राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के राठीखेड़ा क्षेत्र में प्रस्तावित एथेनॉल निर्माण इकाई के ख़िलाफ़ डेढ़ साल से जारी स्थानीय विरोध अब न्यायिक हस्तक्षेप तक पहुंच गया है। यह एक ऐसा मामला है जो ग्रामीण जल-सुरक्षा और पर्यावरणीय मंज़ूरी प्रक्रिया की सीमाओं को उजागर करता है। हालिया अदालती आदेश में परियोजना को मिली पर्यावरणीय और प्रशासनिक मंज़ूरी पर रोक लगाते हुए फैक्ट्री निर्माण को अस्थायी रूप से रोक दिया गया है।
यह विवाद केवल एक औद्योगिक परियोजना तक सीमित नहीं है। यह उन सवालों को सामने लाता है कि जल-संकटग्रस्त ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिक परियोजनाओं का मूल्यांकन कैसे किया जा रहा है, और पर्यावरणीय निर्णय-प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भूमिका क्या रह जाती है।
परियोजना से जुड़े सरकारी दस्तावेज़ों और पर्यावरणीय मंज़ूरी आवेदन (EIA/PCB) रिकॉर्ड के अनुसार, राठीखेड़ा ग्राम पंचायत के चक 5 JRK में एक प्राइवेट कंपनी द्वारा 450 करोड़ की लागत वाली एथेनॉल फ़ैक्ट्री लगाने की प्रस्तावना पेश की गई है।
यह इकाई एथेनॉल उत्पादन के लिए स्थापित की जानी थी, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के तहत ईंधन में एथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाना बताया गया। प्रस्तावित इकाई एक 1320 KLPD का अनाज आधारित एथेनॉल प्लांट है जो इस क्षेत्र के मौजूदा औद्योगिक ढांचे की तुलना में एक बड़े पैमाने की इकाई मानी जाती है। जिसमें 40 MW को-जनरेशन पावर प्लांट भी शामिल है। इस परियोजना का आवेदन चंडीगढ़ में पंजीकृत एम/एस ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी ने किया है।
प्रस्तावित परियोजना के प्रमुख तत्वों में शामिल थे:
कृषि आधारित कच्चे माल (मुख्यतः अनाज/शीरा) से एथेनॉल उत्पादन
बड़ी मात्रा में भूजल या सतही जल की ज़रूरत
तरल अपशिष्ट (spent wash), ठोस अवशेष और वायु उत्सर्जन
ग्रामीण आबादी के नज़दीक औद्योगिक संचालन
स्थानीय समुदाय का कहना है कि परियोजना के जल-उपयोग, अपशिष्ट निपटान और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े सवालों पर न तो विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण दिया गया और न ही इन मुद्दों पर कोई स्वतंत्र या पारदर्शी समीक्षा ही साझा की गई।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने परियोजना के निर्माण को अस्थायी रूप से रोका और एक व्यापक जांच का आदेश दिया। इस आदेश में कहा गया कि पर्यावरणीय पक्ष की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।
इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थानीय चिंताओं को गंभीरता से लिया जाना ज़रूरी समझा गया, क्योंकि परियोजना के पर्यावरणीय प्रबंधन से जुड़े सवालों ने राजनीति में भी अपनी जगह बनाई।
हनुमानगढ़ इलाका पहले से ही जल-संकटग्रस्त माना जाता है। इसलिए खेती और घरेलू उपयोग के लिए पानी की उपलब्धता में कमी की आशंका भी एक कारण है।
स्थानीय विरोध - डेढ़ साल की ज़मीनी लड़ाई
स्थानीय विरोध केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं।
लोगों का विरोध जल उपलब्धता, प्रदूषण जोखिम और स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर ठोस आशंकाओं पर आधारित है।
हनुमानगढ़ का यह इलाका पहले से ही जल-संकटग्रस्त माना जाता है। इसलिए खेती और घरेलू उपयोग के लिए पानी की उपलब्धता में कमी की आशंका भी एक कारण है।
स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने बार-बार यह मुद्दा उठाया कि:
एथेनॉल उत्पादन से उच्च प्रदूषण वाला अपशिष्ट जल निकलेगा
यदि उपचार और निगरानी में चूक हुई, तो नज़दीकी खेतों, नालों और जलस्रोतों में प्रदूषण फैलेगा
क्षेत्र में जल-गुणवत्ता पहले ही एक समस्या बनी हुई है जो और गंभीर हो सकती है
औद्योगिक इकाई का सीधा असर यहां के लोगों और फसलों पर पड़ेगा
ग्रामीणों ने संभावित स्वास्थ्य जोखिमों की ओर भी ध्यान दिलाया:
दूषित जल से त्वचा रोग, पेट संबंधी बीमारियां
वायु उत्सर्जन से श्वसन संबंधी समस्याएं
बच्चों और बुज़ुर्गों पर असमान प्रभाव
स्थानीय विरोध केवल प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ज्ञापन, जनसुनवाई में आपत्तियां, और प्रशासनिक स्तर पर शिकायतें लगातार दर्ज की जाती रहीं।
विरोध की शुरुआत और सीमारेखा
मीडिया रिपोर्ट बताते हैं कि हनुमानगढ़ के टिब्बी और राठीखेड़ा के स्थानीय किसानों और ग्रामीणों ने इस फ़ैक्ट्री के विरोध में लगभग 15 महीनों तक आंदोलन चलाया है।
इस आंदोलन की शुरुआत सितंबर 2024 में हुई जो कोर्ट के आदेश आने तक लगातार जारी रही। फ़ैक्ट्री के निर्माण कार्य और उससे जुड़ी सीमाओं के तय हो जाने के बाद ही आंदोलन को रोका गया।
विरोध की मुख्य शिकायतें और पर्यावरण-स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं
स्थानीय ग्रामीणों और किसान संगठनों का कहना है कि परियोजना दस्तावेज़ों के अनुसार प्रस्तावित फैक्ट्री को प्रतिदिन लगभग 60 लाख लीटर स्वच्छ जल की आवश्यकता होगी, जिससे इलाक़े में पानी की उपलब्धता में कमी आने आशंका जताई जा रही है।
किसानों का कहना है कि अगर फैक्ट्री शुरू हुई, तो सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी और सीमित हो जाएगा, जिससे कृषि उत्पादन सीधे प्रभावित होगा।
इसके साथ ही किसानों ने फैक्ट्री से निकलने वाले स्पेंट वॉश और अन्य प्रदूषक अपशिष्टों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि इन अपशिष्टों की निगरानी और प्रबंधन में चूक हुई, तो नज़दीकी नालों, खेतों और भूजल स्रोतों में प्रदूषण फैल सकता है।
विरोध कर रहे समूहों का आरोप है कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और सामाजिक प्रभाव अध्ययन में स्थानीय जल-स्थिति और आजीविका संबंधी प्रभावों का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया। इसी क्रम में सामुदायिक सहमति के अभाव को भी एक प्रमुख आपत्ति के रूप में सामने रखा गया है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 200 से अधिक किसान समूहों के प्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन को लिखित आपत्तियां और ज्ञापन सौंपते हुए परियोजना से जुड़े MoU को रद्द करने की मांग की।
इस विरोध आंदोलन को स्थानीय स्तर पर गठित ‘एथेनॉल फैक्ट्री हटाओ-क्षेत्र बचाओ संघर्ष समिति’ ने संगठित किया, जिसमें ग्रामीणों और किसानों की सक्रिय भागीदारी रही।
इसके अलावा संयुक्त किसान मोर्चा और ग्रामीण किसान मज़दूर संघ समिति (राजस्थान) जैसे संगठनों ने भी सार्वजनिक मंचों और महापंचायतों के माध्यम से विरोध को समर्थन दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 200 से अधिक किसान समूहों के प्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन को लिखित आपत्तियां और ज्ञापन सौंपते हुए परियोजना से जुड़े MoU को रद्द करने की मांग की।
स्थानीय लोगों को इस परियोजना से जुड़े संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर भी आशंका है। उनका कहना है कि दूषित जल के संपर्क से त्वचा और पेट से जुड़ी बीमारियाँ बढ़ सकती हैं, जबकि वायु प्रदूषण के कारण सांस संबंधी रोगों का जोखिम बढ़ेगा, जिसका सीधा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ सकता है।
विरोध के समर्थन में बड़े पैमाने पर जनसभाओं और महापंचायतों का आयोजन किया गया। 10 दिसंबर 2025 को आयोजित महापंचायत में भारी संख्या में किसानों ने हिस्सा लिया और परियोजना को कम-से-कम रोकने की स्पष्ट मांग उठाई।
किसान प्रतिनिधि रवि जोसन ने कहा, “एथेनॉल प्लांट को रोकने की इस लड़ाई में इलाक़े का हर गांव शामिल है। हम अपने क्षेत्र की हवा, पानी और ज़मीन को प्रदूषित नहीं होने देंगे।”
हालांकि दिसंबर 2025 के मध्य में विरोध के दौरान तनाव बढ़ गया, जिसके परिणामस्वरूप प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 10-12 दिसंबर के बीच हुई जनसभाओं के दौरान किसानों और प्रशासन के बीच झड़पें हुईं। इसमें संपत्ति को नुकसान पहुंचा और पुलिस व प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव हुआ।
इस दौरान सांगरिया से विधायक अभिमन्यु पूनिया भी घायल हुए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से बंद कीं, धारा 163/144 लागू की और भारी पुलिस बल तैनात किया।
एथेनॉल प्लांट को रोकने की इस लड़ाई में इलाक़े का हर गांव शामिल है। हम अपने क्षेत्र की हवा, पानी और ज़मीन को प्रदूषित नहीं होने देंगे।रवि जोसन, किसान प्रतिनिधि, राठीखेड़ा
परियोजना को प्रारंभिक स्तर पर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और अन्य विभागों से आवश्यक स्वीकृतियां मिली हैं, लेकिन विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जनसुनवाई की प्रक्रिया औपचारिकता बनकर रह गई है। उनका कहना है कि स्थानीय आपत्तियों को निर्णय-प्रक्रिया में पर्याप्त वज़न नहीं दिया गया है और निगरानी और अनुपालन की शर्तें केवल काग़ज़ों तक ही सीमित रही हैं।
हालांकि कुछ परिस्थितियों में राज्य सरकार ने उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है ताकि विरोध-प्रदर्शन के बीच पर्यावरणीय दावों की जांच की जा सके (जैसे सैंपल लेना आदि)। आलोचकों का कहना है कि ये कदम पूर्व-नियोजित पर्यावरणीय निगरानी व्यवस्था का हिस्सा होने के बजाय, आंदोलन के दबाव में उठाए गए प्रतिक्रियात्मक उपाय अधिक प्रतीत होते हैं।
प्रशासन का कहना है कि पीसीबी आदि समेत सभी आवश्यक स्वीकृतियां प्राप्त कर ली गईं। लेकिन किसानों और स्थानीय समूहों का दावा है कि जनसुनवाई औपचारिकता में बदल गई। उनका यह भी कहना है कि उनकी स्थानीय आपत्तियों को निर्णय-प्रक्रिया में महत्व नहीं मिला, और निगरानी-अनुपालन शर्तें कागज़ों तक सिमटी रहीं, जो अक्सर ही इस तरह के औद्योगिक-पर्यावरणीय संघर्षों में देखा जाता है।
न्यायिक हस्तक्षेप
लगातार विरोध और याचिकाओं के बाद मामला अदालत पहुंच गया। रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने निम्न बिंदुओं को गंभीरता से लिया:
जल और पर्यावरणीय प्रभावों का पर्याप्त आकलन नहीं
स्थानीय आबादी की आशंकाओं की अनदेखी
परियोजना के लाभ और जोखिम के बीच असंतुलन
अदालत ने मंज़ूरी पर रोक लगाते हुए निर्माण गतिविधियों को फिलहाल रोकने का आदेश दिया, जिससे डेढ़ साल से चल रहे विरोध को एक निर्णायक मोड़ मिला।
यह आदेश दर्शाता है कि जब प्रशासनिक मंज़ूरी प्रक्रियाएं स्थानीय स्तर पर भरोसा पैदा करने में विफल रहती हैं, तब अदालतें पर्यावरणीय शासन में निर्णायक भूमिका निभाने लगती हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति ऊर्जा सुरक्षा और आयात निर्भरता कम करने के उद्देश्य से लाई गई है। लेकिन राठीखेड़ा एथेनॉल फैक्ट्री पर लगी रोक यह दिखाती है कि स्थानीय समुदाय की आवाज़, यदि लगातार और संगठित हो, तो नीतिगत फैसलों को चुनौती दे सकती है।
यह मामला इस बहस को फिर से सामने लाता है कि औद्योगिक विकास, विशेषकर जल-गहन उद्योगों का विस्तार, स्थानीय जल-सुरक्षा और सामुदायिक सहमति से अलग रखकर नहीं देखा जा सकता।