कुकरैल नदी के किनारे सुरक्षित वन क्षेत्र पेड़ों की कटाई और बढ़ते अतिक्रमण व शहरीकरण के कारण लखनऊ का सबसे प्रमुख कनेक्‍टेड फॉरेस्‍ट कुकरैल रिजर्व फॉरेस्‍ट खतरे में है। 

 

स्रोत : विकी कॉमंस

पर्यावरण

खत्‍म हो रहे लखनऊ के ‘कनेक्टेड फॉरेस्ट’ सिर्फ़ पेड़ लगाने से नहीं बचेगा पर्यावरण

ग्रीन बेल्‍ट, ग्रीन कॉरिडोर और पौध-रोपण के रिकॉर्डों के बावजूद नहीं दिखाई दे रहा यूपी की राजधानी की आबोहवा में कोई खास बदलाव।

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

हर साल 5 जून को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर जब पर्यावरण संरक्षण की बात होती है, तो सबसे पहले पेड़ लगाने की तस्वीरें और वृक्षारोपण अभियानों के दावे सामने आते हैं। लेकिन, इन अभियानों के बावजूद अगर पर्यावरण में कोई सुधार देखने को नहीं मिल रहा, तो एक अहम सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ पेड़ लगाने और हर साल पौध रोपण का रिकॉर्ड बनाने से पूरे पर्यावरण को बचाया जा सकता है? 

लखनऊ का बिगड़ता पर्यावरणीय माहौल और बदलता भू-परिदृश्य इस सवाल का जवाब ‘नहीं’ में देता है। पिछले कुछ दशकों में शहर के विस्तार, नई टाउनशिपों, एक्सप्रेस-वे, आवासीय परियोजनाओं और अनियोजित निर्माण ने राजधानी के आसपास मौजूद उन हरित क्षेत्रों को लगातार खंडित किया है, जो कभी एक-दूसरे से जुड़े हुए पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा थे। कुकरैल, रसूलपुर इठौरिया, गोमती तटीय हरित क्षेत्र, कैंट के वृक्षाच्छादित इलाके और शहर के बाहरी हिस्सों में फैले हरित भूभाग आज अलग-अलग द्वीपों में तब्दील होते जा रहे हैं।

लखनऊ समेत भारत के अधिकांश शहरों में हरित क्षेत्र पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। पार्क, सड़क किनारे पेड़, संस्थानों के परिसर और कुछ वन क्षेत्र आज भी मौजूद हैं। इस सबके बावज़ूद शहरी इलाकों का पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता जा रहा है। क्‍योंकि असल समस्या यह है कि ये सभी शहर में विकसित किए गए सभी हरित क्षेत्र एक-दूसरे से कटे हुए हैं। यह एक तरह से "ग्रीन आइलैंड" बन चुके हैं, जिनका कोई बड़ा प्रभाव पर्यावरणीय परिदृश्‍य पर नहीं दिखाई दे रहा है। 

एक समय जो पेड़-पौधे, झाड़ियां, तालाब और खुले क्षेत्र मिलकर एक सतत पारिस्थितिकी तंत्र बनाते थे, आज वे सड़कों, फ्लाईओवरों, कॉलोनियों और कंक्रीट के विस्तार के बीच बिखर गए हैं। नतीजतन पक्षियों, तितलियों, मधुमक्खियों, गिलहरियों और अन्य छोटे जीवों के लिए आवागमन मुश्किल होता जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे "हैबिटेट फ्रैग्मेंटेशन" (Habitat Fragmentation) यानी आवास विखंडन कहते हैं।

दरअसल, पर्यावरण केवल पेड़ों के समूह से नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र से बनता है। जंगलों में पेड़ों के साथ पक्षी, कीट, छोटे वन्यजीव, झाड़ियां, घास, मिट्टी के सूक्ष्मजीव और जल स्रोत मिलकर एक जीवित नेटवर्क तैयार करते हैं। यही "कनेक्टेड फॉरेस्ट" शहर को ठंडा रखने, भूजल को recharge करने, जैव विविधता बचाने और प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इसके विपरीत, जंगलों को काटकर शहर में इधर-उधर पेड़ लगा देना या सीमित इलाकों में ग्रीन बेल्ट विकसित कर देना पर्यावरणीय क्षति की भरपाई नहीं कर सकता। विश्व पर्यावरण दिवस पर लखनऊ का अनुभव यही बताता है कि यदि विकास और प्रकृति के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो हरियाली के आंकड़े बढ़ने के बावजूद शहर का पर्यावरण लगातार कमजोर होता जाएगा।

क्या होते हैं कनेक्टेड फॉरेस्ट? 

कनेक्टेड फॉरेस्ट ऐसे वन क्षेत्र या हरित भूभाग होते हैं, जो किसी न किसी प्राकृतिक या कृत्रिम हरित गलियारे (ग्रीन कॉरिडोर) के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। इनमें जंगल, नदी किनारे की हरित पट्टियां, झाड़ियां, आर्द्रभूमियां, कृषि क्षेत्र और बड़े वृक्षाच्छादित भूभाग शामिल हो सकते हैं। इनका उद्देश्य केवल हरियाली बनाए रखना नहीं, बल्कि वनस्पतियों, पक्षियों, कीटों और अन्य जीवों के लिए एक सतत पारिस्थितिक तंत्र उपलब्ध कराना होता है।

जब विभिन्न हरित क्षेत्र आपस में जुड़े होते हैं, तो जीव-जंतुओं की आवाजाही, परागण, बीजों का प्रसार और प्राकृतिक संसाधनों का प्रवाह सुचारु रूप से चलता रहता है। इसके विपरीत, जब जंगल और हरित क्षेत्र सड़कों, इमारतों या शहरी विस्तार के कारण छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट जाते हैं, तो वे अपनी पारिस्थितिक क्षमता धीरे-धीरे खोने लगते हैं। यही वजह है कि पर्यावरण विशेषज्ञ केवल जंगलों के क्षेत्रफल पर नहीं, बल्कि उनकी आपसी कनेक्टिविटी पर भी जोर देते हैं।

क्यों ज़रूरी हैं ये छोटे-छोटे जंगल ? 

कनेक्टेड फॉरेस्ट किसी शहर या क्षेत्र के पर्यावरणीय स्वास्थ्य की रीढ़ माने जाते हैं। ये न केवल जैव विविधता को संरक्षित करते हैं, बल्कि तापमान नियंत्रित करने, भूजल पुनर्भरण बढ़ाने, कार्बन अवशोषित करने और वायु की गुणवत्ता बेहतर बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। एक जुड़ा हुआ हरित तंत्र अलग-अलग बिखरे हुए पार्कों या वृक्षारोपण स्थलों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी ढंग से काम करता है।

शहरी क्षेत्रों में इनकी आवश्यकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि यहां प्राकृतिक आवास लगातार सिकुड़ रहे हैं। यदि हरित क्षेत्र आपस में जुड़े न हों, तो पक्षियों, तितलियों, मधुमक्खियों और अन्य जीवों की आबादी अलग-थलग पड़ने लगती है। इसके साथ ही शहरों में गर्मी, प्रदूषण और जलभराव जैसी समस्याएं भी बढ़ती हैं। यही कारण है कि दुनिया भर में अब शहरी नियोजन के दौरान कनेक्टेड फॉरेस्ट और ग्रीन कॉरिडोर को पर्यावरण संरक्षण की एक महत्वपूर्ण रणनीति माना जा रहा है।

शहरीकरण और पेड़ों की कटाई से साल दर साल सिमटता जा रहा है कुकरैल और लखनऊ के आसपास के अन्‍य जंगलों का दायरा। 

लखनऊ में प्रमुख 'कनेक्‍टेड फॉरेस्‍ट' या वन जैसे क्षेत्र

लखनऊ से जुड़े जंगलों यानी 'कनेक्‍टेड फॉरेस्‍ट' की बात करें, तो हम पाते हैं कि वास्तविक प्राकृतिक या अर्ध-प्राकृतिक वन क्षेत्र बहुत कम बचे हैं। अधिकांश बड़े पार्क, ग्रीन बेल्ट और विकसित हरित क्षेत्र हैं, लेकिन वे जंगल नहीं हैं। लखनऊ के कुछ बचे-खुचे 'कनेक्‍टेड फॉरेस्‍ट' इस प्रकार हैं-

1 - कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट

यह लखनऊ का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण शहरी वन क्षेत्र माना जाता है। 1950 के दशक में विकसित इस वन क्षेत्र को शहर के "ग्रीन लंग्स" के रूप में देखा जाता है। यहां घड़ियाल संरक्षण केंद्र, विविध पक्षी प्रजातियां और उल्लेखनीय जैव विविधता मौजूद है।

  • लगभग 5000 एकड़ में विकसित।

  • घड़ियाल प्रजनन केंद्र, हिरण, पक्षियों और सरीसृपों की उल्लेखनीय विविधता।

  • शहरी पारिस्थितिकी के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण।

2 - गोमती नदी तटीय हरित पट्टी और उर्मिला वन

यह जंगल नहीं है, लेकिन यदि लखनऊ में किसी प्राकृतिक ग्रीन कॉरिडोर की सबसे अधिक संभावना है, तो वह गोमती नदी का किनारा है। नदी के दोनों ओर मौजूद हरित क्षेत्र, जैव विविधता पार्क, झाड़ियां और वृक्ष पट्टियां भविष्य में शहर के विभिन्न हरित क्षेत्रों को जोड़ने का आधार बन सकती हैं।

  • कुकरैल नदी के किनारे विकसित किया जा रहा नया शहरी वन।

  • मियावाकी तकनीक और देशज प्रजातियों के साथ तैयार किया जा रहा है।

  • भविष्य में यह कुकरैल से जुड़ने वाला महत्वपूर्ण ग्रीन कॉरिडोर बन सकता है।

3 - कैंट क्षेत्र और गन्ना अनुसंधान संस्थान के आसपास के वन पैच

लखनऊ के कैंट क्षेत्र, केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (CISH), भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR), सेना के नियंत्रण वाले हरित भूभाग और इनके आसपास मौजूद पुराने वृक्षों वाले इलाके शहर के उन चुनिंदा क्षेत्रों में हैं, जहां अब भी अपेक्षाकृत सतत हरित आवरण दिखाई देता है। हालांकि इन्हें आधिकारिक रूप से जंगल नहीं कहा जाता, लेकिन बड़े पेड़ों, झाड़ियों और कम मानवीय हस्तक्षेप के कारण ये कई पक्षियों, सरीसृपों और छोटे वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास का काम करते हैं। हाल के वर्षों में इस इलाके में तेंदुए की मौजूदगी और आवाजाही की खबरों ने भी संकेत दिया है कि यहां अब भी कुछ प्राकृतिक हरित संपर्क (Green Connectivity) बने हुए हैं, जो वन्यजीवों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में मदद करते हैं। 

  • ये औपचारिक जंगल नहीं हैं, लेकिन बड़े पेड़ों वाले घने हरित क्षेत्र (Dense Green Zones)  हैं।

  • यहां पक्षियों और छोटे वन्यजीवों के लिए अपेक्षाकृत बेहतर आवास उपलब्ध है।

  • तेंदुए की आवाजाही की खबरों से संकेत मिलता है कि यहां अभी भी वन्यजीवों के लिए कुछ हरित संपर्क मौजूद हैं।

  • यदि इन क्षेत्रों को गोमती तटीय हरित पट्टियों और अन्य ग्रीन पॉकेट्स से जोड़ा जाए, तो यह लखनऊ के संभावित "कनेक्टेड फॉरेस्ट नेटवर्क" का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।

4 - सीजी सिटी-मोहनलालगंज क्षेत्र की ग्रीन बेल्ट

लखनऊ के दक्षिणी हिस्से में स्थित सीजी सिटी, मोहनलालगंज और इसके आसपास के क्षेत्रों में अभी भी बड़े पैमाने पर कृषि भूमि, वृक्षों से आच्छादित भूभाग और खुले हरित क्षेत्र मौजूद हैं। हालांकि इन क्षेत्रों को जंगल की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, लेकिन ये शहर और ग्रामीण परिदृश्य के बीच एक महत्वपूर्ण हरित बफर का काम करते हैं। तेजी से हो रहे शहरी विस्तार, नई टाउनशिप और सड़क परियोजनाओं के कारण इन हरित क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है। यदि इनका संरक्षण किया जाए, तो ये भविष्य में लखनऊ के ग्रीन कॉरिडोर नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।

  • यहां अभी भी बड़े कृषि क्षेत्र और वृक्षों से आच्छादित खुले भूभाग मौजूद हैं।

  • यह क्षेत्र दक्षिणी लखनऊ के लिए हरित बफर (Green Buffer) का काम करता है।

  • तेजी से बढ़ती रियल एस्टेट परियोजनाओं और शहरीकरण से इन पर दबाव बढ़ रहा है।

  • उचित योजना के साथ इन्हें शहर के अन्य हरित क्षेत्रों से जोड़कर ग्रीन कॉरिडोर विकसित किए जा सकते हैं।

5 - रसूलपुर इठौरिया फॉरेस्ट ब्लॉक

लखनऊ के सरोजिनीनगर वन क्षेत्र में स्थित रसूलपुर इठौरिया फॉरेस्ट ब्लॉक राजधानी के कम चर्चित लेकिन महत्वपूर्ण हरित क्षेत्रों में से एक है। हाल के वर्षों में यहां "लक्ष्मणपुरी इकोटूरिज्म रिजर्व" विकसित किया गया है, जिससे यह क्षेत्र पर्यावरण शिक्षा, प्रकृति पर्यटन और जैव विविधता संरक्षण के लिए एक नई पहचान बना रहा है। हालांकि यह कुकरैल की तरह घना प्राकृतिक जंगल नहीं है, फिर भी यहां मौजूद वृक्षावरण, झाड़ियां और अपेक्षाकृत कम मानवीय हस्तक्षेप इसे शहरी पारिस्थितिकी की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं। यदि भविष्य में लखनऊ के विभिन्न हरित क्षेत्रों को जोड़ने की कोई व्यापक योजना बनाई जाती है, तो यह क्षेत्र उसमें एक अहम कड़ी साबित हो सकता है।

  • यह सरोजिनीनगर रेंज के अंतर्गत आने वाला संरक्षित वन क्षेत्र है, जहां अपेक्षाकृत बेहतर वृक्षावरण और प्राकृतिक वातावरण देखने को मिलता है।

  • यहां विकसित किया गया लक्ष्मणपुरी इकोटूरिज्म रिजर्व लोगों को प्रकृति से जोड़ने के साथ-साथ संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का भी काम कर रहा है।

  • यद्यपि यह पूरी तरह प्राकृतिक जंगल नहीं है, फिर भी पक्षियों, छोटे स्तनधारियों और अन्य जीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास उपलब्ध कराता है।

  • लखनऊ के दक्षिणी और पश्चिमी हरित क्षेत्रों को जोड़ने की किसी भी संभावित ग्रीन कॉरिडोर योजना में यह क्षेत्र एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक नोड (Ecological Node) की भूमिका निभा सकता है।

6 - नए विकसित हो रहे शहरी वन

लखनऊ में हाल के वर्षों में शहरी वनों (Urban Forests) की अवधारणा पर काम शुरू हुआ है। इसी क्रम में कुकरैल नदी के किनारे उर्मिला वन समेत कई हरित परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। इनका उद्देश्य केवल सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि जैव विविधता बढ़ाना, स्थानीय प्रजातियों को बढ़ावा देना और शहर में हरित आवरण को मजबूत करना है। हालांकि ये प्राकृतिक रूप से विकसित जंगल नहीं हैं, फिर भी भविष्य में शहरी पारिस्थितिकी को बेहतर बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

  • उर्मिला वन जैसे प्रोजेक्ट शहर में शहरी वन की नई अवधारणा को बढ़ावा दे रहे हैं।

  • इनमें देशज वृक्ष प्रजातियों और जैव विविधता को प्राथमिकता देने का प्रयास किया जा रहा है।

  • ये परियोजनाएं भविष्य में कुकरैल और अन्य हरित क्षेत्रों के बीच हरित संपर्क बनाने में सहायक हो सकती हैं।

  • यदि वैज्ञानिक योजना के तहत विकसित किया जाए, तो ये शहरी हीट आइलैंड प्रभाव को कम करने और वन्यजीवों के लिए नए आवास उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं।

7 - लखनऊ के आसपास के वन क्षेत्र और प्राकृतिक आवास

यदि लखनऊ को केवल नगर सीमा तक सीमित न मानकर उसके व्यापक पारिस्थितिक परिदृश्य के रूप में देखा जाए, तो 60 से 120 किलोमीटर के दायरे में कई महत्वपूर्ण वन और आर्द्रभूमि क्षेत्र मौजूद हैं। इनमें नैमिषारण्य का वन क्षेत्र, नवाबगंज पक्षी विहार और हरदोई जिले का संडीला वन क्षेत्र प्रमुख हैं। ये क्षेत्र सीधे तौर पर लखनऊ के शहरी ग्रीन नेटवर्क का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन क्षेत्रीय जैव विविधता को बनाए रखने और वन्यजीवों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी शहर को उसके आसपास के प्राकृतिक परिदृश्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

  • नैमिषारण्य वन क्षेत्र सीतापुर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाला वन क्षेत्र है, जहां अभी भी उल्लेखनीय वृक्षावरण और प्राकृतिक जैव विविधता मौजूद है।

  • नवाबगंज पक्षी विहार (अब शहीद चंद्रशेखर आजाद पक्षी अभयारण्य) प्रवासी और स्थानीय पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास है तथा क्षेत्रीय पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

  • संडीला वन क्षेत्र हरदोई जिले में स्थित उन चुनिंदा हरित क्षेत्रों में शामिल है, जहां अभी भी प्राकृतिक वनस्पति और वन्यजीवों के लिए अपेक्षाकृत बेहतर आवास उपलब्ध हैं।

  • ये सभी क्षेत्र मिलकर मध्य गंगा के मैदान में एक व्यापक पारिस्थितिक परिदृश्य (Regional Ecological Landscape) का निर्माण करते हैं, जिससे लखनऊ सहित पूरे क्षेत्र की जैव विविधता को अप्रत्यक्ष लाभ मिलता है।

कनेक्‍टेड फॉरेस्‍ट शहरी इलाकों की आबोहवा को ठंडा रखने के साथ ही बाढ़ नियंत्रण में भी अहम भूमिका निभाते हैं, क्‍योंकि यह नदी के तटों के कटाव को रोकते हैं। 

शहर को ठंडा रखने में भी निभाते हैं बड़ी भूमिका

पिछले कुछ वर्षों में लखनऊ समेत उत्तर भारत के अधिकांश शहरों में गर्मी की तीव्रता बढ़ी है। मई और जून के दौरान तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंचना अब असामान्य नहीं रह गया है। विशेषज्ञ इसके पीछे केवल जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार नहीं मानते, बल्कि शहरों में बढ़ते कंक्रीटीकरण को भी एक प्रमुख कारण बताते हैं।

जब हरित क्षेत्र आपस में जुड़े होते हैं, तो वे बड़े स्तर पर तापमान नियंत्रित करने का काम करते हैं। पेड़ों की छाया, वाष्पोत्सर्जन और मिट्टी में नमी की मौजूदगी आसपास के वातावरण को ठंडा बनाए रखती है। इसके विपरीत, अलग-अलग बिखरे हुए पार्कों का प्रभाव सीमित दायरे तक ही रहता है।

कई अध्ययनों में पाया गया है कि परस्पर जुड़े हरित क्षेत्र शहरी हीट आइलैंड प्रभाव को कम करने में अधिक प्रभावी होते हैं। वे ठंडी हवा के प्राकृतिक प्रवाह को भी बढ़ावा देते हैं, जिससे पूरे शहर को लाभ मिलता है।

जल संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण से भी है संबंध

कनेक्टेड फॉरेस्ट का महत्व केवल जैव विविधता या तापमान तक सीमित नहीं है। इनका सीधा संबंध शहरी जल प्रबंधन से भी है। जब हरित क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े होते हैं, तो वर्षा जल को प्राकृतिक रूप से बहने और जमीन में समाने का अवसर मिलता है। मिट्टी अधिक पानी सोखती है और भूजल पुनर्भरण बेहतर होता है।

इसके विपरीत, जब हरियाली छोटे-छोटे टुकड़ों में सिमट जाती है और उनके बीच कंक्रीट का विस्तार हो जाता है, तो वर्षा का अधिकांश पानी सीधे सड़कों और नालों में बह जाता है। यही कारण है कि कम समय की तेज बारिश भी कई शहरों में जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा कर देती है।

लखनऊ में भी पुराने तालाबों, नालों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों के सिकुड़ने का असर बार-बार दिखाई देता है। यदि हरित क्षेत्रों को जलाशयों और नदी तटों के साथ जोड़कर विकसित किया जाए, तो इससे जल संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण दोनों में मदद मिल सकती है।

निष्कर्ष : अब पेड़ों की गिनती से आगे बढ़ने का समय

विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल पौधे लगाने का अभियान नहीं है। असली चुनौती ऐसे शहर बनाने की है जहां प्रकृति टुकड़ों में बंटी हुई न हो। यदि हरित क्षेत्र एक-दूसरे से कटे रहेंगे, तो वे सीमित लाभ ही दे पाएंगे। लेकिन यदि उन्हें वैज्ञानिक ढंग से जोड़ दिया जाए, तो वही पेड़, वही पार्क और वही नदी शहर को ठंडा रखने, जैव विविधता बचाने, जल संरक्षण बढ़ाने और लोगों के जीवन की गुणवत्ता सुधारने में कहीं अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं।

आज जरूरत सिर्फ अधिक पेड़ लगाने की नहीं, बल्कि ऐसे "कनेक्टेड फॉरेस्ट" बनाने की है जो शहर को फिर से प्रकृति से जोड़ सकें। क्योंकि पेड़ तो हमारे शहरों में पहले से हैं, लेकिन उन्हें फिर से जंगल बनाना अभी बाकी है।

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