नेपाल सीमा से सटे कतर्नियाघाट के जंगलों के बीच बहने वाली गेरुआ व कौड़ियाला नदी में इन दिनों अंडों से  घड़ियाल के बच्‍चे निकल रहे हैं। 

 

फोटो : घड़ियाल कंजर्वेशन प्रोग्राम 

पर्यावरण

गेरुआ, कौड़ियाला नदी की गोद में जन्‍म ले रही घड़ियालों की नई पीढ़ी, 500 बच्चों ने खोलीं आंखें

नेपाल सीमा से सटे कतर्नियाघाट के जंगलों के बीच रंग ला रही है वन विभाग की घड़ियाल संरक्षण की मुहिम

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

कुदरत के कुशल कारीगर माने जाने वाले घडि़यालों को लेकर एक अच्‍छी खबर सामने आई है। भारत-नेपाल सीमा से सटे कतर्नियाघाट के जंगलों के बीच बहने वाली गेरुआ व कौड़ियाला नदी में इन दिनों इन उभयचर सरिसृपों की नई पीढ़ी जीवन की एक नई कहानी लिख रही है। नदी के बीच वन्‍य जीव प्रभाग द्वारा संरक्षित किए गए रेतीले टापुओं पर करीब दो महीने पहले मादा घड़ियालों के दिए गए अंडे से अब बच्चे बाहर आने लगे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बीते सप्‍ताह तक टापू पर मौजूद 18 नेस्ट खुल चुके हैं। इनमें रखे अंडों से 500 से अधिक नन्हे घड़ियाल बाहर निकल चुके हैं। इससे वन विभाग और वन्यजीव प्रेमियों में भी उत्साह है।

अंडों से निकले ज्‍़यादातर बच्चे  जीवन का अगले चरण की ओर कदम बढ़ते हुए अपनी माताओं के साथ गेरुआ और कौड़ियाला नदी की धारा में चले गए हैं। कमजोर और संरक्षण की जरूरत वाले सुरक्षित शिशुओं को कतर्नियाघाट स्थित घड़ियाल संरक्षण केंद्र के तालाब में रखा गया है। यहां इन्‍हें जरूरी पोषण व उपयुक्‍त माहौल देकर इनकी निगरानी कर की जा रही है।

अगले कुछ दिनों में कई और नेस्ट भी खुलने की संभावना है। अंडों व घडि़याल के बच्‍चों की सुरक्षा के लिए टापू क्षेत्र की कड़ी निगरानी की जा रही है, ताकि किसी प्रकार की मानवीय दखल, शिकार या प्राकृतिक खतरों से इन्‍हें कोई नुकसान न पहुंचने पाए। अंडों की रखवाली के लिए चार वनकर्मियों की टीम को तैनात किया गया है, जो इस क्षेत्र में होने वाली हर हलचल पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।

संरक्षण प्रयासों को सफलता मिलने से उत्‍साह

नेपाल में हिमालय की तलहटी से निकल कर भारत आने वाली गेरुआ और कौड़ियाला नदी देश के महत्वपूर्ण घड़ियाल प्रजनन स्थलों में शामिल है। इस वर्ष बड़ी संख्या में बच्चों का निकलना संरक्षण प्रयासों की सफलता का प्रमाण है। इस साल की शुरुआत में ही  घड़ियालों के प्रजनन के लिए नदी के बीचोबीच व किनारों पर बने रेतीले टीलों को सुरक्षित कर दिा गया था। फरवरी-मार्च में मादा घडि़यालों ने 26 घोसले बनाए। हर घोसले में मादा घड़ियाल 30 से 40 अंडे देती है। संरक्षण के इन प्रयासों को मिल रही सफलता से वन विभाग और वन्यजीव प्रेमियों में भी उत्साह है।

सर्दियों के बाद शुरू होती है ‘नेस्टिंग' की प्रक्रिया

मादा घड़ियालों के घोसला बनाने और उसमें अंडे देकर उन्‍हें रेत में दबाने की प्रक्रिया को ‘नेस्टिग' कहा जाता है। यह एक नियमित प्रक्रिया है। इसके तहत हर साल सर्दी खत्‍म होने के बाद मार्च और अप्रैल के बीच नदी के टापुओं पर घोंसले बनाती हैं। मिट्टी और हवा में बारिश की नमी आने के बाद 15 जून के बाद इन अंडों से बच्चे निकलने शुरू हो जाते हैं। इस साल मानसून में देरी होने के कारण यह प्रक्रिया भी कुछ देर से जुलाई में शुरू हुई है। लेकिन, अच्‍छी बात यह है कि इसका अंडों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा और घड़ियालों का नया कुनबा नदी के पानी में अठखेलियां करता नजर आ रहा है। अंडों से निकले नवजात घडि़यालों की सुरक्षा के लिए, मादा घड़ियालों ने जिन स्थानों पर अंडे दिए हैं, वहां आम लोगों और पर्यटकों के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। साथ ही वन विभाग घोंसलों और बच्‍चों की निगरानी कर रहा है। 

सोन नदी में अवैध रेत खनन से घड़ियालों को खतरा

घड़ियालों, मगरमच्‍छों और कछुओं के प्राकृतिक आवास के लिए मशहूर सोन नदी बालू माफियाओं के अवैध रेत उत्‍खनन का शिकार हो रही है। मनमाने ढंग से भारी मात्रा में की जा रही रेत की खुदाई से नदी की धाराएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं और इसका जलस्‍तर भी घटता जा रहा है। इसका काफ़ी बुरा असर नदी में रहने वाले घड़ियालों, मगरमच्‍छों सहित सोन नदी के पूरे पार‍िस्थितिक तंत्र पर पड़ रहा है। खासकर मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश की सीमा में हो रहे अवैध खनन ने सोन घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य यानी सोन घड़ियाल वाइल्‍ड लाइफ सेंक्‍चुअरी को बुरी तरह प्रभावित किया है। यह घड़ियालों की यह सेंक्‍चुअरी मध्य प्रदेश के सिद्धी ज़िले में सोन नदी के किनारे स्थित है। इसे घड़ियाल और मगरमच्छ, कछुओं, तथा अन्य जलीय-स्थलीय जीवों के संरक्षण के लिए बनाया गया था। एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2021 तक सोन नदी में संख्या घटकर करीब 20 हो गई थी। इसके अलावा कछुओं और नदी में रहने वाले अन्‍य कई जीव-जंतुओं के बसेरों और प्रजनन स्थलों को भी अवैध खनन से गंभीर खतरा है। एक अन्‍य मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नदी में बचा एकमात्र नर घड़ियाल अब गायब है। 

दुनिया के 98% से अधिक जंगली घड़ियाल पाए जाते हैं भारत में
भारत घड़ियाल का सबसे बड़ा प्राकृतिक आवास है। उत्तर प्रदेश की कतरनियाघाट वन्यजीव अभयारण्य, राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य, मध्य प्रदेश और बिहार की कुछ नदी प्रणालियां इनके प्रमुख आवास हैं। नेपाल में भी इनकी एक छोटी आबादी मौजूद है।

अवैध खनन के ऐसे ही एक मामले में पिछले साल राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने सख्‍ती दिखाते हुए सोनभद्र में अवैध खनन के आरोपों की जांच के मामले में ढिलाई बरतने पर ज़िले के डीएम पर 10 हज़ार रुपए का ज़ुर्माना लगाया था। अदालत ने यह कार्रवाई कोर्ट के निर्देश के बावज़ूद अवैध खनन की जांच पूरी करने में देरी के चलते की।  लॉ बीट की रिपोर्ट के अनुसार 3 नवंबर 2025 को इस मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव, अध्यक्ष और डॉ. ए. सेंथिल वेल, विशेषज्ञ सदस्य की पीठ ने कहा कि ज़िला मजिस्ट्रेट के आचरण से न्यायाधिकरण के आदेशों का पालन करने में तत्परता की कमी दिखी, जिससे कार्यवाही में देरी हुई। ट्रिब्‍यूनल ने अवैध खनन के मामले की जांच कर रिपोर्ट देने के लिए 23 अप्रैल को एक समिति गठित की थी, जिसमें डीएम को नोडल एजेंसी के रूप में नामित किया गया था। समिति को साइट का दौरा करके 23 जून तक रिपोर्ट देनी थी। पर, एनजीटी को रिपोर्ट नहीं दी गई। एनजीटी में पवन कुमार बनाम भारत संघ एवं के मामले में कोर्ट को बताया गया कि अधिकारियों ने जांच में लापरवाही बरतने के साथ ही अवैध रेत खनन के सबूत मिटाने में रेत माफियाओं की मदद भी की थी।

भारत में सोन, कुकरैल, चंबल और गेरुआ नदी को घड़ियालों का प्रमुख आवास माना जाता है। जहां इनके संरक्षण के प्रयास भी चल रहे हैं।

कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र की अहम भूमिका

लखनऊ के कुकरैल घड़ियाल पुनर्वास केंद्र को भी घड़ियालों के संरक्षण के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। पिछले महीने यहां में चंबल नदी से लाए गए 500 अंडों से बच्चे निकले हैं, जिससे केंद्र में करीब 400 नए घड़ियालों के जुड़ने की उम्मीद है। इन्हें मिलाकर केंद्र घड़ियालों की संख्या 866 हो जाएगी। इन घड़ियाल के बच्चे सवा मीटर की लंबाई होने और ढाई वर्ष पूरा होने पर किसी नदी में छोड़ा जाएगा। अंडों को चंबल से लाने का मकसद यह रहता है कि वहां अंडे से बाहर आने के बाद नदी में वह शिकार हो जाते थे और नवजातों की मृत्यु दर बढ़ने से इसकी संख्या लगातार गिरने के कारण ही 1975 में घड़ियाल पुनर्वास केंद्र की स्थापना की गई थी। घड़ियाल पुनर्वास केंद्र में अंडों से लाकर 60 से 65 दिन की अवधि में आवश्यक तापमान पर इनक्यूबेट कर बच्चे तैयार किए जाते हैं। बड़ा होने पर इन्‍हें उन्‍हीं नदियों में छोड़ दिया जाता है, जहां से अंडे लाए गए थे। यहां से घड़ियालों को विदेशों में भी भेजा गया है। सन 1970 में हुए सर्वे में देशभर में घड़ियालों की संख्‍या सिमट कर ढाई सौ से तीन सौ तक सिमट जाने के बाद ही लखनऊ कुकरैल में पुनर्वास की स्थापना की गई थी।  कुकरैल नदी के आस पास के जंगलों को लखनऊ का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण शहरी वन क्षेत्र माना जाता है। 1950 के दशक में विकसित इस वन क्षेत्र को शहर के "ग्रीन लंग्स" के रूप में देखा जाता है। यहां घड़ियाल संरक्षण केंद्र, विविध पक्षी प्रजातियां और उल्लेखनीय जैव विविधता मौजूद है।

राजस्थान सरकार ने घटाया चंबल नदी के घड़ियाल अभयारण्य क्षेत्र

हाल ही में राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के 732 हेक्टेयर इलाके को राजस्थान सरकार ने डी-नोटिफाइड कर क्रोकोडइल सेंचुरी से बाहर क दिया है। सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर अभयारण्य के एक बड़े इलाक़े में 1983 से लागू प्रतिबंधों को हटा दिया है। इस विवादास्‍पद कदम से चंबल नदी में लुप्‍त हो रहे घड़ियालों के अस्तित्‍व का संकट और भी ज्‍यादा खतरे में पड़ गया है। 

3 जनवरी 2025 को जारी राजस्‍थान सरकार की सरकार की अधिसूचना ने कोटा से सटे राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य का नक्शा ही बदल दिया है। चंबल के इस इलाके को घड़ियाल, डॉल्फिन और दुर्लभ जलीय जीवों के लिए सुरक्षित घोषित किया गया था, जिसके चलते यहां इनकी अच्‍छी खासी आबादी थी। नए सरकारी आदेश के बाद अब इसका एक बड़ा इलाक़ा उनके हाथों से निकलने जा रहा है। 

अधिसूचना के अनुसार चंबल घड़ियाल अभ्‍यारण्य क्षेत्र अब जवाहर सागर बांध से हैंगिंग ब्रिज तक होगा, जो पहले कोटा बैराज तक फैला हुआ था। गैर-अधिसूचित किए गए क्षेत्र में हैंगिंग ब्रिज से लेकर कोटा बैराज तक का वन क्षेत्र, नदी तटवर्ती क्षेत्र और निर्जन भूमि शामिल है। नई अधिसूचना के बाद 206 खसरों पर लगा प्रतिबंध अब हट गया है। इसके बाद किशोरपुरा का 208.56 हेक्टेयर, शिवपुरा का 320.33 हेक्टेयर, सकतपुरा का 186.36 हेक्टेयर, रामपुरा का 0.7, गुमानपुरा का 3.93 और नयागांव का 12.12 हेक्टेयर एरिया सेंचुरी से बाहर हो गया। सरकार के इस फैसले को लेकर प्रकृति प्रेमी और पर्यावरणविद चिंता जता रहे हैं। उनका कहना है कि इसका सीधा सा मतलब यह है कि अब इससे अस्तित्‍व का संकट झेल रहे लुप्‍तप्राय घड़ियालों का ठिकाना अब और भी सिकुड़ जाएगा। 

हाल ही में लिया गया राजस्‍थान सरकार का यह फैसला न केवल मनमाना और बेतुका है, बल्कि यह पर्यावरण के प्रति उसकी असंवेदनशीलता को भी दर्शाता है। सरकार चंबल राष्‍ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य के एक बड़े हिस्‍से को उससे अलग करके वहां विकास के नाम पर अपनी मर्ज़ी की गतिविधियां करना चाहती है। यह घड़ियालों को उनके प्राकृतिक आवास से खदेड़ कर अपने लोगों को खुश और लाभान्वित करने वाला कदम है, जो स्‍पष्‍ट तौर पर वोटों की राजनीति से प्रेरित लगता है। सियासी फ़ायदे के लिए लुप्‍तप्राय घड़ियालों, प्रकृति और चंबल नदी के पूरे पारिस्थितिक तंत्र से इस तरह का खिलवाड़ अस्‍वीकार्य है।
डॉ. सुधांशु, पर्यावरण विशेषज्ञ और पीपल्स ग्रीन पार्टी के अध्‍यक्ष

जानिए घड़ियाल को

वर्ग : सरीसृप (Reptilia)
गण : क्रॉकोडाइलिया (Crocodilia)
कुल : गैवियालिडी (Gavialidae)
वैज्ञानिक नाम : Gavialis gangeticus

शारीरिक बनावट : इसकी त्वचा बहुत कड़ी और मजबूत होती है तथा इसका थूथन अन्य मगरमच्छों की तुलना में काफी लंबा और पतला होता है। वयस्क नर के थूथन के सिरे पर घड़े जैसी उभरी हुई संरचना विकसित होती है, जिसे 'घड़ा' कहा जाता है।
आकार : वयस्क घड़ियाल की लंबाई सामान्यतः 4 से 6 मीटर तक होती है। नर मादा से बड़े होते हैं।
वजन : वयस्क नर का वजन 160 से 250 किलोग्राम या इससे अधिक हो सकता है।
आहार : यह मुख्य रूप से मछली खाने वाला और शांत स्वभाव का जीव है।
आवास : बड़ी, गहरी और साफ पानी वाली नदियां, जहां रेतीले तट मौजूद हों।
प्रजनन : मादा रेतीले किनारों पर गड्ढा बनाकर लगभग 30 से 60 अंडे देती है। अंडों से बच्चे निकलने में लगभग 70 से 90 दिन लगते हैं।
जीवनकाल: प्राकृतिक वातावरण में लगभग 40 से 60 वर्ष तक जीवित रह सकता है।
भारत में मौजूदगी : उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और असम की कुछ नदी प्रणालियों में पाया जाता है। इसकी प्रमुख आबादी चंबल, गिरवा (कतरनियाघाट), गंडक, सोन और घाघरा जैसी नदियों में मिलती है।
संरक्षण स्थिति: International Union for Conservation of Nature की रेड लिस्ट में गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में शामिल है।
मुख्य खतरे : नदी प्रदूषण, बांध और बैराज, रेत खनन, मछली पकड़ने के जाल में फंसना, नदी तटों का अतिक्रमण और प्राकृतिक आवास का नष्ट होना।
विशेषता : घड़ियाल मनुष्यों के लिए लगभग हानिरहित माना जाता है। इसका पतला थूथन बड़ी मछलियों को तेजी से पकड़ने के लिए विकसित हुआ है, लेकिन यह बड़े शिकार को पकड़ने में सक्षम नहीं होता। नर के थूथन पर बना 'घड़ा' प्रजनन काल में आवाज निकालने और मादाओं को आकर्षित करने में सहायक होता है।

1970 में घटकर महज़ 200 रह गई थी वयस्क घड़ियालों की संख्‍या
एक समय हजारों की संख्या में मिलने वाले घड़ियाल आज गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। 1970 के दशक तक इनकी संख्या घटकर लगभग 200 से भी कम प्रजननक्षम (Breeding) वयस्क घड़ियाल रह गई थी। संरक्षण कार्यक्रमों से इनकी संख्या में सुधार हुआ है, लेकिन यह प्रजाति आज भी IUCN की रेड लिस्ट में 'गंभीर रूप से संकटग्रस्त' (Critically Endangered) श्रेणी में शामिल है।

प्रकृति के कुशल सफाईकर्मी हैं घड़ियाल

घड़ियाल को आमतौर पर मछली खाने वाले जीव के रूप में जाना जाता है, लेकिन नदी पारिस्थितिकी तंत्र में इसकी भूमिका इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यह बीमार, घायल और कमजोर मछलियों का शिकार करके उनके अनियंत्रित प्रसार को रोकता है। कई बार यह नदी में बहकर आने वाले मृत जलीय जीवों को भी खा लेता है, जिससे पानी में सड़न और जैविक प्रदूषण कम होता है। इस तरह घड़ियाल नदी को स्वच्छ बनाए रखने में अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देता है। इसलिए इसे नदी का प्राकृतिक 'सफाईकर्मी' भी कहा जाता है।

घड़ियाल की मौजूदगी इस बात का भी संकेत मानी जाती है कि नदी अपेक्षाकृत स्वच्छ है, उसमें पर्याप्त मछलियां हैं और रेतीले तट सुरक्षित हैं। जिस नदी में घड़ियाल स्वस्थ आबादी के साथ जीवित रह सकते हैं, वहां का जलीय पर्यावरण भी सामान्यतः बेहतर स्थिति में माना जाता है।

नदियों के पारिस्थितिक तंत्र के महत्वपूर्ण प्रहरी

घड़ियाल नदी के खाद्य जाल (Food Web) का एक महत्वपूर्ण शीर्ष शिकारी (Top Predator) है। यह मछलियों की विभिन्न प्रजातियों के बीच प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है, जिससे किसी एक प्रजाति की अत्यधिक वृद्धि नहीं हो पाती। इसका लाभ पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को मिलता है।

घड़ियाल के संरक्षण का अर्थ केवल एक संकटग्रस्त जीव को बचाना नहीं है, बल्कि पूरी नदी, उसकी जैव विविधता और उससे जुड़े असंख्य जीवों की रक्षा करना भी है। जिस नदी में घड़ियाल सुरक्षित रहते हैं, वहां डॉल्फिन, कछुए, ऊदबिलाव, प्रवासी पक्षी और अनेक स्थानीय मछली प्रजातियों के लिए भी अनुकूल वातावरण बना रहता है। इसलिए वैज्ञानिक घड़ियाल को 'अम्ब्रेला स्पीशीज' (Umbrella Species) मानते हैं। इसका संरक्षण करने से पूरे नदी तंत्र और उससे जुड़े अनेक जीवों का संरक्षण स्वतः हो जाता है।

इसी कारण घड़ियाल को नदी पारिस्थितिकी तंत्र का 'स्वास्थ्य सूचक' (Indicator Species) भी माना जाता है। किसी नदी में घड़ियालों की बढ़ती या स्थिर आबादी इस बात का संकेत होती है कि वहां पानी की गुणवत्ता, मछलियों की उपलब्धता और प्राकृतिक आवास अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। दूसरी ओर, इनकी संख्या में गिरावट नदी के बिगड़ते पर्यावरण, प्रदूषण या मानवीय हस्तक्षेप का प्रारंभिक संकेत भी हो सकती है।

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