फोटो: टी. आर. शंकर रमन / विकिमीडिया कॉमन्स

 
पर्यावरण

हर खाली जमीन बंजर नहीं: खुले प्राकृतिक इलाकों को समझने की नई कोशिश

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

  • हर कम पेड़ों वाली जमीन बंजर नहीं होती।घासभूमि, सवाना, झाड़ीदार क्षेत्र और रेगिस्तान भी प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र हैं।

  • भारत में खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र करीब 3.2 लाख वर्ग किमी में फैले हैं, लेकिन इनमें से 5% से भी कम क्षेत्र संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क में आता है।

  • हर जगह पेड़ लगाना पर्यावरण बहाली का सही तरीका नहीं है। स्थानीय जैव विविधता, मिट्टी और पानी को ध्यान में रखकर बहाली की योजना बनानी होगी।

  • घासभूमियां जलवायु और आजीविका के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इनकी मिट्टी में कार्बन जमा रहता है और इन पर चराई तथा स्थानीय समुदायों की आजीविका निर्भर करती है।

भारत में प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की चर्चा अक्सर जंगलों और पेड़ों के इर्द-गिर्द होती है। लेकिन देश में कई ऐसे प्राकृतिक इलाके भी हैं जहां पेड़ कम होते हैं। घासभूमियां, सवाना, झाड़ीदार क्षेत्र, रेगिस्तान, चट्टानी इलाके और बीहड़ इसके उदाहरण हैं। इन जगहों पर पेड़ों की कम संख्या हमेशा भूमि क्षरण का संकेत नहीं होती। कई बार यही उनकी प्राकृतिक स्थिति होती है।

17 अगस्त 2026 को भारत ने पहली बार घासभूमियों और अन्य खुले प्राकृतिक इलाक़ों पर एक राष्ट्रीय गाइड जारी की। इसमें इन इलाकों की प्रकृति, वहां मिलने वाली जैव विविधता और उनसे जुड़ी आजीविकाओं के बारे में जानकारी दी गई है। गाइड को संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण निवारण अभिसमय (UNCCD) के COP17 के दौरान मंगोलिया के उलानबातार में जारी किया गया।

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मार्गदर्शन में तैयार इस गाइड में देश के प्रमुख खुले प्राकृतिक इलाकों की पहचान और उनकी विशेषताओं के बारे में जानकारी दी गई है। इसमें वहां मिलने वाली जैव विविधता और इन इलाकों पर निर्भर समुदायों को भी शामिल किया गया है। 

ATREE के अनुसार, गाइड में 24 तरह के खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों को शामिल किया गया है। इसे ATREE ने IUCN, Centre of Excellence on Sustainable Land Management, ICFRE और ISRO के Space Applications Centre के सहयोग से तैयार किया है। यह गाइड इस सोच पर सवाल उठाती है कि कम पेड़ों वाली हर जमीन पर पेड़ लगाना ही पर्यावरण बहाली है।

इस सवाल का जवाब उस जमीन की प्राकृतिक पारिस्थितिकी को समझने में है। इन इलाकों की अहमियत सिर्फ इसलिए नहीं है कि यहां अलग-अलग प्रजातियां मिलती हैं। ये मिट्टी में कार्बन जमा करते हैं, पशुपालक समुदायों को चारा और चरागाह देते हैं और कई जगह स्थानीय जल चक्र का हिस्सा हैं। इसलिए इन्हें केवल “पेड़ कम होने वाली जमीन” के रूप में देखना इनके दूसरे पर्यावरणीय और सामाजिक महत्व को नजरअंदाज करना है।

भारत में 24 तरह के खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र

खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (Open Natural Ecosystems या ONEs) किसी एक तरह के इलाके को नहीं कहते। इसमें ऐसे प्राकृतिक इलाके शामिल हैं जहां पेड़ कम होते हैं। घासभूमि, सवाना, झाड़ीदार क्षेत्र, रेगिस्तान, चट्टानी पठार और बीहड़ इसके उदाहरण हैं।

हिमालय और तराई की घासभूमियों से लेकर थार और बन्नी के सूखे इलाकों तक, भारत में खुले प्राकृतिक इलाकों के कई रूप मिलते हैं। दक्कन के सवाना, चट्टानी पठार और बीहड़ भी इसके उदाहरण हैं।

2022 में Journal of Biogeography में प्रकाशित एक अध्ययन ने भारत के शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में ONEs का विस्तृत मानचित्र तैयार किया। अध्ययन के अनुसार, इन क्षेत्रों में ONEs लगभग 3.2 लाख वर्ग किलोमीटर, यानी भारत के भौगोलिक क्षेत्र के करीब 10 प्रतिशत में फैले हैं। इनमें से 5 प्रतिशत से भी कम क्षेत्र संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क के भीतर आता है।

Wasteland का मतलब क्या सचमुच बेकार जमीन है?

यहीं एक अहम सवाल सामने आता है। इन इलाकों की पहचान में एक बड़ी समस्या यह रही है कि सरकारी रिकॉर्ड में इन्हें किस श्रेणी में रखा जाए। Journal of Biogeography में प्रकाशित अध्ययन में जिन ONEs का मानचित्र तैयार किया गया, उनमें 68.6 प्रतिशत क्षेत्र को ‘wasteland’ की श्रेणी में रखा गया था। शोधकर्ताओं के अनुसार, ऐसे वर्गीकरण के कारण इन इलाकों को पेड़ लगाने, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं या दूसरे विकास कार्यों के लिए उपलब्ध जमीन मान लिए जाने का खतरा बढ़ सकता है।

2022 के अध्ययन में mapped ONEs में 68.6 प्रतिशत क्षेत्र ‘wasteland’ के रूप में दर्ज था। ATREE के बाद के विश्लेषण में यह आंकड़ा करीब 70 प्रतिशत बताया गया है।

इसलिए ‘wasteland’ केवल भूमि का एक वर्गीकरण नहीं है। शोधकर्ताओं के अनुसार, ऐसे वर्गीकरण के कारण इन इलाकों को पेड़ लगाने, नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं या दूसरे कामों के लिए खाली जमीन मान लिया जाने का खतरा बढ़ सकता है। 

हर खुली जमीन को जंगल में बदलना बहाली नहीं

किसी प्राकृतिक घासभूमि या सवाना में पेड़ों की संख्या कम होना हमेशा भूमि क्षरण का संकेत नहीं है। IPCC की रिपोर्ट के अनुसार, जो क्षेत्र प्राकृतिक रूप से घासभूमि या सवाना हैं, वहां बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण से जैव विविधता, पानी की उपलब्धता और प्रकृति से मिलने वाले दूसरे लाभ प्रभावित हो सकते हैं।

दक्कन के सवाना में घास और जगह-जगह खड़े पेड़ वहां की प्राकृतिक बनावट का हिस्सा हो सकते हैं। थार में कम वर्षा और रेतीली जमीन अलग तरह की वनस्पति को सहारा देती है। चट्टानी पठारों और बीहड़ों की भी अपनी अलग पारिस्थितिकी है।

इन सभी इलाकों को बहाल करने का एक ही तरीका काम नहीं कर सकता। आबी टी. वानक के अनुसार, किसी इलाके को बहाल करने का तरीका वहां की स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से तय होना चाहिए। अगर किसी क्षेत्र में पेड़ लगाने की जरूरत हो, तो स्थानीय वर्षा और जल उपलब्धता को भी ध्यान में रखना चाहिए। 

इसका मतलब यह है कि सूखे और अर्द्ध-शुष्क इलाकों में वृक्षारोपण की योजना बनाते समय स्थानीय बारिश और पानी की उपलब्धता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वानक के अनुसार, जिस इलाके में पेड़ प्राकृतिक रूप से नहीं उगते, वहां ज्यादा पेड़ लगाने से पानी की उपलब्धता बढ़ने के बजाय पानी पर दबाव बढ़ सकता है।

यह बात खास तौर पर उन शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है जहां पानी पहले से सीमित है।

खुले भू-दृश्य कई प्रजातियों के लिए जरूरी हैं

खुले प्राकृतिक इलाक़ों का महत्व केवल घास या पेड़ों की संख्या से नहीं समझा जा सकता। यह उन प्रजातियों से भी जुड़ा है जो इन्हीं भू-दृश्यों पर निर्भर हैं। इनमें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, ब्लैकबक, भारतीय भेड़िया, लेसर फ्लोरिकन और इंडियन कर्सर जैसी प्रजातियां शामिल हैं। ATREE के ONE Map में इन प्रजातियों को ONEs से जुड़ी जैव विविधता के उदाहरण के रूप में दर्ज किया गया है।

महाराष्ट्र में किए गए एक हालिया अध्ययन में प्राकृतिक सवाना और वृक्षारोपण वाले क्षेत्रों के बीच पक्षियों की विविधता की तुलना की गई। अध्ययन में 69 प्रजातियों में से 22 केवल पुराने प्राकृतिक सवाना क्षेत्रों में और 21 केवल वृक्षारोपण वाले क्षेत्रों में मिलीं। शोधकर्ताओं ने पाया कि वृक्षारोपण से पक्षियों की पूरी समुदाय संरचना बदल गई और सवाना पर निर्भर पक्षियों में कमी आई। हालांकि, सभी पक्षियों के लिए इसका असर एक जैसा नहीं था।

इसलिए अध्ययन के निष्कर्ष किसी एक सरल नतीजे के बजाय यह बताते हैं कि सवाना में वृक्षारोपण के असर को स्थानीय बारिश और वहां रहने वाली प्रजातियों के संदर्भ में समझना जरूरी है।

घासभूमि की कहानी पानी और कार्बन की भी है

खुले प्राकृतिक इलाकों का महत्व सिर्फ वन्यजीवों और पशुओं के चरने तक सीमित नहीं है। इनके नीचे की मिट्टी में भी कार्बन जमा रहता है। ATREE के सोलापुर पायलट अध्ययन में घासभूमि की मिट्टी में करीब 30 टन कार्बन प्रति हेक्टेयर तक का भंडार पाया गया।

सवाना जैसे इलाकों में कार्बन का बड़ा हिस्सा पेड़ों के ऊपर नहीं, बल्कि जमीन के नीचे जड़ों और मिट्टी में जमा रहता है। इसलिए जलवायु नीति में केवल पेड़ों में जमा कार्बन को देखना पर्याप्त नहीं है। IPCC की छठी आकलन रिपोर्ट में घासभूमियों और सवाना के संरक्षण और बहाली को कार्बन बचाने और उत्सर्जन घटाने के संभावित तरीकों में शामिल किया गया है।

यहां कार्बन के साथ पानी का सवाल भी जुड़ता है। शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में वृक्षारोपण की योजना बनाते समय स्थानीय वर्षा और पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखना जरूरी है। महाराष्ट्र के अध्ययन पर बात करते हुए आबी वानक ने भी वृक्षारोपण को स्थानीय जलवायु और वर्षा के अनुरूप रखने की जरूरत बताई है।

इसलिए किसी इलाके को बहाल करने की योजना बनाते समय यह समझना जरूरी है कि वहां पहले किस तरह की प्राकृतिक वनस्पति थी और वह वहां उपलब्ध पानी पर कितनी निर्भर थी।

घासभूमि सिर्फ वन्यजीवों का आवास नहीं

इन इलाकों पर कई स्थानीय समुदायों की आजीविका भी निर्भर है। खुले प्राकृतिक इलाक़ों का संबंध स्थानीय आजीविकाओं से भी है। ATREE के 2024 के विश्लेषण के अनुसार, भारत में करीब 1.3 करोड़ पशुपालक 46 पशुपालक समुदायों से जुड़े हैं और इन खुले प्राकृतिक इलाकों से उनकी आजीविका का एक बड़ा हिस्सा जुड़ा है।

हालांकि हर तरह की चराई फायदेमंद नहीं होती। इसका असर पशुओं की संख्या, चराई की तीव्रता, मौसम और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए संरक्षण और आजीविका के बीच संतुलन के लिए स्थानीय स्तर पर चराई का बेहतर प्रबंधन जरूरी होगा।

यानी किसी इलाके को बहाल करने से पहले वहां की प्राकृतिक स्थिति को समझना और इस बात को जानना ज़रूरी है कि हर जगह पेड़ लगाना इसका एकमात्र तरीका नहीं है।

अब सवाल है कि नई गाइड जमीन पर क्या बदलेगी?

नई गाइड पहली बार इन खुले प्राकृतिक इलाकों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान देती है। लेकिन असली सवाल यह है कि इसके नक्शे और जानकारी जमीन पर लिए जाने वाले फैसलों में कितनी काम आएगी।

पहला: भूमि रिकॉर्ड में पहचान

अगर किसी प्राकृतिक घासभूमि को सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ ‘wasteland’ या बंजर भूमि कहा जाता है, तो रिकॉर्ड और सरकारी योजनाओं में उसकी प्राकृतिक पहचान कैसे दर्ज होगी?

दूसरा: विकास परियोजनाओं की योजना

क्या ONEs के नक्शों का इस्तेमाल सौर और पवन ऊर्जा, सड़क, खनन और दूसरे विकास कार्यों की जगह तय करते समय किया जाएगा? 

तीसरा: बहाली के लिए अलग योजना और बजट

क्या घासभूमि, सवाना और दूसरे खुले इलाकों की बहाली के लिए अलग योजना और बजट बनाया जाएगा?

चौथा: सफलता कैसे मापी जाएगी?

किसी बहाली परियोजना की सफलता केवल लगाए गए पेड़ों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। स्थानीय वनस्पति, जैव विविधता, मिट्टी, पानी और आजीविका में बदलाव को भी सफलता का आधार माना जाना चाहिए।

  • स्थानीय घास और वनस्पतियों की विविधता

  • खुले प्राकृतिक इलाकों पर निर्भर प्रजातियां

  • मिट्टी की स्थिति और मिट्टी में कार्बन

  • पानी की उपलब्धता

  • चराई और स्थानीय आजीविका

  • आक्रामक प्रजातियों का फैलाव

सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि कितने पेड़ लगाए गए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि स्थानीय प्राकृतिक इलाके की स्थिति में क्या बदलाव आया।

गाइड की असली परीक्षा जमीन पर होगी

भारत की पहली ‘Grasslands and Other Open Natural Ecosystems’ गाइड ने घासभूमियों, सवाना, रेगिस्तान, झाड़ियों और दूसरे खुले प्राकृतिक इलाकों को संरक्षण की चर्चा में जगह दी है। अब अगला कदम इस जानकारी को नक्शे और दस्तावेज से आगे ले जाने का है। भूमि उपयोग की योजना, विकास परियोजनाओं, बहाली कार्यक्रमों और चरागाह प्रबंधन में इन इलाकों की अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखना होगा।

किसी जमीन पर पेड़ कम हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह बंजर है। किसी इलाके को बहाल करने से पहले यह समझना जरूरी है कि वहां प्रकृति अपने आप कैसे काम करती है। वहां की जैव विविधता, मिट्टी और पानी को भी ध्यान में रखना होगा। हर जगह पेड़ लगाना ही बहाली का तरीका नहीं है।

नई गाइड पहली बार इन खुले प्राकृतिक इलाकों को एक राष्ट्रीय संदर्भ में एक साथ सामने लाती है।

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