बीते एक-डेढ़ दशक में भारत में पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रति सजगता काफ़ी तेज़ी से बढ़ी है। इसके लिए व्यक्तिगत प्रयासों, स्वयंसेवी संस्थाओं के कामों से लेकर सरकारी योजनाओं और नीतिगत स्तर तक उल्लेखनीय काम होता दिखा है, जिसे दुनिया ने माना और सराहा है। पर्यावरण के क्षेत्र में भारत की कोशिशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी ही मान्यता मिली है संयुक्त राष्ट्र (यूएन) का सबसे बड़ा पर्यावरणीय पुरस्कार एक भारतीय महिला सुप्रिया साहू को दिए जाने के रूप में।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा सामाजिक और पर्यावरणीय बदलाव लाने वाले व्यक्तियों को सम्मानित करने के लिए दिया जाने वाला ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ अवार्ड (2025) तमिलनाडु कैडर की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सुप्रिया साहू को दिया गया है। उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रकृति, पर्यावरण और जलवायु के संरक्षण में अपनी ठोस कार्रवाईयों और असाधारण योगदान के लिए दिया गया है। उनके इन कामों से लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव आए हैं, जिसे संयुक्त राष्ट्र की ओर से वैश्विक स्तर पर मान्यता मिली है, जिसे भारतीय प्रशासनिक सेवा के इतिहास में भी एक गौरवशाली उपलब्धि माना जा रहा है।
सुप्रिया साहू 1991 बैच की आईएएस अधिकारी हैं। वर्तमान में वह तमिलनाडु सरकार में अतिरिक्त मुख्य सचिव (पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन एवं वन विभाग) के पद पर कार्यरत हैं। तीन दशक से अधिक का प्रशासनिक अनुभव रखने वाली सुप्रिया ने अपने करियर की शुरुआत से ही पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी। करियर के शुरुआती दिनों में ही उन्हें यह अहसास हुआ कि प्रशासनिक शक्ति का उपयोग अगर सही दिशा में किया जाए, तो प्रकृति और समाज दोनों का भला किया जा सकता है।
सुप्रिया को यह प्रेरणा अपने आसपास के जंगलों की हरियाली में घूमते समय दिखाई दिए दृश्यों से मिली। उन्होंने जब वनों तक पहुंच गए प्रदूषण के कारण वन्य जीवों को प्लास्टिक कचरा खाते देखा, तो उन्हें महसूस हुआ कि प्रदूषण की समस्या कितनी विकराल होती जा रही है और यह हमारी प्रकृति को कितना गहरा नुकसान पहुंचा रही है। इसी विचार ने उन्हें एक ब्यूरोक्रेट के रूप में उनकी सोच और कार्यशैली में पूरी तरह बदल कर रख दिया और उन्हें अपने प्रशासकीय कामों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के व्यवहारिक और समाधानों के लिए काम करने को प्रेरित किया।
सुप्रिया के प्रशासनिक करियर की शुरुआत ही ‘ऑपरेशन ब्लू माउंटेन’ नाम के एक बड़े पर्यावरण अभियान से हुई, जिसे उन्होंने नौकरी के शुरुआती दिनों में नीलगिरि जिले में चलाया था था। इस पहल का उद्देश्य सिंगल यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल पर लगाम कसना था। स्थानीय वन्यजीवों पर प्लास्टिक के दुष्प्रभाव को देखते हुए साहू ने इस आंदोलन को मजबूती से आगे बढ़ाया।
इस अभियान के साथ ही उनकी हरियाली एक और पहल ने नीलगिरि में एक नया इतिहास रचा, जिसके तहत एक ही दिन में 42,000 से अधिक पौधे लगाए गए, जिसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया था। इस तरह बड़ी-पैमाने पर की गई उनकी पर्यावरणीय कोशिशों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की। साथ ही इससे लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी की भावना को भी विकसित करने में मदद मिली। सुप्रिया की इन शुरुआती कोशिशों ने उनके मन में इस विश्वास को पक्का कर दिया कि अगर सरकार और समुदाय हाथ मिला कर काम करें, तो पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को कहां आसानी से पाया जा सकता है और इन चीज़ों को औपचारिक नीतियों से कहीं आगे ले जाया जा सकता है।
सुप्रिया साहू की अगुवाई में तमिलनाडु में वन विस्तार (Afforestation) पर विशेष ध्यान दिया गया। उनके नेतृत्व में राज्य में 10 करोड़ से अधिक वृक्ष लगाए गए, 65 से अधिक नए आरक्षित वन (Reserve Forests) बनाए गए और तटीय इलाकों में घटते मैंग्रोव कवर को दोगुना करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई। मैंग्रोव के पेड़ों के ज़रिये वेटलैंड्स के पारिस्थितिक-तंत्र (Ecosystems) को संरक्षित करने से न तटों के कटाव को रोकने और समुद्री तटों को भी तूफ़ानों और समुद्री लहरों से बचाने में मदद मिली, बल्कि यह पहल जैव विविधता को संरक्षित करने में भी मददगार साबित हुई।
इस प्रकार के कई कदम उठाकर सुप्रिया साहू ने तमिलनाडु में बायो-डायवर्सिटी को मजबूती दी और सामूहिक प्रयासों के ज़रिये प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गर्मी और हीटवेव से बचाव के लिए लोग अकसर एयर कूलर या एयर कंडीशनर (एसी) जैसे ज़्यादा बिजली की खपत वाले साधनों का इस्तेमाल करते हैं। इससे बिजली की खपत बढ़ने से पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, क्योंकि हमारे देश में बिजली का ज़्यादार उत्पादन ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले थर्मल पावर प्लांट्स में होता है। इसके अलावा गर्मी के कारण घरों में पानी की खपत भी बढ़ जाती है, जो सीमित जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालती है। इन दोनों ही समस्याओं का समाधान गर्मी में घरों को पर्यावरण अनुकूल तरीके से ठंडा रखकर किया जा सकता है। इसके लिए सुप्रिया ने तमिलनाडु में सस्टेनबल कूलिंग के उपाय के तौर पर ‘कूल रूफ प्रोजेक्ट’ को लागू किया। इस प्रोजेक्ट में सरकारी भवनों, स्कूलों और गरीब वर्ग के घरों की छतों को विशेष हाई रिफ्लेक्टिव पेंट किया गया।
इससे इमारतों के भीतर तापमान (गर्मी) को काफ़ी हद तक कम करने में मदद मिली। यह पहल तमिलनाडु सरकार की शहरी इलाकों में गर्मी में कमी लाने के उपायों (Urban Heat Mitigation Strategy) का हिस्सा है। इससे तापमान में 5-8 डिग्री सेल्सियस तक की कमी लाने में मदद मिली। यह खासकर उन लोगों के लिए एक बड़ी राहत साबित हुई, जिनके पास कूलर या एसी जैसी महंगी सुविधाएं नहीं थीं। इस तरह कूल रूप पहल न केवल तापमान नियंत्रण में कारगर रही, बल्कि ऊर्जा की मांग को कम कर बिजली की खपत को घटाने में मददगार साबित हुई।
यह मॉडल तमिलनाडु के ज़्यादा गर्मी और उमस वाले इलाक़ों में सस्ते और प्रभावी तरीके से हीट स्ट्रेस को कम करने में कारगर साबित हुआ है।
सुप्रिया साहू का मानना रहा है कि पर्यावरणीय परिवर्तन तभी स्थायी और प्रभावी हो सकते हैं, जब उसमें जन भागीदारी और स्वामित्व की भावना हो। इसी सोच पर काम कते हुए उन्होंने तमिलनाडु में चलाए गए पर्यावरणीय कार्यक्रमों ने समुदाय-आधारित जलवायु प्रबंधन को मजबूत किया। उनके नेतृत्व में शुरू की गई पहलों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 25 लाख से अधिक रोजग़ार के अवसर यानी “ग्रीन जॉब्स” तैयार हुए। ये रोजगार पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, वेटलैंड प्रबंधन और अन्य स्थायी गतिविधियों से जुड़े हुए थे। इससे न केवल पर्यावरण सुरक्षित हुआ, बल्कि स्थानीय समुदायों को आजीविका कमाने के आर्थिक अवसर भी प्राप्त हुए।
सुप्रिया साहू ने समझा कि पर्यावरण केवल प्रकृति का मुद्दा नहीं बल्कि इसका गहरा असर लोगों की सेहत और जीवन-गुणवत्ता पर भी पड़ता है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी यानी ग्लोबल वॉर्मिंग, प्रदूषण और जल संकट का सबसे अधिक असर कमजोर एवं पिछड़े समुदायों पर पड़ता है। इसलिए उन्होंने अपनी पर्यावरणीय पहलों में खासतौर पर इस वर्ग को ध्यान में रखते हुए तापमान के बढ़ने पर सार्वजनिक स्थानों में हीट अडैप्टेशन मॉडल लागू किए, जिससे 1.2 करोड़ से अधिक लोगों की जलवायु-सहनशीलता (Climate Resilience) बढ़ाई गई। यह केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए जीवन में सुधार लाने का ज़रिया भी बन गया, जो बढ़ती गर्मी की परेशानी से प्रतिदिन जूझते हैं।
जैसे-जैसे धरती पर तापमान बढ़ रहा है, हमारे शहर और भी तेज़ी से गर्म होते जा रहे हैं। इन कंक्रीट के जंगलों में सुप्रिया साहू ने प्राकृतिक तरीको से ठंडक पहुंचाई है। इनके प्रयासों से लाखों लोगों, जिनमें हज़ारों स्कूली बच्चे भी शामिल हैं, को तमिलनाडु की भीषण गर्मी से राहत मिली है। इनकी पहल बिजली की भारी खपत वाले एयर कंडीशनरों के बिना और प्रकृति का उपयोग करके गर्मी को कम करने के उपायों के महत्व को दर्शाता है। यह जलवायु संकट से निपटने में सरकारी स्तर पर किए जाने वाली इनोवेटिव पहल के महत्व को भी उजागर करता है।इंगर एंडरसन, संयुक्त राष्ट्र की अवर महासचिव और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक
सुप्रिया साहू को उनके पर्यावरणीय प्रयासों के लिए मिले संयुक्त राष्ट्र के इस सम्मान से वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका और योगदानों को भी एक प्रकार से मान्यता मिली है। सुप्रिया की उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान के लिये है, बल्कि यह सरकार के लिए भी एक गर्व का विषय है, क्योंकि यह सारे कार्य उन्होंने सरकारी तंत्र का हिस्सा रहते हुए और सरकार की नीतियों के तहत ही किए हैं। इस तरह यह सरकारी की ओर से स्थानीय स्तर पर किए गए कार्यों की वैश्विक मान्यता को भी दर्शाता है। इसे लेकर UNEP के बयान में कहा गया है कि साहू ने प्लास्टिक प्रदूषण, जैव विविधता हानि, जलवायु अनुकूलन, और ऊर्जा-कुशल शीतलन जैसे समग्र पर्यावरणीय समाधान पेश किए हैं, जो अन्य राज्यों और देशों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।
सुप्रिया साहू को इन्सपिरेशन एंड एक्शन श्रेणी में मिले ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ अवार्ड के अलावा संस्थागत श्रेणी में यह पुरस्कार युवाओं द्वारा संचालित एक गैर-सरकारी संगठन पैसिफिक आइलैंड्स स्टूडेंट्स फाइटिंग क्लाइमेट चेंज को भी मिला है। यह संस्था सोलोमन आइलैंड्स, फ़िजी, वानुअतु, टोंगा आदि प्रशांत द्वीपीय देशों में पर्यावरण के क्षेत्र में काम करती है। इस संगठन ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय से एक ऐतिहासिक निर्णय प्राप्त किया है, जिसमें जलवायु परिवर्तन को रोकने और मानवाधिकारों की रक्षा करने के लिए राज्यों के कानूनी दायित्वों की पुष्टि की गई है।
इसके अलावा नाइजर की मरियम इस्सौफौ आर्किटेक्ट्स की प्रमुख और संस्थापक मरियम इस्सौफौ को 'उद्यमी दूरदर्शिता' श्रेणी में सम्मानित किया गया है। वह टिकाऊ और जलवायु-प्रतिरोधी इमारतों को नया रूप दे रही हैं और अफ्रीका के निर्मित पर्यावरण को आकार देने वाले डिजाइनरों की एक नई पीढ़ी को प्रेरित कर रही हैं। इस साल के अन्य विजेताओं में ब्राजील का इमाज़ोन (Imazon) शोध संस्थान भी शामिल है। इसे 'विज्ञान और नवाचार' श्रेणी में पुरस्कृत किया गया है। इमाज़ोन ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े हजारों कानूनी मामलों में सहायता प्रदान की है साथ ही इसके कार्यों ने वन प्रशासन को मजबूत किया है। इसने अमेज़न के जंगलों में बड़े पैमाने पर हो रही अवैध कटाई की घटनाओं को भी उजागर कर इस पर रोक लगाने में अहम भूमिका निभाई है। यूएनईपी 'चैंपियंस ऑफ द अर्थ' पुरस्कार के तहत उन व्यक्तियों, समूहों और संगठनों को सम्मानित करता है, जिनके कार्यों का पर्यावरण पर परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ता है।
सुप्रिया साहू की कहानी यह सिखाती है कि सरकारी अधिकारियों में स्पष्ट दृष्टि, व्यक्ति का समर्पण के साथ जनता को केंद्र में रखकर काम करने की नीति और जज़्बा हो तो सरकारी तंत्र, नियम और नीतियां बाधा नहीं बनते, बल्कि इनसे प्रयासों को मजबूती और व्यापकता ही मिलती है। साथ ही सरकारी सहायोग के चलते यह प्रसास कम ही समय में बड़े बदलाव लाने में सक्षम होते हैं। इसी के चलते उनके कार्यों ने तमिलनाडु को न केवल भारत में बल्कि वैश्विक जलवायु नेतृत्व के मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया है।
अपने कामों के ज़रिये उन्होंने यह दिखा दिया है कि पर्यावरण संरक्षण केवल एक नीतिगत विषय नहीं बल्कि यह लोगों को साथ लेकर आगे बड़े बदलाव लाने का क्षेत्र है। इससे लोगों के दैनिक जीवन, उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोजगार में भी सुधार लाया जा सकता है। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, बढ़ती गर्मी जैसी चुनौतियों और प्रकृति के क्षरण जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्याओं से जूझ रही है, सुप्रिया जैसे उत्साही और संकल्पित अधिकारियों की नेतृत्वकारी भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।