पिछले साल (2025) ब्राज़ील में हुए COP30 सम्मेलन की एक गोलमेज बैठक में भाग लेते सदस्य देशों के प्रतिनिधि।
स्रोत : विकी कॉमंस
भारत ने एक अप्रत्याशित घटनाक्रम में ‘राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की समीक्षा’ का हवाला देते हुए 2028 में होने वाले COP-33 की मेजबानी के लिए अपनी दावेदारी को वापस ले लिया है। सरकार का यह फैसला भू-राजनीतिक कूटनीति में तेजी से होते बदलावों के बीच भारत की जलवायु रणनीति में बदलाव को भी दर्शाता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने दिसंबर 2023 में दुबई में आयोजित COP28 के उच्च स्तरीय सत्र में अपने संबोधन में 2028 में होने वाले COP33 की मेजबानी करने की भारत की इच्छा और इरादे को मजबूती के साथ पेश किया था। ब्रिक्स समूह ने भी भारत की उम्मीदवारी का समर्थन किया था। हालांकि, भारत ने कभी औपचारिक रूप से बोली नहीं लगाई। पर इन दोनों घटनाओं के साथ ही देश में इस वैश्विक सम्मेलन की तैयारियों का सिलसिला शुरू हो गया था। इसके लिए जुलाई 2025 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) में बाकायदा प्रकोष्ठ भी गठित किया गया था। पर, बीते कुछ महीनों में भू-राजनीतिक परिस्थितियों में तेजी से हुए बदलावों के बाद अब भारत ने COP33 की मेजबानी का प्रस्ताव वापस ले लिया है। 2 अप्रैल, 2026 को सरकार ने एशिया-प्रशांत समूह को आधिकारिक तौर पर शिखर सम्मेलन से हटने के अपने निर्णय की सूचना दे दी है।
भारत की इस कदम वापसी से बहुत से जलवायु विशेषज्ञ और पर्यावरण कार्यकर्ता हैरान हैं, जो इस शिखर सम्मेलन को भारत के लिए वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व करने के एक बड़े अवसर के रूप में देख रहे थे। क्योंकि COP शिखर सम्मेलन की गिनती दुनिया की सबसे बड़ी जलवायु वार्ता के रूप में होती है, जिसमें भविष्य की राष्ट्र वैश्विक जलवायु नीति को आकार दिया जाता है। इसे देखते हुए इसकी मेजबानी का अवसर प्राप्त करना एक अंतरराष्ट्रीय गौरव का विषय समझा जाता है। ऐसे में सम्मेलन के आयोजन को लेकर भारत के रवैये में इस बदलाव को एक झटके के तौर पर भी देखा जा रहा है, क्योंकि यह ‘पश्चगामी' (Regressive) कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब भारत खुद को “ग्लोबल साउथ” के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा था।
आयोजन स्थल पर प्रदर्शितत ब्राज़ील में अयोजित cop30 सम्मेलन का लोगो।
हालांकि सरकार ने अपने पत्र में औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की समीक्षा” की बात कहते हुए यह फैसला लेने की बात कही है, लेकिन विशेषज्ञों और विश्लेषकों के अनुसार भारत सरकार द्वारा दिए गए आधिकारिक कारण काफी सीमित और अस्पष्ट हैं। वास्तव में इसके पीछे कई रणनीतिक, आर्थिक और घरेलू राजनीतिक कारण छिपे हो सकते हैं। वास्तव में COP33 की मेजबानी पीछे हटने के सरकार के इस फैसले प्रमुख वजहें इस प्रकार हो सकती हैं :-
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत 2028 के आसपास कई बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की तैयारी कर रहा है, जैसे संभावित खेल आयोजन या अन्य वैश्विक कार्यक्रम। ऐसे में COP जैसे आयोजन की मेजबानी भारी वित्तीय, प्रशासनिक और लॉजिस्टिक बोझ डाल सकती थी। COP सम्मेलन आमतौर पर दो सप्ताह तक चलता है और इसमें 70,000 से अधिक प्रतिभागी शामिल होते हैं, जिनमें राष्ट्राध्यक्ष, वैज्ञानिक, कार्यकर्ता और मीडिया शामिल होते हैं। ऐसे आयोजन के लिए विशाल बुनियादी ढांचे, सुरक्षा और संसाधनों की आवश्यकता होती है। भारत शायद इस बोझ को अन्य प्राथमिकताओं के साथ संतुलित नहीं कर पा रहा था।
भारत की जलवायु नीति पिछले कुछ वर्षों में अधिक “डेवलपमेंट-फर्स्ट” दृष्टिकोण की ओर झुकी है। यानी सरकार अब यह मान रही है कि आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है। दूसरी ओर, COP का मेजबान देश होने के नाते उसे वैश्विक जलवायु लक्ष्यों जैसे उत्सर्जन में कटौती, नेट ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में कदम उठाने और जीवाश्म ईंधन से दूरी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी निभानी होती है। विश्लेषकों के अनुसार, भारत की मौजूदा नीतियां और वैश्विक अपेक्षाएं आपस में टकरा सकती थीं। इस स्थिति में मेजबानी करना भारत के लिए कूटनीतिक रूप से असहज हो सकता था।
COP की मेजबानी करने का मतलब है कि उस देश पर जलवायु कार्रवाई को लेकर अधिक अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत फिलहाल इस तरह के किसी भी अतिरिक्त दबाव से बचना चाहता है, क्योंकि पहले से ही उसकी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हो रही है। यदि भारत COP33 की मेजबानी करता, तो उससे अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य घोषित करने और तेजी से कार्रवाई करने की अपेक्षा की जाती, जो उसकी औद्योगिक और आर्थिक विकास जरूरतों के साथ संतुलित करना मुश्किल हो सकता था।
यह निर्णय भारत की जलवायु कूटनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। भारत ने जलवायु वित्त और विकसित देशों की जिम्मेदारी को लेकर हाल के वर्षों में जलवायु वार्ताओं में अधिक आक्रामक और स्पष्ट रुख अपनाया है। भारत ने बार-बार यह मांग उठाई है कि विकसित देश “वित्त प्रदान करें” (provide), न कि केवल “संग्रहित करें” (mobilise)। ऐसे में COP का अध्यक्ष बनने पर भारत को एक संतुलित और तटस्थ भूमिका निभानी होती, जो उसके इस आक्रामक रुख के विपरीत हो सकती थी। विश्लेषक भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं में व्यापक बदलाव की ओर इशारा करते हैं, जिसमें बड़े वैश्विक आयोजनों की मेजबानी करने के बजाय क्षेत्रीय स्थिरता और निरंतर भू-राजनीतिक गतिविधियों पर अधिक जोर दिया जा रहा है।
कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार 2028 का समय भारत के लिए राजनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है, क्योंकि उसके बाद देश में अगले आम चुनाव (2029) होने हैं। ऐसे में लगभग 200 देशों और हजारों प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए दो सप्ताह के वैश्विक कार्यक्रम का आयोजन करना और उसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के व्यापक इंतज़ाम करना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। चुनाव पास होने के कारण उस समय देश के सियासी तापमान में बढ़ोतरी और सरकार के राजनीतिक विरोध में उभार होने के भी आसार बन सकते हैं, जिसे सरकार पूरी दुनिया के सामने आने देना पसंद नहीं करेगी। इसलिए सतर्कता बरतते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर के इस बड़े आयोजन से कदम वापस खींच लिए गए।
COP 26 सम्मेलन के दौरान एक वार्ता में द्विपक्षीय चर्चा करते भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादीमीर ज़ेलेंस्की।
COP की नींव 1992 में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो में हुए “Earth Summit” के दौरान पड़ी थी, जब United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC) यानी संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय को अपनाया गया। यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका मुख्य उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को इस स्तर पर स्थिर करना है, जिससे जलवायु परिवर्तन के खतरनाक प्रभावों को रोका जा सके।
पहला COP सम्मेलन यानी COP1 1995 में जर्मनी के बर्लिन में आयोजित हुआ। यहीं से जलवायु वार्ताओं की औपचारिक प्रक्रिया शुरू हुई।
अपनी शुरुआत के बाद से अबत COP सम्मेलनों ने जलवायु और पर्यावरण से जुड़े कई ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौतों को अंजाम दिया है। इनमें से तीन सबसे प्रमुख समझौते इस प्रकार हैं:
COP3 (1997, क्योटो) – क्योटो प्रोटोकॉल
यह पहला कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता था, जिसमें विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य दिए गए।
इसने “Common But Differentiated Responsibilities” सिद्धांत को मजबूत किया, यानी विकसित देशों पर ज्यादा जिम्मेदारी डाली गई।
COP21 (2015, पेरिस) – पेरिस समझौता
इस समझौते में सभी देशों ने मिलकर वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे और 1.5°C तक सीमित करने का लक्ष्य तय किया।
हर देश को अपने-अपने जलवायु लक्ष्य (NDCs) तय करने और समय-समय पर उन्हें अपडेट करने की जिम्मेदारी दी गई।
COP28 (2023, दुबई) – जीवाश्म ईंधन पर सहमति
इस सम्मेलन में पहली बार वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन से “transition away” यानी धीरे-धीरे दूर होने पर सहमति बनी।
साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा को तीन गुना बढ़ाने और ऊर्जा दक्षता दोगुनी करने का लक्ष्य भी सामने आया।
1995 में पहले सम्मेलन के बाद से COP बैठकों को लगभग हर वर्ष आयोजित करने की परंपरा स्थापित हो गई, जिससे जलवायु वार्ताएं एक निरंतर वैश्विक प्रक्रिया बन सकीं। समय के साथ यह मंच केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौते जैसे ठोस निर्णयों का आधार बना। आज COP सम्मेलन वैश्विक जलवायु नीति तय करने, देशों की प्रगति की समीक्षा करने और नए लक्ष्यों को निर्धारित करने का सबसे प्रभावशाली मंच बन चुका है।
ब्राज़ील में हुए COP 30 में प्रतिनिधियों के साथ अनौपचारिक बातचीत करते कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो।
United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC) के तहत आयोजित COP सम्मेलन का एक सुव्यवस्थित संस्थागत ढांचा होता है, जिसमें विभिन्न स्तरों पर निर्णय लिए जाते हैं। COP इसका सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है, जहां सभी सदस्य देशों (Parties) को समान अधिकार प्राप्त होते हैं। COP की गतिविधियों को चलाने के लिए दो प्रमुख सहायक निकाय होते हैं -
Subsidiary Body for Scientific and Technological Advice (SBSTA)
Subsidiary Body for Implementation (SBI)
ये दोनों अंक तकनीकी और कार्यान्वयन से जुड़े मुद्दों पर काम करते हैं। COP के दौरान विभिन्न “नेगोशिएशन ट्रैक्स” चलते हैं, जिनमें जलवायु वित्त, अनुकूलन, शमन (mitigation) और पारदर्शिता जैसे विषय शामिल होते हैं।
सम्मेलन का नेतृत्व एक “COP अध्यक्ष” करता है, जो आमतौर पर मेजबान देश का प्रतिनिधि होता है और वार्ताओं को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। निर्णय आम सहमति (consensus) से लिए जाते हैं, जिससे प्रक्रिया धीमी जरूर होती है, लेकिन सभी देशों की भागीदारी सुनिश्चित होती है।
COP सम्मेलन और उससे जुड़ी गतिविधियों की फंडिंग मुख्य रूप से सदस्य देशों के योगदान और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय तंत्रों से होती है। UNFCCC का नियमित बजट सदस्य देशों द्वारा उनकी आर्थिक क्षमता के अनुसार दिया जाता है, जिससे सचिवालय और वार्ताओं का संचालन किया जाता है।
इसके अलावा, मेजबान देश (Host Country) सम्मेलन के आयोजन का बड़ा हिस्सा स्वयं वहन करता है। इसमें इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा और लॉजिस्टिक्स के खर्च सबसे प्रमुख होते हैं। कई बार निजी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थान भी प्रायोजक (sponsor) के रूप में इसमें आर्थिक व अन्य प्रकार कासहयोग देते हैं।
जलवायु कार्यों के लिए अलग से Green Climate Fund (GCF), Global Environment Facility (GEF) और “Loss and Damage Fund” जैसे तंत्र बनाए गए हैं, जिनका उद्देश्य विकासशील देशों को वित्तीय सहायता देना है। हालांकि, इन फंड्स को लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच योगदान और वितरण को लेकर लगातार बहस बनी रहती है।
COP यानी “Conference of the Parties” United Nations Framework Convention on Climate Change (UNFCCC) का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला मंच है, जहां हर साल दुनिया के लगभग 190–200 देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के उपायों पर चर्चा करते हैं। इस सम्मेलन की मेजबानी करना केवल एक आयोजन नहीं बल्कि कूटनीतिक नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है। मेजबान देश को वैश्विक जलवायु एजेंडा तय करने, विकासशील देशों की आवाज उठाने और अपने मॉडल को दुनिया के सामने रखने का अवसर मिलता है।
इसलिए इसे भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा था क्योंकि वह लंबे समय से “Common But Differentiated Responsibilities” (साझा, लेकिन भिन्न उत्तरदायित्व) जैसे सिद्धांतों के जरिए विकसित देशों की जवाबदेही पर जोर देता रहा है।
अब तक हुए प्रमुख COP सम्मेलनों की सूची
नीचे दी गई तालिका में COP1 से COP28 तक के प्रमुख सम्मेलनों की क्रम संख्या, वर्ष, स्थान और मुख्य उपलब्धियां दी गई हैं:
| क्रम संख्या | वर्ष | स्थान (मेजबान) | प्रमुख उपलब्धि |
|---|---|---|---|
| 1 | 1995 | बर्लिन, जर्मनी | जलवायु वार्ता की शुरुआत |
| 2 | 1996 | जेनेवा, स्विट्जरलैंड | IPCC रिपोर्ट को मान्यता |
| 3 | 1997 | क्योटो, जापान | क्योटो प्रोटोकॉल |
| 4 | 1998 | ब्यूनस आयर्स, अर्जेंटीना | एक्शन प्लान |
| 5 | 1999 | बॉन, जर्मनी | कार्यान्वयन चर्चा |
| 6 | 2000 | हेग, नीदरलैंड | वार्ता में गतिरोध |
| 7 | 2001 | माराकेच, मोरक्को | Marrakesh Accords |
| 8 | 2002 | नई दिल्ली, भारत | विकासशील देशों पर फोकस |
| 9 | 2003 | मिलान, इटली | कार्बन सिंक चर्चा |
| 10 | 2004 | ब्यूनस आयर्स, अर्जेंटीना | अनुकूलन (Adaptation) |
| 11 | 2005 | मॉन्ट्रियल, कनाडा | क्योटो लागू |
| 12 | 2006 | नैरोबी, केन्या | अफ्रीका फोकस |
| 13 | 2007 | बाली, इंडोनेशिया | Bali Action Plan |
| 14 | 2008 | पोजनान, पोलैंड | रोडमैप |
| 15 | 2009 | कोपेनहेगन, डेनमार्क | Copenhagen Accord |
| 16 | 2010 | कानकुन, मैक्सिको | Green Climate Fund |
| 17 | 2011 | डरबन, दक्षिण अफ्रीका | Durban Platform |
| 18 | 2012 | दोहा, कतर | Kyoto विस्तार |
| 19 | 2013 | वारसा, पोलैंड | Loss & Damage |
| 20 | 2014 | लीमा, पेरू | Paris के लिए आधार |
| 21 | 2015 | पेरिस, फ्रांस | Paris Agreement |
| 22 | 2016 | माराकेच, मोरक्को | Paris लागू प्रक्रिया |
| 23 | 2017 | बॉन (फिजी अध्यक्षता) | Climate Action Agenda |
| 24 | 2018 | काटोविसे, पोलैंड | Paris Rulebook |
| 25 | 2019 | मैड्रिड, स्पेन | कार्बन बाजार बहस |
| 26 | 2021 | ग्लासगो, यूके | Coal phase-down |
| 27 | 2022 | शर्म अल-शेख, मिस्र | Loss & Damage Fund |
| 28 | 2023 | दुबई, UAE | Fossil fuel transition |
COP30 सम्मेलन की तैयारियों से जुड़े कार्यकर्ता और वॉलंटियर्स।
सम्मेलन की मेजबानी की पेशकश को वापस लेना भारत सरकार का एक रणनीतिक कदम है। कई विश्लेषक इसक वजह बताते हैं कि भारत संभवतः यह समझ चुका है कि COP की मेजबानी से ज्यादा महत्वपूर्ण है—
अपनी ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखना
विकास की गति को जारी रखना
और अंतरराष्ट्रीय दबावों से स्वतंत्र रहना
इस नजरिए से देखें, तो यह कदम भारत की “यथार्थवादी” (Realistic) विदेश नीति का हिस्सा दिखाई देता है।
इसके विपरीत, कई जलवायु विशेषज्ञों ने इस कदम को "गंवा दिए गए अवसर" या Missed Opportunity के रूप को में देख रहे हैं। क्योंकि, उनका मानना है कि COP33 की मेजबानी करने से भारत को नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable energy) के क्षेत्र में अपनी प्रगति को प्रदर्शित करने का एक बेहतरीन वैश्वित मंच मिलने वाला था। साथ ही इस सम्मेलन का आयोजन करके भारत स्वयं को ‘वैश्विक दक्षिण’ Global South की एक सशक्त आवाज़ के रूप में स्थापित कर सकता था। संक्षेप में COP33 की मेजबानी भारत को इन चीजों के मौके दे सकती थीं -
अपने नवीकरणीय ऊर्जा मॉडल को दिखाने
ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने
जलवायु की ग्लोबल वित्तीय व्यवस्था पर दबाव बनाने
ऐसे में इस सम्मेलन की मेजबानी से भारत खुद को वैश्विक जलवायु नेतृत्व की दौड़ में अग्रिम पंक्ति के देशों में खड़ा कर सकता था।
इस तरह, कुल मिला कर हम देखते हैं कि भारत द्वारा COP33 की मेजबानी से पीछे हटना केवल एक रणनीतिक, कूटनीतिक या प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु राजनीति में उसके बदलते दृष्टिकोण का संकेत है। यह कदम दिखाता है कि भारत अब जलवायु मुद्दों पर आदर्शवाद और नेतृत्व के बजाय व्यावहारिकता और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दे रहा है।
हालांकि इससे उसकी वैश्विक छवि और नेतृत्व की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि भारत जलवायु वार्ताओं में अपनी शर्तों पर भाग लेना चाहता है, न कि वैश्विक दबावों के तहत। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात और साफ होती है कि आने वाले वर्षों में ‘जलवायु कूटनीति’ (Climate Diplomacy) केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रहेगी। अब यह यह विकास, राजनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन का भी अहम हिस्सा बनने वाली है।
1 दिसंबर 2023 को दुबई में आयोजित COP28 सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे विभिन्न देशों के प्रतिनिधि। इसी सम्मेलन में भारत ने COP33 की मेजबानी की पेशकश की थी, जिसे अब वापस ले लिया गया है।
संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं में मेजबानी क्षेत्रीय समूहों के आधार पर तय होती है, और 2028 के लिए एशिया-प्रशांत समूह की बारी है। हालांकि भारत के हटने के बाद COP33 की मेजबानी को लेकर अनिश्चितता जरूर बढ़ी है, क्योंकि भारत के हटने से एशिया-प्रशांत समूह के पास सीओपी33 के लिए कोई पुष्ट मेजबान नहीं बचा है। इसके बावजूद प्रक्रिया पूरी तरह रुकी नहीं है। ऐसे में अब एशिया-प्रशांत समूह समूह के भीतर नए दावेदार सामने आ सकते हैं और आपसी सहमति से किसी एक देश का चयन किया जाएगा।
संभावित मेजबानों में दक्षिण कोरिया का नाम सबसे प्रमुख रूप से लिया जा रहा है। दक्षिण कोरिया पहले भी बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों की सफल मेजबानी कर चुका है और उसकी मजबूत शहरी अवसंरचना तथा “ग्रीन ग्रोथ” नीति उसे एक मजबूत दावेदार बनाती है।
इसके अलावा जापान भी एक संभावित विकल्प हो सकता है, क्योंकि वह पहले क्योटो प्रोटोकॉल जैसे ऐतिहासिक समझौते की मेजबानी कर चुका है और तकनीकी रूप से उन्नत देश है।
इसी तरह इंडोनेशिया का नाम भी चर्चा में आ सकता है, जिसने हाल के वर्षों में G20 जैसे बड़े आयोजनों का सफल संचालन किया है और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित देशों की आवाज को सामने रखने की क्षमता रखता है। हालांकि, अंतिम निर्णय अभी सदस्य देशों की सहमति और UNFCCC प्रक्रिया के तहत ही लिया जाएगा, इसलिए आने वाले समय में इस सूची में बदलाव भी संभव है।
COP सम्मेलन जलवायु परिवर्तन से निपटने की वैश्विक कोशिशों के एक सशक्त मंच के रूप में स्थापित हो चुका है। 1995 में स्थापित यह मंच जिस तरह पेरिस समझौते जैसे ऐतिहासिक और दमदार निर्णयों तक पहुंचा है। उसे देखते हुए इसका आयोजन और मेजबानी वैश्विक कूटनीति में एक अहम विषय बन चुकी है। पर, महत्वपूर्ण यह है कि इसे किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा या शक्ति प्रदर्शन के अवसर के रूप में देखने के बजाय पर्यावरण और जलवायु संबंधी चिंतओं और कार्यवाहियों के मंच के रूप में ही देखा और काम करने दिया जाए। इसलिए, अंतत: कहा जा सकता है कि चाहे कोई भी देश COP के आगामी सम्मेलन का आयोजन करे, फोकस कुछ निर्णायक फैसले लेने या ठोस कार्यवाहियों पर रहना चाहिए। COP को भू-राजनीतिक समीकरणों को साधने और कूटनीति के मंच के रूप में देखने और इस्तेमाल किए जाने से बचाना ही बेहतर होगा।
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