वेटलैंड्स भूजल रिचार्ज और बाढ़ नियंत्रण में मददगार होने के साथ ही प्रवासी पक्षियों के लिए एक मनपसंद प्रवास स्थल भी होते हैं।
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सरकार नमामि गंगे कार्यक्रम को अब केवल गंगा नदी की सफाई तक सीमित न रखकर गंगा बेसिन क्षेत्र के पूरे पारिस्थितिक तंत्र को पुनर्जीवितक करने की तैयारी में है। इसके लिए नमामि गंगे के तहत चल रहे राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) के अंतर्गत उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड की छह महत्वपूर्ण वेटलैंड्स को पुनर्जीवित करने की योजना शुरू की जाने वाली है। इस तरह यह योजना व्यापक स्तर पर गंगा बेसिन की पारिस्थितिकी, भूजल सुरक्षा, जैव विविधता को मजबूत करने की एक व्यापक पहल है।
इस योजना के तहत मुजफ्फरनगर की कालेवाला झील, प्रयागराज की नुमैया दह और खेडुवा ताल, बलिया की रेवती दह, बिहार के भोजपुर की नाथमलपुर भागड़ तथा झारखंड की उधवा झील पक्षी अभयारण्य (रामसर स्थल) को शामिल किया गया है। इन वेटलैंड्स के पुनर्जीवन से इनके आसपास के इलाकों में बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, पक्षी संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी कम करने में मदद मिलेगी।
वेटलैंड्स को पृथ्वी की ‘प्राकृतिक किडनी’ कहा जाता है क्योंकि ये सतह पर मौजूद पानी को फिल्टर कर और प्रदूषक तत्वों को सोखकर भूजल को रिचार्ज करने का महत्वपूर्ण काम करती हैं। इस तरह वेटलैंड्स किडनी की तहर जल प्रवाह को नियंत्रित करने और उसे शुद्ध करने का काम करती हैं। ठीक इसी तरह गंगा बेसिन में मौजूद सैकड़ों-हज़ारों झीलें, दह, ताल और भागड़ जैसी आर्द्रभूमियां मानसूनी जल को संचित कर धीरे-धीरे उसे भूजल तथा नदियों में पहुंचाती हैं।
पिछले कुछ दशकों में यह आर्द्र भूमियां अतिक्रमण, गाद जमाव, अवैध भराई, जल निकासी और प्रदूषण के कारण तेजी से सिमटती और नष्ट होती जा रही हैं। सरकार ने अब नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत इन्हें बचाने का बीड़ा उठाया है। यह काम राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के तहत किया जाएगा। क्योंकि, केवल नदी मौजूद कचरे की सफाई और केवल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से गंगा जल का ट्रीटमेंट करना गंगा को स्वच्छ और अविरल बनाए रखने में कारगर साबित नहीं हो रहा है। इसके लिए नदी से जुड़े प्राकृतिक जल तंत्र, विशेषकर वेटलैंड्स, को पुनर्जीवित करना भी उतना ही जरूरी है। इसीलिए नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत अब नदी तंत्र से जुड़ी आर्द्रभूमियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
| वेटलैंड | क्षेत्रफल (हेक्टेयर) | जिला / राज्य | विशेषता |
|---|---|---|---|
| कालेवाला झील | लगभग 1,150 (मीडिया रिपोर्ट) | मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश | प्रवासी पक्षियों का ठिकाना |
| नुमैया दह | उपलब्ध नहीं | प्रयागराज, उत्तर प्रदेश | गंगा तंत्र से जुड़ी आर्द्रभूमि |
| खेडुवा ताल | उपलब्ध नहीं | प्रयागराज, उत्तर प्रदेश | स्थानीय जल संचयन का प्रमुख स्रोत |
| रेवती दह | उपलब्ध नहीं | बलिया, उत्तर प्रदेश | बाढ़ क्षेत्र की महत्वपूर्ण दह |
| नाथमलपुर भागड़ | उपलब्ध नहीं | भोजपुर, बिहार | मौसमी जल भंडारण व मत्स्य संसाधन |
| उधवा झील पक्षी अभयारण्य | 935.5 (आधिकारिक) | साहिबगंज, झारखंड | रामसर स्थल, समृद्ध जैव विविधता |
किसी भी वेटलैंड को पुनर्जीवित करने के पीछे एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण होता है। यूपी, बिहार और झारखंड के इन वेटलैंड्स के चयन के पीछे कई वैज्ञानिक और प्रबंधन संबंधी कारण हैं। जिनमें सात प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-
गंगा बेसिन में रणनीतिक स्थिति- सभी वेटलैंड्स गंगा या उसकी सहायक नदियों के बाढ़ क्षेत्र का हिस्सा हैं। इसलिए इनके संरक्षण का सीधा असर नदी के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
उच्च पारिस्थितिक महत्व - ये मछलियों, कछुओं, डॉल्फिन के खाद्य तंत्र और प्रवासी पक्षियों सहित अनेक जलीय एवं स्थलीय प्रजातियों के आवास हैं। विशेष रूप से उधवा झील पक्षी अभयारण्य एक रामसर साइट है, जो इसकी अंतरराष्ट्रीय पारिस्थितिक महत्ता दर्शाती है।
क्षरण और अतिक्रमण का खतरा - कई वेटलैंड्स में जल प्रवाह बाधित होने, गाद भरने, प्रदूषण, अतिक्रमण और भूमि उपयोग में बदलाव जैसी समस्याएं सामने आई हैं। पुनर्जीवन से उनकी प्राकृतिक जल प्रणाली बहाल करने का लक्ष्य है।
मॉडल परियोजनाएं विकसित करना - NMCG इन स्थलों पर वैज्ञानिक पुनर्जीवन मॉडल विकसित करना चाहता है ताकि भविष्य में गंगा बेसिन के अन्य वेटलैंड्स में भी इसी प्रकार के संरक्षण उपाय लागू किए जा सकें।
गंगा नदी के लिए प्राकृतिक स्पंज - गंगा नदी और वेटलैंड्स का संबंध केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि हाइड्रोलॉजिकल और पारिस्थितिक है। ये वेटलैंड गंगा नदी के लिए प्राकृतिक "स्पंज" का काम करते हैं। बाढ़ के समय ये वेटलैंड्स अतिरिक्त पानी को अपने भीतर समाहित करते हैं और जलस्तर घटने पर धीरे-धीरे पानी वापस छोड़ते हैं। इससे बाढ़ का प्रभाव कम होता है और नदी का प्रवाह संतुलित रहता है।
जलीय प्रजातियों का घर - गंगा नदी की कई जलीय प्रजातियां अपने जीवन चक्र के विभिन्न चरणों में वेटलैंड्स पर निर्भर रहती हैं। ये प्रजनन, भोजन और आश्रय स्थल के रूप में काम करते हैं।
मछुवारों के लिए आजीविका का स्रोत- इन राज्यों की आर्द्रभूमियों में हिलसा, गोल्डन महासीर, रोहू, कटला, मृगल, आदि पायी जाती हैं, जिनकी डिमांड भारतीय बाज़ारों में बहुत अधिक है। मछलियों की ये प्रजातियां मछुवारों के लिए आजीविका का प्रमुख स्रोत हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर जिले की कालेवाला झील लंबे समय से प्रवासी पक्षियों के प्रवास के लिए जानी जाती रही है। साइबेरिया और मध्य एशिया से आने वाले कई पक्षी यहां शीतकालीन प्रवास और प्रजनन करते हैं। इन पक्षियों में बार-हेडेड गूज, तिब्बती पठार, ग्रेलैग गूज, रड्डी शेलडक (ब्राह्मणी बतख), नॉर्दर्न पिंटेल, नॉर्दर्न शोवेलर, आदि प्रमुख हैं। मुजफ्फरनगर की यह झील इन पक्षियों को जलीय पौधे, कीट, छोटी मछलियां और घोंघे, आदि के रूप में पर्याप्त भोजन मुहैया कराती है। यहां का उथला पानी और दलदली क्षेत्र व जलवायु उन्हें सुरक्षित विश्राम और प्रजनन-पूर्व आवास मुहैया कराता है।
पिछले कई वर्षों में इस झील में भारी मात्रा में गाद जमने, आसपास के इलाकों में खेती का विस्तार होने और यहां के जलस्तर में गिरावट आने जैसी समस्याएं बढ़ी हैं। इसे देखते हुए इस झील व इसके वेटलैंड को पुनर्जीवित करने की योजना के तहत झील की डी-सिल्टिंग, जलधारण क्षमता बढ़ाने, किनारों पर पौधारोपण और पक्षियों के लिए सुरक्षित आवास विकसित करने पर विचार किया जा रहा है। इससे यह क्षेत्र फिर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रमुख बर्डिंग स्थलों में शामिल हो सकता है।
गंगा-यमुना की संगम स्थली होने के कारण प्रयागराज (इलाहाबाद) में इन दोनों ही नदियों के विस्तृत बाढ़ मैदानों से जुड़ी कई आर्द्रभूमियां मौजूद हैं। नुमैया दह और खेडुवा ताल इनमें महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इनके संरक्षण की योजना है। ये जल निकाय मानसून के दौरान बारिश के पानी को बड़ी मात्रा में समाहित करके भूजल रिचार्ज और आसपास के क्षेत्रों में जलभराव को कम करने में भूमिका निभाते हैं। शहरी विस्तार और तलछट जमाव के कारण इनकी जलधारण क्षमता (water holding capacity) काफी बुरी तहर प्रभावित हुई है। इसे देखते हुए NMCG की योजना के तहत इस वेटलैंड के प्राकृतिक जलमार्गों की सफाई, पानी के कुदरती बहाव को बहाल करने और स्थानीय लोगों की समुदायिक भागीदारी से इसके संरक्षण का कार्य किया जाएगा।
बलिया गंगा और घाघरा जैसी बड़ी और बाढ़ वाली नदियों के प्रभाव वाले क्षेत्र में स्थित है। इसलिए यहां तकरीबन हर साल-दो साल में बाढ़ आती है। नदियों के तटीय इलाकों में तो तो हर साल मानसून के बाद एक बड़े क्षेत्र में जलभराव बड़ी संख्या में लोगों को कई महीनों के लिए विस्थापित करता है।
यहां की रेवती दह बाढ़ के पानी को समाहित करने और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। स्थानीय मछुआरा समुदाय भी इस जल निकाय पर निर्भर है। यदि इस योजना के तहत इस दह का पुनर्जीवन सफल होता है तो इस बाढ़ पर नियंत्रण के साथ ही मत्स्य उत्पादन, स्थानीय जैव विविधता और जल उपलब्धता तीनों में सुधार देखने को मिल सकता है।
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाके भोजपुर की नाथमलपुर भागड़ उन पारंपरिक वेटलैंड्स में शामिल है जो बरसाती जल को लंबे समय तक संचित करती हैं। बिहार में ‘भागड़’ शब्द प्रायः ऐसी आर्द्रभूमियों के लिए इस्तेमाल होता है जो नदी के पुराने प्रवाह मार्गों से जुड़ी होती हैं। यहां मत्स्य संसाधन, जल पक्षी और स्थानीय कृषि तंत्र एक-दूसरे से जुड़े हैं। नाथमलपुर भागड़ को पुनर्जीवित किए जाने पर यह क्षेत्र जल संरक्षण में कारगर हो सकता है। साथ ही यह इस इलाके में ग्रामीण आजीविका का एक भरोसेमंद साधन भी बन सकता है।
साहिबगंज झारखंड का इकलौता जिला है, जहां गंगा बहती है। इसी साहिबगंज का उधवा झील पक्षी अभयारण्य झारखंड का एकमात्र रामसर स्थल है। यह दो झीलों पाटौड़ा और बेरहाले से मिलकर बना एक महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि तंत्र (wetland system) है।
यहां हर साल सैकड़ों प्रजातियों के विदेशी पक्षी प्रवास के लिए आते हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या में स्थानीय पक्षी भी रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय महत्व के इस स्थल के जलकी गुणवत्ता में सुधार, अतिक्रमण और अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण, पक्षी आवास संरक्षण और पारिस्थितिक पर्यटन के बेहतर प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने से इस बदहाल होते पक्षी अभयारण्य को बचाया जा सकता है।
वेटलैंड पुनर्जीवन की रणनीति बहुस्तरीय होगी। इसमें डी-सिल्टिंग, जल प्रवाह बहाली, अतिक्रमण चिन्हांकन, जैविक बफर जोन विकसित करना, स्थानीय वनस्पतियों का रोपण, जल गुणवत्ता निगरानी और सामुदायिक भागीदारी शामिल हो सकती है। NMCG पहले भी गंगा तटों पर जैव विविधता संरक्षण, डॉल्फिन संरक्षण और वनीकरण जैसे कार्यक्रम चला चुका है।
अब वेटलैंड्स को नदी तंत्र के अभिन्न हिस्से के रूप में विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही वर्षाजल संचयन संरचनाओं को मजबूत करने, प्राकृतिक नालों के संपर्क को पुनर्स्थापित करने और स्थानीय स्तर पर दीर्घकालिक प्रबंधन तंत्र विकसित करने की दिशा में भी काम किया जाएगा, ताकि पुनर्जीवित वेटलैंड्स भविष्य में फिर से क्षरण और अतिक्रमण का शिकार न हों।
एक स्वस्थ वेटलैंड भारी वर्षा के दौरान अतिरिक्त पानी को रोककर बाढ़ के प्रभाव को काफी हद तक सीमित और कम करती है। वेटलैंड में जमा बारिश का पानी बाद में धीरे-धीरे जमीन में रिसकर भूजल स्तर को बनाए रखने में भी मदद करता है। गंगा बेसिन के कई हिस्सों में भूजल दोहन तेजी से बढ़ा है।
यदि ये वेटलैंड्स अपनी मूल क्षमता के साथ काम करने लगें, तो इनके आसपास के एक बड़े इलाके के गांवों और कस्बों में भूजल स्तर सुधरने से जल उपलब्धता बेहतर हो सकती है। इसके अलावा आर्द्रभूमियां बाढ़ और भारी वर्षा के कारण अचानक आने वाले जल प्रवाह को नियंत्रित करके निचले इलाकों में होने वाले कटाव और जलभराव को भी कम करती हैं।
सूखे के समय यही संचित पानी स्थानीय जल स्रोतों को साल भर पानी देने के लिए सहारा देता है। इससे आसपास के इलाकों में कृषि, पशुपालन और घरेलू उपयोग के लिए पानी की उपलब्धता अपेक्षाकृत स्थिर बनी रहती है।
वेटलैंड्स का व्यापक पारिस्थितिक तंत्र किसानों, मछुआरों समेत कई समुदायों के लिए आजीविका का साधन भी बनता है।
वेटलैंड्स को बचाना केवल जल संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण के लिए ही जरूरी नहीं है। बल्कि, यह जैव विविधता को बनाए रखने के लिए भी जरूरी है। इन छह वेटलैंड्स में अनेक प्रकार की मछलियां, उभयचर, जलीय वनस्पतियां और पक्षी पाए जाते हैं। प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित ठिकानों की संख्या घटने से उनका दबाव कुछ चुनिंदा स्थलों पर बढ़ गया है।
कालेवाला झील और उधवा झील जैसे क्षेत्र पक्षी संरक्षण की दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं। पुनर्जीवन के बाद इनके पारिस्थितिक तंत्र में सुधार होने से कई प्रजातियों को बेहतर आवास मिल सकता है। जल गुणवत्ता सुधरने पर जलीय जीवों की संख्या बढ़ने की संभावना भी रहती है, जिससे खाद्य श्रृंखला मजबूत होती है और पूरे वेटलैंड पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बेहतर होता है। इससे स्थानीय मत्स्य संसाधनों को भी लाभ मिल सकता है और प्रकृति आधारित पर्यटन की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
वेटलैंड संरक्षण केवल सरकारी परियोजना बनकर सफल नहीं हो सकता। स्थानीय मछुआरे, किसान, ग्राम पंचायतें और स्वयंसेवी संगठन यदि संरक्षण प्रक्रिया में शामिल हों तो परिणाम अधिक टिकाऊ होते हैं।
जल निकासी रोकने, कचरा फेंकने पर नियंत्रण, अवैध भराई की सूचना और पौधारोपण जैसे कार्यों में समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। कई राज्यों में सामुदायिक निगरानी से वेटलैंड संरक्षण के अच्छे परिणाम मिले हैं।
पुनर्जीवन की राह में कई चुनौतियां हैं। अतिक्रमण हटाना अक्सर प्रशासनिक और सामाजिक रूप से कठिन होता है। कुछ स्थानों पर भूमि स्वामित्व विवाद भी सामने आ सकते हैं। लगातार गाद जमाव, अपशिष्ट जल का प्रवाह और जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में बदलाव जैसी समस्याएं भी दीर्घकालिक प्रबंधन की मांग करती हैं। इसलिए केवल एक बार की सफाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि नियमित निगरानी और रखरखाव आवश्यक होगा।
नमामि गंगे के शुरुआती चरण में मुख्य जोर सीवेज प्रबंधन और नदी सफाई पर था। अब कार्यक्रम धीरे-धीरे नदी बेसिन प्रबंधन के व्यापक मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जिसमें सहायक नदियां, बाढ़ क्षेत्र, वेटलैंड्स और जैव विविधता सभी को एक साथ देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड की इन छह वेटलैंड्स का पुनर्जीवन इस नए दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है।
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