अंतरिक्ष से कुछ ऐसा दिखता है हॉर्मुज़ जलडमरू मध्य, उपग्रह से लिया गया ओमान की खाड़ी में स्थित हॉर्मुज़ का चित्र।
स्रोत : विकी कॉमंस
मध्य-पूर्व में ईरान-इजराइल और अमेरिका के बीच चल रही जंग के बीच हॉर्मुज़ जलडमरू मध्य का नाम खबरों में लगातार सुनने को मिल रहा है। भारत सहित दुनिया के कई देशों में इस समय चल रहे तेल व गैस के संकट की वजह इसी जलडमरू मध्य से जहाजों का आवागमन बाधित होना जाना बताया जा रहा है। ऐसे में आप के मन में भी यह सवाल आया होगा कि आखिर यह जलडमरू मध्य होता क्या है और इसके बंद हो जाने से अर्थव्यवस्था पर इतना बड़ा असर क्यों पड़ता है? इस लेख में हम आपको इसी बारे में बताने जा रहे हैं। साथ ही जलडमरू मध्य से जुड़ी और भी तमाम जानकारियां आपको इसमें मिलेंगी।
हॉर्मुज़ जलडमरू मध्य केवल एक संकरे समुद्री मार्ग वाली भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि अपनी विशेष स्थिति के चलते इसे ग्लोबल ऊर्जा आपूर्ति की “धड़कन” कहा जाता है। क्योंकि, इसके रास्ते ही खाड़ी देशों व अन्य तेल उत्पादक देशों से दुनिया के बड़े हिस्से को तेल और गैस की आपूर्ति होती है। इसलिए जब यहां किसी तरह का खतरा या तनाव पैदा होता है, तो पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट की आशंका बढ़ जाती है। इस समय ठीक ऐसा ही हो रहा है। ईरान ने अमेरिका और इजरायल द्वारा अपने ऊपर किए गए हमले के कारण हॉर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर दिया है, जिससे भारत सहित दुनिया के एक बड़े इलाके में तेल-गैस की आपूर्ति तकरीबन ठप हो गई है। इस संकट को देखते हूए आज हॉर्मुज़ जलडमरू मध्य (Strait) के बारे में समझना जरूरी हो गया है ।
जलडमरू मध्य एक ऐसा संकरा जलमार्ग होता है जो दो बड़े जल निकायों, जैसे समुद्र या महासागरों को जोड़ता है और दो स्थलीय भूभागों (महाद्वीप या द्वीपों) के बीच स्थित होता है। इस तरह यह एक प्राकृतिक “पुल” की तरह काम करता है, जो समुद्री परिवहन को छोटा और आसान बनाता है।
ऐसे जलमार्ग के होने से जहाजों को लंबा चक्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे समय, ईंधन और लागत तीनों की बचत होती है। यही कारण है कि विश्व के कई प्रमुख व्यापारिक मार्ग इन्हीं जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं। इसके अलावा, ये जलमार्ग दो अलग-अलग समुद्री क्षेत्रों के जल, तापमान और लवणता को मिलाने का काम भी करते हैं, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। साथ ही, जलडमरूमध्य अक्सर अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग (International Shipping Lanes) के रूप में विकसित हो जाते हैं, जिससे इनका आर्थिक और सामरिक महत्व और भी बढ़ जाता है। इसलिए, ये केवल भौगोलिक संरचना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और भू-राजनीति के महत्वपूर्ण केंद्र भी माने जाते हैं। उदाहरण के लिए, जिब्राल्टर जलडमरू मध्य यूरोप और अफ्रीका के बीच स्थित है और अटलांटिक महासागर को भूमध्य सागर से जोड़ता है।
अपनी बेहद खास भौगोलिक स्थिति के कारण हॉर्मुज़ जलडमरू मध्य अकसर ही सामरिक गतिविधियों का केंद्र बना रहता है।
जलडमरू मध्य की संरचना को समझने के लिए तीन मुख्य तत्वों पर ध्यान देना जरूरी है :
चौड़ाई और गहराई : अधिकांश जलडमरू मध्य बहुत संकरे होते हैं। कुछ की चौड़ाई केवल कुछ किलोमीटर होती है। यही संकरा आकार इन्हें खास बनाता है। जैसे बॉस्फोरस जलडमरू मध्य। वहीं, कुछ अपेक्षाकृत चौड़े होते हैं, जैसे मलक्का जलडमरू मध्य।
जल प्रवाह (करंट्स) : यहां जल का प्रवाह बहुत तेज और जटिल हो सकता है क्योंकि दो अलग-अलग समुद्रों के जल स्तर, तापमान और लवणता में अंतर होता है। इससे जलडमरू मध्य में विशेष प्रकार के समुद्री करंट्स बनते हैं। यहां “करंट्स” से मतलब बिजली के करंट से नहीं, बल्कि समुद्र के पानी के बहाव (जल धाराओं) से है। ये धाराएं पानी के तापमान, लवणता और जलस्तर के अंतर के कारण एक दिशा में बहती रहती हैं।
भौगोलिक स्थिति : ये आमतौर पर महाद्वीपों के किनारों या द्वीप समूहों के बीच पाए जाते हैं, जो इन्हें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। इनकी यही स्थिति इन्हें अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों का अहम हिस्सा बना देती है, जहां से होकर बड़ी मात्रा में व्यापारिक जहाज गुजरते हैं। साथ ही, कई देशों की सीमाएं इन जलमार्गों के आसपास होती हैं, जिससे इन पर नियंत्रण को लेकर भू-राजनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
जलडमरू मध्य का निर्माण लाखों वर्षों की भूगर्भीय प्रक्रियाओं का परिणाम होता है। इसके प्रमुख कारण हैं—
1. प्लेट विवर्तनिकी (Tectonic Movement)
जब पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराती, खिसकती या अलग होती हैं, तो भूमि का स्वरूप बदलने लगता है। कई बार इन हलचलों से भूमि के बड़े हिस्से टूटकर अलग हो जाते हैं और उनके बीच दरारें या खाली स्थान बन जाते हैं। समय के साथ इन स्थानों में समुद्र का पानी भर जाता है, जिससे संकरे जलमार्ग यानी जलडमरूमध्य का निर्माण हो सकता है।
2. समुद्र स्तर में परिवर्तन
पृथ्वी के इतिहास में कई बार बर्फ युग (Ice Age) आए, जब समुद्र का स्तर काफी नीचे चला गया था और कई भूभाग आपस में जुड़े हुए थे। जैसे-जैसे तापमान बढ़ा और हिमनद (glaciers) पिघले, समुद्र का स्तर ऊपर उठ गया। इससे निचले इलाके जलमग्न हो गए और जो क्षेत्र पहले भूमि थे, वे अब जलमार्ग में बदलकर जलडमरूमध्य बन गए।
3. अपरदन (Erosion)
नदियों, समुद्री लहरों और हवाओं के लगातार प्रभाव से भूमि का कटाव होता रहता है। यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है, लेकिन लंबे समय में यह ठोस चट्टानों को भी तोड़ सकती है। जब किसी तटीय क्षेत्र या दो भूभागों के बीच लगातार कटाव होता है, तो वहां एक संकरा रास्ता बन जाता है, जिसमें समुद्री पानी भरकर जलडमरूमध्य का रूप ले लेता है।
जलडमरू मध्य केवल व्यापारिक मार्ग ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसकी प्राकृतिक भूमिका और उपयोगिता के बारे में इस प्रकार समझा जा सकता है-
यहां विभिन्न समुद्री जल मिलते हैं, जिससे पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है और मछलियों व अन्य जीवों की विविधता अधिक होती है। इन क्षेत्रों में प्लवक (plankton) की अधिकता के कारण खाद्य श्रृंखला मजबूत होती है, जो बड़े समुद्री जीवों के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार करती है। यही वजह है कि कई जलडमरूमध्य मछली पालन और समुद्री संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र माने जाते हैं।
जलडमरूमध्य समुद्री धाराओं को नियंत्रित करते हैं, जो वैश्विक जलवायु प्रणाली को प्रभावित करते हैं। ये धाराएं गर्म और ठंडे पानी के आदान-प्रदान को संतुलित करती हैं, जिससे विभिन्न क्षेत्रों का तापमान और मौसम प्रभावित होता है। इस प्रकार, छोटे से जलमार्ग भी बड़े पैमाने पर जलवायु संतुलन बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।
ये अलग-अलग समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों के बीच “फिल्टर” की तरह काम करते हैं, जिससे प्रजातियों का संतुलन बना रहता है। संकरे और विशेष भौगोलिक स्वरूप के कारण हर जीव यहां आसानी से प्रवेश नहीं कर पाता, जिससे बाहरी प्रजातियों का अनियंत्रित प्रसार रुकता है। इस तरह जलडमरूमध्य जैव विविधता की सुरक्षा और संतुलन बनाए रखने में सहायक होते हैं।
| जलडमरूमध्य | भौगोलिक स्थिति | आकार/चौड़ाई (लगभग) | विशेषता |
|---|---|---|---|
| मलक्का | दक्षिण-पूर्व एशिया | ~800 किमी लंबा | सबसे व्यस्त व्यापार मार्ग |
| हॉर्मुज़ | मध्य पूर्व | ~39 किमी | तेल आपूर्ति का केंद्र |
| जिब्राल्टर | यूरोप-अफ्रीका | ~14 किमी | अटलांटिक-भूमध्य जोड़ता |
| बॉस्फोरस | तुर्की | ~31 किमी | यूरोप-एशिया विभाजन |
| बेरिंग | रूस-अमेरिका | ~85 किमी | आर्कटिक से जुड़ाव |
| पनामा (कैनाल क्षेत्र) | मध्य अमेरिका | कृत्रिम मार्ग | अटलांटिक-पैसिफिक जोड़ता |
हॉर्मुज़ जलडमरू मध्य दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्ग माना जाता है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। इसके कारण अकसर संकट क्यों पैदा होता है? इसकी वजहें निम्नलिखित हैं-
1. वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा
दुनिया के लगभग 20% से अधिक कच्चे तेल की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। मध्य पूर्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों से निकलने वाला अधिकांश तेल इसी जलमार्ग के जरिए एशिया, यूरोप और अन्य क्षेत्रों तक पहुंचता है। इसलिए यहां किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है।
2. संकरा मार्ग
यह जलडमरूमध्य काफी संकरा है, जिससे एक समय में सीमित संख्या में ही बड़े तेल टैंकर और जहाज गुजर सकते हैं। ऐसे में यदि कोई तकनीकी खराबी, दुर्घटना या जानबूझकर अवरोध उत्पन्न हो जाए, तो पूरे मार्ग की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और आपूर्ति श्रृंखला बाधित हो जाती है।
3. भू-राजनीतिक तनाव
ईरान और अमेरिका के बीच जब भी तनाव बढ़ता है, तो इस क्षेत्र में अस्थिरता पैदा हो जाती है। कई बार सैन्य गतिविधियां, धमकियां या प्रतिबंध जैसी स्थितियां इस जलमार्ग को असुरक्षित बना देती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा मंडराने लगता है।
4. विकल्पों की कमी
इस मार्ग का कोई आसान और त्वरित विकल्प उपलब्ध नहीं है, क्योंकि अन्य समुद्री रास्ते या पाइपलाइन इतनी बड़ी मात्रा में तेल की आपूर्ति संभालने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में यदि यह जलमार्ग अस्थायी रूप से भी बाधित होता है, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं और इसका असर आम लोगों तक भी ईंधन महंगा होने के रूप में पहुंचता है।
ईरान के नियंत्रण वाले हॉर्मुज़ जलडमरू मध्य का नक्शा ।
दुनिया के अधिकांश समुद्री व्यापार मार्ग जलडमरूमध्य से होकर गुजरते हैं। ये मार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार को तेज, सस्ता और सुगम बनाते हैं। यदि ये रास्ते बाधित होते हैं, तो जहाजों को लंबा चक्कर लगाना पड़ता है, जिससे लागत और समय दोनों बढ़ जाते हैं और वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित होती है।
जो देश या क्षेत्र इन जलडमरू मध्य पर नियंत्रण रखते हैं, वे सामरिक रूप से एक मजबूत स्थिति में होते हैं। क्योंकि यह युद्ध या तनाव की स्थिति में इन मार्गों को बंद या नियंत्रित करके विरोधी देशों की आपूर्ति और व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं, जैसा कि इस समय हॉर्मुज़ के मामले में देखने को मिल रहा है। यही कारण है कि कई शक्तिशाली देश इन क्षेत्रों में अपनी नौसैनिक उपस्थिति बनाए रखते हैं और अमेरिका, रूस व चीन जैसी सामरिक शक्तियां जलडमरू मध्य के इलाकों के आसपास अपना सैन्य ठिकाना या नौसैनिक बेस बनाती हैं।
तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति बड़े पैमाने पर इन समुद्री मार्गों पर निर्भर करती है। विशेष रूप से मध्य पूर्व से एशिया और यूरोप तक ऊर्जा पहुंचाने के लिए जलडमरू मध्य बेहद जरूरी हैं। यदि इनमें किसी भी तरह की रुकावट आती है, तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है।
जलडमरू मध्य से जुड़े और भी कई तरह के महत्वपूर्ण पहलू होते हैं। कुछ प्रमुख पहलुओं को इस प्रकार समझा जा सकता है-
तेल टैंकरों की भारी आवाजाही के कारण जलडमरू मध्य में तेल रिसाव (Oil Spill) का खतरा बना रहता है। इसके अलावा जहाजों से निकलने वाला कचरा और रसायन समुद्री जल को प्रदूषित करते हैं, जिससे समुद्री जीवों और पारिस्थितिक तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जलडमरू मध्य में जहाजों और नौकाओं के अत्यधिक ट्रैफिक के कारण शोर प्रदूषण भी बढ़ता है, जो समुद्री जीवों के व्यवहार को प्रभावित करता है।
कुछ जलडमरू मध्य, विशेष रूप से मलक्का जलडमरू मध्य, समुद्री डकैती के लिए भी जाने जाते रहे हैं। संकरे मार्ग और धीमी गति से चलने वाले जहाज समुद्री लुटेरों के लिए आसान लक्ष्य बन जाते हैं। हालांकि हाल के वर्षों में क्षेत्रीय देशों के सहयोग और सुरक्षा उपायों के कारण ऐसी घटनाओं में कमी आई है।
संयुक्त राष्ट्र के समुद्री कानून, जिसे UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) कहा जाता है, के तहत जलडमरूमध्य में सभी देशों को “निरंतर और निर्बाध आवागमन” (Right of Transit Passage) का अधिकार प्राप्त है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैश्विक व्यापार और समुद्री आवाजाही बिना किसी अनावश्यक बाधा के जारी रह सके, भले ही जलडमरूमध्य किसी देश की सीमा के भीतर ही क्यों न आता हो।
भारत के पास भी एक महत्वपूर्ण जलडमरूमध्य है, जिसका नाम है पाल्क जलडमरू मध्य (Palk Strait)। यह भारत और श्रीलंका के बीच स्थित है और बंगाल की खाड़ी को मन्नार की खाड़ी से जोड़ता है। यह जलडमरू मध्य भौगोलिक रूप से काफी उथला और संकरा है, जहां कई जगहों पर पानी की गहराई बहुत कम हो जाती है। इसी कारण बड़े समुद्री जहाज यहां से आसानी से नहीं गुजर पाते और उन्हें लंबा समुद्री मार्ग अपनाना पड़ता है। इस क्षेत्र में स्थित रामसेतु (एडम्स ब्रिज) जैसी प्राकृतिक संरचनाएं भी जलमार्ग को और जटिल बनाती हैं।
आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से इसका महत्व कम नहीं है। लंबे समय से सेतुसमुद्रम शिपिंग नहर परियोजना पर चर्चा होती रही है, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र को गहरा करके जहाजों के लिए सीधा मार्ग बनाना था, ताकि भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटों के बीच समुद्री दूरी कम हो सके। हालांकि पर्यावरणीय और धार्मिक कारणों से यह परियोजना विवादों में रही है।
इसके अलावा, यह क्षेत्र समुद्री जैव विविधता के लिए भी बेहद समृद्ध माना जाता है। मन्नार की खाड़ी में प्रवाल भित्तियां (coral reefs), समुद्री घास (seagrass) और दुर्लभ जलीय जीव पाए जाते हैं, जो इसे पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं। इस प्रकार पाल्क जलडमरूमध्य भले ही वैश्विक व्यापार के बड़े मार्गों जैसा व्यस्त न हो, लेकिन भारत के लिए इसका भू-राजनीतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत व्यापक और बहुआयामी है।
हॉर्मुज़ स्ट्रेट को पार करने के दौरान हाल ही में ईरान द्वारा उड़ाया गया एक तेल टैंकर पोत।
मलक्का जलडमरू मध्य दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है। यह हिंद महासागर को प्रशांत महासागर से जोड़ता है और एशिया, यूरोप तथा मध्य पूर्व के बीच व्यापार का सबसे छोटा समुद्री रास्ता प्रदान करता है। हर साल हजारों जहाज, जिनमें तेल टैंकर, कंटेनर शिप और व्यापारिक पोत शामिल होते हैं, इसी मार्ग से गुजरते हैं, जिससे इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान बन जाता है।
16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच इस जलडमरूमध्य पर नियंत्रण को लेकर यूरोपीय शक्तियों ब्रिटेन, फ्रांस और नीदरलैंड्स (डच) के बीच लगातार संघर्ष हुए। उस समय समुद्री व्यापार ही वैश्विक शक्ति का आधार था और जो देश इस मार्ग को नियंत्रित करता, वही एशिया-यूरोप व्यापार पर अपना दबदबा कायम कर सकता था। इसी कारण इस क्षेत्र में किले, व्यापारिक चौकियां और नौसैनिक अड्डे स्थापित किए गए, जिससे यह इलाका औपनिवेशिक प्रतिस्पर्धा का प्रमुख केंद्र बन गया।
इन संघर्षों के पीछे सबसे बड़ा कारण था “मसाला व्यापार” (Spice Trade)। इंडोनेशिया, मलय द्वीपसमूह और आसपास के क्षेत्रों से काली मिर्च, लौंग, जायफल और दालचीनी जैसे बहुमूल्य मसाले यूरोप भेजे जाते थे। उस समय ये मसाले सोने के बराबर मूल्य रखते थे। मलक्का जलडमरू मध्य इस व्यापार का सबसे सुरक्षित और छोटा मार्ग था, इसलिए जो शक्ति इसे नियंत्रित करती, वह वैश्विक व्यापार और मुनाफे पर एकाधिकार स्थापित कर लेती।
जलडमरू मध्य भले ही भौगोलिक रूप से छोटे हों, लेकिन उनका प्रभाव वैश्विक स्तर पर बहुत बड़ा होता है। हॉर्मुज़ जलडमरू मध्य जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि एक संकरा समुद्री मार्ग भी पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। आज के दौर में, जब ऊर्जा, व्यापार और भू-राजनीति आपस में गहराई से जुड़े हैं। इस तरह जलडमरू मध्य केवल भौगोलिक संरचना नहीं बल्कि “वैश्विक शक्ति संतुलन” का केंद्र बन चुके हैं। भविष्य में बदलती जलवायु, बढ़ती ऊर्जा मांग और समुद्री सुरक्षा चुनौतियों के बीच इन जलमार्गों का महत्व और भी बढ़ने वाला है। इसलिए, इनका संतुलित उपयोग, सुरक्षा और पर्यावरणीय संरक्षण सुनिश्चित करना पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी बनती जा रही है।
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