यूपी के महराजगंज जिले में नहर में फंसी गर्भवती गंगा डॉल्फिन को जांच के लिए पकड़ा गया। बाद में उसे एक 52 किमी लंबा सुरक्षित ग्रीन कॉरिडोर बना कर राप्ती नदी तक पहुंचने का इंतज़ाम किया गया।
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गोरखपुर चिड़ियाघर और लखनऊ से आए विशेषज्ञों की टीम ने मिलकर तीन दिन तक चलाया बचाव अभियान
रास्ता भटक कर या तूफानी लहरों में फंस कर व्हेलों या शार्क के समुद्र किनारे पहुंचने या तट पर फंसने की खबरें अकसर ही समुद्र तटवर्ती राज्यों में देखने-सुनने को मिलते हैं। इनके लिए चलाए जाने वाले बचाव अभियान भी चर्चा का विषय बनते हैं। कुछ इसी तरह की एक घटना हाल ही में उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में देखने को मिली है। नेपाल की सीमा से सटे महराजगंज एक गर्भवती गंगा डॉल्फिन बाढ़ के कारण त्रिवेणी नदी में अपने प्राकृतिक आवास से भटक कर देवरिया कैनाल में पहुंच गई।
घटना की जानकारी मिलने के बाद हरकत में आए सरकारी अमले ने तेजी से प्रयास शुरू कर दिए। जिसके चलते गर्भवती गंगा डॉल्फिन को आखिरकार तीन दिन तक चले बचाव अभियान के बाद नहर से निकाल कर सुरक्षित ढंग से राप्ती नदी में छोड़ दिया गया। वन विभाग, सिंचाई विभाग और विशेषज्ञों की संयुक्त टीम को इसके लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। डॉल्फिन को नहर से निकाल कर राप्ती नदी तक पहुंचाने के लिए भटहट से राजघाट तक का 52 किमी लंबा ग्रीन कॉरिडोर भी बनाया गया था।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक त्रिवेणी नदी बाढ़ और तेज बहाव के कारण गर्भवती डॉल्फिन भटक कर देवरिया कैनाल के रास्ते महाराजगंज में धरमौली बाजार के पास नहर तक पहुंच गई थी। शनिवार को वह यहां मछुआरों के जाल में फंस गई थी। हालांकि, गंगा डॉल्फिन को पकड़ने पर रोक के कारण मछुआरों ने उसे वापस नहर में छोड़ दिया गया। पर, बाढ़ के कारण पानी का बहाव काफी तेज होने और गर्भवती होने के कारण तेजी से तैरने में असक्षम डॉल्फिन बार-बार प्रयास करने पर भी धारा के विपरीत तैर कर वापस त्रिवेणी नदी में नहीं जा पा रही थी। इसलिए उसे बचाव दल ने उसे पकड़ कर सबसे पहले उसके स्वास्थ्य की जांच करने का फैसला लिया। जांच में डॉल्फिन का वजन 147 किलो, लंबाई सात फीट दो इंच निकला। साथ ही उसके गर्भवती होने का भी पता चला। संभवत: इसी कारण वापस लौटने की अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद वह तीन दिन तक नहर में फंसी रही।
डॉल्फिन के इस संघर्ष को देख लोगों ने इसकी सूचना वन विभाग, सिंचाई विभाग और अन्य संबंधित सरकारी महकमों को दी। कुछ लोगों ने इसका वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर भी डाल दिया। वीडियो वायरल होने के बाद सरकारी अमला सक्रिय हुआ। गोरखपुर पुलिस, सिंचाई विभाग, गोरखपुर चिड़ियाघर और लखनऊ से आए विशेषज्ञों की टीम ने सबसे पहले डॉल्फिन को नहर से निकाल कर उसके स्वास्थ्य की जांच की। उसका विशेष एंबुलेंस में प्राथमिक उपचार भी किया गया।
इसके बाद विशेषज्ञों ने उसे तत्काल सुरक्षित रूप से उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ने की सलाह दी। इसके बाद उसे राप्ती नदी में पहुंचाने के लिए करीब 52 किमी लंबा ग्रीन कॉरिडोर तैयार कराया गया। रविवार को पूरे दिन संयुक्त टीम ने चौपरिया, अहिरौली, धरमौली, सिसवा शुक्ल, सुम्हाखोर, मेहाबार, देवीपुर और धनगड़ा के सिवान तक नहर में तलाशी अभियान चलाया गया। पर, नहर में पानी का तेज बहाव और डॉल्फिन के लगातार स्थान बदलने के कारण अभियान काफी कठिन रहा। नहर का जलस्तर भी ज्यादा था। इसी कारण रविवार को टीम विफल हो गई।
इसके बाद एक नई रणनीति तैयार कर सिंचाई विभाग से नहर के जलस्तर को कम करने के लिए कहा गया। नहर का पानी घटने पर सोमवार को दोबारा अभियान शुरू किया गया और कुशीनगर वन प्रभाग के हाटा रेंज अंतर्गत सिसवां शुक्ल ग्राम सभा के पास डॉल्फिन का रेस्क्यू कर उसे सुरक्षित राप्ती में छोड़ दिया गया। डीएफओ गोरखपुर शुभम सिंह के मुताबिक डॉल्फिन पूरी तरह सुरक्षित है।
रिपोर्ट के मुताबिक डॉल्फिन को बचाने के लिए बनाई गई संयुक्त टीम में वन विभाग, सिंचाई विभाग, गोरखपुर, महराजगंज और कुशीनगर के स्थानीय प्रशासन के अधिकारी और विशेषज्ञों को शमिल किया गया। इनमें प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) अनुराधा बेमुरी और मुख्य वन संरक्षक गोरखपुर डॉ. बीसी ब्रह्मा, हाटा वन विभाग की अधिकारी अमृता सिंह, गोरखपुर चिड़ियाघर के उपनिदेशक डॉ. योगेश प्रताप सिंह, टीएसए फाउंडेशन इंडिया के डॉ. शैलेंद्र सिंह भी शामिल रहे।
डॉल्फिन जैसे बड़े और अत्यंत संवेदनशील जलीय स्तनधारी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना सामान्य काम नहीं होता। पानी से निकाल कर दूसरी जगह पहुंचाने में कई तरह के जोखिम जुड़े होते हैं, जिनके चलते इनकी जान भी जा सकती है। इसी लिए फंसी हुई डॉल्फिन को सुरक्षित रखने के लिए उसे खुद से तैर कर निकलने के इंतज़ाम किए जाते हैं। इसमें लगातार पानी का तापमान, ऑक्सीजन, नमी और डॉल्फिन की शारीरिक स्थिति पर नजर रखनी पड़ती है। रास्ते में यातायात को नियंत्रित करना, नौकाओं व जलीय वाहनों की गति सीमित रखना और कम से कम समय में सुरक्षित नदी तक पहुंचाना जरूरी होता है। ऐसे अभियान में वन विभाग, पशु चिकित्सकों, मत्स्य विभाग, स्थानीय प्रशासन और पुलिस का समन्वय बेहद महत्वपूर्ण होता है। 52 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर इसी उद्देश्य से बनाया गया, ताकि डॉल्फिन को बिना किसी अतिरिक्त तनाव के राप्ती नदी तक पहुंचाया जा सके।
गर्भवती डॉल्फिन को सुरक्षित बचाया जाना संरक्षण की दृष्टि से और अधिक महत्वपूर्ण कदम है। क्योंकि गंगा डॉल्फिन की प्रजनन दर काफी कम होती है। एक वयस्क मादा डॉल्फिन सामान्यतः एक बार में केवल एक शिशु को जन्म देती है और शावक कई महीनों तक अपनी मां पर निर्भर रहता है। ऐसे में एक गर्भवती डॉल्फिन की मौत केवल एक जीव का नुकसान नहीं होती, बल्कि अगली पीढ़ी के भी खत्म होने का खतरा भी बढ़ जाता है। इसलिए वन्यजीव विशेषज्ञ गर्भवती मादा डॉल्फिन के सफल बचाव को संरक्षण की बड़ी उपलब्धि मानते हैं।
| तथ्य | जानकारी |
| वैज्ञानिक नाम | Platanista gangetica |
| राष्ट्रीय जलीय जीव | वर्ष 2009 से |
| संरक्षण स्थिति | IUCN: Endangered (संकटग्रस्त) |
| भारतीय कानून | वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I के तहत सर्वोच्च संरक्षण |
| प्रमुख खतरे | मछली पकड़ने के जाल, बैराज, प्रदूषण, रेत खनन, घटता नदी प्रवाह |
| पहचान | लगभग दृष्टिहीन, इकोलोकेशन से शिकार करती है |
| भोजन | छोटी मछलियां, झींगे और अन्य जलीय जीव |
गगंगा और उसकी सहायक नदियों में पाई जाने वाली 'गंगा डॉल्फिन' को 2009 में भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है।
गंगा डॉल्फिन भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव है। वर्ष 2009 में इसे यह दर्जा दिया गया था। यह दुनिया की कुछ चुनिंदा मीठे पानी की डॉल्फिन प्रजातियों में शामिल है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी आंखें अत्यंत अविकसित होती हैं और यह लगभग देख नहीं सकती।
शिकार खोजने और रास्ता पहचानने के लिए यह चमगादड़ों की तरह इकोलोकेशन (ध्वनि तरंगों) का उपयोग करती है। पानी में ध्वनि तरंगें छोड़कर उनसे लौटने वाली प्रतिध्वनि के आधार पर यह मछलियों, चट्टानों और अन्य बाधाओं का पता लगाती है। यही कारण है कि गंदले पानी में भी यह आसानी से जीवनयापन कर लेती है।
गंगा डॉल्फिन का प्राकृतिक आवास गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और कर्णफुली-सांगू नदी तंत्र है। भारत में यह मुख्य रूप से गंगा, घाघरा, गंडक, कोसी, सोन, चंबल, ब्रह्मपुत्र और उनकी प्रमुख सहायक नदियों में पाई जाती है।
उत्तर प्रदेश में गंगा के अलावा घाघरा, गंडक, राप्ती और कुछ अन्य नदियों में भी इसकी मौजूदगी दर्ज की गई है। यह ऐसी नदियों को पसंद करती है जहां पानी अपेक्षाकृत गहरा हो और प्रवाह लगातार बना रहे। नदी में पर्याप्त मात्रा में छोटी मछलियां उपलब्ध हों, क्योंकि वह इसका भोजन हैं। मछलियों की प्रचुरता के कारण नदियों के संगम के आसपास के इलाके, मोड़ और गहरे जलकुंड इसके पसंदीदा आवास माने जाते हैं।
गंगा डॉल्फिन आज कई तरह के खतरों का सामना कर रही है। बांध और बैराज बनने से नदियों का प्राकृतिक प्रवाह टूट जाता है। इससे डॉल्फिन की आवाजाही और प्राकृतिक माहौल् प्रभावित होता है। इस कारण कई बार बाढ़ के दौरान वह नहरों, तालाबों या उथले जल क्षेत्रों में पहुंच जाती हैं और वापस नदी तक नहीं लौट पातीं।
मछुआरों के जाल में फंसना भी उनकी मृत्यु का एक बड़ा कारण है। महाराजगंज की घटना इसी का एक उदाहरण है। इसके अलावा जल प्रदूषण, रेत खनन, नावों की बढ़ती आवाजाही और नदी में घटता जलस्तर भी इनके आवास को नुकसान पहुंचा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण नदी प्रवाह के बदलते स्वरूप को भी एक उभरते हुए खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
उत्तर प्रदेश में गंगा डॉल्फिन संरक्षण के लिए समय-समय पर गणना, जागरूकता अभियान और बचाव अभियान चलाए जाते हैं। अक्टूबर 2024 में यूपी के बलरामपुर जिले के तुलसीपुर क्षेत्र में राप्ती नदी से जुड़ी एक नहर में भटककर पहुंची गंगा डॉल्फिन को वन विभाग और स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से सुरक्षित राप्ती नदी में छोड़ा गया था। इसी तरह जुलाई 2025 में बहराइच जिले में घाघरा नदी के बाढ़ क्षेत्र में फंसी एक गंगा डॉल्फिन को कई घंटे चले रेस्क्यू अभियान के बाद सुरक्षित नदी की मुख्य धारा में पहुंचाया गया। इन अभियानों में स्थानीय मछुआरों और ग्रामीणों की सतर्कता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लोगों में अब गंगा डॉल्फिन के प्रति जागरूकता पहले की तुलना में काफी बढ़ी है। पहले जहां ऐसी स्थिति में लोग घबरा जाते थे या अनजाने में डॉल्फिन को नुकसान पहुंचा बैठते थे। वहीं, अब अधिकांश मामलों में स्थानीय लोग तुरंत वन विभाग को सूचना देते हैं।
महराजगंज में गर्भवती गंगा डॉल्फिन का सफल बचाव भी इसी बढ़ती जनभागीदारी और विभिन्न विभागों के बेहतर समन्वय का उदाहरण है। इसमें वन विभाग, स्थानीय समुदाय, मछुआरे और विशेषज्ञों के संयुक्त प्रयास से डॉल्फिन को सुरक्षित ढंग से उसके प्राकृतिक आवास में वापस पहुंचाया गया। स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी से ऐसे रेस्क्यू अभियानों का सफल होना दिखाता है कि सामुदायिक सहयोग संरक्षण की सबसे मजबूत कड़ी बन सकता है।
महराजगंज जिले में बहने वाली त्रिवेणी नदी नेपाल के तराई क्षेत्र से निकलती है। यह भारत-नेपाल सीमा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण नदी है। यह गंगा डॉल्फिन का एक पसंदीदा प्राकृतिक आवास भी है।
मानसून के दौरान नेपाल में होने वाली भारी वर्षा का पानी इसी नदी के जरिए उत्तर प्रदेश में पहुंचता है, जिससे कई बार बाढ़ की स्थिति बन जाती है। यह आगे चलकर राप्ती नदी तंत्र से जुड़ती है। बाढ़ के समय नदी का जलस्तर बढ़ने पर कई जलीय जीव मुख्य धारा से निकलकर नहरों, खेतों और अन्य जल निकायों में पहुंच जाते हैं। यही वजह है कि इस तरह की परिस्थितियों में वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को विशेष सतर्कता बरतनी पड़ती है।
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