स्थानीय लोगों ने यह आरोप लगाया है कि पाइपलाइन और टैंक जैसी योजनाएं शुरू तो हुईं, लेकिन सालों बाद भी वे नियमित आपूर्ति सुनिश्चित नहीं कर सकीं।
चित्र: Odisha TV
मई की तेज़ गर्मी में ओडिशा के कालाहांडी ज़िले के धरमगढ़-सिनापाली मार्ग पर सैकड़ों ग्रामीण घंटों तक सड़क पर बैठे रहे। कई महिलाओं के हाथ में खाली बाल्टियां थीं। उनका आरोप था कि गांवों तक पाइपलाइन तो पहुंच गई, लेकिन नियमित पानी की आपूर्ति आज तक शुरू नहीं हुई।
दरअसल यह सड़क जाम सिर्फ एक स्थानीय विरोध नहीं था। यह उस गहरे और लंबे समय से चले आ रहे जल संकट का सार्वजनिक विस्फोट था, जहां ग्रामीणों को न केवल पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि उपलब्ध पानी की गुणवत्ता भी जीवन के लिए खतरा बन चुकी है।
इस खबर के अनुसार स्थानीय लोगों ने यह आरोप लगाया है कि पाइपलाइन और टैंक जैसी योजनाएं शुरू तो हुईं, लेकिन सालों बाद भी वे नियमित आपूर्ति सुनिश्चित नहीं कर सकीं। विरोध के दौरान लोगों ने साफ कहा कि हैंडपंप का पानी पीने लायक़ नहीं है। इतना ही नहीं, जगहों पर तो उपलब्ध पानी के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी पैदा हो रही हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ट्यूबवेलों से निकलने वाले पानी में आयरन और अन्य खनिजों की अधिक मात्रा है, जिससे लंबे समय में स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं।
कालाहांडी और आसपास के क्षेत्रों में समस्या केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं है। असली संकट उपलब्ध पानी की गुणवत्ता का है। BIS मानकों के अनुसार पीने के पानी में आयरन की स्वीकार्य सीमा 0.3 mg/L है, लेकिन पश्चिम ओडिशा के कई क्षेत्रों में यह इससे कई गुना अधिक दर्ज की गई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ट्यूबवेलों से निकलने वाले पानी में आयरन और अन्य खनिजों की अधिक मात्रा है, जिससे लंबे समय में स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं।
यह स्थिति भारत के कई ग्रामीण क्षेत्रों में देखे जा रहे उस व्यापक पैटर्न से मेल खाती है, जहां पीने के सुरक्षित और साफ़ पानी और उपलब्ध पानी के बीच का अंतर गहरा हो चुका है।
नीति आयोग की Composite Water Management Index रिपोर्ट पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि भारत के कई ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता और साफ़ पानी की उपलब्धता दो अलग-अलग वास्तविकताएं बन चुकी हैं।
कालाहांडी और पश्चिम ओडिशा में जल संकट का एक बड़ा कारण भूजल पर अत्यधिक निर्भरता है। भारत में ग्रामीण पेयजल का बड़ा हिस्सा अभी भी भूजल पर आधारित है।
पश्चिम ओडिशा के नुआपाड़ा जैसे क्षेत्रों में भूजल दोहन की स्थिति पहले ही semi-critical श्रेणी तक पहुंच चुकी है। मतलब कि वहां भूजल निकासी की दर रिचार्ज क्षमता के काफ़ी करीब पहुंच गई है।
यह स्थिति पूरे क्षेत्र में बढ़ते एक्वीफर तनाव, यानी जमीन के नीचे मौजूद जल भंडार पर बढ़ते दबाव, की ओर संकेत करती है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) recharge और extraction के अनुपात के आधार पर क्षेत्रों को safe, semi-critical, critical और over-exploited श्रेणियों में वर्गीकृत करता है।
CGWB की Dynamic Ground Water Resources of India नाम की रिपोर्ट बताती है कि देश के कई हिस्सों में भूजल दोहन की गति रिचार्ज क्षमता के बराबर या उससे अधिक होती जा रही है। नतीजतन कई जिलों में एक्वीफ़र तनाव बढ़ रहा है।
जल-स्तर में आ रही इस गिरावट का संबंध केवल उसकी मात्रा से नहीं है, बल्कि गुणवत्ता से भी है, जहां फ्लोराइड, नाइट्रेट और घुलनशील पदार्थ जैसे तत्व पानी को असुरक्षित बना रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि सिंचाई और घरेलू उपयोग के लिए बढ़ते दोहन दबाव ने कई क्षेत्रों में रिचार्ज और दोहन के बीच का संतुलन कमजोर किया है।
पश्चिम ओडिशा के भूजल पर किए गए शोध में कालाहांडी और आसपास के क्षेत्रों में भूजल में फ्लोराइड की मात्रा कई जगहों पर मानक सीमा (1.5 mg/L) से अधिक पाई गई है। नतीजतन लोगों को कई प्रकार की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। जैसे कि लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से दांतों और हड्डियों पर असर पड़ता है, जिसे फ्लोरोसिस कहा जाता है।
वहीं एक दूसरे शोध में कुछ ब्लॉकों का Water Quality Index (WQI) E-class श्रेणी में पाया गया, जिसका अर्थ है कि पानी बिना उपचार के पीने योग्य नहीं माना जाता।
यह बात साफ़ होती है कि संकट केवल उपलब्धता का नहीं बल्कि अब पानी के ज़हरीलेपन का भी हो गया है।
हाल के CGWB अध्ययनों में ओडिशा के कई इलाकों में फ्लोराइड, नाइट्रेट और अन्य घुलनशील तत्वों की उच्च मात्रा दर्ज की गई है, जिससे सार्वजनिक जल स्रोतों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
जल गुणवत्ता खराब होने पर सबसे अधिक असर उन समुदायों पर पड़ता है जिनके पास वैकल्पिक जल स्रोत, निजी स्वास्थ्य सेवाएं या फिल्ट्रेशन जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं।
कालाहांडी के कई ब्लॉकों में डायरिया और टाइफॉइड जैसे पानी से होने वाले रोग उच्च स्तर पर पाए गए हैं। इनका सीधा संबंध पानी की ख़राब गुणवत्ता और कमजोर स्वास्थ्य ढांचे से जुड़ा है।
स्वास्थ्य मंत्रालय और NFHS के आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण भारत में दूषित पानी बच्चों में डायरिया और कुपोषण के बड़े कारणों में शामिल है। यूनिसेफ के अनुसार, भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में डायरिया मौत के प्रमुख कारणों में शामिल है, और दूषित पानी इसका एक बड़ा कारण माना जाता है।
इतना ही नहीं, कालाहांडी की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां इस जल संकट को और गंभीर बना देती हैं। यह इलाका लंबे समय से गरीबी, कुपोषण, सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं और मौसमी पलायन जैसी समस्याओं से जूझता रहा है।
ज़िले की बड़ी आबादी ग्रामीण और आदिवासी समुदायों से जुड़ी है, जिनकी आजीविका मुख्य रूप से वर्षा आधारित कृषि और अस्थायी मजदूरी पर निर्भर करती है।
ऐसे में जब पीने का सुरक्षित पानी उपलब्ध नहीं होता, तो उसका असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता बल्कि कामकाज, बच्चों की पढ़ाई, पोषण और घरेलू आय पर भी पड़ता है।
कई अध्ययनों में यह पाया गया है कि जल गुणवत्ता खराब होने पर सबसे अधिक असर उन समुदायों पर पड़ता है जिनके पास वैकल्पिक जल स्रोत, निजी स्वास्थ्य सेवाएं या फिल्ट्रेशन जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होतीं। यही कारण है कि कालाहांडी में पानी का संकट केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि सामाजिक असमानता और विकास मॉडल से जुड़ा हुआ संकट भी बन जाता है।
ओडिशा के कई जिलों में भूजल स्तर में गिरावट और अनियमित वर्षा का प्रभाव लगातार देखा जा रहा है। जल विशेषज्ञों के अनुसार, भूजल संकट को जलवायु परिवर्तन और अनियमित वर्षा ने और जटिल बना दिया है। पश्चिम ओडिशा में मानसून की अनियमितता और लंबे सूखे महीनों ने रिचार्ज प्रक्रिया को पहले से ज़्यादा कमजोर किया है। 2017 के बाद के आकलनों में पाया गया कि कई क्षेत्रों में भूजल संसाधनों में लाखों घन मीटर की कमी दर्ज हुई है।
कालाहांडी में सड़क पर उतरकर विरोध कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि पाइपलाइन बिछी हुई है, लेकिन पानी नहीं आता है। वहीं हैंडपंप से निकलने वाला पानी हमारे परिवार के लोगों के लिए बीमारी का कारण बन रहा है। हम लगातार शिकायत कर रहे हैं। हमारी शिकायतें प्रशासन तक पहुंचती भी हैं लेकिन समाधान नहीं होता।
इससे यह बात साफ़ होती है कि यह जल-संकट केवल तकनीकी ही नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता का भी नतीजा है।
कई ग्रामीण जल योजनाओं में पाइपलाइन और टैंक जैसे ढांचागत निर्माण तो पूरे हो जाते हैं, लेकिन जलस्रोतों की दीर्घकालिक उपलब्धता, रखरखाव और नियमित बिजली आपूर्ति जैसी बुनियादी चुनौतियां अनदेखी रह जाती हैं।
कालाहांडी में जल-संकट का यह मामला दरअसल भूजल स्तर में आ रही कमी, जल गुणवत्ता में हो रही गिरावट, अधूरी या ठप पड़ी जल आपूर्ति योजनाओं और जलवायु परिवर्तनशीलता के बढ़ते प्रभाव से सीधे जुड़ा है। कहने का अर्थ है कि जल संकट अब अस्थायी समस्या नहीं बल्कि संरचनात्मक संकट बनता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नई पाइपलाइन परियोजनाएं इस संकट का स्थायी समाधान नहीं हो सकतीं। इसके लिए भूजल रिचार्ज, स्थानीय जल स्रोतों के पुनर्जीवन, विकेंद्रीकृत जल शोधन प्रणाली और समुदाय आधारित जल प्रबंधन को एक साथ लागू करने की जरूरत है।
अब स्थानीय जलग्रहण क्षेत्रों के पुनर्जीवन और वर्षा जल संचयन को भी दीर्घकालिक समाधान का अहम हिस्सा माना जा रहा है। साथ ही जल योजनाओं में कार्यात्मक जल आपूर्ति अर्थात् वास्तविक और नियमित आपूर्ति को केवल इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण से अधिक महत्व देना होगा।
कालाहांडी में हुआ विरोध एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह संकेत है कि भारत के ग्रामीण जल प्रबंधन मॉडल में अब केवल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी, प्रशासन और भूजल प्रणालियों को एक साथ समझने की जरूरत है।
बुंदेलखंड से लेकर मराठवाड़ा और अब पश्चिम ओडिशा तक, पानी को लेकर उभरते विरोध यह संकेत दे रहे हैं कि भारत का ग्रामीण जल संकट अब केवल कमी का संकट नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक संकट में बदलता जा रहा है।
यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो ऐसे विरोध देश के कई अन्य हिस्सों में सामान्य हो सकते हैं। पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि संघर्ष का कारण बनता जाएगा।
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