त्रिपुरा के गोमती जिले में जल अर्पण योजना को बढ़ावा देने के लिए जिला प्रशासन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में ग्रामीण स्‍तर पर जल प्रबंधन को बेहतर बनाने और संरक्षण की शपथ लेते स्‍थानीय प्रतिनिधि। 

 

सस्रोत : गोमती जिला प्रशासन फेसबुक पेज

पेयजल

जन भागीदारी से सुधरेगी गांवों की पेयजल आपूर्ति "जल अर्पण" योजना को बढ़ावा देगी सरकार

JJM - 2.0 का दायरा अब केवल पाइपलाइन बिछाने या नल कनेक्शन देने तक सीमित नहीं, सतत पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने पर होगा फोकस

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग (DDWS) ने जिला कलेक्टरों के पेयजल संवाद का 10वां सम्मेलन आयोजित किया। जल जीवन मिशन 2.0 पर जिलों के प्रदर्शन की हुई समीक्षा।

केंद्र सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (PIB) द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक 14 जुलाई को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जिला कलेक्टरों के पेयजल संवाद की 10वीं बैठक का आयोजन किया गया। इसमें वरिष्ठ अधिकारी, जिला कलेक्टर/उपायुक्त और राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के मिशन निदेशकों के साथ सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से सतत ग्रामीण पेयजल सेवा को सुदृढ़ करने  पर विचार-विमर्श किया गया। इसके लिए जल जीवन मिशन (जेजेएम) 2.0 के तहत "जल अर्पण" योजना के कार्यान्वयन में तेजी लाने की बात कही गई। बैठक की अध्यक्षता डीडीडब्ल्यूएस के सचिव अशोक के.के. मीणा ने की। राष्ट्रीय जल जीवन मिशन (एनजेजेएम) के अतिरिक्त सचिव एवं मिशन निदेशक कमल किशोर सोआन और डीडीडब्ल्यूएस के अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें उपस्थित रहे।

‘जल अर्पण’ को वार्षिक कार्यक्रम बनाने की जरूरत

देशभर के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के जिला कलेक्टरों/उपायुक्तों तथा मिशन निदेशकों के साथ हुई वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हुई बैठक में यह रेखांकित किया गया कि जल जीवन मिशन 2.0 (JJM - 2.0) के तहत अब केवल पाइपलाइन बिछाने या नल कनेक्शन देने तक सीमित दृष्टिकोण नहीं अपनाया जाएगा, बल्कि दीर्घकालिक और सतत पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसके लिए “जल अर्पण” योजना को जन भागीदारी आधारित मॉडल के रूप में तेजी से लागू करने की रणनीति बनाई जा रही है। यह काम सामुदायिक-नेतृत्व वाली शासन व्यवस्था (जन भागीदारी) के माध्यम से किया जा सकता है। सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने के लिए राज्यों और जिलों से हर घर जल (HGJ) ग्राम पंचायतों (GP) के प्रमाणीकरण में तेजी लाकर और प्रत्येक ग्राम पंचायत में जल अर्पण योजना को एक वार्षिक सामुदायिक नेतृत्व वाले कार्यक्रम के रूप में लागू करके किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि जल सेवा आंकलन के अंतर्गत देशभर में 1.17 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों में यह कार्य पहले ही संपन्न हो चुका है। अब जल जीवन मिशन के तहत स्‍थापित ग्रामीण जल आपूर्ति प्रणालियों के संचालन तथा रखरखाव (ओ एंड एम) ग्राम पंचायतों और ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों (वीडब्ल्यूएससी) के जरिये बेहतर बनाना होगा।

अधिकारियों ने कहा कि गांवों में पेयजल स्रोतों के संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय स्तर पर संचालन एवं रखरखाव की व्यवस्था मजबूत किए बिना ग्रामीण जलापूर्ति को स्थायी नहीं बनाया जा सकता। सचिव अशोक के.के. मीणा ने बैठक में शामिल जिला प्रशासन अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे ग्राम पंचायतों, ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय समुदायों को योजना के क्रियान्वयन में सक्रिय भागीदार बनाएं। उनका कहना था कि जहां समुदाय की भागीदारी मजबूत होती है, वहां जल योजनाओं की कार्यक्षमता और टिकाऊपन दोनों बेहतर पाए जाते हैं।

क्या है जल अर्पण योजना

जल अर्पण योजना को सामुदायिक स्वामित्व और जन भागीदारी पर आधारित पहल के रूप में देखा जा रहा है। इसका मूल विचार यह है कि ग्रामीण जलापूर्ति व्यवस्था केवल सरकारी परियोजना न रहकर गांव के लोगों की साझा जिम्मेदारी बने। इसके तहत गांवों में जल संरक्षण गतिविधियों, जल स्रोतों के पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, सोख्ता गड्ढों के निर्माण और जलापूर्ति प्रणालियों के रखरखाव में समुदाय की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाता है।

जलापूर्ति से जुड़ी सरकारी योजनाओं में आमतौर पर देखा जाता है कि ग्रामीण भारत में पेयजल योजनाओं की सबसे बड़ी चुनौती संचालन एवं रखरखाव की होती है। कई स्थानों पर पाइपलाइन और टंकियां बन जाने के बाद उनकी नियमित देखभाल नहीं हो पाती, जिससे कुछ वर्षों में योजनाएं प्रभावित होने लगती हैं। जल अर्पण मॉडल इसी समस्या का समाधान स्थानीय सहभागिता के माध्यम से खोजने का प्रयास करता है।

जिलों में JJM - 2.0 के प्रदर्शन की हुई समीक्षा

बैठक में विभिन्न राज्यों और जिलों के प्रदर्शन की समीक्षा भी की गई। इसमें घरेलू नल कनेक्शन की प्रगति, जल गुणवत्ता की निगरानी, स्रोत स्थिरता, योजनाओं के संचालन एवं रखरखाव तथा सामुदायिक योगदान जैसे पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। अधिकारियों ने उन जिलों के अनुभव भी साझा किए जहां स्थानीय भागीदारी के माध्यम से जलापूर्ति योजनाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।

डीडीडब्ल्यूएस के अधिकारियों के अनुसार, जल जीवन मिशन 2.0 का उद्देश्य केवल नए कनेक्शन देना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर ग्रामीण परिवार को नियमित रूप से पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध हो। इसके लिए जल स्रोतों की सुरक्षा, जल गुणवत्ता परीक्षण और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही की व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है।

राष्ट्रीय स्तर पर जल जीवन मिशन- 2.0 की प्रगति

सूचकांकस्थिति
अगस्त 2019 में ग्रामीण नल कनेक्शन कवरेजकरीब 17%
ग्रामीण परिवारों की कुल संख्यालगभग 19.3 करोड़
नल जल से जुड़े परिवार (2026 तक)करीब 15.7 करोड़
वर्तमान राष्ट्रीय कवरेज80% से अधिक
लक्ष्यहर ग्रामीण परिवार को कार्यशील नल कनेक्शन

वीडियो कॉन्‍फ्रेंसिंग के जरिये जिलों के कलेक्‍टर व उपायुक्‍तों के साथ बैठक करते केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल और स्वच्छता विभाग के अधिकारी।

ग्रामीण पेयजल प्रबंधन में बदलाव का संकेत

जल अर्पण योजना और जल जीवन मिशन 2.0 का संयुक्त दृष्टिकोण ग्रामीण पेयजल प्रबंधन के पारंपरिक मॉडल में बदलाव का संकेत देता है। अब फोकस केवल निर्माण कार्यों पर नहीं, बल्कि “स्रोत से घर तक” पूरी जलापूर्ति श्रृंखला की स्थिरता पर है। इसमें जल संरक्षण, समुदाय की भागीदारी, स्थानीय निगरानी और वित्तीय जिम्मेदारी जैसे तत्वों को एक साथ जोड़ा जा रहा है।

यदि जिला प्रशासन, पंचायतें और स्थानीय समुदाय मिलकर इस मॉडल को प्रभावी ढंग से लागू करते हैं, तो इससे न केवल पेयजल आपूर्ति में सुधार होगा, बल्कि भूजल संरक्षण और जल सुरक्षा की दिशा में भी महत्वपूर्ण परिणाम देखने को मिल सकते हैं।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि अगस्त 2019 में जहां केवल लगभग 17% ग्रामीण परिवारों के पास नल जल कनेक्शन था, वहीं जल जीवन मिशन के तहत यह कवरेज बढ़कर 80% से अधिक हो चुका है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अब सबसे बड़ी चुनौती इन कनेक्शनों को दीर्घकाल तक कार्यशील बनाए रखना है। यही कारण है कि जल जीवन मिशन 2.0 के तहत ‘जल अर्पण’ योजना के माध्यम से समुदाय आधारित संचालन, स्रोत संरक्षण और वर्षा जल संचयन को विशेष महत्व दिया जा रहा है।

जल स्रोत की स्थिरता पर बढ़ा फोकस

बैठक में यह भी कहा गया कि जल जीवन मिशन 2.0 के तहत स्रोत स्थिरता को प्रमुख प्राथमिकता दी जाएगी। कई राज्यों में भूजल स्तर में गिरावट और अनियमित वर्षा के कारण ग्रामीण जलापूर्ति पर दबाव बढ़ा है। ऐसे में तालाबों, झीलों, कुओं और अन्य पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण को जलापूर्ति रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है।

बैठक में शामिल केंद्र के अधिकारियों ने जिला प्रशासन से कहा कि वे मनरेगा, कृषि विभाग, जल संसाधन विभाग और पंचायत राज संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित कर जल संरक्षण कार्यों को गति दें। वर्षा जल संचयन संरचनाओं और भूजल पुनर्भरण कार्यों को गांव स्तर की जल सुरक्षा योजना से जोड़ने पर भी जोर दिया गया।

मजबूत होगी जल गुणवत्ता की निगरानी 

ग्रामीण क्षेत्रों में फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन और अन्य प्रदूषकों से प्रभावित पेयजल स्रोतों की चुनौती को देखते हुए जल गुणवत्ता निगरानी पर विशेष चर्चा हुई। बैठक में जिला कलेक्टरों से कहा गया कि वे नियमित परीक्षण व्यवस्था को मजबूत करें और संदूषित स्रोतों के लिए वैकल्पिक सुरक्षित जल व्यवस्था सुनिश्चित करें।

जल जीवन मिशन के तहत गांवों में महिलाओं को फील्ड टेस्ट किट के उपयोग का प्रशिक्षण देने की पहल भी जारी है। इसका उद्देश्य समुदाय को जल गुणवत्ता निगरानी की प्रक्रिया में शामिल करना है ताकि समस्याओं की पहचान शुरुआती स्तर पर ही की जा सके।

पेयजल संवाद की 10वीं बैठक में जल जीवन मिशन - 2.0 की जिलावार प्रगति पर चर्चा करते अधिकारी। 

ग्राम पंचायतों की भूमिका अहम

बैठक में ग्राम पंचायतों और ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों की भूमिका पर विशेष जोर दिया गया। अधिकारियों के अनुसार, ग्रामीण जलापूर्ति व्यवस्था का सफल संचालन तभी संभव है जब स्थानीय संस्थाएं निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय हों। इसके लिए पंचायतों को योजना निर्माण, जल शुल्क प्रबंधन, रखरखाव और शिकायत निवारण की जिम्मेदारियों में अधिक सक्षम बनाया जा रहा है।

कुछ राज्यों के उदाहरणों में बताया गया कि जहां पंचायतों ने जल स्रोतों के संरक्षण और पाइपलाइन नेटवर्क की निगरानी में सक्रिय भूमिका निभाई, वहां जलापूर्ति में व्यवधान कम हुए और मरम्मत कार्य तेजी से हुए।

महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों की भी भागीदारी

बैठक के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि ग्रामीण जल प्रबंधन में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। कई राज्यों में स्वयं सहायता समूहों को जल गुणवत्ता परीक्षण, जागरूकता अभियान और संचालन एवं रखरखाव गतिविधियों से जोड़ा गया है। इससे न केवल स्थानीय क्षमता बढ़ी है, बल्कि योजनाओं के प्रति समुदाय का स्वामित्व भी मजबूत हुआ है। अधिकारियों ने जिला प्रशासन से कहा कि वे महिलाओं के समूहों को जल संरक्षण अभियानों, स्रोत संरक्षण और जल उपयोग दक्षता कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से शामिल करें।

जल सुरक्षा की योजना बनाने के निर्देश

बैठक में जिला कलेक्टरों को गांव स्तर पर व्यापक जल सुरक्षा योजनाएं तैयार करने के निर्देश दिए गए। इन योजनाओं में जल स्रोतों की स्थिति, भविष्य की मांग, वर्षा का स्‍थानीय पैटर्न, भूजल स्तर, जल की गुणवत्ता, जोखिम और संरक्षण उपायों के आकलन जैसी चीजों को शामिल किया जाएगा। उद्देश्य यह है कि प्रत्येक गांव अपनी जल आवश्यकताओं और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर दीर्घकालिक रणनीति विकसित कर सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि जल सुरक्षा योजना तैयार करने से स्थानीय स्तर पर बेहतर योजना निर्माण संभव होता है और संकट की स्थिति में वैकल्पिक स्रोतों की पहचान पहले से की जा सकती है।

निष्कर्ष : जल प्रबंधन में स्‍थानीय भागीदारी और सामूहिक जिम्‍मेदारी को मिलेगा बढ़ावा 

पेयजल संवाद की 10वीं बैठक ने स्पष्ट कर दिया कि केंद्र सरकार अब ग्रामीण पेयजल योजनाओं में सामुदायिक भागीदारी को केंद्रीय तत्व बनाना चाहती है। जल अर्पण योजना के माध्यम से गांवों में जल स्रोत संरक्षण, वर्षा जल संचयन, जल गुणवत्ता निगरानी और स्थानीय स्तर पर संचालन एवं रखरखाव को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है। जल जीवन मिशन 2.0 की सफलता केवल नल कनेक्शन की संख्या से नहीं, बल्कि सुरक्षित और निरंतर जलापूर्ति की स्थिरता से आंकी जाएगी। आने वाले समय में यह मॉडल ग्रामीण भारत में जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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