पैक्ड पानी को नल या अन्य स्रोतों के मुकाबले सुरक्षित मान लिया जाता है। लेकिन विभिन्न रिपोर्ट और अध्ययन में यह तथ्य सवाल के घेरे में आ गया है।

 

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

पेयजल

गोरखपुर में बोतलबंद पानी की गुणवत्ता पर सवाल: क्या पैक्ड वाटर सच में सुरक्षित है?

गोरखपुर में पैकेज्ड पेयजल के नमूनों में कोलीफार्म बैक्टीरिया मिलने के बाद बोतलबंद पानी की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। यह रिपोर्ट गुणवत्ता-निगरानी, नियामक अनुपालन और सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों की वास्तविक स्थिति की पड़ताल करती है।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में चार पैकेज्ड पेयजल ब्रांडों के नमूनों में कोलीफार्म बैक्टीरिया पाए जाने और उसके बाद संबंधित इकाइयों के उत्पादन व बिक्री पर रोक लगाए जाने की घटना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई भर नहीं है।

यह घटना सोचने के लिए इस सोच को संदेह के घेरे में लाती है कि पैक्ड पानी को नल या अन्य स्रोतों के मुकाबले सुरक्षित मान लिया जाता है। तेजी से बढ़ते बोतलबंद पानी के बाजार और उपभोक्ता भरोसे के बीच यह प्रश्न अब अधिक प्रासंगिक हो गया है कि गुणवत्ता-निगरानी, नियामक अनुपालन और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा की व्यवस्थाएं कितनी प्रभावी हैं।

जांच रिपोर्ट क्या कहती है?

खाद्य सुरक्षा विभाग ने जनवरी 2026 में शहर और ग्रामीण इलाकों के लगभग 19 वाटर प्लांटों से नमूने लिए। इन जांचों में चार नमूनों की रिपोर्ट असुरक्षित पाई गई। इसके बाद उन प्लांटों का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया और उत्पादन-बिक्री पर रोक लगायी गयी। इनमें हाईमैक्स, गैलेसिया, एक्वा नीर और बाटाडू जैसे ब्रांड शामिल रहे।

यह मामला अकेला नहीं है। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में करीब 39 बोतलबंद पानी और पैक्ड ड्रिंक ब्रांडों के खिलाफ बिक्री और सप्लाई पर तत्काल रोक लगायी गयी, क्योंकि उनके नमूने मानक गुणवत्ता परीक्षणों पर खरे नहीं उतरे थे

कोलीफार्म क्या संकेत देते हैं?

कोलीफार्म बैक्टीरिया आमतौर पर मल जनित संदूषण का संकेत देते हैं और दूषित पानी में पाए जाते हैं। इसकी उपस्थिति स्वयं में बीमारी नहीं, बल्कि मल-जनित संदूषण का वैज्ञानिक संकेतक मानी जाती है।

ऐसे बैक्टीरिया के संपर्क से पेट में संक्रमण, दस्त, उल्टी और अन्य इन्फेक्शियस रोगों का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि ये जलजनित बीमारियों के लिए अनुकूल वातावरण पैदा करते हैं। 

जल गुणवत्ता विज्ञान में कोलीफार्म बैक्टीरिया (Total Coliforms) और विशेष रूप से फीकल कोलीफार्म / ई. कोलाई को इंडिकेटर ऑर्गैनिज़्म के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की पीने की पानी की गुणवत्ता को लेकर जारी किया गया दिशानिर्देश स्पष्ट करता है कि पीने के पानी के 100 मिलीलीटर नमूने में ई. कोलाई या थर्मोटॉलरेंट कोलीफॉर्म बिल्कुल नहीं होने चाहिए।

इनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि पानी किसी न किसी स्तर पर मल-जनित संदूषण के संपर्क में आया है, जिससे अन्य रोगजनक (pathogens), जैसे साल्मोनेला, शिगेला, विब्रियो कोलेरी या वायरल एजेंट मौजूद हो सकते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की पीने की पानी की गुणवत्ता को लेकर जारी किया गया दिशानिर्देश स्पष्ट करता है कि पीने के पानी के 100 मिलीलीटर नमूने में ई. कोलाई या थर्मोटॉलरेंट कोलीफॉर्म बिल्कुल नहीं होने चाहिए। 

WHO के अनुसार, ई. कोलाई की उपस्थिति हालिया फीकल संदूषण का संकेत है और इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संभावित जोखिम माना जाता है।

इसी तरह, ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) द्वारा निर्धारित मानक (IS 10500: Drinking Water Specification) भी यह अनिवार्य करते हैं कि पैकेज्ड पेयजल में कोलीफार्म का स्तर शून्य होना चाहिए।

IS 10500 सामान्य पेयजल (नल/भूजल) की गुणवत्ता के मानक निर्धारित करता है, जबकि IS 14543 विशेष रूप से पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर के उत्पादन, क्लीनिंग प्रक्रिया और माइक्रोबायोलॉजिकल मानकों को नियंत्रित करता है। पैकेज्ड पानी के मामले में IS 14543 के तहत कोलीफार्म की उपस्थिति पूरी तरह से निषिद्ध है।

शोध क्या बताते हैं?

जलजनित रोगों का जोखिम: WHO और UNICEF की संयुक्त रिपोर्टों के अनुसार, असुरक्षित पानी और अपर्याप्त स्वच्छता के कारण विश्व स्तर पर डायरिया जैसी बीमारियां अभी भी बच्चों में मृत्यु और रोगभार का बड़ा कारण हैं। 

भारत में माइक्रोबायोलॉजिकल परीक्षण: 2013 में जयपुर में किए गए एक शोध (Veterinary World) में 50 पैकेज्ड पानी के नमूनों की जांच में कई नमूनों में कुल और फीकल कोलीफार्म पाए गए। अध्ययन ने स्पष्ट किया कि सभी ब्रांड BIS मानकों का पालन नहीं कर रहे थे, जिससे नियमित निगरानी की आवश्यकता रेखांकित हुई। 

इंडिकेटर बनाम वास्तविक रोगजनक: जल-गुणवत्ता विज्ञान यह मानता है कि कोलीफार्म स्वयं हर बार गंभीर बीमारी का कारण नहीं होते, लेकिन वे “संकेतक” के रूप में यह चेतावनी देते हैं कि पानी की शुद्धिकरण प्रक्रिया, भंडारण या वितरण श्रृंखला में कहीं न कहीं विफलता हुई है।

पानी के शुद्धीकरण प्रक्रिया में होने वाली संभावित चूक

• अपर्याप्त RO/UV शोधन

• अनुचित भंडारण परिस्थितियां (उच्च तापमान, धूप)

• फिल्ट्रेशन के बाद पुनः संदूषण (बोतल भरने की प्रक्रिया में)

• सफाई और रखरखाव में नियमितता की कमी

सिर्फ बोतलबंद होने से पानी स्वचालित रूप से सुरक्षित नहीं माना जा सकता, प्रोसेसिंग, भंडारण और सप्लाई चेन भी असर डालते हैं।

नियामक ढांचा क्या कहता है?

अक्सर लोग बोतल बंद पानी को साफ़ और सुरक्षित मान लेते हैं, लेकिन गुणवत्ता नियंत्रण की कमियों के कारण यह धारणा वास्तविकता से मेल नहीं खाती है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) भारत में बोतलबंद और पैकेज्ड वॉटर के नियमन का ढांचा निर्धारित करती है।

FSSAI के नियमों के अनुसार पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर को उच्च जोखिम वाले खाद्य श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है कि इन इकाइयों का नियमित निरीक्षण और सैंपलिंग आवश्यक है।

FSSAI के लाइसेंसिंग एवं पंजीकरण विनियमों के तहत:

  • विनिर्माण इकाइयों को वैध लाइसेंस हासिल करना ज़रूरी है।

  • राज्य खाद्य सुरक्षा विभागों द्वारा समय-समय पर निरीक्षण और रैंडम सैंपलिंग की जाती है।

  • गंभीर उल्लंघन की स्थिति में लाइसेंस निलंबन या रद्द किया जा सकता है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) भारत में बोतलबंद और पैकेज्ड वॉटर के नियमन का ढांचा निर्धारित करती है।

हालांकि, निरीक्षण की आवृत्ति राज्यों के संसाधनों और स्थानीय प्रशासनिक क्षमता पर निर्भर करती है, जिसके कारण निगरानी की प्रभावशीलता में भिन्नता देखी जाती है। 

सार्वजनिक स्तर पर सभी परीक्षण रिपोर्टों की रियल-टाइम उपलब्धता अभी व्यापक रूप से सुनिश्चित नहीं है, जिससे पारदर्शिता का प्रश्न बना रहता है।

सुरक्षा की धारणा बनाम वास्तविकता

यह घटनाक्रम यह संकेत देता है कि:

  • पैक्ड पानी पर नियमित, व्यापक और पारदर्शी गुणवत्ता परीक्षण की आवश्यकता है।

  • लाइसेंसिंग के बाद भी नियमित जांच, रेंडम सैंपलिंग और रियल-टाइम पारदर्शिता जरूरी है।

  • उपभोक्ताओं को पैक्ड पानी के स्रोत, लाइसेंस स्थिति और परीक्षण डेटा को समझने का अधिकार होना चाहिए।

  • सिर्फ बोतलबंद होने से पानी स्वचालित रूप से सुरक्षित नहीं माना जा सकता, प्रोसेसिंग, भंडारण और सप्लाई चेन भी असर डालते हैं।

उपभोक्ताओं
उपभोक्ताओं को पैक्ड पानी के स्रोत, लाइसेंस स्थिति और परीक्षण डेटा को समझने का अधिकार होना चाहिए।

बढ़ते बाज़ार के साथ बढ़ती चुनौतियां

पैक्ड वाटर की मांग तेजी से बढ़ी है। विभिन्न बाजार अध्ययनों के अनुसार 2024 तक भारत का पैकेज्ड वाटर बाजार अरबों डॉलर के स्तर पर पहुंच गया था, लेकिन बढ़ते बाजार के बीच पानी की गुणवत्ता-सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बढ़ीं हैं।

केरल में 296 पैकेज्ड पानी नमूनों के परीक्षण में लगभग दो-तिहाई नमूने असुरक्षित या निम्न गुणवत्ता वाले पाए गए। यह संकेत देता है कि समस्या केवल एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि निगरानी तंत्र की व्यापक चुनौती है।

आगे का रास्ता क्या हो?

  • पैक्ड वाटर की नियमित, पारदर्शी जांच: FSSAI और राज्य खाद्य सुरक्षा विभागों को अधिक व्यापक नमूना परीक्षण और पब्लिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था करनी चाहिए।

  • बोतलबंद पानी का लाइसेंस तो पर्याप्त नहीं: लाइसेंस मिलने के बाद भी निरंतर गुणवत्ता मानकों का पालन जरूरी है।

  • उपभोक्ता जागरूकता और सूचना: ब्रांड, परीक्षण रिपोर्ट और लाइसेंस स्थिति की जानकारी उपभोक्ताओं तक पहुंचनी चाहिए।

  • सख्त मानक और स्टोरेज नियंत्रण: केवल फिल्ट्रेशन ही नहीं, भंडारण और सप्लाई चेन की गुणवत्ता भी मानकों पर खरा उतरनी चाहिए।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि बड़ी संख्या में लाइसेंस प्राप्त इकाइयां नियमित रूप से मानकों का पालन करती हैं, लेकिन अनियमितताओं के मामले निगरानी तंत्र की सीमाओं को उजागर करते हैं।

गोरखपुर का मामला यह स्पष्ट करता है कि बोतलबंद पानी को अपनी स्वाभाविक सुरक्षा की गारंटी नहीं समझा जा सकता। पानी की गुणवत्ता केवल पैकिंग पर निर्भर नहीं करती। बल्कि मानक, निगरानी, पारदर्शिता और नियमन की एक मजबूत संरचना ही उपभोक्ताओं को स्वस्थ पेयजल तक पहुंच सुनिश्चित कर सकती है।

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