जरधोबा
जल जीवन मिशन योजना अपने शुरुआती 7 साल में भारत के ग्रामीण इलाकों के घरों में नल का पानी पहुंचाने में महत्वपूर्ण साबित हुई है।
WHO से लेकर UNICEF तक ने JJM को माना भारत में शिशु मृत्यु दर में कमी लाने का एक कारगर उपाय
15 अगस्त को देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर जल जीवन मिशन योजना ने अपने सात साल पूरे कर लिए। JJM-2.0 के तहत अपने दूसरे चरण में प्रवेश कर चुकी पेयजल के आधारभूत ढांचे और जलापूर्ति से जुड़ी इस महत्वाकांक्षी योजना को आमतौर पर घरों तक पाइप से पानी पहुंचाने वाली योजना के रूप में देखा जाता है। लेकिन, अपनी अबतक की अवधि में इस योजना ने ग्रामीण इलाकों में जलापूर्ति को सुधारने के साथ ही सामाजिक बदलाव की नींव रखने में भी अहम भूमिका निभाई है। जिसकी सराहना नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO से लेकर संयुक्त राष्ट्र की सहायक इकाई UNICEF तक ने की है।
माइकल क्रेमर के शोध के मुताबिक भारत में JJM की भूमिका घरों तक पानी पहुंचाने से भी कहीं बड़ी है। उनकी रिसर्च के मुताबिक इस योजना के ज़रिये सुरक्षित पेयजल की सार्वभौमिक पहुंच केवल महिलाओं और लड़कियों को पानी ढोने की मेहनत से राहत निजात दिला कर उनके जीवन में संभावनाओं के नए द्वार भी खोले हैं। इसलिए इसे ग्रामीण जीवन की सुविधा बढ़ाने वाली योजना से हटकर करोड़ों लोगों की जिंदगी बचाने वाले ण्क महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
माइकल क्रेमर और उनके सहयोगियों अकांक्षा सलेतोर, विटोल्ड विएचेक और आर्थर बेकर के अध्ययन ‘Potential Reduction in Child Mortality through Expanding Access to Safe Drinking Water in India’ के अनुसार, अगर जल जीवन मिशन ग्रामीण भारत के सभी परिवारों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने में सफल होता है, तो हर साल करीब 1.36 लाख पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौतें टाली जा सकती हैं। हालांकि अध्ययन ने इसके लिए एक महत्वपूर्ण शर्त रखी है कि जल जीवन मिशन के जरिए पहुंचने वाला पानी माइक्रोबियल प्रदूषण से मुक्त होना चाहिए। यह शर्त उनके अध्ययन और जल जीवन मिशन के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। इसका अर्थ यह है कि केवल घरों तक नल का कनेक्शन पहुंच जाना अपने आप में स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी नहीं है। जलापूर्ति का असली लाभ तब मिलेगा, जब उस नल से नियमित रूप से ऐसा पानी पहुंचे जिसे पीना सुरक्षित हो।
क्रेमर का अध्ययन जल और स्वास्थ्य के बीच संबंध को समझने के लिए उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों का इस्तेमाल करता है। शोधकर्ताओं ने सुरक्षित पानी और बच्चों की मृत्यु के बीच संबंध का अनुमान लगाने के लिए पानी के उपचार से जुड़े रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल्स और अन्य उपलब्ध आंकड़ों को आधार बनाया। उनका आकलन था कि सुरक्षित पानी की उपलब्धता में बड़ा विस्तार भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु को उल्लेखनीय रूप से कम कर सकता है।
जल जीवन मिशन के लिए तैयार किए गए उनके अध्ययन में 2019 की स्थिति को आधार बनाया गया था। उस समय भारत में बड़ी आबादी के पास सुरक्षित पेयजल की पहुंच नहीं थी। शोधकर्ताओं ने पानी की असुरक्षा से जुड़ी बाल मृत्यु और मिशन के जरिए सुरक्षित पानी की पहुंच बढ़ने के संभावित प्रभाव को जोड़कर अनुमान लगाया कि पूर्ण प्रभाव की स्थिति में करीब पांच साल से कम उम्र (अंडर-5) के बच्चों की 1,36,000 मौतें हर साल टाली जा सकती हैं।
इस आंकड़े को इस तरह नहीं समझना चाहिए कि जल जीवन मिशन शुरू होने के बाद 1.36 लाख बच्चों की मौतें वास्तव में हर साल कम हो चुकी हैं। यह इस योजना के एक संभावित प्रभाव का वैज्ञानिक अनुमान है। इसका मतलब है कि यदि सुरक्षित पानी की सार्वभौमिक पहुंच हासिल होती है और पानी माइक्रोबियल प्रदूषण से मुक्त रहता है, तो इतने बड़े स्तर पर बाल मृत्यु को टालने की क्षमता इस योजना में मौजूद है।
पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे दूषित पानी से होने वाली बीमारियों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। दूषित पानी में मौजूद बैक्टीरिया, वायरस और दूसरे रोगजनक डायरिया जैसी बीमारियों का कारण बन सकते हैं। गंभीर डायरिया छोटे बच्चों में डिहाइड्रेशन और दूसरी जटिलताओं का कारण बन सकता है और कई मामलों में यह जानलेवा हो जाता है।
क्रेमर और उनके सहयोगियों का व्यापक शोध भी इसी कड़ी को मजबूत करता है। 2023 में प्रकाशित उनके एक मेटा-विश्लेषण में पानी के उपचार से जुड़े 52 रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल्स की समीक्षा की गई और 18 अध्ययनों में उपलब्ध बाल मृत्यु के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पानी के उपचार से पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की सभी कारणों से होने वाली मृत्यु की संभावना में औसतन करीब 24 से 27 प्रतिशत कमी का अनुमान लगाया।
यह शोध जल जीवन मिशन के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि पानी की गुणवत्ता को केवल एक पर्यावरणीय या बुनियादी सुविधा का मुद्दा मानना पर्याप्त नहीं है। सुरक्षित पानी सीधे स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित कर सकता है।
माइकल क्रेमर का भारत के जल जीवन मिशन से संबंध केवल उनके प्रकाशित शोध तक सीमित नहीं है। 13 जुलाई 2022 को उन्होंने जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के अधिकारियों के साथ बातचीत की और साफ पानी तथा बच्चों के स्वास्थ्य पर अपने शोध के निष्कर्ष साझा किए। उस दौरान उन्होंने जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण परिवारों तक सुरक्षित पानी पहुंचाने के प्रयासों की सराहना की और कहा कि छोटे बच्चों को इसका सबसे बड़ा स्वास्थ्य लाभ मिल सकता है।
क्रेमर ने सुरक्षित पानी के भंडारण, कम लागत वाली जल उपचार तकनीकों और गांवों में नल के पानी की उपलब्धता के प्रभावों पर आगे अध्ययन के लिए सहयोग की संभावना भी जताई थी।
इस तरह जल जीवन मिशन के लिए क्रेमर का शोध एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि पाइपलाइन और नल तक पहुंचना लक्ष्य का पहला हिस्सा है, सुरक्षित पानी पहुंचाना उसका निर्णायक हिस्सा।
जल जीवन मिशन का मूल उद्देश्य ग्रामीण घरों तक पर्याप्त और सुरक्षित पेयजल पहुंचाना है। लेकिन किसी गांव में पाइपलाइन बिछ जाने और घर में नल लग जाने के बाद भी पानी की गुणवत्ता कई कारणों से प्रभावित हो सकती है। स्रोत का प्रदूषण, पाइपलाइन में रिसाव, अपर्याप्त क्लोरीनेशन, पानी का भंडारण और वितरण व्यवस्था में आने वाली समस्याएं इसके उदाहरण हैं।
क्रेमर के अध्ययन में भी इसी चुनौती पर जोर दिया गया है। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि 1.36 लाख मौतों को टालने की संभावना तभी साकार हो सकती है, जब जल जीवन मिशन से उपलब्ध कराया जाने वाला पानी माइक्रोबियल contamination से मुक्त हो।
यही कारण है कि जल जीवन मिशन के तहत पानी की गुणवत्ता की निगरानी और परीक्षण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। मिशन की जल गुणवत्ता संबंधी हैंडबुक में भी क्रेमर के अनुमान को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता से हर साल करीब 1.36 लाख पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौतों को टाला जा सकता है। साथ ही, पाइप से पहुंचने वाले पानी की गुणवत्ता की निगरानी और उसका रखरखाव जरूरी बताया गया है।
केंद्र सरकार ने जलापूर्ति से जुडी अपनी योजना को जल जीवन मिशन 2.0 के रूप में 2028 तक का विस्तार दे दिया है। दूसरे चरण में योजना में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
जल जीवन मिशन ने ग्रामीण भारत में पेयजल पहुंचाने की तस्वीर बदलने की बड़ी संभावना पैदा की है। लेकिन क्रेमर का शोध इस मिशन के सामने एक और बड़ी कसौटी रखता है। यह कसौटी केवल यह नहीं है कि कितने घरों में नल लगा, बल्कि यह है कि उन नलों से आने वाला पानी कितना सुरक्षित है और उसका स्वास्थ्य पर वास्तविक असर क्या पड़ा।
1.36 लाख बच्चों की संभावित जिंदगियां बचाने का अनुमान कोई छोटी संख्या नहीं है। लेकिन यह तभी वास्तविक स्वास्थ्य लाभ में बदल सकता है, जब पाइपलाइन के अंतिम छोर तक पहुंचने वाला पानी भी उतना ही सुरक्षित हो, जितना वह स्रोत से निकलते समय होना चाहिए।
इसलिए जल जीवन मिशन की अगली बड़ी चुनौती शायद नल कनेक्शन बढ़ाने से ज्यादा पानी की गुणवत्ता, नियमितता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है। अगर यह चुनौती सफलतापूर्वक हल होती है, तो ग्रामीण भारत में जल जीवन मिशन सिर्फ पेयजल आपूर्ति की योजना नहीं रहेगा, बल्कि बच्चों की जान बचाने वाले सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों में से एक साबित हो सकता है।
जल जीवन मिशन का महत्व केवल भारत सरकार के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र की सहायक इकाई यूनिसेफ (UNICEF) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी इस योजना के स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण जीवन पर संभावित प्रभाव को महत्वपूर्ण माना है। इनके आकलन से पता चलता है कि घर तक सुरक्षित पानी पहुंचाने का असर बीमारी घटाने से लेकर महिलाओं और बच्चों के समय की बचत तक कई स्तरों पर हो सकता है।
WHO : करीब 4 लाख डायरिया से होने वाली मौतें टाली जा सकती हैं
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन Estimating health gains from increased access to safely managed drinking-water services following Government of India's Jal Jeevan Mission में अनुमान लगाया गया कि देश में सार्वभौमिक रूप से सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल की पहुंच होने पर करीब 4 लाख डायरिया से होने वाली मौतों को टाला जा सकता है। WHO ने इसके साथ लगभग 1.4 करोड़ DALYs यानी बीमारी, विकलांगता और समय से पहले मृत्यु के कारण गंवाए जाने वाले स्वस्थ जीवन वर्षों की बचत का भी अनुमान लगाया।
WHO : पानी लाने में रोजाना करोड़ों घंटे की बचत
WHO के आकलन में जल जीवन मिशन का लाभ केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। हर ग्रामीण घर में नल कनेक्शन पहुंचने से पानी लाने में लगने वाले समय में करीब 5.5 करोड़ घंटे प्रतिदिन की बचत होने का अनुमान है। इसमें करीब तीन-चौथाई समय महिलाओं और लड़कियों से जुड़ा है। इसका मतलब है कि सुरक्षित पानी की घर तक पहुंच ग्रामीण महिलाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और दूसरे उत्पादक कार्यों के लिए समय उपलब्ध कराने का माध्यम भी बन सकती है।
UNICEF ने अपने घरेलू जल सुरक्षा संबंधी अध्ययन में जल जीवन मिशन को ग्रामीण भारत में पानी की सुविधा से लैंगिक असमानता कम करने की संभावना वाली एक प्रमुख पहल माना है। संस्था के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण फोकस लैंगिक समानता, सामाजिक असमानता और जल प्रबंधन है। यानी घर तक पानी पहुंचने को केवल सुविधा नहीं, बल्कि महिलाओं और लड़कियों पर पानी जुटाने के असमान बोझ को कम करने के साधन के रूप में भी देखा गया है।
UNICEF भारत में जल जीवन मिशन को बच्चों और कमजोर समुदायों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखता है। संस्था का कहना है कि वह भारत सरकार के साथ मिलकर स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल को हर बच्चे तक पहुंचाने के लिए काम कर रही है। यूनिसेफ के अनुसार जल जीवन मिशन ग्रामीण परिवारों तक पाइप से पानी पहुंचाने के साथ जल प्रबंधन, जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन जैसे उपायों को भी बढ़ावा देता है।
जल जीवन मिशन की सफलता को अगर केवल इस आधार पर मापा जाए कि कितने ग्रामीण घरों में नल पहुंचा, तो तस्वीर अधूरी रहेगी। नल कनेक्शन जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि उस नल में नियमित रूप से पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित पानी आए।
यही वह जगह है जहां क्रेमर का शोध जल जीवन मिशन की प्राथमिकताओं को एक नया स्वास्थ्य आयाम देता है। जल स्रोतों की सुरक्षा, नियमित जल गुणवत्ता परीक्षण, क्लोरीनेशन, पाइपलाइन की निगरानी, पानी के सुरक्षित भंडारण और स्थानीय स्तर पर जल आपूर्ति व्यवस्था की क्षमता सीधे तौर पर इस संभावित स्वास्थ्य लाभ से जुड़ जाते हैं।
दूसरे शब्दों में, हर घर नल जल जीवन मिशन की उपलब्धि है, लेकिन हर घर सुरक्षित पानी उसका असली लक्ष्य होना चाहिए।
भारत में बाल स्वास्थ्य सुधारने के लिए पोषण, टीकाकरण, स्वच्छता, मातृ स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं पर लगातार जोर दिया जाता रहा है। सुरक्षित पेयजल इसी श्रृंखला की एक बुनियादी कड़ी है। इसका फायदा केवल बीमारी होने के बाद इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि बीमारी को रोकने में है।
यही वजह है कि क्रेमर का अध्ययन जल जीवन मिशन को एक अलग नजरिए से देखने का अवसर देता है। यदि सुरक्षित पानी की सार्वभौमिक पहुंच वास्तव में हासिल होती है, तो इसका प्रभाव स्वास्थ्य व्यवस्था के बाहर भी दिखाई दे सकता है। बच्चों के कम बीमार पड़ने से परिवारों पर इलाज का खर्च और देखभाल का बोझ कम हो सकता है। बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार उनके पोषण और विकास पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
हालांकि इन सभी संभावित लाभों को वास्तविक उपलब्धियों में बदलने के लिए पानी की गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति पर लगातार निगरानी जरूरी होगी।
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