नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने दुनिया का ध्यान एक बार फिर जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालय पर बढ़ते खतरे की ओर खींच दिया है।

 

फोटो : फेसबुक

आपदा

नेपाल से पेरू तक 10 GLOF आपदाएं, जिन्होंने दुनिया को हिला दिया

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने एक बार फिर दुनिया का ध्यान हिमालय के तेजी से बदलते खतरे की ओर खींच दिया है। आसपास के इलाकों में वैसी मूसलाधार बारिश नहीं हुई थी, जैसी आमतौर पर अचानक आई बाढ़ के पीछे मानी जाती है। इसके बावजूद देखते ही देखते पहाड़ों से पानी, बर्फ, चट्टान और मलबे का ऐसा सैलाब नीचे उतरा कि रास्ते में आने वाली सड़कें, पुल, मकान और बिजली परियोजनाएं तबाह हो गईं।

शुरुआती रिपोर्टों में इसे ग्लेशियर झील के अचानक फटने से जुड़ी बाढ़ यानी Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) माना गया, लेकिन बाद की सैटेलाइट और भूगर्भीय जांच में तस्वीर अधिक जटिल सामने आई। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार ल्हेंडे खोला क्षेत्र में ग्लेशियर और चट्टान का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। इससे नदी में अचानक भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान और मलबा पहुंचा और देखते ही देखते विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लिया। नदी का जलस्तर करीब 30 मिनट में कई मीटर बढ़ गया। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण समेत विशेषज्ञ संस्थाओं के विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि यह एक जटिल ग्लेशियर-रॉक एवेलांच और फ्लड की श्रृंखला थी।

28 अगस्त तक नेपाल में मृतकों की संख्या 469 तक पहुंचने की रिपोर्ट है और दोनों देशों में करीब 1,000 लोग लापता बताए जा रहे हैं। बचाव कार्यों के बीच भूस्खलन से बनी एक झील के उफनने ने नए खतरे को भी जन्म दे दिया है।

लेकिन नेपाल में 2026 की यह त्रासदी पहली नहीं है। दुनिया के अलग-अलग पर्वतीय क्षेत्रों में ग्लेशियर टूटने, ग्लेशियर झीलों के फटने और बर्फ-चट्टान के हिमस्खलन से ऐसी कई विनाशकारी बाढ़ आ चुकी हैं। इनमें कुछ घटनाओं में हजारों लोग मारे गए। इतिहास की ये घटनाएं बताती हैं कि पहाड़ों में जमा बर्फ और ग्लेशियर केवल पानी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर छिपी अस्थिरता अचानक बड़े पैमाने पर आपदा में बदल सकती है।

1. हुआराज़, पेरू : 1941 में झील फटने से हजारों मौतें

31 मई 1941 को पेरू के एंडीज पर्वत क्षेत्र में हुआराज़ के पास स्थित पाल्काकोचा झील से जुड़ी एक विनाशकारी ग्लेशियर झील बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। ग्लेशियर के मलबे और बर्फ के कारण बनी झील की प्राकृतिक बाधा टूट गई और पानी तथा मलबे का विशाल प्रवाह नीचे की ओर हुआराज़ की तरफ पहुंचा।

इस घटना में लगभग 5,000 लोगों के मारे जाने का अनुमान है। यह घटना इस बात का शुरुआती बड़ा उदाहरण थी कि ग्लेशियर के पीछे बनी झील अगर अचानक टूट जाए तो सामान्य बारिश के बिना भी कुछ ही समय में पूरा नदी तंत्र विनाशकारी बाढ़ में बदल सकता है। 1941 की इस त्रासदी के बाद पेरू में ग्लेशियर झीलों की निगरानी और खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा। 2026 की नेपाल त्रासदी की तरह ही यहां भी खतरा पहाड़ के ऊपरी हिस्से से अचानक नीचे आया था।

2. रणरहिरका, पेरू : 1962 में ग्लेशियर का हिस्सा टूटा

10 जनवरी 1962 को पेरू के हुआस्कारान पर्वत से विशाल बर्फ और चट्टानों का हिमस्खलन हुआ। करीब 13 मिलियन घन मीटर मलबा नीचे आया और रणरहिरका शहर को अपनी चपेट में ले लिया। इस घटना में करीब 4,000 लोगों की मौत हुई। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार यह सामान्य बाढ़ नहीं बल्कि ग्लेशियर से जुड़ा विशाल हिमस्खलन था, जिसने नीचे उतरते हुए बर्फ, चट्टान और मलबे को अपने साथ मिला लिया। यह मिश्रण नदी घाटी में बेहद तेजी से आगे बढ़ा और रास्ते में आने वाली बस्तियों को तबाह कर गया। इस घटना के बाद वैज्ञानिकों ने हुआस्कारान क्षेत्र की अस्थिर ग्लेशियर ढलानों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया।

3. युंगाय, पेरू : 1970 की त्रासदी में पूरा शहर दब गया

31 मई 1970 को पेरू में आए शक्तिशाली भूकंप ने हुआस्कारान पर्वत की ढलान को अस्थिर कर दिया। इसके बाद करीब 50 से 100 मिलियन घन मीटर चट्टान, बर्फ और मिट्टी का विशाल मलबा पर्वत से नीचे गिरा। यह मलबा करीब 14.5 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए युंगाय शहर तक पहुंचा। इसकी गति इतनी तेज थी कि वैज्ञानिकों ने औसत गति 280 से 335 किलोमीटर प्रति घंटा तक आंकी। युंगाय और आसपास के इलाकों में 18,000 से ज्यादा लोग मारे गए। मलबे का प्रवाह आगे सांता नदी की घाटी में भी पहुंचा और उसने खेतों, सड़कों तथा बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया। यह घटना आज भी दुनिया की सबसे घातक ग्लेशियर-सम्बंधित आपदाओं में गिनी जाती है।

4. झांगझांगबो, तिब्बत : 1981 में 200 से ज्यादा मौतें

जुलाई 1981 में तिब्बत के झांगझांगबो क्षेत्र में स्थित ग्लेशियर झील सिरेंमाको के फटने से अचानक बाढ़ आई। पानी और मलबे का यह सैलाब नेपाल तक पहुंचा और सुनकोशी घाटी में भारी तबाही हुई। इस घटना में नेपाल में 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। बाढ़ ने चीन-नेपाल मैत्री पुल को नष्ट कर दिया, सड़क के करीब छह किलोमीटर हिस्से को बहा दिया और सुनकोशी जलविद्युत परियोजना को भी गंभीर नुकसान पहुंचाया। यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका असर अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों ओर हुआ। वैज्ञानिक रिकॉर्ड बताते हैं कि सिरेंमाको झील में 1964, 1981 और 1983 में तीन बड़े GLOF हुए थे, जिनमें 1981 की घटना सबसे विनाशकारी थी।

5. डिगत्शो, नेपाल : 1985 में अचानक फूटी ग्लेशियर झील

4 अगस्त 1985 को नेपाल के एवरेस्ट क्षेत्र में डिग त्शो ग्लेशियर झील की प्राकृतिक मोरेन बांध जैसी संरचना टूट गई। देखते ही देखते पानी नीचे की ओर बहने लगा और अपने साथ चट्टान, मिट्टी तथा मलबा ले गया। इस GLOF ने कई पुलों, पगडंडियों, खेतों और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया तथा लगभग तैयार हो रहे नामचे जलविद्युत संयंत्र को नष्ट कर दिया। आर्थिक नुकसान करीब 1.5 मिलियन डॉलर आंका गया था। इस घटना ने नेपाल में ग्लेशियर झीलों के व्यवस्थित अध्ययन और जोखिम आकलन की जरूरत को गंभीरता से सामने रखा। बाद के वर्षों में नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में GLOF की निगरानी तथा शुरुआती चेतावनी प्रणालियों पर काम तेज हुआ।

ग्‍लेशियर बर्स्‍ट की 10 बड़ी घटनाएं एक नज़र में

वर्षस्थानआपदा का प्रकारप्रमुख असर
1941हुआराज़, पेरूग्लेशियर झील बाढ़ (GLOF)करीब 5,000 मौतें
1962रणरहिरका, पेरूग्लेशियर/बर्फ-चट्टान हिमस्खलनकरीब 4,000 मौतें
1970युंगाय, पेरूभूकंप से ग्लेशियर-चट्टान एवेलांच18,000 से अधिक मौतें
1981झांगझांगबो, तिब्बत-नेपालग्लेशियर झील बाढ़ (GLOF)200 से अधिक मौतें, पुल व बिजली परियोजना तबाह
1985डिग त्शो, नेपालग्लेशियर झील बाढ़ (GLOF)जलविद्युत परियोजना और बुनियादी ढांचे को नुकसान
1994लुग्गे त्शो, भूटानग्लेशियर झील बाढ़ (GLOF)21 मौतें, पुनाखा क्षेत्र प्रभावित
2012सेती नदी, नेपालबर्फ-चट्टान एवेलांच/फ्लैश फ्लड72 मृत या लापता
2021चमोली, भारतरॉक-आइस एवेलांच व मलबा बाढ़200 से अधिक मृत या लापता
2023दक्षिण ल्होनाक, सिक्किमग्लेशियर झील बाढ़ (GLOF)तीस्ता घाटी में भारी तबाही
2026नेपाल-तिब्बत सीमाग्लेशियर-चट्टान ढहना और फ्लैश फ्लड469 मौतें, करीब 1,000 लापता (28 अगस्त तक रिपोर्ट)

6. लुग्गे त्शो, भूटान : 1994 में 21 लोगों की मौत

7 अक्टूबर 1994 को भूटान के लुनाना क्षेत्र की लुग्गे त्शो ग्लेशियर झील की मोरेन बांध जैसी प्राकृतिक संरचना का एक हिस्सा टूट गया। करीब 18 मिलियन घन मीटर पानी नीचे की ओर बहा और फो छू घाटी में विनाशकारी बाढ़ लेकर आया। बाढ़ करीब 100 किलोमीटर दूर पुनाखा तक पहुंची। इस घटना में कम से कम 21 लोगों की मौत हुई। करीब 90 मकानों को नुकसान पहुंचा और खेती की जमीन, पुल, जलचक्कियां तथा अन्य संपत्ति भी बह गई। ऐतिहासिक पुनाखा जोंग को भी नुकसान पहुंचा। इस घटना के बाद भूटान ने संभावित खतरनाक ग्लेशियर झीलों की निगरानी, जलस्तर कम करने और शुरुआती चेतावनी व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया।

7. सेती नदी, नेपाल : 2012 में पहाड़ से आया सैलाब

5 मई 2012 को पश्चिमी नेपाल की सेती नदी में अचानक विनाशकारी फ्लैश फ्लड आई। शुरुआत में इसके कारण को लेकर कई सवाल उठे, क्योंकि इतनी बड़ी बाढ़ के लिए स्थानीय स्तर पर वैसी भारी बारिश नहीं हुई थी। बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों ने संकेत दिया कि अन्नपूर्णा क्षेत्र से बर्फ और चट्टान का विशाल हिमस्खलन हुआ था। यह मलबा नीचे आते हुए बर्फ, तलछट और पानी को अपने साथ मिलाता गया और नदी में अचानक विशाल बाढ़ पैदा हुई। इस घटना में 72 लोग मारे गए या लापता हुए। यह घटना नेपाल की 2026 की त्रासदी से इसलिए मिलती-जुलती है क्योंकि दोनों में स्थानीय भारी बारिश के बजाय ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्र में बर्फ, चट्टान और पानी की अचानक गति ने निचली घाटियों को तबाह किया।

8. चमोली, भारत : 2021 में हिमस्‍खलन से तबाही

7 फरवरी 2021 को उत्तराखंड के चमोली जिले में आई विनाशकारी बाढ़ को शुरुआती दौर में ग्लेशियर झील फटने की घटना माना गया था। बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों ने तस्वीर साफ की। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और अन्य शोधकर्ताओं के अनुसार रौंती पीक के पास करीब 27 मिलियन घन मीटर चट्टान और ग्लेशियर बर्फ का विशाल हिस्सा टूटकर नीचे गिरा। यह बर्फ-चट्टान का हिमस्खलन बेहद तेजी से मलबे के प्रवाह में बदल गया और रिषिगंगा तथा धौलीगंगा घाटियों में नीचे की ओर बढ़ा। दो जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा और 200 से ज्यादा लोग मारे गए या लापता हुए। वैज्ञानिकों ने इस घटना को GLOF के बजाय रॉक-आइस एवेलांच से बनी आपदा श्रृंखला बताया है। यही अंतर नेपाल की 2026 की घटना को समझने में भी महत्वपूर्ण है।

9. ल्होनाक, सिक्किम : 2023, ग्लेशियर झील का बांध टूटा

4 अक्टूबर 2023 को सिक्किम की दक्षिण ल्होनाक झील से विनाशकारी ग्लेशियर झील बाढ़ निकली। यह झील करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और तेजी से बढ़ने वाली खतरनाक ग्लेशियर झीलों में गिनी जाती थी। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार झील में बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ। करीब 38.31 मिलियन घन मीटर मलबा झील में पहुंचा और इसके साथ ग्लेशियर का करीब 7 मिलियन घन मीटर बर्फ द्रव्यमान भी टूटकर गिरा। इससे झील की प्राकृतिक मोरेन बांध जैसी संरचना टूट गई और पानी की विशाल लहर नीचे की ओर चली गई। इस आपदा ने सिक्किम के साथ पश्चिम बंगाल को भी प्रभावित किया और तीस्ता-III जलविद्युत परियोजना को नष्ट कर दिया। अलग-अलग आकलनों में मृतकों और लापता लोगों की संख्या 90 के आसपास रही।

10. नेपाल-तिब्बत सीमा : 2026 की तबाही ने फिर चेताया

26 अगस्त 2026 को नेपाल के रसुवा जिले और चीन के तिब्बत क्षेत्र में ल्हेंडे खोला तथा उससे जुड़ी नदी घाटियों में अचानक विनाशकारी बाढ़ आई। शुरुआत में लोगों को लगा कि शायद बादल फटने या भूकंप के कारण बाढ़ आई है, लेकिन बाद के विश्लेषणों में ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के टूटने की तस्वीर सामने आई।

सैटेलाइट तस्वीरों में पहाड़ की ढलान और ग्लेशियर में बड़े पैमाने पर बदलाव दिखाई दिए। वैज्ञानिकों के अनुसार ऊंचाई से गिरा बर्फ-चट्टान का मलबा नदी में पहुंचा और पानी, बर्फ तथा तलछट का अत्यंत शक्तिशाली प्रवाह पैदा हुआ। कुछ रिपोर्टों के अनुसार नदी का स्तर लगभग 30 मिनट में नौ मीटर तक बढ़ गया। इसके रास्ते में आने वाली सड़कें, पुल, मकान, बिजली परियोजनाएं और सीमा व्यापार से जुड़ा बुनियादी ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ।

28 अगस्त तक नेपाल में मृतकों की संख्या 469 तक पहुंचने की रिपोर्ट है और दोनों तरफ करीब 1,000 लोगों के लापता होने की सूचना है। इस बीच भूस्खलन से बनी एक नई झील के उफनने से बचाव अभियान को भी रोकना पड़ा। यानी पहली बाढ़ के बाद भी खतरा खत्म नहीं हुआ है।

तिब्‍बत में ग्‍लेश्यिर झील के फूटने से नेपाल के रसुवा में भोटेकोशी नदी में आई फ्लैश फ्लड से सैकड़ों घर, पुल और सड़कें बह गए। 

ग्लेशियर की आपदा में बारिश जरूरी नहीं

नेपाल की घटना ने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा किया है कि उस दिन आसपास भारी बारिश नहीं हुई, तब अचानक इतनी बड़ी बाढ़ कैसे आ गई? इसका जवाब हिमालय की ऊंची घाटियों में छिपा है। ग्लेशियर के ऊपर या उसके सामने जमा पानी किसी प्राकृतिक बांध के पीछे झील बना सकता है। यह बांध बर्फ, चट्टान और मोरेन से बना हो सकता है और सामान्य बांधों की तरह मजबूत नहीं होता।

कभी झील में पानी बढ़ने से यह प्राकृतिक बांध टूट जाता है। कभी किसी दूसरे ग्लेशियर का हिस्सा, चट्टान या भूस्खलन झील में गिरकर विशाल लहर पैदा करता है। और कभी ग्लेशियर का बर्फ-चट्टान वाला हिस्सा सीधे नदी में गिरकर पानी और मलबे को कई गुना बढ़ा देता है। इसीलिए ऐसी बाढ़ के लिए उसी स्थान पर भारी बारिश होना जरूरी नहीं है।

2026 की नेपाल घटना इसी जटिलता की याद दिलाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऊंचे हिमालय में तापमान बढ़ने से ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, बर्फ और चट्टान के बीच की स्थिरता बदल रही है और पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से ऊंची ढलानों की मजबूती भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन के कारण बताने के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी है, लेकिन गर्म होती पर्वतीय दुनिया में ग्लेशियर-सम्बंधित खतरों के बढ़ने की चिंता लगातार सामने आ रही है।

इतिहास का सबक: खतरा सिर्फ ग्लेशियर पिघलने का नहीं

पेरू से हिमालय तक की इन घटनाओं को अगर साथ रखकर तुलनात्‍मक दृष्टि से देखें, तो एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है। खतरा केवल ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र और नदियों में पानी बढ़ने का नहीं है। ग्लेशियर का पीछे हटना, नई झीलों का बनना, झीलों की प्राकृतिक बांधों पर बढ़ता दबाव, ऊंची ढलानों का अस्थिर होना और बर्फ-चट्टान के बड़े हिस्सों का अचानक टूटना एक-दूसरे से जुड़ी आपदा श्रृंखला बना सकते हैं।

दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि ऐसी घटनाओं के लिए चेतावनी का समय कई बार बहुत कम होता है। डिग त्शो, सेती, चमोली और दक्षिण ल्होनाक की घटनाओं ने दिखाया है कि ऊंचाई पर शुरू हुई प्रक्रिया कुछ ही मिनटों या घंटों में नीचे बसे लोगों और बुनियादी ढांचे तक पहुंच सकती है।

इसलिए हिमालयी देशों के लिए केवल ग्लेशियरों की निगरानी पर्याप्त नहीं होगी। खतरनाक ग्लेशियर झीलों की लगातार सैटेलाइट निगरानी, स्वचालित सेंसर, नदी के जलस्तर की रियल-टाइम निगरानी, भूकंपीय नेटवर्क, स्थानीय चेतावनी तंत्र और सीमा-पार डेटा साझा करने की व्यवस्था को एक साथ मजबूत करना होगा। नेपाल की 2026 की त्रासदी का सबसे बड़ा सबक यही है कि पहाड़ों में आसमान साफ होने का मतलब हमेशा खतरा टल जाना नहीं होता।

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