वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, जल संकट, जैव विविधता का ह्रास, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन जैसी कई चुनौतियां पूरी दुनिया के सामने है। इन समस्याओं का समाधान किसी एक देश के प्रयासों से संभव नहीं है। यही कारण है कि विभिन्न देशों ने पर्यावरण संरक्षण और जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए कई अंतरराष्ट्रीय समझौते किए है।
भारत भी पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय समझौतों के माध्यम से लगातार मजबूत कर रहा है। इनमें जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण, मरुस्थलीकरण नियंत्रण, सीमा-पार नदियों के प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने से जुड़े समझौते शामिल है।
भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए। यह समझौता विश्व बैंक की मध्यस्थता में संपन्न हुआ था और इसे दुनिया की सबसे सफल अंतरराष्ट्रीय जल संधियों में गिना जाता है।
संधि के अनुसार रावी, ब्यास और सतलुज नदियां भारत को आवंटित की गईं। इन नदियों में सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों का उपयोग मुख्य रूप से पाकिस्तान को दिया गया। दोनों देशों के बीच जल संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए स्थायी सिंधु आयोग का गठन किया गया।
इसी के अनुसार यह संधि केवल जल बंटवारे तक सीमित नहीं है। इसने दोनों देशों में सिंचाई, खाद्य सुरक्षा और जलविद्युत विकास के लिए स्थिर आधार प्रदान किया। छह दशकों से अधिक समय तक यह समझौता विभिन्न राजनीतिक तनावों के बावजूद बना रहा, जो इसे सतत संसाधन प्रबंधन का महत्वपूर्ण उदाहरण बनाता है।
भारत और बांग्लादेश के बीच दिसंबर 1996 में गंगा जल बंटवारा संधि हुई। यह समझौता फरक्का बैराज पर उपलब्ध जल के वितरण से संबंधित है। इस संधि ने लंबे समय से चले आ रहे जल विवाद को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गंगा नदी पर निर्भर करोड़ों लोगों के लिए यह समझौता अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कृषि उत्पादन को समर्थन मिलता है। नदी आधारित आजीविकाएँ सुरक्षित होती है। दोनों देशों के बीच जल सहयोग मजबूत होता है। यह संधि सीमा पार नदी प्रबंधन के माध्यम से सतत विकास का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
भारत और नेपाल के बीच कई महत्वपूर्ण नदी जल समझौते हुए है, जिनमें कोसी समझौता (1954), गंडक समझौता (1959) और महाकाली संधि (1996) प्रमुख है।जो निम्न प्रकार है -
कोसी समझौता - कोसी नदी में आने वाली विनाशकारी बाढ़ों को नियंत्रित करने के उद्देश्य से यह समझौता किया गया। इसके तहत बांधों और तटबंधों का निर्माण किया गया जिससे बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई सुविधाओं का विस्तार संभव हुआ।
गंडक समझौता - इस समझौते का उद्देश्य सिंचाई क्षमता बढ़ाना और कृषि विकास को प्रोत्साहित करना था। इससे भारत और नेपाल दोनों को लाभ मिला।
महाकाली संधि - महाकाली नदी के एकीकृत विकास के लिए 1996 में भारत और नेपाल ने समझौता किया। इसमें जलविद्युत उत्पादन, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण जैसे उद्देश्य शामिल हैं। यह संधि साझा प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग का उदाहरण मानी जाती है।
भारत और नेपाल के बीच जल संसाधनों के क्षेत्र में सहयोग की बड़ी संभावनाएं है। दोनों देश बाढ़ पूर्वानुमान, जलभराव की रोकथाम और तटबंध निर्माण जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से मिलकर कार्य कर रहे है। नेपाल और भारत में बाढ़ की समस्या को कम करने के लिए भारत ने नेपाल की चार प्रमुख बाढ़ प्रभावित नदियों में लाल बकैया, खांडो, कमला और बागमती पर तटबंध निर्माण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने पर सहमति व्यक्त की है। ये परियोजनाएं विभिन्न चरणों में कार्यान्वित की जा रही है।
भारत-नेपाल जल संसाधन सहयोग की निगरानी दोनों देशों के जल संसाधन सचिवों की अध्यक्षता वाली संयुक्त जल संसाधन समिति (JCWR) करती है। इसके अंतर्गत बाढ़ पूर्वानुमान, जलभराव, तटबंध निर्माण तथा कोसी और गंडक परियोजनाओं से संबंधित कई उप-समितियां गठित की गई है।
फरवरी 1996 में नेपाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की भारत यात्रा के दौरान महाकाली नदी के एकीकृत विकास संबंधी संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस संधि में शारदा बैराज, टनकपुर बैराज और पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना को शामिल किया गया है। दोनों देशों ने पंचेश्वर परियोजना को संयुक्त रूप से विकसित करने पर सहमति जताई। इसके लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने का कार्य 1999 में शुरू हुआ।
इसके अतिरिक्त भारत और नेपाल ने सप्त कोसी–सुन कोसी परियोजना के लिए एक संयुक्त परियोजना कार्यालय स्थापित करने पर भी सहमति व्यक्त की है, जो सर्वेक्षण और तकनीकी अध्ययन कर परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का कार्य कर रहा है।
वर्ष 2015 में भारत और फ्रांस ने मिलकर अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की स्थापना की। इसका उद्देश्य सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना है। यह पहल विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों तक पहुंच उपलब्ध कराने तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करती है। आज 100 से अधिक देश इस पहल से जुड़े हुए है।
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन को SDG-7 (सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा) तथा SDG-13 (जलवायु कार्रवाई) की दिशा में भारत का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र ने 2023-2027 के लिए Government of India - United Nations Sustainable Development Cooperation Framework (GoI-UNSDCF) पर हस्ताक्षर किए है। यह सहयोग ढांचा भारत को सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता प्रदान करता है।
इस सहयोग के प्रमुख क्षेत्र है -
स्वास्थ्य और पोषण
खाद्य सुरक्षा
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
आर्थिक विकास और रोजगार
पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन
जल, स्वच्छता और आपदा लचीलापन
यह ढांचा People, Prosperity, Planet and Participation यानी व्यक्ति, समृद्धि, पृथ्वी और सहभागिता के चार स्तंभों पर आधारित है।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के अनुसार भारत जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, आर्द्रभूमि संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित अनेक बहुपक्षीय पर्यावरणीय समझौतों का सदस्य है।
रामसर अभिसमय (Ramsar Convention), 1971 - रामसर अभिसमय विश्व की आर्द्रभूमियों (Wetlands) के संरक्षण और उनके विवेकपूर्ण उपयोग के लिए बनाया गया पहला वैश्विक समझौता है। इसका नाम ईरान के शहर रामसर के नाम पर रखा गया, जहां 1971 में यह संधि अपनाई गई। भारत 1982 में इस समझौते का सदस्य बना। आज भारत विश्व के उन देशों में शामिल है जिनके पास सर्वाधिक रामसर स्थल है। जल क्षेत्र में इसका विशेष महत्व है। जिसमें झीलों, दलदलों और मैंग्रोव क्षेत्रों का संरक्षण, बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, जल पक्षियों और मत्स्य संसाधनों का संरक्षण है।
संकटग्रस्त वन्यजीव एवं वनस्पति प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय (CITES), 1973 - CITES का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वन्य जीवों और वनस्पतियों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार उनकी प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा न बने। भारत इस संधि का सदस्य है और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के माध्यम से इसके प्रावधानों को लागू करता है। इसमें बाघ, हाथी, गैंडा जैसी प्रजातियों की सुरक्षा, अवैध वन्यजीव व्यापार पर नियंत्रण और जैव विविधता संरक्षण में इस्मा विशेष महत्त्व है।
प्रवासी प्रजातियों का अभिसमय (CMS/Bonn Convention), 1979 - CMS का उद्देश्य उन जंगली जीवों का संरक्षण करना है जो विभिन्न देशों के बीच प्रवास करते हैं। इसका विशेष महत्त्व है, जहां प्रवासी पक्षियों का संरक्षण, समुद्री जीवों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय संरक्षण सहयोग शामिल है।
वियना कन्वेंशन, 1985 - यह समझौता ओजोन परत की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। इसका अपना विशेष महत्त्व है जिसमे ओजोन क्षय की निगरानी, वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा, वैश्विक सहयोग शामिल है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987 - मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल को दुनिया का सबसे सफल पर्यावरणीय समझौता माना जाता है। इसका उद्देश्य ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना है। भारत ने इस समझौते के तहत CFCs और अन्य ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उपयोग को कम किया है। जिसमें ओजोन परत संरक्षण, स्वास्थ्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन शमन है।
बेसल कन्वेंशन, 1989 - यह समझौता खतरनाक अपशिष्टों के सीमा-पार परिवहन और निपटान को नियंत्रित करता है। जिसमें जहरीले कचरे का नियंत्रण, पर्यावरण प्रदूषण में कमी और विकासशील देशों की सुरक्षा है ।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC), 1992 - 1992 के रियो अर्थ समिट में अपनाया गया यह समझौता जलवायु परिवर्तन से निपटने का वैश्विक ढांचा प्रदान करता है। इसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, जलवायु अनुकूलन और जलवायु वित्त है।
जैव विविधता अभिसमय (CBD), 1992 - CBD का उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण, उसके घटकों का सतत उपयोग तथा आनुवंशिक संसाधनों से होने वाले लाभों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है। इसमें जैव विविधता संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा और आनुवंशिक संसाधनों का प्रबंधन है ।
संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण निरोधक अभिसमय (UNCCD), 1994 - UNCCD भूमि क्षरण, मरुस्थलीकरण और सूखे से निपटने के लिए बनाया गया वैश्विक समझौता है। इसका जल क्षेत्र में विशेष महत्व है, जिसमें भूजल संरक्षण, मिट्टी संरक्षण और सूखा प्रबंधन शामिल है।
क्योटो प्रोटोकॉल, 1997 - यह UNFCCC के अंतर्गत पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता था जिसने विकसित देशों के लिए उत्सर्जन कटौती लक्ष्य निर्धारित किए।
रॉटरडैम कन्वेंशन, 1998 - यह खतरनाक रसायनों और कीटनाशकों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करता है। इसमें जल प्रदूषण नियंत्रण, रसायनों के सुरक्षित उपयोग को बढ़ावा देना शामिल है।
स्टॉकहोम कन्वेंशन, 2001 - यह स्थायी जैविक प्रदूषकों (POPs) को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया।इसका महत्त्व जल और मिट्टी प्रदूषण में कमी और मानव स्वास्थ्य संरक्षण में है।
नागोया प्रोटोकॉल, 2010 - यह CBD के अंतर्गत अपनाया गया समझौता है। इसका उद्देश्य आनुवंशिक संसाधनों से होने वाले लाभों का न्यायसंगत वितरण होता है।
मिनामाटा कन्वेंशन, 2013 - यह पारे (Mercury) से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया वैश्विक समझौता है। इसका महत्व जल प्रदूषण में कमी और मानव स्वास्थ्य सुरक्षा शामिल है।
पेरिस समझौता, 2015 - पेरिस समझौते का लक्ष्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे तथा 1.5°C तक सीमित करने का प्रयास करना है। भारत ने पंचामृत लक्ष्यों की घोषणा कर नवीकरणीय ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन में कमी की दिशा में प्रतिबद्धता दिखाई है।
किगाली संशोधन, 2016 - यह मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का संशोधन है जिसका उद्देश्य HFC गैसों को कम करना है।
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क (2022) - CBD COP-15 में अपनाए गए इस फ्रेमवर्क का लक्ष्य 2030 तक जैव विविधता हानि को रोकना है। इसका प्रमुख लक्ष्य 30x30 लक्ष्य 2030 तक पृथ्वी के 30% भाग का संरक्षण और पारिस्थितिक तंत्र पुनर्स्थापन करना है।
BBNJ या हाई सीज ट्री टी (2023) - यह राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर समुद्री जैव विविधता (Marine Biodiversity Beyond National Jurisdiction) के संरक्षण हेतु संयुक्त राष्ट्र समझौता है। इसका विशेष महत्व समुद्री जैव विविधता संरक्षण, समुद्री आनुवंशिक संसाधनों का प्रबंधन और समुद्री संरक्षित क्षेत्र में है।
भारत और जर्मनी के बीच नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और जलवायु परिवर्तन से संबंधित कई सहयोग कार्यक्रम चल रहे है। इनका उद्देश्य है स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना, कार्बन उत्सर्जन कम करना, सतत शहरी विकास को बढ़ावा देना, जलवायु अनुकूल अवसंरचना विकसित करना, जर्मनी भारत के हरित ऊर्जा परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण साझेदार है।
भारत और जापान जल संसाधन प्रबंधन, सिंचाई, आपदा प्रबंधन और टिकाऊ अवसंरचना विकास के क्षेत्र में सहयोग कर रहे हैं। यह सहयोग विशेष रूप से निम्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है -
जल संरक्षण
बाढ़ प्रबंधन
नदी बेसिन योजना
स्मार्ट शहर विकास
यह साझेदारी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने तथा संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देने में सहायक है।
इन समझौतों ने भारत में अनेक नीतियों और कार्यक्रमों को प्रभावित किया है:
राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना
नमामि गंगे कार्यक्रम
राष्ट्रीय जैव विविधता कार्य योजना
राष्ट्रीय आर्द्रभूमि संरक्षण कार्यक्रम
भूमि क्षरण तटस्थता लक्ष्य
मिशन LiFE
ये समझौते भारत को जल सुरक्षा, जैव विविधता संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और जलवायु परिवर्तन से निपटने में सहायता प्रदान करते हैं।
1971 के रामसर अभिसमय से लेकर 2023 के हाई सीज ट्रीटी तक वैश्विक पर्यावरणीय शासन लगातार विकसित हुआ है। भारत इन लगभग सभी प्रमुख पर्यावरणीय और जल संबंधी अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सक्रिय भागीदार है। जलवायु परिवर्तन, जल संकट और जैव विविधता हानि के वर्तमान दौर में इन समझौतों का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। आने वाले वर्षों में भारत की पर्यावरणीय नीतियां और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
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