जंगलों की कटाई और बढ़ते शहरीकरण के कारण हाथियों के प्राकृतिक आवास सिमटते जा रहे हैं।
फोटो : विकी कॉमंस
12 अगस्त को पूरी दुनिया में विश्व हाथी दिवस मनाया जाता है। विश्व हाथी दिवस केवल हाथियों के प्रति प्रेम और आकर्षण व्यक्त करने का दिन नहीं है। दुनिया भर में हाथियों पर मंडराते संकट को याद दिलाने वाला यह दिवस हाथियों को बचाने, उनके जंगल, जलस्रोत और सदियों पुराने आवागमन मार्गों को बचाने के उपायों पर विचार करने का भी है। इसका मूल संदेश यह समझना है कि हाथियों का भविष्य उनके आवास के भविष्य से जुड़ा है। 12 अगस्त 2012 को शुरू किए गए इस वैश्विक अभियान का उद्देश्य एशियाई और अफ्रीकी हाथियों के सामने मौजूद खतरों पर दुनिया का ध्यान खींचना था। आज इन खतरों की प्रकृति और जटिल हो गई है। जंगलों की कटाई, कृषि विस्तार, शहरीकरण, खनन और आधारभूत ढांचे का विकास हाथियों के आवासों को लगातार नष्ट कर रहे हैं या इन्हें छोटे व अलग-अलग हिस्सों में बांट रहे हैं। जलवायु परिवर्तन भोजन और पानी की उपलब्धता को बदल रहा है। और इन सबके बीच इंसानों और हाथियों के बीच टकराव बढ़ रहा है।
हाथी पृथ्वी के सबसे बड़े स्थलीय स्तनधारी ही नहीं, बल्कि जंगलों के पारिस्थितिक तंत्र को आकार देने वाली महत्वपूर्ण प्रजाति भी हैं। वे पेड़ों की शाखाएं और पत्तियां खाते हैं, वनस्पतियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाते हैं, बीजों का प्रसार करते हैं और अपने आवागमन से जंगल की संरचना को प्रभावित करते हैं। इसलिए हाथियों का संरक्षण केवल एक वन्यजीव को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और उससे जुड़ी जैव विविधता को बचाने का प्रयास है।
हाथी केवल जंगलों में रहने वाला एक विशाल वन्यजीव नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को आकार देने वाली महत्वपूर्ण प्रजाति है। इसी वजह से उन्हें अक्सर ‘इकोसिस्टम इंजीनियर’ कहा जाता है। भोजन की तलाश में लंबी दूरी तय करते हुए हाथी पेड़ों की शाखाओं और वनस्पतियों को प्रभावित करते हैं, घने जंगलों में रास्ते बनाते हैं और सबसे महत्वपूर्ण रूप से फलों के बीजों को अपने गोबर के जरिए दूर-दूर तक पहुंचाते हैं। कई बड़े पेड़ों की प्रजातियों के बीजों के प्रसार में उनकी खास भूमिका होती है। हाथियों की आवाजाही से जंगलों में वनस्पतियों के फैलाव और नए पौधों के उगने की प्रक्रिया को मदद मिलती है। उनके द्वारा खोदे गए या बनाए गए जलकुंड सूखे मौसम में दूसरे वन्यजीवों के लिए भी पानी का स्रोत बन सकते हैं। इस तरह हाथियों की मौजूदगी सिर्फ उनकी अपनी प्रजाति के लिए नहीं, बल्कि पेड़-पौधों, छोटे-बड़े जीवों और पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए हाथियों का संरक्षण वास्तव में उन जंगलों और जैव विविधता के संरक्षण से जुड़ा है, जिनके वे स्वयं एक अहम हिस्सा हैं। लेकिन, आज हाथियों के सामने खतरा केवल शिकारियों या हाथीदांत के अवैध कारोबार से नहीं है। उनका सबसे बड़ा संकट उस जगह के लगातार सिकुड़ने का है, जिसे वे अपना घर कहते हैं।
दुनिया के तीन मौजूदा हाथी समूहों में एशियाई हाथी, अफ्रीकी सवाना हाथी और अफ्रीकी वन हाथी शामिल हैं। IUCN के अनुसार तीनों ने अपने ऐतिहासिक वितरण क्षेत्र का बड़ा हिस्सा खो दिया है। अफ्रीकी वन हाथी को अत्यंत संकटग्रस्त (Critically Endangered) और अफ्रीकी सवाना हाथी को संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में रखा गया है। एशियाई हाथी भी संकटग्रस्त प्रजाति है।
हाथियों के लिए समस्या केवल जंगल का क्षेत्रफल घटने की नहीं है। उससे भी गंभीर समस्या है आवास का विखंडन। जब जंगलों के बीच सड़कें, रेलवे लाइन, खदानें, बांध, बिजली की लाइनें, औद्योगिक क्षेत्र, शहर और कृषि क्षेत्र विकसित होते हैं तो एक बड़ा जंगल कई छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाता है।
हाथियों को दूसरे कई वन्यजीवों की तुलना में बहुत बड़े क्षेत्र में घूमने की जरूरत होती है। वे भोजन, पानी और मौसमी संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार लंबी दूरी तय करते हैं। इसलिए उनके लिए दो जंगलों के बीच मौजूद प्राकृतिक रास्ता भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना खुद जंगल।
IUCN के अनुसार अफ्रीका में हाथियों के लिए उपयुक्त माने जाने वाले क्षेत्र का बड़ा हिस्सा मौजूद होने के बावजूद मानव दबाव के कारण उसका केवल एक छोटा हिस्सा ही वास्तव में हाथियों के लिए उपलब्ध है। एशिया में भी आवास के विखंडन और जलवायु परिवर्तन का संयुक्त दबाव हाथियों के लिए उपलब्ध क्षेत्र को और कम कर रहा है।
| Sl. No. | राज्य/लैंडस्केप | अनुमानित संख्या |
|---|---|---|
| 1. | कर्नाटक | 6,013 |
| 2. | तमिलनाडु | 3,136 |
| 3. | केरल | 2,785 |
| 4. | झारखंड | 217 |
| 5. | ओडिशा | 912 |
| 6. | मध्य प्रदेश | 97 |
| 7. | छत्तीसगढ | 451 |
| 8. | महाराष्ट्र (पश्चिमी घाट और गढ़चिरोली) | 63 |
| 9. | पश्चिम बंगाल (दक्षिण) | 31 |
| 10. | आंध्र प्रदेश | 120 |
| 11. | उत्तराखंड | 1,792 |
| 12. | उत्तर प्रदेश | 257 |
| 13. | बिहार | 13 |
| 14. | अरुणाचल प्रदेश | 617 |
| 15. | असम | 4,159 |
| 16. | मणिपुर | 9 |
| 17. | मेघालय | 677 |
| 18. | मिजोरम | 16 |
| 19. | नगालैंड | 252 |
| 20. | त्रिपुरा | 153 |
| 21. | पश्चिम बंगाल (उत्तर) | 676 |
| कुल | 22,446 |
जंगलों के आसपास खेती का विस्तार मानव-हाथी संघर्ष की सबसे बड़ी वजहों में से एक बनता जा रहा है। हाथियों को जंगल में मिलने वाले भोजन की तुलना में खेतों में खड़ी फसलें कई बार अधिक आसानी से उपलब्ध और पौष्टिक लगती हैं। धान, गन्ना, मक्का, केले और दूसरी फसलें हाथियों को आकर्षित कर सकती हैं।
जब हाथियों के पारंपरिक रास्ते खेतों और बस्तियों में बदल जाते हैं तो हाथी अपना रास्ता नहीं बदलते, बल्कि बदलते भू-दृश्य के बीच से आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं। यही वह बिंदु है जहां वन्यजीव संरक्षण और मानव आजीविका का टकराव शुरू होता है।
एक ओर किसान की महीनों की मेहनत कुछ घंटों में नष्ट हो सकती है, वहीं दूसरी ओर हाथियों के खिलाफ प्रतिशोधी कार्रवाई उनकी जान के लिए खतरा बन जाती है। इसीलिए IUCN मानव-वन्यजीव संघर्ष को केवल जानवरों और इंसानों के बीच समस्या नहीं मानता। यह आजीविका, भूमि उपयोग, विकास और संरक्षण से जुड़े अलग-अलग मानवीय हितों का भी संघर्ष है।
भारत एशियाई हाथियों के संरक्षण के लिहाज से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण देशों में है। 2017 की अखिल भारतीय हाथी गणना में देश में 29,964 जंगली हाथी दर्ज किए गए थे। केंद्र सरकार ने इसके बाद हाथियों की गणना की पद्धति में बदलाव करते हुए बाघों के साथ समन्वित गणना की दिशा में काम किया।
भारत में हाथियों का आवास मुख्य रूप से ऐसे वन क्षेत्रों में है जहां आसपास बड़ी मानव आबादी भी रहती है। यही कारण है कि यहां संरक्षण की चुनौती केवल राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के भीतर हाथियों की रक्षा तक सीमित नहीं हो सकती।
हाथियों के लिए जंगलों के बीच मौजूद कॉरिडोर, यानी आवागमन के प्राकृतिक रास्ते, बेहद महत्वपूर्ण हैं। 2010 की ‘गज रिपोर्ट’ में 88 हाथी गलियारों को प्राथमिकता वाले गलियारों के रूप में चिन्हित किया गया था, जबकि 2017 में प्रकाशित ‘राइट ऑफ पैसेज’ दस्तावेज में 101 गलियारों की पहचान की गई थी। इसके बाद सरकार ने हाथी गलियारों की स्थिति को फिर से चिन्हित और सत्यापित करने का काम शुरू किया।
2023 में जारी सरकारी दस्तावेज में गलियारों के सामने सड़क, रेलवे लाइन, नहर और बिजली की लाइनों जैसी रैखिक आधारभूत संरचनाओं को प्रमुख चुनौतियों में शामिल किया गया है।
अफ्रीका और एशिया महाद्वीप के जंगल दुनिया में हाथियों के दो प्रमुख इलाके हैं, जहां इनकी सबसे ज़्यादा आबादी पाई जाती है।
हाथियों को उनकी विशाल काया, असाधारण बुद्धिमत्ता और सामाजिक व्यवहार के कारण दुनिया के सबसे अनोखे वन्यजीवों में गिना जाता है। उनके शरीर की बनावट से लेकर संवाद करने और अपने समूह की देखभाल करने के तरीके तक, कई ऐसी विशेषताएं हैं जो उन्हें दूसरे स्थलीय स्तनधारियों से अलग बनाती हैं। विश्व हाथी दिवस की स्टोरी में ये तथ्य पाठकों के लिए एक रोचक और उपयोगी तथ्य बॉक्स की तरह काम कर सकते हैं।
हाथी सबसे बड़ा स्थलीय स्तनधारी है। अफ्रीकी सवाना हाथी सबसे बड़ा होता है और वयस्क नर का वजन कई टन तक पहुंच सकता है।
हाथी की सूंड उसकी बहुउपयोगी अंग है। यह नाक और ऊपरी होंठ का रूपांतरण है, जिसका इस्तेमाल सांस लेने, सूंघने, पानी पीने, भोजन उठाने और वस्तुओं को छूने के लिए किया जाता है।
हाथी की याददाश्त बेहद विकसित होती है। वे लंबे समय तक दूसरे हाथियों, स्थानों और पानी के स्रोतों से जुड़ी जानकारी याद रख सकते हैं।
हाथी आपस में कई तरह की आवाजों से संवाद करते हैं। उनकी कुछ आवाजें इतनी कम आवृत्ति की होती हैं कि इंसान उन्हें सुन नहीं सकता। इन्हें इन्फ्रासाउंड कहा जाता है और इनके जरिए हाथी लंबी दूरी तक संपर्क कर सकते हैं।
हाथियों के कान केवल सुनने के लिए नहीं हैं। बड़े कान शरीर की अतिरिक्त गर्मी बाहर निकालने और तापमान नियंत्रित करने में भी मदद करते हैं।
हाथी सामाजिक प्राणी हैं। मादाएं आमतौर पर परिवार के समूह में रहती हैं, जिसकी अगुआई अक्सर अनुभवी मादा, यानी मैट्रिआर्क, करती है। वयस्क नर अक्सर अकेले या छोटे नर समूहों में रहते हैं।
हाथी तैराकी में माहिर होते हैं। वे पानी में लंबी दूरी तक तैर सकते हैं और अपनी सूंड को एक तरह की स्नॉर्कल की तरह इस्तेमाल करके पानी के ऊपर रख सकते हैं।
हाथी बीज फैलाने वाले महत्वपूर्ण वन्यजीव हैं। फल खाने के बाद वे अपने गोबर के साथ बीजों को काफी दूर तक पहुंचाते हैं। इस तरह वे जंगलों में वनस्पतियों के प्रसार में मदद करते हैं।
हाथी अपने मृत साथियों के प्रति असामान्य व्यवहार दिखाते हैं। वे मृत या मर रहे हाथियों के शरीर के पास रुकते, उन्हें सूंड से छूते और कुछ समय तक उनके आसपास रहते देखे गए हैं।
हाथियों के दांत जीवनभर बदलते रहते हैं। उनके बड़े चबाने वाले दांत धीरे-धीरे घिसते हैं और उनकी जगह नए दांत पीछे से आगे की ओर आते हैं। एक हाथी के जीवनकाल में दाढ़ के कई सेट बदल सकते हैं।
झारखंड में हाथी-मानव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं के बीच फरवरी 2026 में विधानसभा में इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा हुई। लगातार हो रही मौतों और हाथियों के आबादी वाले इलाकों में पहुंचने की घटनाओं को देखते हुए सरकार ने संघर्ष से निपटने के लिए मौजूदा व्यवस्था में बदलाव और एक व्यापक रणनीति तैयार करने की बात कही। सरकार ने अन्य हाथी-बहुल राज्यों की व्यवस्थाओं का अध्ययन कर बेहतर उपाय अपनाने तथा हाथी-मानव संघर्ष के लिए विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार करने की बात कही।
इस रणनीति में हाथियों के हमले या आबादी में उनके प्रवेश की स्थिति में तत्काल कार्रवाई के लिए क्विक रिस्पांस टीम (QRT) गठित करने की योजना प्रमुख है। सरकार ने राज्य के पांचों प्रमंडलीय स्तरों पर कम से कम एक QRT बनाने की योजना बताई है। साथ ही हाथियों के बचाव और प्रबंधन के लिए एलीफेंट रेस्क्यू सेंटर स्थापित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने और प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम तैयार करने की बात कही गई है। घायल हाथियों के तत्काल उपचार के लिए मोबाइल वेटरनरी यूनिट शुरू करने पर भी विचार किया जा रहा है। इसके अलावा हाथियों को नियंत्रित करने और रेस्क्यू अभियान में मदद के लिए तमिलनाडु से छह प्रशिक्षित कुंकी हाथी लाने की योजना बताई गई।
मुआवजे का मुद्दा भी विधानसभा में प्रमुखता से उठा। उस समय हाथी के हमले में मौत होने पर झारखंड में चार लाख रुपये की सहायता राशि का प्रावधान था। इसे बढ़ाने की मांग पर सरकार ने तत्काल राशि बढ़ाने की घोषणा करने के बजाय ओडिशा और असम जैसे राज्यों की व्यवस्था का अध्ययन करने की बात कही। इस पूरी पहल का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि झारखंड में हाथी-मानव संघर्ष केवल वन्यजीव प्रबंधन की समस्या नहीं रह गया है। यह ग्रामीण आबादी की सुरक्षा, किसानों की आजीविका और हाथियों के प्राकृतिक आवास तथा कॉरिडोर के संरक्षण से सीधे जुड़ा मुद्दा बन चुका है। झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष बढ़ने के प्रमुख कारण हैं:
जंगलों और हाथियों के प्राकृतिक आवास का सिकुड़ना
हाथी कॉरिडोर में अतिक्रमण और आवागमन में बाधा
कृषि क्षेत्र और बस्तियों का वन क्षेत्रों तक विस्तार
सड़क, रेलवे और अन्य आधारभूत परियोजनाओं से आवास का विखंडन
जंगलों में भोजन और पानी की उपलब्धता में कमी
जलवायु परिवर्तन और मौसम के बदलते पैटर्न
दलमा और अन्य हाथी आवासों के आसपास बढ़ता मानवीय दबाव
सरकार की प्रस्तावित रणनीति का महत्व इस बात में है कि इसमें तत्काल संघर्ष प्रबंधन के साथ हाथियों के आवास और कॉरिडोर को सुरक्षित रखने की जरूरत को भी शामिल किया जा रहा है।
पानी हाथियों के जीवन का अभिन्न अंग है। ये एक बार में पचास से सौ लीटर तक पानी पी जाते हैं। हाथियों को पानी में नहाना और खेलना भी बहुत पसंद होता है।
हाथियों के लिए जलवायु परिवर्तन का असर सीधे तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है। बदलता तापमान, अनियमित बारिश, लंबे सूखे, जलस्रोतों का सूखना और वनस्पतियों की उपलब्धता में बदलाव उनके भोजन और पानी की तलाश को प्रभावित कर सकते हैं।
एशियाई हाथियों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का आकलन करने वाले WWF के अनुसार बढ़ता तापमान, भोजन के स्रोतों को प्रतिस्पर्धा देने वाली आक्रामक वनस्पतियां, बीमारी की संवेदनशीलता और पहले से ही खंडित आवास उनकी अनुकूलन क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। हाथियों की धीमी प्रजनन दर और लंबी पीढ़ी अवधि भी उनके लिए बदलती परिस्थितियों के अनुकूल जल्दी ढलना मुश्किल बनाती है।
अफ्रीका में भी इसके संकेत मिल रहे हैं। IUCN के अनुसार गैबॉन में किए गए एक अध्ययन में 30 वर्षों की अवधि में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित पेड़ों के कारण अफ्रीकी वन हाथियों के लिए उपलब्ध फलों की मात्रा में 80 प्रतिशत से अधिक गिरावट देखी गई। इसका संबंध हाथियों की शारीरिक स्थिति में गिरावट से भी पाया गया।
इसका एक बड़ा पारिस्थितिक असर भी है। यदि हाथी कम भोजन पाते हैं, उनकी संख्या और स्वास्थ्य प्रभावित होता है तो उनके द्वारा किए जाने वाले बीज प्रसार पर भी असर पड़ सकता है। इससे जंगलों की अगली पीढ़ी की वनस्पतियों पर प्रभाव पड़ सकता है।
हाथियों के संरक्षण की पुरानी रणनीति मुख्य रूप से राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों और हाथी रिजर्वों की सुरक्षा पर केंद्रित रही है। यह जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
हाथियों के संरक्षण के लिए पूरे लैंडस्केप को बचाने की जरूरत है। इसका अर्थ है जंगलों को आपस में जोड़ना, हाथी कॉरिडोर को अतिक्रमण और असंगत निर्माण से बचाना, महत्वपूर्ण जलस्रोतों की रक्षा करना और विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय हाथियों की आवाजाही को ध्यान में रखना।
जहां सड़क या रेलवे बनाना जरूरी हो, वहां पहले से हाथी आवागमन के रास्तों की पहचान करके वन्यजीव-अनुकूल डिजाइन अपनाना होगा। जिन कॉरिडोर पर दबाव बढ़ चुका है वहां भूमि संरक्षण, पुनर्वनीकरण और सुरक्षित मार्ग विकसित करने की जरूरत है।
IUCN के अनुसार अफ्रीका और एशिया दोनों में हाथियों के लिए संरक्षित क्षेत्रों को आपस में जोड़ना जरूरी है, क्योंकि अलग-अलग छोटे संरक्षित क्षेत्र हाथियों की लंबी दूरी की आवाजाही और आबादी की आनुवंशिक विविधता के लिए पर्याप्त नहीं हो सकते।
हाथी केवल जंगल पर निर्भर नहीं हैं, वे जंगल को बनाने और बदलने की प्रक्रिया में भी भाग लेते हैं। वे लंबी दूरी तक बीज पहुंचाते हैं। कुछ बड़े बीज वाले पेड़ों के लिए हाथियों की भूमिका विशेष महत्व रखती है।
इसलिए हाथी संरक्षण को जलवायु और वन संरक्षण से अलग करके नहीं देखा जा सकता। हाथियों के आवास को बचाने का मतलब है बड़े वन परिदृश्यों, जलस्रोतों और वनस्पति विविधता को बचाना। दूसरी ओर स्वस्थ वन हाथियों के साथ-साथ अनगिनत अन्य प्रजातियों और स्थानीय समुदायों को भी लाभ पहुंचाते हैं।
World Elephant Day के आयोजकों के अनुसार हाथियों का संरक्षण उनके आवास की रक्षा, अवैध शिकार और हाथीदांत के अवैध व्यापार को रोकने तथा जंगली हाथियों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक क्षेत्रों को बनाए रखने से जुड़ा हुआ है।
जब हाथी खेत में पहुंचता है तो उसे समस्या मान लेना आसान है। लेकिन उसके पीछे की वजह समझना ज्यादा जरूरी है। यदि हाथी के पारंपरिक भोजन और पानी के स्रोत खत्म हो गए हैं, जंगलों के बीच का रास्ता बंद हो गया है या उसके आवास के बीच नई सड़क बन गई है तो इंसानी क्षेत्र में उसका पहुंचना अक्सर उसी बदलते भू-दृश्य का परिणाम होता है।
इसलिए संघर्ष कम करने की रणनीति में स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है। फसल नुकसान का तेज और उचित मुआवजा, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, हाथियों की आवाजाही की निगरानी, सुरक्षित अवरोध, सामुदायिक जागरूकता और संवेदनशील गांवों के लिए स्थानीय स्तर की कार्ययोजना प्रभावी हो सकती है।
भारत में भी हाल की सरकारी रिपोर्टों में मुआवजा व्यवस्था, सौर ऊर्जा आधारित विद्युत बाड़, जैव-बाड़, सामुदायिक जागरूकता और क्षमता निर्माण जैसे उपायों को मानव-हाथी संघर्ष कम करने के विकल्पों में शामिल किया गया है। हालांकि, यहां भी सावधानी जरूरी है। कोई भी बाड़ या अवरोध हाथियों की प्राकृतिक आवाजाही को पूरी तरह बंद कर दे तो समस्या दूसरी जगह पैदा हो सकती है। इसलिए संघर्ष प्रबंधन और कॉरिडोर संरक्षण को एक साथ देखना होगा।
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