा हुआ
संधि स्थगित किए जाने के बाद भारत ने पश्चिमी नदियों पर अपनी जलविद्युत और जल प्रबंधन परियोजनाओं को लेकर पहले की तुलना में अधिक आक्रामक रुख अपनाया। इससे विवाद केवल तकनीकी जल-बंटवारे से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभु अधिकार का मुद्दा बन गया।
31 अगस्त 2026: हेग की Court of Arbitration का बड़ा फैसला
Court of Arbitration ने कहा कि सिंधु जल संधि प्रभावी है और भारत की ओर से इसे स्थगित करना संधि के तहत उचित नहीं था। कोर्ट ने रतले परियोजना पर भी अंतरिम उपाय जारी किए और Neutral Expert की प्रक्रिया पूरी होने तक कुछ निर्माण गतिविधियों पर रोक लगाई।
31 अगस्त 2026: भारत ने फैसला खारिज किया
भारत ने Court of Arbitration को “अवैध रूप से गठित” बताते हुए उसके फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। भारत का कहना है कि इस अदालत के पास उसके संप्रभु फैसलों पर अधिकार क्षेत्र नहीं है और संधि अभी भी भारत की नजर में abeyance में है।
2027: अगला महत्वपूर्ण पड़ाव
रतले परियोजना से जुड़े विवाद में World Bank द्वारा नियुक्त Neutral Expert के जुलाई 2027 तक अपना निर्णय देने की उम्मीद है। इसलिए 2026 का हेग फैसला इस विवाद का अंत नहीं, बल्कि भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल व्यवस्था को लेकर अगले कानूनी और कूटनीतिक चरण की शुरुआत माना जा सकता है।
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