ब्रह्मपुत्र और उपनदियों की धाराओं में आई रुकावटें बनी बाढ़ का बड़ा कारण
फोटो -भारतीय सेना व दूरदर्शन के सौजन्य से
असम में जून के अंत से अगस्त 2026 की शुरुआत तक आई बाढ़ ने लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित की। इस विनाशकारी बाढ़ के साथ भूस्खलन की वजह से पूर्वोत्तर भारत में 5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए और 9 अगस्त तक असम में कम से कम 99ऽ मौतें दर्ज की गईं। 35 में से 16 जिलों के 794 गाँव बाढ़ की चपेट में आए। एक बार फिर वैज्ञानिकों ने इसके पीछे असाधारण बारिश को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन ब्रह्मपुत्र की प्राकृतिक संरचना, पहाड़ी क्षेत्रों से आया तेज बहाव, और कमजोर ड्रेनेज व तटबंधों समेत कई कारणों ने मिलकर बाढ़ के भीषण रूप दिया।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी बॉम्बे), इंपीरियल कॉलेज लंदन और रेड क्रॉस क्रीसेंट क्लाइमेट सेंटर ने मिल कर असम में बाढ़ का अध्ययन किया, जिसमें कई बड़े और गंभीर कारण सामने आये। उनमें से 10 बड़े कारणों से पहले जानते हैं कि यह बाढ़ कितनी भयावह थी।
जून के अंत से अगस्त की शुरुआत तक असम के उत्तरी भाग और उससे लगे अरुणाचल प्रदेश तथा नागालैंड के पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी से अत्यधिक भारी बारिश हुई। करीब 28 जून के आसपास हुई पहली तेज बारिश ने बाढ़ और भूस्खलन की पहली बड़ी लहर पैदा की। इसके बाद 18 से 21 जुलाई के बीच बारिश के दूसरे बड़े दौर ने 16 जिलों के 794 गांवों को प्रभावित किया और पानी जुलाई के अंत तथा अगस्त की शुरुआत तक बना रहा।
असम बाढ़ 2026
इस दौरान मध्य-वायुमंडलीय चक्रवात पैदार हुआ जो हिमालय की तलहटी की ओर खिसकी मानसूनी द्रोणिका ने बंगाल की खाड़ी से नमी वाली हवाओं को पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों की ओर पहुंचाया। पहाड़ों से टकराकर इन हवाओं के ऊपर उठने से स्थानीय स्तर पर बहुत तेज बारिश हुई। ये बारिश उन जगहों पर हुई जहां पहले से हुई बारिश के कारण नदियों के जलग्रहण क्षेत्र पानी से भरे हुए थे। इसलिए जुलाई की बारिश का बड़ा हिस्सा तेजी से सतही बहाव में बदलकर ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों में पहुंचा और ऊपरी असम के निचले इलाकों में पानी नदी से बाहर निकल कर फैल गया।
हिमालय की तलहटी में स्थित असम दुनिया के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में से एक है। यहां ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों में बार-बार जलस्तर बढ़ता है जिसके कारण लगभग हर साल बाढ़ आती है। आम तौर पर यहां बाढ़ की प्रमुख वजह ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र है, जिसका उद्गम तिब्बती पठार से होता है। यह नदी पूर्वी हिमालय से होकर असम की घाटी में उतरते समय अपने साथ बड़ी मात्रा में गाद लेकर आती है। यह गाद धीरे-धीरे नदी की तलहटी को ऊंचा करती है, नदी की जलधारण क्षमता को कम करती है और रेत की पट्टियों का स्थान बदलती रहती है। इसके परिणामस्वरूप मानसून के दौरान जब नदी उफान पर आती है तब पानी बाहर फैलने लगता है।
राज्य में 35 जिले हैं, जिन्हें आगे 160 उप-जिलों में बांटा गया है। सबसे अधिक आबादी वाले जिले नगांव और कछार हैं। वहीं, उप-जिलों में सिलचर, दिसपुर और लंका सबसे अधिक आबादी वाले हैं। 2026 की बाढ़ के दौरान असम के चराइदेव, दरंग, गोलाघाट, जोरहाट, कार्बी आंगलोंग, नगांव और शिवसागर जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। इन जिलों में राज्य की कुल आबादी का 21.1% हिस्सा रहता है।
आईआईटी बाम्बे, इंपीरियल कॉलेज और रेडक्रॉस क्रीसेंट के वैज्ञानिकों ने 2026 की बारिश को दो स्तरों पर देखा। पहला स्तर तीन दिन में हुई अधिकतम बारिश और दूसरा 30 दिनों में जमा हुई बारिश। 26 से 29 जून के बीच की तीन दिन तक लगातार बारिश और 20 जून से 19 जुलाई के बीच की 30 दिन तक राज्य के अलग-अलग हिस्सों बारिश को अध्ययन में शामिल किया गया, क्योंकि लंबे समय तक हुई बारिश ने जलग्रहण क्षेत्रों को भर दिया था।
पांच अलग-अलग जगहों से प्राप्त डेटासेट के विश्लेषण अनुसार, 2026 की तीन-दिवसीय बारिश की वापसी अवधि लगभग 1 से 2 वर्ष और 30-दिवसीय बारिश की वापसी अवधि भी 2 वर्ष से कम आंकी गई। यानी आज की जलवायु में ये बारिश ऐसी दुर्लभ घटना नहीं थी जो दशकों में केवल एक बार आती हो। हालांकि अलग-अलग डेटासेट में आंकड़ों में काफी अंतर था। यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने बारिश के रुझान को लेकर मजबूत निष्कर्ष निकालने से सावधानी बरती है।
बाढ़ के दौरान बचावकार्य
बाढ़ का सबसे सीधा प्रभाव कृषि और पशुधन पर पड़ा। अध्ययन के अनुसार बाढ़ में करीब 21,500 हेक्टेयर से अधिक खड़ी फसल पूरी तरह जलमग्न हो गई, जिसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी हैं। वहीं आकलन के अनुसार 45,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को नदी के पानी ने ढक लिया, जिसकी वजह से नदी की रेत खेतों में भर गई है। इस रेत को निकालने के बाद ही अगली फसल बोई जा सकती है और इसमें कितना समय लगेगा, इसका अंदाजा फिलहाल लगाना मुश्किल है। पशुधन की बात करें तो रिपोर्ट के अनुसार 8 लाख से अधिक फार्म और अन्य पशु प्रभावित हुए तथा 26,512 पशु, जिनमें पालतू जानवर भी शामिल थे, बह गए।
इस बाढ़ ने चाय उद्योग को भी नहीं छोड़ा। जोरहाट, शिवसागर, चराइदेव और गोलाघाट के करीब 30 चाय बागान बाढ़ में डूबे। शिवसागर के नाजिरा क्षेत्र में ही 57,000 से अधिक लोगों के विस्थापित होने की खबर है।
बाढ़ का खतरा सभी लोगों के लिए समान नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार छोटे किसान, पशुपालक, चाय बागानों में काम करने वाले लोग, दिहाड़ी मजदूर और दूसरे असंगठित मजदूर बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। नदी किनारे और चार क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों की निर्भरता खेती, मछली पकड़ने और पशुपालन पर अधिक है, इसलिए बाढ़ आने पर उनके घर के साथ उनकी आय का स्रोत भी प्रभावित होता है।
दरांग, गोलाघाट, नगांव और शिवसागर के कई उप-जिलों में खराब और जर्जर अवस्था वाले हज़ारों घर बाढ़ में ढह गए। इन क्षेत्रों की आबादी सात प्रभावित जिलों की कुल आबादी का लगभग 28% थी। यानी वो लोग जिनके पास आपदा के बाद जल्दी संभलने के लिए संसाधन के नाम पर अब कुछ नहीं बचा है। यही वो लोग हैं जो बार-बार बाढ़ की चपेट में आते हैं।
प्रस्तुत हैं 10 कारण जिनका उल्लेख इस ताज़ा अध्ययन में किया गया है। बता दें कि इस अध्ययन में क्षेत्रों की भौगोलिक संरचना, वर्षा के पैटर्न और मौसम के कई अन्य पैमानों को रेखांकित करके निष्कर्ष निकालने के प्रयास किए गए हैं।
ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को समझने के लिए सिर्फ बारिश देखना पर्याप्त नहीं है। कई सारी नदियां, जिनमें ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायग नदियां शामिल हैं, तिब्बती पठार से पूर्वी हिमालय से होते हुए असम की घाटी में उतरती है और अपने साथ भारी मात्रा में तलछट यानी सेडिमेंट लेकर आती है। भारी मात्रा में जमा गाद धीरे-धीरे नदी की तलहटी को ऊपर उठाती है और नदी की जलधारण क्षमता कम होने लगती है। साथ ही रेत की पट्टियां और नदी का मार्ग लगातार बदल ने लगते हैं। ऐसी परिस्थितियों में पानी ओवरफ्लो होने लगता है। ठीक वैसे ही अगर किसी कटोरे में पानी रखा हो और आप उसमें रेत डाल देंगे, तो कटोरे का पानी छलक कर बाहर आ जाएगा। यहां फर्क बस इतना है कि यह पानी नदी से बाहर निकल कर गाँवों, शहरों, कसबों व आसपास के जंगलों तक पहुंच जाता है।
2026 में स्थिति इसलिए गंभीर हुई क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों से भारी मात्रा में पानी आया तब अपने साथ अचानक भारी मात्रा में गाद लेकर आया। ब्रह्मपुत्र व सहायक नदियों के तल में गाद अचानक भर गई। कई जगह पानी की निकासी का स्थान संकरा था तो बहाव तेज़ हो गया और कई जगह तटबंधों के कमजोर होने के कारण पानी ऊपरी असम के निचले इलाकों में तेजी से फैल गया। पहले तो नदी का उफान और उफपर से भारी बारिश दोनों ने मिल कर सैंकड़ों उपजिलों को अपनी चपेट में ले लिया।
अध्ययन में पाया गया है कि असम की बाढ़ को केवल राज्य की सीमा के भीतर हुई बारिश कारण नहीं बनाया जा सकता है। ऊपरी असम के आसपास अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड के पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्र हैं। यहां हुई भारी बारिश का पानी तेज गति से ढलानों से नीचे उतरकर उन छोटी-बड़ी सहायक नदियों में पहुंचता है जो आगे ब्रह्मपुत्र में मिलती हैं।
2026 की बारिश के दौरान पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्रों में पहले से ही जल की अधिकता थी। जुलाई के मध्य की बारिश ने नीचे आपने वाले पानी के बहाव को तेज कर दिया। अध्ययन के अनुसार ऊपरी असम की भौगोलिक स्थिति भी महत्वपूर्ण है। ब्रह्मपुत्र घाटी एक तरह के घोड़े की नाल जैसी स्थलाकृति से घिरी है। मानसूनी हवाएं जब आसपास की ऊंची पहाड़ियों से टकराती हैं तो तेज संवहन और भारी बारिश पैदा हो सकती है। इसलिए असम के मैदानी इलाकों में बाढ़ का खतरा काफी हद तक ऊपर के पहाड़ी क्षेत्रों में होने वाली बारिश और उससे पैदा होने वाले रनऑफ पर निर्भर करता है।
बाढ़ के दौरान बचाव कार्य
यह इस अध्ययन में असम के हालिया वर्षों में रिकॉर्ड तापमान की तुलना बीते दशकों से की गई। यह लिंक बहुत महत्वपूर्ण बताया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार 2026 की भारी बारिश में मानव-जनित जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट और मजबूत प्रभाव नहीं मिला। उपलब्ध आंकड़ों को मिलाकर देखने पर बारिश में कोई स्पष्ट दीर्घकालिक ट्रेंड सामने नहीं आया। 1.4°C मानव-जनित ग्लोबल वॉर्मिंग की तुलना करते हुए भी वैज्ञानिकों ने पाया कि इस वर्ष की भारी बारिश की संभावना और तीव्रता में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन का असम की बारिश पर कोई असर कभी नहीं पड़ेगा। समस्या यह है कि इस क्षेत्र में मौसम स्टेशनों की संख्या कम है, जिसके कारण प्रभावित व दूरस्थ क्षेत्रों का डाटा एकत्र नहीं हो पाता है और वतर्मान में प्राप्त डेटासेट एक-दूसरे से काफी अलग परिणाम देते हैं। मॉडल भी पूर्वोत्तर भारत की बारिश को पूरी तरह सही ढंग से दर्शा नहीं पाते। इसलिए वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि फिलहाल 2026 की बाढ़ वाली बारिश को जलवायु परिवर्तन के कारण असाधारण कहना उचित नहीं है।
असम और पूर्वोत्तर भारत की बारिश की कहानी केवल यह नहीं है कि सालाना कितनी बारिश होती है। रिपोर्ट में पुराने अध्ययनों के आधार पर बताया गया है कि हाल के दशकों में औसत और कुल बारिश में कमी के संकेत मिले हैं, लेकिन इसके साथ बारिश के वितरण में बदलाव भी देखा गया है। हल्की और मध्यम बारिश की आवृत्ति में कमी और कुछ अध्ययनों में अत्यधिक बारिश की घटनाओं की तीव्रता में वृद्धि की बात सामने आई है। यानी कम दिनों में अधिक बारिश होने का खतरा महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन यहां भी वैज्ञानिक सावधानी जरूरी है। अध्ययन में 2026 की तीन दिन लगातार और 30 दिन की बारिश के लिए कोई मजबूत दीर्घकालिक ट्रेंड स्थापित नहीं किया गया। अलग-अलग डाटासेट में परिणामों में काफी असहमति है। कुछ आंकड़े बढ़ती प्रवृत्ति दिखाते हैं, कुछ घटती और कुछ में कोई स्पष्ट बदलाव नहीं है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पूर्वोत्तर की जटिल भौगोलिक संरचना और सीमित संसाधनों के कारण बारिश के दीर्घकालिक बदलावों को समझना अभी कठिन है।
बाढ़ का पानी पहाड़ों से नीचे आते समय केवल बारिश का पानी नहीं होता। जंगल और प्राकृतिक वनस्पति पानी के बहाव को रोकने, मिट्टी को थामने और पानी को धीरे-धीरे नीचे पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं। रिपोर्ट में 35 जगहों पर किए गए अध्ययनों की समीक्षा का हवाला देते हुए बताया गया है कि वनों को काटने, हरी पिट्टियों को खत्म करने और भूमि पर बेतरतीब निमार्ण काय ने असम में बाढ़ के जोखिम को बढ़ाया है।
कैचमेंट स्तर के अध्ययनों में हिरयाली को खत्म करने, वनों की कटाई और अनियमित सैंड रेत खनन को ध्यान में रखते हुए बाढ़ की गंभीरता गा अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि पूर्वोत्तर में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई ने प्राकृतिक अवरोधों को कम किया गया, जिससे भारी बारिश के बाद नागालैंड की पहाड़ियों से आने वाला पानी तेजी से नीचे आया। इसके साथ आर्द्रभूमियों का सिकुड़ना और नदी किनारों का कटाव का बढ़ना वो दो और वजहें हैं जिससे नीचे के क्षेत्रों में बाढ़ और अधिक खतरनाक हुई।
2026 की बाढ़ केवल नदी में पानी बढ़ने की घटना नहीं थी। भारी और लगातार बारिश की वजह से पहाड़ी जलग्रहण पहले ही भर चुके थे, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ गया। रिपोर्ट के अनुसार करीब 28 जून को पहला बड़ा भूस्खलन हुआ और अचानक बाढ़ आयी। इसके बाद जुलाई के आसपास भी भूस्खलन और बाढ़ के अन्य दौर आए। इसी वजह से वैज्ञानिकों ने तीन दिन की बारिश के साथ 30 दिन की बारिश को भी अध्ययन में शामिल किया। भूस्खलन का असर दो स्तरों पर पड़ता है। पहला, इससे पहाड़ी क्षेत्रों में जान-माल और परिवहन ढांचे को नुकसान होता है। दूसरा, भारी बारिश के बाद तेजी से नीचे उतरने वाला पानी और मलबा निचले जलग्रहण क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। असम की बाढ़ में दूसरा प्रभाव ज्यादा देखने को मिला।
असम में बाढ़ का खतरा केवल ग्रामीण क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा। चराइदेव और शिवसागर जैसे क्षेत्रों में उन क्षेत्रों में पानी जमा हुआ जहां लोगों के घर बने हुए हैं, जबकि गुवाहाटी में नाले के ब्लॉक होने से आसपास के क्षेत्रों से अचानक जलभराव हुआ। रिपोर्ट के अनुसार बाढ़ बाढ़ का पानी कई कस्बों और जलग्रहण क्षेत्रों पर बने घरों तक पहुंचा। यही नहीं पुराने वेटलैंड के आस-पास अतिक्रमण भी बाढ़ की चपेट में आये। यही नहीं जो स्थान प्राकृतिक ड्रेनेज का काम करते हैं, उन पर लोगों के घर बना दिए गए, जिस कारण उन जगहों पर बाढ़ से बहुत अधिक नुकसान हुआ।
हम जानते हैं कि शहरी विस्तार का असर जमीन की पानी सोखने की क्षमता को कम करता है। रिपोर्ट में गुवाहाटी के उदाहरण के तौर पर देखा गया है कि 1995 से 2025 के बीच शहरी क्षेत्र में 258.27% की वृद्धि हुई, जबकि हरियाली और कृषि भूमि में क्रमशः 25.82% और 37.35% की कमी हुई। अनियमित शहरीकरण, अवैज्ञानिक तरीके से बनाए गए ड्रेनेज और ठोस-कूड़े को खुले मैदानों में एकत्र करने जैसे मानवजनित कारकों की वजह से बाढ़ अधिक विनाशकारी हुई।
वेटलैंड बाढ़ के समय अतिरिक्त पानी को अपने भीतर समेटने वाले प्राकृतिक क्षेत्र की तरह काम कर सकते हैं। लेकिन जब इनमें मिट्टी भरकर इमारतों का निर्माण किया जाता है या इनके ड्रेनेज चैनल बाधित होते हैं, तो इनमें पानी के रुकने और धीरे-धीरे निकलने के विकल्प कम हो जाते हैं। रिपोर्ट में भूमि के इस्तेमाल के कारण आर्द्रभूमियों के खत्म होने, नदी किनारे के कटाव और प्राकृतिक ड्रेनेज के बाधित होने को बढ़ते बाढ़ की भयावहता से जोड़ा गया है। यही कारण है कि वैज्ञानिक केवल नए बाढ़ नियंत्रण सिस्टम बनाने के बजाय फ्लडप्लेन और वेटलैंड को बनाये रखने की बात करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार भविष्य पानी को हर जगह रोकने के बजाय उन प्राकृतिक रास्तों से सुरक्षित निकलने में मदद करनी चाहिए, जो कि असम में नहीं हो रहा है।
असम ने बाढ़ से बचाव के लिए बड़े पैमाने पर तटबंध, बंधे और कस्बों व शहरों की सुरक्षा के लिए बंधे (नदी के दोनों ओर दीवार जैसा ढांचा) और ऐसे तटबंध जिन पर से सड़क यातायात निकलता है, बनाए गए हैं। ये ढांचे कई जगहों पर बेहद कारगर हैं, लेकिन रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने साफ चेतावनी दी है कि केवल कॉन्क्रीट के ढांचों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। तटबंध प्राकृतिक धाराओं को बाधित कर सकते हैं, उनके पीछे गाद जमा हो सकती है और नदी तल ऊंचा हो सकता है। इससे तटबंध टूटने पर अचानक और गंभीर बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
वैज्ञानिकों का सुझाव है कि नदी को पूरी तरह नियंत्रित करने के बजाय उसके साथ काम करने की जरूरत है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी तटबंध हटा दिए जाएं। बल्कि जहां जरूरी है वहां उसे फ्लडप्लेन रेस्टोरेशन किया जाए, आर्द्रभूमियों करे पुनर्जीवित किया जाए, पनी की बेहतर निकासी में स्थानीय समुदायों को जोड़ा जाए। यानी भविष्य की रणनीति केवल “नदी को रोकने” की नहीं, बल्कि “बाढ़ के पानी के लिए सुरक्षित जगह बनाने” की होनी चाहिए।
यह कहना सही नहीं होगा कि 2026 की बाढ़ में पहले से कोई चेतावनी नहीं दी गई थी। ऊपरी असम में Flood Early Warning System यानी FLEWS मौजूद है। केंद्रीय मौसम विभाग ने 18 जुलाई को भारी बारिश की चेतावनी जारी की थी और क्षेत्रीय मौसम केंद्र के अनुसार 19 जुलाई की भारी बारिश से 72, 48 और 24 घंटे पहले चेतावनी जारी की गई थीं। 20 जुलाई को FLEWS ने कई जिलों के लिए बाढ़ की चेतावनी (low-to-moderate flood alerts) भी जारी की गई थी। इसके बावजूद उस स्तर का ऐक्शन नहीं हुआ, जिस स्तर का होना चाहिए था।
इससे साफ है कि असल चुनौती चेतावनी देने वाले सिस्टम में नहीं है बल्कि चेतावनी को अंतिम छोर तक पहुंचने और उस पर समय रहते कार्रवाई करने की थी। कुछ अधिकारियों ने पर्याप्त समय न मिलने की बात कही, जबकि केंद्रीय मौसम विभाग ने इससे असहमति जताई। रिपोर्ट बताती है कि शिवसागर में तेजी से बढ़ते पानी ने ग्रामीण समुदायों को कुछ ही घंटों में संकट में डाल दिया। कुछ जगहों पर लोगों ने शुरुआत में गाँव खाली करने से इनकार कर दिया था।
शोधपत्र का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि असम की बाढ़ को केवल नदी पर और अधिक कॉन्क्रीट ढांचे बनाकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता। ब्रह्मपुत्र जैसी गतिशील नदी अपने साथ गाद लाती है, अपना बहाव बदलती है और हर साल फ्लडप्लेन को प्रभावित करती है। इसलिए लक्ष्य नदी की गतिविधियों को रोकना नहीं, बल्कि लोगों और बुनियादी ढांचे को उसके साथ सुरक्षित रूप से रहने लायक बनाना चाहिए।
तो कुल मिलाकर 2026 की यह बाढ़ एक महत्वपूर्ण बात समझाती है—बाढ़ की तबाही का आकार केवल बारिश तय नहीं करती। बारिश, पहाड़ से पीचे आने वाले पानी, ब्रह्मपुत्र की गाद की गतिशीलता, भूमि उपयोग में बदलाव, जंगलों और वेटलेंड का नुकसान, शहरीकरण, धाराओं पर अतिक्रमण, आदि सभी चीजें जोखिम को बढ़ाती हैं। इस अध्ययन में जलवायु परिवर्तन को 2026 की बारिश की असाधारणता का स्पष्ट कारण नहीं पाया गया, लेकिन वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि बारिश के रुझानों को लेकर अनिश्चितता के बावजूद बाढ़ का जोखिम वास्तविक है। इसलिए असम के लिए सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि अगली बार बारिश कितनी होगी, बल्कि यह है कि क्या राज्य अगली बाढ़ आने से पहले अपने लोगों और नदी-परिदृश्य को उसके लिए तैयार कर पाएगा।
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