पानी की किल्लत से जूझते हमारे देश में पाइप लाइनों की खस्ता हालत और बेतहाशा लीकेज शहरी इलाकों के जल संकट को और भी गंभीर कर रहा है। इसके चलते शहरों में पाइप लाइनों के ज़रिये सप्लाई किए जाने वाले “ट्रीटेड वाटर” (उपचारित पानी) का एक बड़ा हिस्सा लोगों के घरों तक पहुंचने से पहले ही गुम हो जाता है। ऑब्ज़रर्वर रिसर्च फाउंडेशन यानी ORF की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पाइप लाइनों से भेजा जाने वाला जलापूर्ति का लगभग 38% पानी उपभोक्ताओं तक पहुंचता ही नहीं है। इसका मतलब है कि हर 100 लीटर पानी में से करीब 38 लीटर या उससे ज्यादा पाइप लाइन लीक, चोरी, अवैध कनेक्शनों के कारण पानी का हिसाब-किताब न हो पाना जैसी वजहों के चलते गायब जाता है। इसमें सबसे ज़्यादा बर्बादी पाइप लाइनों की दरारों या लीकेज के कारण होती है। पानी की बर्बादी का यह आंकड़ा 15–20% की अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्य सीमा से करीब दोगुना है। तकनीकी भाषा में इसे नॉन-रेवेन्यू वाटर (NRW) कहा जाता है।
देश भर में NRW का लगभग 75% हिस्सा यानी लगभग 28.5% (38% × 75%) पानी पाइपलाइन लीकेज और के कारण बर्बाद हो जाता है। जबकि, लगभग 25% यानी 9.5% पानी चोरी, अवैध कनेक्शन या मीटर/बिलिंग की ग़लतियों से गुम हो जाता है। ओआरएफ की रिपोर्ट के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली में NRW लगभग 58% तक पहुंच चुका है यानी आधे से ज़्यादा पानी लोगों तक पहुंचता ही नहीं। मुंबई में भी लगभग 30% और बेंगलुरु में लगभग 28% पानी डिस्ट्रीब्यूशन में ही खो जाता है। कुछ शहरों के स्थानीय रिकॉर्ड बताते हैं कि राजस्थान के उदयपुर और जयपुर में 40–44% तक पानी वितरण सिस्टम में ही लीक हो जाता है। नागपुर में एक समय NRW 40% तक पहुंच गया था, जिसे सुधार प्रयासों के ज़रिये घटाकर 28–29% तक लाया गया है। केरल में पाइप फटने और रिसाव की वजह से पानी की 20–35% तक बर्बादी दर्ज की गई है।
केरल के कोच्चि और तिरुअनंतपुरम जैसे प्रमुख शहरों में पाइप फटने और रिसाव की वजह से पानी की 20–35% तक बर्बादी दर्ज की गई है। इन आंकड़ों का मतलब साफ है कि भारत में हर साल अरबों लीटर साफ, पिए जाने योग्य पानी पाइप लाइनों में ही खो जाता है, जिसका असर जल सुरक्षा, आर्थिक लागत और लोगों की सेहत पर पड़ता है। इस तरह NRW का यह चिंताजनक आंकड़ा राष्ट्रीय स्तर पर जल प्रबंधन प्रणाली में लापरवाही और विफलता का प्रमाण है।
नॉन-रेवेन्यू वाटर (NRW) केवल जलापूर्ति से जुड़ी एक तकनीकी खामी या इंजीनियरिंग की गड़बड़ी नहीं, बल्कि शहरी जल प्रशासन की एक ऐसी संरचनात्मक समस्या है, जो प्लानिंग की कमी और भविष्य की आवश्यकताओं के प्रति अदूरदर्शिता को भी दर्शाती है। यह पाइपों के लीकेज से लेकर जल उपयोग का सटीक डेटा नहीं, आपूर्ति नेटवर्क के आधे-अधूरे नक्शों और जलापूर्ति व्यवस्था में जिम्मेदारी या जवाबदेही की कमजोरी जैसी चीजों को भी प्रदर्शित करती है।
भारत के अधिकांश शहरों में पानी की आपूर्ति की योजना, निगरानी और जवाबदेही के बीच बड़े गैप देखने को मिलते हैं। इसके अलावा देश में बढ़ते जा रहे जल संकट के बावज़ूद जलापूर्ति से जुड़े महकमों में पानी को “सीमित संसाधन” की बजाय अब भी “असीम आपूर्ति” की तरह देखने का नज़रिया ही दरअसल इस समस्या की जड़ है। नतीजतन, लीकेज, चोरी या गलत बिलिंग को अक्सर छोटी-मोटी समस्या मानकर छोड़ दिया जाता है। इस लापरवाही भरे नज़रिये के चलते ही जल वितरण में पारदर्शिता की कमी, अनियमित निगरानी और तकनीकी-प्रशासनिक तालमेल के अभाव में ट्रीट किया गया पानी लोगों तक पहुंचने से पहले ही वाटर सप्लाई सिस्टम से बाहर निकल जाता है।
यही वजह है कि NRW धीरे-धीरेजल संकट का अदृश्य लेकिन सबसे महंगा और गंभीर पहलू बनता जा रहाहै। नीचे NRW के प्रमुख कारणों को इन बिंदुओं के ज़रिये समझा जा सकता है-
देश के ज़्यादातर शहरों की जल आपूर्ति पाइप लाइनें अक्सर 30–50 साल पुरानी होती हैं। कोलकाता, दिल्ली, लखनऊ, हैदारबाद, वाराणसी, चेन्नई, मुंबई जैसे देश के दर्ज़नों पुराने शहरों के घनी आबादी वाले पुराने इलाकों में तो सौ से डेढ़ सौ साल पुरानी पाइप लाइनें भी देखने को मिलती हैं। जंग लगी पाइपें, कमज़ोर या उधड़ चुके जोड़ (जॉइंट), समय-समय पर सड़क निर्माण या मेट्रो/केबल डालने के दौरान हुई क्षति से पाइपों में दरारें पड़ने से लीकेज पैदा होने की समस्याएं आमतौर पर देखने को मिलती हैं। कई बार ये रिसाव पक्की सड़कों के नीचे जमीन में कई फुट की गइराई में होते हैं, जिनका पता वर्षों तक नहीं चलता। इनसे लगातार बहता यह पानी न केवल बर्बाद होता है, बल्कि आसपास की मिट्टी को कमजोर कर सड़कों और इमारतों के धंसने जैसी समस्याएं भी पैदा करता है।
पानी के कनेक्शन लेने की प्रक्रिया की जटिलताओं और लचर विभागीय कार्यशैली के चलते कई शहरों में लोग लोकल प्लंबरों से अवैध कनेक्शन करा लेते हैं। इसके अलावा पानी की आपूर्ति अनियमित होने के कारण भी लोग पंपिंग स्टेशन से टंकियों तक पानी पहुंचाने वाली मेन पाइप से सीधे कनेक्शन करा लेते हैं। इसमें पाइप लाइन को ठीक से सील न किए जाने के कारण लीकेज रह जाते हैं। झुग्गी-बस्तियों और घनी आबादी वाले व्यावसायिक इलाकों में तो बिना मीटर के ऐसे अवैध कनेक्शनों की भरमार होती है, जो सिस्टम से पानी खींचते रहते हैं। चूंकि इनकी एंट्री जलापूर्ति के तो रिकॉर्ड में नहीं होती और न ही इनकी बिलिंग होती है। इसलिए इन अवैध कनेक्शनों के ज़रिये इस्तेमाल किया जाने वाला पानी सीधे नॉन-रेवेन्यू वाटर के खाते में चला जाता है। इस तरह जहां सिस्टम कमजोर होता है, वहां पानी चोरी-छिपे सिस्टम के दायरे से बाहर जाता है। यह वैध उपभोक्ताओं पर दबाव बढ़ाता है, क्योंकि जलापूर्ति की मात्रा वैध कनेक्शनों के हिसाब से ही तय की जाती है।
कई शहरों में कई जगहों पर या तो मीटर लगे ही नहीं हैं या फिर पुराने और खराब मीटर गलत रीडिंग देते हैं। कहीं मीटर तो हैं, लेकिन नियमित रीडिंग और बिलिंग की व्यवस्था नहीं। इसका नतीजा यह होता है कि पानी सप्लाई तो हो रही है, लेकिन उसका हिसाब-किताब नहीं हो पा रहा। तकीनीकी भाषा में यह स्थिति “अनमीटरीकरण” कहलाती है, जो NRW का एक बड़े हिस्से का कारण बनती है, क्योंकि पानी जब मापा ही नहीं जाएगा, तो उसका नुकसान दिखेगा भी नहीं।
जल आपूर्ति में दबाव (प्रेशर) का संतुलन बेहद अहम होता है। ऊंची इमारतों वाले शहरों में और दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, रांची जैसे ऊंचाई-निचाई पर बसे कई शहरों में कभी बहुत तेज दबाव के साथ पानी की सप्लाई करनी पड़ती है, तो कभी प्रेशर सामान्य या बिल्कुल कम रहता है। दबाव के इस उतार-चढ़ाव (प्रेशर फ्लक्चुएशन) से कमजोर पाइप अकसर फट जाती हैं। इस तरह जल आपूर्ति में दबाव का असंतुलन सिस्टम को अंदर से तोड़ देता है। खासकर गर्मियों में जब मांग बढ़ती है, तब यह समस्या और गंभीर हो जाती है। कमजोर नेटवर्क इस दबाव को झेल नहीं पाता और लीकेज कई गुना बढ़ जाते हैं।
हाल के वर्षों में हमारे देश की वाटर सप्लाई लाइन की एक कड़वी हकीक़त यह भी बन गई है कि जहां पाइपलाइन कमजोर होती है, वहां टैंकर मजबूत हो जाते हैं। कई शहरों में जल आपूर्ति की खामियों ने एक समानांतर जल अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है, जिसकी चाबी आमतौर पर शहर के लोकल “टैंकर माफिया” के हाथों में होती है। इसमें दबंगई और विभागीय साठगांठ दोनों की बराबर की भूमिका होती है। पाइपलाइनों की मरम्मत में देरी, जानबूझ कर पाइप लाइन में कम प्रेशर पर पानी छोड़ना और पंपिंग स्टेशन या लाइन में ख़राबी के नाम पर कई इलाकों में पानी की सप्लाई बाधित रखना। ये सभी तरीके इस टैंकर माफिया की अनौपचारिक व्यवस्था को फलने-फूलने का मौका देते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि इसकी मोटी कमाई में महकमे के जिम्मेदारों की भी गुपचुप हिस्सेदारी होती है।
यह गठजोड़ इतना गहरा होता है कि कई मामलों में तो लाखों लीटर ट्रीटेड पानी सीधे या परोक्ष रूप से टैंकरों में उड़ेल दिया जाता है। इसकी न तो कोई मीटरिंग होती है, न ही बिलिंग। मुफ़्त में लिया गया यह पानी उन्हीं इलाकों में मनमाने दामों पर बेचा जाता है, जहां विभागीय साठगांठ से नियमित जलापूर्ति कमजोर कर दी गई होती है। इस तरह स्थानीय प्रबंधन से टैंकर माफिया साठगांठ धीरे-धीरे NRW को और बढ़ाती जाती है। इसका असर दोहरा होता है। एक तरफ तो इससे नगर निकाय को राजस्व का नुकसान होता है, दूसरी तरफ आम उपभोक्तओं को अलग से पैसे ख़र्च करके पानी खरीदना पड़ता है। यही वजह है कि कई शहरों में टैंकर माफिया अब पानी की कमी की देन नहीं, बल्कि उसकी वजह बनता जा रहे हैं।
इन सभी कारणों का कुल मिला कर असर यह होता है कि लाखों-करोड़ों लीटर साफ व पीने लायक पानी शहरों के वाटर सप्लाई सिस्टम से चुपचाप बाहर निकल जाता है, बिना इस बात की जानकारी के कि आखि़र इतना सारा पानी कहां गया? पानी की यह छिपी हुई बर्बादी गर्मियों में जल संकट को और गंभीर बना देती है। इसके चलते एक तरफ लोग टैंकरों पर निर्भर होते हैं, दूसरी तरफ ट्रीटेड पानी जमीन के नीचे बह रहा होता है। नॉन-रेवेन्यू वाटर की समस्या केवल “कम पानी” की नहीं, बल्कि खराब प्रबंधन और जर्जर ढांचे की कहानी है। इसलिए जब तक लीकेज नियंत्रण, मीटरिंग में सुधार और नेटवर्क के आधुनिकीकरण को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक नई जल परियोजनाएं भी अधूरी साबित होंगी। असल समाधान पानी खोजने और आपूर्ति बढ़ाने में नहीं, बल्कि जो पानी हमारे पास है, उसे बचाने और सही तरह से सही जगह तक पहुंचाने में छुपा है।
पानी के संकट से निपटने के लिए अमेरिकी राज्य टेक्सास के लोगों ने एक बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने अगले 20 वर्षों में जलापूर्ति, जल संरक्षण, सीवेज सिस्टम में सुधार और बाढ़ से जुड़ी परियोजनाओं के लिए लगभग 20 अरब डॉलर का कोष बनाने के प्रावधान Proposition 4 को 2025 के चुनाव में भारी बहुमत से पास किया। यह राशि बिक्री कर की आय से सीधे पानी के फंड में निवेश के रूप में जाएगी और 2047 तक हर साल इसे लगभग 1 अरब डॉलर की रकम दी जाएगी। इस फंड का लक्ष्य है :
पाइपलाइनों की मरम्मत और अद्यतन
नई जल आपूर्ति परियोजनाओं को शुरू करना
भूमिगत जल संसाधनों की सुरक्षा के लिए योजनाएं लागू करना
पानी की गुणवत्ता सुधारना और रिसाव कम करना
रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रस्ताव को नेशनल वाइल्ड लाइफ फेडरेशन एक्शन फंड सहित कई पर्यावरण और पानी के क्षेत्र के समूहों का समर्थन मिला, जो इसे टेक्सास के पानी की सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक प्रयास मानते हैं। देखने वाली बात यह है कि हमारे देश में पानी के मुद्दे पर इस तरह की काई दूरदर्शी और बड़ी पहल कभी देखने को मिलेगी क्या? अगर हां, तो कब? अगर भारत इस दिशा में कोई ऐसा ही ठोस कदम उठाए, जैसा कि टेक्सास ने भविष्य मे जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया है, तो देश में खस्ताहाल जलापूर्ति नेटवर्क को काफ़ी हद तक सुधारा जा सकता है, बल्कि पानी की बर्बादी को रोका और भूजल के स्तर को भी सुधारा जा सकता है।
इस तरह हम देखते हैं कि भारत में नॉन-रेवेन्यू वाटर की समस्या जितनी गहरी है, उससे निकलने की राह भी उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। सबसे बड़ी बाधा पुरानी और जर्जर जल आपूर्ति इन्फ्रास्ट्रक्चर है, जो आज की आबादी की बढ़ती ज़रूरतों और दबाव को झेलने में सक्षम नहीं रह गया है। इसके साथ ही पानी के प्रवाह, दबाव और नुकसान को मापने के लिए विश्वसनीय डेटा और मज़बूत मॉनिटरिंग सिस्टम का अभाव ने स्थिति को और गंभीर बना रखा है।
नगर निकायों की सीमित वित्तीय क्षमता के कारण जलापूर्ति नेटवर्क की मरम्मत और अपग्रेडेशन को लगातार टाल दिया जाता है, जिसका फायदा अवैध कनेक्शनों के ज़रिये पानी की चोरी और समानांतर टैंकर अर्थव्यवस्था उठा रही है।
समाधान की दिशा में पहला कदम तो पानी को “असीमित संसाधन” मानने की सोच बदलना है। इसके अलावा स्मार्ट मीटरिंग, रीयल-टाइम लीकेज डिटेक्शन और प्रेशर मैनेजमेंट जैसी तकनीकों से यह जाना जा सकता है कि पानी कहां और कितना खो रहा है। उसके अनुरूप ही पाइप लाइन नेटवर्क के चरणबद्ध नवीनीकरण और संवेदनशील इलाकों में दबाव नियंत्रण से रिसाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि जन जागरूकता, सख़्त जुर्माना नीति और पारदर्शी कार्रवाई के ज़रिये भी अवैध कनेक्शनों और पानी की चोरी पर भी अंकुश लगाना होगा। सबसे अहम यह कि जल आपूर्ति से जुड़े आंकड़ों को मुक्त और सार्वजनिक बनाया जाए, ताकि नीति निर्धारण केवल अनुमान पर नहीं, बल्कि ठोस तथ्यों पर आधारित हो। अगर इन मोर्चों पर एक साथ काम किया गया, तो नॉन-रेवेन्यू वाटर केवल एक समस्या नहीं, बल्कि सुधार का सबसे बड़ा अवसर बन सकता है।
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