दुर्लभ पक्षी गरुड़ 

 
पर्यावरण

दुर्लभ पक्षी प्रजाति ‘गरुड़’ के लिए 'सुरक्षित घर' कैसे बना भागलपुर का कदवा दियारा?

यह कहानी है बिहार के गाँव कदवा दियारा की जहां के लोगों का अटूट रिश्‍ता दुर्लभ पक्षी प्रजाती 'गरुड़' के साथ है। यहां ऐसा क्या हुआ कि यहां युवा भईया-दीदी से ‘गरुड़ सेवियर’ बन गए, महिलाएं ‘गरुड़ सेविका’ और बुजुर्ग ‘गरुड़ गार्जियन’। जन-सहभागिता के इस अनोखे मॉडल ने भागलपुर का नाम पूरे विश्‍व में रौशन कर दिया।

Author : नीतू सिंह

भागलपुर (कदवा दियारा)। बिहार का भागलपुर सिल्क के उत्पादन के लिए तो हमेशा से प्रसिद्ध रहा है लेकिन बीते कुछ वर्षों में यह इंसानों और पक्षियों के बीच बनाये गए एक अनूठे रिश्‍ते के लिए जाना जा रहा है। यहां पाए जाने वाले ग्रेटर एडजुटेंट और स्थानीय लोगों के बीच एक अटूट रिश्‍ता बन गया है, जिसकी वजह से विश्व की अत्यंत संकटग्रस्त प्रजातियों में से एक इस पक्षी की जनसंख्‍या में तेज़ी से वृद्ध‍ि हुई है। स्थानीय लोग इस पक्षी को गरुड़ कहते हैं।  

भागलपुर में जन-समुदाय की सहभागिता से गरुड़ की एक दुर्लभ प्रजाति “ग्रेटर एडजुटेंट” का तेज़ी से प्रजनन संभव हुआ है और देखते ही देखते यहां के लोगों का इस पक्षी के गहरा रिश्ता बन गया।

ठंड के मौसम में कोसी कदवा दियारा क्षेत्र में पक्षियों की बड़ी हलचल रहती है। बड़े-बड़े बरगद और पीले के पेड़ों में पतली लकड़ियों से बने घोंसलों में गरुड़ अपने बच्चों को उड़ान के लिए तैयार करते हैं। कभी इस इलाके में इस पक्षी को लोग पहचानते तक नहीं थे लेकिन आज स्थानीय लोगों की पहल से यहां देश-दुनिया से लोग घूमने आते हैं। यह बदलाव किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि गाँव के लोगों की सामूहिक कोशिश का नतीजा है।

कदवा दियारा क्षेत्र - विश्‍व का तीसरा सबसे बड़ा गरुड़ प्रजनन क्षेत्र 

भागलपुर जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर नवगछिया का कोसी कदवा दियारा क्षेत्र विश्व का तीसरा सबसे बड़ा गरुड़ प्रजनन क्षेत्र है और भारत का दूसरा। सामुदायिक प्रयास को देखते हुए राज्य सरकार ने भागलपुर में दुनिया का पहला गरूड़ पुनर्वास केंद्र खोला। इससे ग्रामीणों का उत्साह कई गुना बढ़ गया।

गरुड़ प्रजनन क्षेत्र भागलपुर 

सुबह के नीले आसमान में पीपल के पेड़ के ऊपर विशाल पंखों की आहट बेहद खूबसूरत लग रही है। पेड़ के नीचे दो लोग रस्सी का जाल जमीन और पेड़ के बीचो-बीच बांधने में जुटे हैं। यह जाल किसी पक्षी को फसाने की तैयारी नहीं बल्कि उन्हें बचाने के लिए बाँधा जा रहा है। ग्रेटर एडजुटेंट के छोटे बच्चे अक्सर घोसले से नीचे गिर जाते हैं जिससे वो घायल हो जाते हैं। इनके बच्चों को चोट न लगे और उन्हें वक़्त से इलाज मिल सके इसके लिए यह जाल स्थानीय लोग बिछा रहे थे। 

जाल लगा रहे नगीना राय बताते हैं, “मैं और मेरा बेटा हम दोनों गरुड़ की सुरक्षा के लिए काम करते हैं। सितंबर महीने से इन पक्षियों का आना शुरू हो जाता है। गरुड़ का अंडा 35 दिन के अन्दर फट जाता है। हम लोग घोसले में जाकर देखते हैं कि किसका अंडा फटा है किसका नहीं। इनके बच्चों की सुरक्षा के लिए पेड़ों के नीचे जाल लगाते हैं ताकि अगर वो नीचे गिरे तो उन्हें चोट न लगे। जो बच्चे गिर जाते हैं उन्हें हम इलाज के लिए अपने घर ले जाते हैं। पंख टूट गया या पैर टूट गया छोटी-मोटी सर्जरी घर पर ही कर लेते हैं जब ये ठीक नहीं होते तो इन्हें भागलपुर रेस्क्यू सेंटर भेज देते हैं।”

बीते 20 वर्षों में यहां गैर सरकारी संगठन, स्थानीय लोग, वन विभाग और पर्यावरणविदों के सहयोग से 600-700 गरुड़ पक्षियों का संरक्षण हुआ है। विश्व में गरुड़ों की कुल आबादी में से आधे से अधिक भागलपुर में रहते हैं। भागलपुर जिला के अंतर्गत मधेपुरा सीमा से सटे कोसी व गंगा का दियारा क्षेत्र है कदवा। यहां के ऊंचे-ऊंचे बरगद, पीपल, सेमल, कदंब, पाकड़ आदि के पेड़ों पर गरुड़ों ने घोंसला बना रखा है। पक्षी वैज्ञानिक मानते हैं कि अपेक्षित वातावरण, भोजन और पानी की सुलभता की वजह से गरुड़ यहां रहना पसंद करते हैं। नवगछिया अनुमंडल का कदवा दियारा ऊँचे-ऊँचे पीपल, बरगद, कदंब और सेमल के पेड़ों से घिरा हुआ है। ये पेड़ गरुड़ों के प्रजनन स्थल बनते हैं। हर साल सितंबर के आसपास ये पक्षी यहां आते हैं और मार्च के अंत तक अपने बच्चों के साथ लौट जाते हैं।

दुनिया का पहला गरुण पुनर्वास केंद्र 

भागलपुर के सुंदरवन में दुनिया का पहला गरुड़ रेस्क्यू एवं पुनर्वास केंद्र बना है। जहाँ कोसी कदवा दियारा क्षेत्र के घायल गरुड़ पक्षियों को लाया जाता है। यहां उनकी इलाज का पूरा इंतजाम है। इन घायल पक्षियों को यहां तबतक रखा जाता है जबतक ये पूरी तरह से उड़ने के लिए तैयार न हो जाएं। 

गरुण पुनर्वास केंद्र 

नगीना बताते हैं, “मैं करीब 20 साल से इन घायल पक्षियों का इलाज कर रहा हूँ। अबतक 2,000 से जायदा घायल गरुड़ को ठीक कर चुका हूँ। इलाके के हर व्यक्ति के पास मेरा नम्बर है जहाँ भी पक्षी घायल होता है हमें तुरंत फोन आ जाता है। सूचना मिलते ही मैं तुरंत पहुंचता हूं। यहां गरुड़ को लेकर हर कोई जागरूक है। इसे बचाना यहां सभी अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। यह सौभाग्य की बात है कि आज इन पक्षियों को बचाने की वजह से हमारे कदवा का नाम दुनिया में हो गया। यहां लोग गरुड़ पक्षी को देखने विदेशों तक से आते हैं। यही यहां के लोगों की कमाई है।”

नगीना की तरह इस इलाके के तमाम लोग इस बात पर गर्व करते हैं कि कैसे कदवा जैसी छोटी जगह ने पूरी दुनिया में अपनी जगह बना ली। कदवा के आसपास तीन ग्राम पंचायते हैं जहाँ की आबादी लगभग 50,000 है। इन तीनों पंचायतों के लोग गरुड़ के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। 

आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में करीब 1600-1700 गरुड़ों में 600-700 सिर्फ कदवा में हैं। इन गरुड़ों की खासियत है कि यह पेड़ पौधों में कीड़े नहीं लगने देते हैं। ये कीड़े-मकोड़ों, फसल बर्बाद करने वाले चूहों को भी खा जाते हैं।

गरुड़

भागलपुर के सुंदरवन रेस्क्यू सेंटर में अख्तर हुसैन घायल गरुड़ के केयर टेकर हैं। वो बताते हैं, “गिद्ध की तरह गरुड़ भी ख़त्म हो रहा था। लेकिन हम लोगों ने इसे खोजना शुरू किया और बचा लिया। आज बिहार में 700 गरुड़ हैं। हमारी जाति मुंशिकार है हम लोग पक्षियों को पकड़कर बेचते थे। लेकिन अभी इनका संरक्षण कर रहे हैं।”

जब हम गरुण संरक्षण केंद्र पहुंचे तब वहां के रेस्क्यू सेंटर में 7 बीमार गरुड़ थे। ये वो पक्षी थे जो पेड़ से गिर गये थे या किसी तरह घायल हो गये थे। अख्तर बताते हैं, “जिन गरुड़ के पैर टूट जाते हैं उन्हें बचाना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन जिनके पंख टूटते हैं उन्हें आसानी से बचा लेते हैं। लोगों की सूचना पर रेस्क्यू गाड़ी यहां से जाती है। गाड़ी में चार फीट का एक बक्सा होता है उसमें डालकर यहां ले आते हैं। पहले हम लोग उसे देखते हैं फिर डॉक्टर। मैं यहां 2014 से काम कर रहा हूं। एक साल में करीब 20 पक्षी ठीक होकर उड़ा दिए जाते हैं। यह ग्रेटर एडजुटेंट का पहला रेस्क्यू सेंटर है।”

रेस्क्यू सेंटर में लाया गया गरुड़  

कैसे बना ग्रेटर एजजुटेंट का पहला रेस्क्यू सेंटर?

भागलपुर में रेस्क्यू सेंटर का इतिहास भी बड़ा रोचक है। साल 2006 तक लोगों का यह मानना था कि गरुड़ की यह दुर्लभ प्रजाति “ग्रेटर एडजुटेंट” कंबोडिया और असम में ही प्रजनन करती हैं। लेकिन पहली बार साल 2006  में इनके दो घोसलों को भागलपुर के कदवा दियारा में देखा गया। अक्टूबर 2006 में जनीनदार मंडल नाम के एक व्यक्ति ने अपने मित्र व पर्यावरणविद अरविंद मिश्रा को बताया कि उनके गाँव के पास सिमल के पेड़ में दो बड़े-बड़े पक्षी बैठे हैं। अरविंद मिश्रा ने कहा कि अगर पक्षी हैं तो उनके घोसले भी जरूर होंगे। 

अरविंद मिश्रा ने इन पक्षियों को एक नज़र में पहचान लिया कि ये ग्रेटर एडजुटेंट हैं। किस पक्षी की दुलर्भ प्रजाति को देखना वाकई में खुशी का पल था लेकिन कुछ ही समय में उन पक्षियों के घोंसले उजड़ गए। 

हमने जब अरविन्द मिश्रा से बात की तो उन्‍होंने अपने बीस वर्ष पुराने अनुभव को साझा किया। उन्‍होंने कहा, “आज भी मुझे वो दिन याद है। अपने मित्र जनीनदार मंडल की सूचना पर जब मैंने गॉंव में जाकर देखा तो पाया कि वे पक्षी ग्रेटर एडजुटेंट थे। चूंकि उनके घोंसले उजड़ चुके थे इसलिए मैंने गंगा के किनारे बसे गाँवों में अन्‍य घोसलों को खोजना शुरू किया। जनवरी 2007 में कदवा दियारा में हमें इसके 16 घोषले मिले।” 

अरविन्द मिश्रा ने बताया कि 2006 में इनकी अनुमानित संख्या 78 थी। वहीं साल 2024 में इनके 160 घोसले मिले और इनकी अनुमानित संख्या 700 हो गई। साल 2006 में यह अनुमान लगाया गया था कि दुनिया में इस प्रजाति के पक्षी केवल 600 से 800 ही बचे हैं। लेकिन अब यह संख्या काफी बढ़ है जिसमें बिहार का बहुत बड़ा योगदान है।

अरविंद मिश्रा

आठ साल तक ग्रामीणों ने किया गरुड़ का संरक्षण 

अरविन्द बताते हैं कि सरकार और संस्थाओं का सहयोग बाद में मिला। शुरुआत के आठ साल सिर्फ ग्रामीणों की भागीदारी से यह काम आगे बढ़ता रहा। ग्रामीणों का प्रयास केवल पक्षियों के घोंसलों को बचाने तक सीमित नहीं थे। 

सड़क निर्माण के लिए काटे जाने वाले पीपल के पेड़ को बचाने के लिए रास्ता बदलने से लेकर बिजली विभाग से बात कर हाई‑वोल्टेज तारों को अंडरग्राउंड कराने तक के कार्य शामिल रहे। आज कदवा दियारा में गरुड़ों की सुरक्षित उड़ान इस बात का सबूत है कि जब समुदाय आगे आता है तो विलुप्ति भी हार मान सकती है।

 अरविन्द ने एक रिसर्च पेपर सबमिट किया जो एक भारतीय वन्यजीव अनुसंधान संगठन, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के जर्नल में प्रकाशित हुआ। धीरे-धीरे उन्होंने इस प्रजाति के सामने आने वाले खतरों को पहचाना शुरू कर दिया।

अरविंद मिश्रा गरुड़ की इतनी तादाद बिहार में होने का श्रेय कदवा के स्थानीय लोगों को देते हैं। वो बताते हैं, “यहां के स्थानीय लोगों की सहभागिता से हमने सात-आठ साल काम किया। वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया ने इसके संरक्षण में मदद की साथ में फंड भी दिया। इसके बाद सरकार से मदद लेकर भागलपुर में दुनिया का पहला गरुड़ एवं पुनर्वास केंद्र खुलवाया। शुरुआती दौर में इस इलाके में काम करना काफी मुश्किल था क्योंकि अति पिछड़ा क्षेत्र होने की वजह से अवागमन का रास्ता सही नहीं था। ऐसे में इनके घोसले खोजना बहुत मुश्किल था। इस मुश्किल का समाधान के लोगों को जागरूक करने से हुआ। हमने इसके फायदे गिनाने शुरू किये कि कैसे इनको बचाने से स्थानीय लोगों का फायदा होगा। मुझे खुशी है कि लोग न केवल आगे आये बल्कि अभी तक अपनी सहभागिता पूरी जिम्मेदारी से निभा रहे हैं।”

रेस्क्यू सेंटर मे गरुड़ 

कैसे आया गरुड़ को बचाने का विचार? 

गरुड़ को बचाने का विचार कहां से आया, इस सवाल के जवाब में अरविंद मिश्रा बताते हैं कि वो 1989 में एक कैंप में गये थे जहाँ उन्होंने सुना कि बिहार में पक्षियों पर कोई अध्ययन नहीं हुआ। अरविंद के भीतर यही बात ठहर गई और फिर उन्होंने यह काम करना शुरू कर दिया।

दुनिया में पहले दो ही जगह गरुड़ ब्रीड करते थे कम्बोडिया और असम। जब बिहार में हमने इसको खोजना शुरू किया इसके बाद भागलपुर का भी नाम शामिल हो गया। शुरुआती दौर में लोगों को बताते थे कि गरुड़ पक्षी फसल में चूहे के नुकसान को रोकने में मदद करता है दूसरा सांप जैसे जहरीले जीव को खतम कर देता है और तीसरा नदी को साफ़ रखने में मदद करता है और सबसे जरूरी बात जैव-विविधिता के लिए इस पक्षी का संरक्षण करना हम सबकी जिम्मेदारी है।
अरविन्द मिश्रा, पर्यावरणविद  

गरुड़ के बच्चों की चहचाहट के बीच पढ़ाई करते स्कूली बच्चे   

जब हम कोसी कदवा दियारा क्षेत्र में इन पक्षियों को देखने पहुंचे उस वक़्त सुबह के करीब 11 बजे थे। सड़क के किनारे पीपल के पेड़ पर तीन दर्जन से ज्यादा पक्षी मटरगश्ती कर रहे थे। इन पक्षियों में गरुड़ की एक दुर्लभ प्रजाति “ग्रेटर एडजुटेंट” भी थी जिसका यहां बीते वर्षों में तेज़ी से प्रजनन हुआ है। मैंने अपनी आँखों से यह पक्षी पहली बार देखा था। 

यह इलाका इनकी चहचाहट से गुलजार रहता है। यहां से हर आने-जाने वाले की नजर इस पेड़ पर कुछ देर के लिए ठहर जाती है। इस पीपल के पेड़ के बगल में मध्य विद्यालय खैरपुर का प्रांगण है जहाँ के बच्चों के लिए इन पक्षियों का खूबसूरत नजारा देखना अब हर रोज की बात हो गई है।

इस स्कूल में सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली अंजली कुमारी खुश होकर बताती हैं, “स्कूल के बाहर जो पीपल का पेड़ है उसपर पूरे दिन गरुड़ उड़ते हैं। उनके छोटे-छोटे बच्चे घोसले में बैठे रहते हैं और गरुड़ इनके लिए नदी से मछली लाता है। देख कर बहुत खुशी होती है। अगर हमारे यहां यह पक्षी नहीं होता तो हम भी केवल किताबों में इनकी फोटो देख पाते।”

रोज़ाना गरुड़ को देख खुश होते हैं बच्‍चे  

कहां-कहां है गरुड़ का बसेरा?

भागलपुर में पक्षियों पर काम करने वाली एक संस्था मंदार नेचर क्लब ने इन परिंदों के संरक्षण की पहल शुरू की। शुरुआत में क्लब ने इस काम के लिए आसपास की पंचायतों के 22 टोलों का सहयोग लिया। एक समय था जब केवल कोसी के कदवा दियारा में गरुड़ दिखते थे, अब खैरपुर पंचायत के कसीमपुर, लखमिनिया, आश्रम टोला, गोला टोला, खैरपुर मध्य विद्यालय, गुरु स्थान, ठाकुरजी कचहरी टोला, बगरी टोला, प्रतापनगर, खलीफा टोला, बिंद टोली, पंचगछिया आदि में गरुड़ों का बसेरा है। 

इन स्थानों पर गरुड़ पक्षियों ने अपना बसेरा रातो-रात नहीं बनाया। इसमें जनसहभागिता ने बड़ी भूमिका निभाई। इसके लिए क्लब के संस्थापक अरविन्द मिश्रा ने स्थानीय लोगों को जागरूक करने के साथ शुरुआत की कि कैसे यह पक्षी जैव-विविधिता के लिए बेहद जरूरी है। बीते वर्षों में यहां के स्थानीय लोगों की यह समझ और गहरी हुई है कि इस पक्षी के संरक्षण से उन्हें अनगिनत फायदे हैं।

मध्य विद्यालय खैरपुर कदवा की शिक्षिका कुमारी सोनम बताती हैं, “स्कूल की टाइमिंग के दौरान अगर गरुड़ का कोई बच्चा घोसले से नीचे गिर जाता है तो हम रेस्क्यू टीम को फोन करके तुरंत सूचित करते हैं। सिर्फ मेरी ही नहीं यहां आसपास किसी की भी अगर नजर ऐसे पड़ती है तो पहला काम बिना देर किये रेस्क्यू टीम को सूचित करना होता है। टीम बिना देरी किये यहां पहुंचती है और फिर इनका इलाज शुरू हो जाता है। पक्षियों को देखकर कौन खुश नहीं होता। स्कूल के छोटे बच्चों को थोड़ा इनके बारे में कम जानकारी है, लेकिन नौवी दसवीं के बड़े बच्चे इनमें खूब रूचि रखते हैं।”

गरुड़ के बारे में बतातीं स्कूल की टीचर 

बढ़ाई गई पीपल और कदम के पेड़ों की तादाद 

कदवा में 50 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में गरुड़ प्रजनन करते हैं। इसके अलावा यहां से 50-60 किलोमीटर की दूरी में खगड़िया और मधेपुरा जिले में भी प्रजनन करते हैं। इन इलाकों में ज्यादा से ज्यादा गरुड़ प्रजनन करें उसके लिए कदम और पीपल जैसे पेड़ो का वृक्षारोपण करने के लिए इलाके के लोगों को प्रोत्साहित किया गया। स्थानीय लोगों का मानना है कि गरुड़ पीपल और कदम इन दो पेड़ों पर सबसे ज्यादा प्रजनन करते हैं। 

यहां के स्थानीय लोग गरुड़ पक्षी के फायदा गिनाते नहीं थकते। खैरपुर पंचायत की सविता देवी बताती हैं, “यहां का पर्यावरण गरुड़ पक्षी के लिए काफी अनुकूल है। हमारे क्षेत्र में सिर्फ इस पक्षी की सुरक्षा के लिए 11,000 हाई वोल्टेज का इलेक्ट्रिक तार अंडरग्राउंड लगाया गया। जगह-जगह बोर्ड लगाए गए जिसपर लिखा गया कि गाड़ियों का हॉर्न तेज आवाज़ में न बजाएं इससे पक्षियों को दिक्कत होगी। मैं दो साल से गरुड़ सेविका के रूप में जुड़ी हूँ।  मुझे गरुड़ पक्षी को बचाने में आत्मसंतुष्टि मिलती है।”

अरविंद मिश्रा

अरविंद मिश्रा ने सविता जैसी दर्जनों महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों को गरुड़ बचाने की पहल में शमिल किया और उन्हें गरुड़ सेविका, गरुड़ सेवियर और गरुड़ गार्जियन का नाम दिया। आपको इस पक्षी को बचाने से क्या फायदा? इस सवाल के जवाब में चार साल से गरुड़ सेविका ज्योति ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “हर काम फायदे नुकसान के लिए नहीं होता। हमें इस काम का कोई पैसा नहीं मिलता. हमलोग निस्वार्थ भाव से यह काम करते हैं। साल में एक बार सुंदरवन में मीटिंग होता है हम सभी महिलाएं वहां भी जाते हैं।  इससे पहले हम इस तरह से बाहर जाने का मौका नहीं मिलता था लेकिन अभी गरुड़ संरक्षण की वजह से हम जैसी कई महिलाओं को बाहर निकलने का मौका मिला।”

स्थानीय लोगों में गरुड़ को संरक्षित करने का जूनून 

यहां हम जितने भी लोगों से मिले सभी में गरुड़ को संरक्षित करने का उत्साह और जूनून अलग तरह से दिखा। लोग इसे बचाना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं। लोगों को इस पक्षी का वैज्ञानिक नाम मुंह जवानी याद है। गरुड़ को संरक्षित करने वाले स्थानीय लोग इस पक्षी की अनगिनत खूबियाँ बताते हैं। उनका मानना है कि यह पक्षी नदी को साफ़ रखने में, पौधों को पनपने में और किसान की बेहतर फसल उपजाऊं में सहायक है। यह पक्षी उन कीड़ों को खाता है जो पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। चूहों को खाता है जिससे फसल बर्बाद नहीं होती। मरे हुए जानवरों को खाता है जिससे गंगा और नदियाँ साफ़ रहती हैं।

राजकुमार

गरुड़ सेवियर राजकुमार बताते हैं, “पहले हमारे गाँव में जहरीले सांप के काटने से बहुत लोगों की मौत होती थी लेकिन अब ऐसी घटनाएँ कम हुई हैं क्योंकि गरुड़ का मुख्य भोजन सांप है। यहां के नौजवानों को अरविन्द सर ने जानकारी दी फिर हम नौजवानों में गरुड़ पक्षी के प्रति प्रेम जागा। अब तो महिलाएं, बड़े-बुजुर्ग सभी आगे आकर गरुड़ की रक्षा करते हैं। हमारे यहां के लोग तो इसे अपना मिशन मान चुके हैं।”

अरविन्द मिश्रा भी इस बात को पुख्ता करते हैं कि इस पहल में युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक सभी को जोड़ा गया। इस मुहिम से जुड़ने वाले युवाओं को गरुड़ सेवियर का नाम दिया गया। बड़े-बुजुर्गों को गरुड़ गार्डियन का नाम दिया गया और मुहिम से जुड़ने वाली महिलाओं को गरुड़ सेविका कहा जाने लगा। 

अरविन्द बताते हैं, “शुरुआत तो समुदाय से हुई लेकिन बाद में प्रशासन और सरकार ने आगे आकर हमारी इस मुहीम को मजबूत करने में सहयोग किया। एक बार रोड बनाने के लिए एक पीपल के पेड़ को काटना था जिसमें 23 घोसले थे।  लेकिन हमारे अनुरोध पर सरकार ने उस रास्ते को घुमावदार बनाया दिया लेकिन पेड़ नहीं काटा।  एक बार 11 हजार हाई वोल्टज तार से टकराकर दो-तीन पक्षी मर गए थे बिजली विभाग से संपर्क करके उसे एक किलोमीटर के दायरे में अंडरग्राउंड करा दिया।  तो कहने का मतलब है कहानी समुदाय के संरक्षण से शुरू हुई लेकिन बाद में सभी लोग आये जिसका नतीजा आपके सामने है।”

गरुड़ का शिकार कर उनके अंडे ले जाते थे शिकारी 

शुरुआती दौर में पहले स्थानीय शिकारी गरुड़ का शिकार करते थे। यही नहीं शिकार करने के बाद घोंसले की खोज कर उनके अंडे साथ ले जाते थे। जिससे इनकी संख्या बढ़ नहीं पाती थी। जब यहां के स्थानीय लोग जागरूक हुए शिकारी खुद ही इस काम से डरने लगे। यही नहीं कई तो इनका शिकार छोड़ उन्हें संरक्षित करने में आगे आये। 

भागलपुर के अधिकांश लोगों की पक्षियों के प्रति जनरल नॉलेज भी काफी अच्‍छी है। लोग पक्षियों के वैज्ञानिक नाम बखूबी जानते हैं। पक्षियों को बचाने के लिए यहां चौपाल लगती है जिसमें पक्षियों की पहचान करने केतरीके बताये जाते हैं।

भागलपुर निवासी संतोष कुमार खुद को ‘गरुड़ सेवियर’ कहते हैं। वे प्रशिक्षित बर्ड गाइड हैं और 10 साल से अधिक समय से यह काम कर रहे हैं। वो बताते हैं, “यहां इसकी चार प्रमुख प्रजातियां हैं -  ग्रेटर एडजुटेंट, लेसर एडजुटेंट, पेंटेड स्टॉर्क और ओपनबिल। मैं कोचिंग चलाता हूँ लेकिन अगर किसी घायल पक्षी की खबर मिल गयी तो हमारी प्राथमिकता वन विभाग को सूचित कर उस पक्षी को सबसे पहले रेस्क्यू सेंटर पहुचाना होता है। गाँव में गरुड़ पक्षी होने से फायदा यह हुआ है कि यहां जहरीले सांप बहुत कम हो गए हैं। इसके अलावा खेतों में चूहों की संख्या भी बहुत कम हुई है।”

संतोष कुमार

भागलपुर के लोग गरुड़ पक्षी को भगवान स्वरूप मानते हैं। सरकार गरुड़ों के लिए सालाना 40 लाख रुपये खर्च करती है। स्थानीय निवासी अर्जुन सिंह कहते हैं, “हम इसे गरुड़ महाराज कहते हैं। हम सभी इसकी सेवा करते हैं। गांव में साप बिच्छू जैसे घातक जीव बहुत कम हो गए हैं।” 

संतोष की तरह राहुल कुमार पेशे से शिक्षक हैं और पिछले आठ वर्षों से गरुड़ सेवियर भी। हाल ही में उन्होंने  ‘कोसी नेचर क्लब’ की शुरुआत की है जिसमें 39 युवा जुड़े हैं। वो कहते हैं, "हम सिर्फ पक्षियों ही नहीं बल्कि कीट-पतंगों और लुप्त होते बीजों को भी संरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह काम पर्यावरण संतुलन का सवाल है क्योंकि हर जीव एक-दूसरे का पूरक है।”

अंतर्राष्‍ट्रीय पटल पर पहुंचा गदवा दियारा का नाम 

भागलपुर के इस गॉंव में जन सहभागिता ने यह सिद्ध कर दिया है कि अगर सब एक जुट हो जाएं तो कोई भी कार्य असंभव नहीं रह जाता है। कदवा दियारा आज दुनिया के लिए संरक्षण का एक बेमिसाल उदाहरण पेश कर रहा है। तमाम वैश्विक स्तर के संस्थानों ने इस सामूहिक प्रयास की तारीफ की है। एशियन जर्नल ऑफ इंवॉर्नमेंट एंड ईकोलॉजी में 2023 में इस पर एक शोधपत्र प्रस्‍तुत किया गया। बर्ड लाइफ इंटरनेशनल ने इस बात की पुष्टि है की कि भागलपुर दुनिया के उन तीन क्षेत्रों में से एक है जहां गरुड़ प्रजनन करते हैं। 

इनके अलावा तमाम राष्‍ट्रीय व अंतर्राष्‍ट्रीय स्तर की रिपोर्ट आयीं, जिनमें कदवा दियारा के सामूहिक प्रयासों का वर्णन किया गया ताकी दुनिया के बाकी लोग भी यहां की तरह पक्षियों से प्रेम करना सीखें। और इस तरह गरुड़ इस गॉंव का प्रतीक बन गया।  

यह कहानी इंडिया वाटर फेलोशिप 2025 के तहत की गई ग्राउंड स्‍टोरी है।

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