बंगलुरु में आयोजित अर्घ्‍यम के रजत जयंती समारोह में पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने जलवायु परिवर्तन, पर्यावराण, प्रदूषण और जल संकट जैसे विषयों पर विचार व्‍यक्‍त किए। 

 

स्रोत : इंडिया वाटर पोर्टल

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आंकड़ों से ही समझी जा सकती है जलवायु परिवर्तन और जल संकट जैसी गंभीर समस्‍याओं की गहराई : सुनीता

पर्यावरणीय चुनौतियों को समझने में हुई देरी, आने वाले वर्षों में बढ़ सकते हैं Extreme weather events, गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए हमें रहना होगा तैयार।

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

देश और दुनिया में पानी का संकट गहराता जा रहा है। यह हो रहा है भूजल के अत्‍यधिक दोहन और जलवायु परिवर्तन व मौसम की चरम घटनाओं (Extreme weather events) जैसी चीजों के चलते। पर, यह सब हमारे सामने होते हुए भी हमें नज़र और समझ में नहीं आता। क्‍योंकि, हम इन सारी चीजों को आपस में जोड़कर देख नहीं पाते। ऐसा संभव होता है तब, जब हम इन सारी चीजों के आंकड़ों को एक साथ रखकर समग्र रूप से देखते हैं। ऐसा करने पर हमें इस संकट की गहराई और इसकी वजहों के बीच का अंतर्संबंध साफ दिखाई देता है। इसलिए पानी, मौसम, तापमान और Extreme weather events के आंकड़े हमारे लिए बेहद महत्‍वपूर्ण हैं। यह केवल संख्‍याओं का नीरस लेखाजोखा नहीं, बल्कि पानी और पर्यावरण को लेकर हमारी समझ को गहरा करने और व्‍यापक बनाने का एक सशक्‍त माध्‍यम हैं। 

यह बात पर्यावरण विशेषज्ञ व कार्यकर्ता और सेंटर फॉर साइंस एंड इन्‍वायर्नमेंट (CSE) की डायरेक्‍टर जनरल सुनीता नारयण ने जल संबंधी मुद्दों पर काम करने वाली संस्‍था अर्घ्‍यम के रजत जयंती समारोह को संबोधित करते हुए कहीं।  

जलवायु परिवर्तन की सबसे तगड़ी मार गरीबों पर

सुनीता ने कहा कि जलवायु परिवर्तन और बाढ़, अतिवृष्टि, भूस्‍खलन, हिमस्‍खलन, बादल फटने और सूखे जैसी मौसम की चरम घटनाओं को लेकर गंभीरता इसलिए भी ज़रूरी है कि इसका सबसे ज्‍यादा असर गरीबों पर पड़ता है। आर्थिक दिक्‍कतों और संसाधनों के अभाव के कारण ऐसी घटनाओं के चलते अकसर उनकी आजीविका भी प्रभावित होती है। कई बार तो उन्‍हें विस्‍थापन तक का कष्‍ट झेलना पड़ा है, जो उनकी जीवन की जड़ों को हिला कर रख देता है। इसलिए पर्यावरण, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को केवल बौद्धिक विमर्श के विषय समझने के बजाय आज के समय की एक ऐसी वास्‍तविक समस्‍या के तौर पर देखे जाने की ज़रूरत है, जिसकी सबसे तगड़ी मार समाज के आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके पर पड़ रही है। इसके प्रति गंभीर न होने पर आने वाले समय में इसके प्रतिकूल समाजिक प्रभाव हमें देखने को मिल सकते हैं।

हमने पानी और पर्यावरण के मुद्दों को सही ढंग से नहीं समझा 

भारत में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट के प्रति लापरवाही भरे रवैये को लेकर सुनीता ने कहा कि दरअसल, हमारे देश में पानी और उससे जुड़े मुद्दों को सही ढंग से नहीं समझा गया है। यह काम काफी देरी से 1990 के दशक में थोड़ा-मोड़ा शुरू हुआ और 2010 तक छुटपुट स्‍तर पर ही रहा। हाल के वर्षों में इसमें कुछ तेजी आई है, तो जल संकट के प्रति सक्रियता बढ़ी है। सही समय पर इसे समझा गया होता, तो स्थितियां शायद इतनी गंभीर न होने पातीं, क्‍योंकि हमारे पास पानी को सहेजने (जल संरक्षण) के लिए जोहड़, आहर पाइन जैसी दर्ज़नों पारंपरिक देसी प्रणालियां सदियों से मौजूद हैं। पर, इनके महत्‍व को समझ न पाने से आज यह सब तकरीबन खत्‍म होता जा रहा है। इसका नतीजा हमें बढ़ते जल संकट के रूप में देखने को मिल रहा है। हमने अगर इसके महत्‍व को समझा और इसे बढ़ावा दिया होता, तो भारत का पारंपरिक ज्ञान और अनुभव सारी दुुनिया के लिए एक सबक हो सकता था। 

Wastewater की जगह Used Water का नज़रिया 

शहरी इलाकों में तेजी से जल संकट के बारे में उन्‍होंने कहा कि पानी को रीसाइकल और रीयूज़ करना इससे निपटने का सबसे कारगर उपाय हो सकता है। इसके लिए हमें अपने नज़रिये में व्‍यापक बदलाव लाना होगा। हमें इस्‍तेमाल किए गए पानी के लिए ‘वेस्‍ट वाटर’ और ‘डर्टी वाटर' (मलजल) जैसे शब्‍दों के इस्‍तेमाल के बजाय ‘यूज्‍़ड वाटर' कहना चाहिए, जिससे इसे दोबारा इस्‍तेमाल करने के प्रति हिचक और नकारात्‍मक नज़रिये से मुक्ति पाई जा सके। ऐसा करना ज़रूरी है, क्‍योंकि ग्रे वाटर को रीसाइकिल और रीयूज़ करके शहरी जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। हालांकि, इसमें नीतिगत स्‍तर पर बदलाव की भी ज़रूरत है। क्‍योंकि, नदियों के बेतहाशा प्रदूषण के चलते नदियों के पानी को साफ करने का खर्च काफी बढ़ता जा रहा है। इसलिए वाटर सप्‍लाई के लिए बनाए गए वाटर ट्रीटमेंट प्‍लांट्स को चलाना दिन पर दिन खर्चीला होता जा रहा है। ऐसे में इसे साफ करके पेयजल के रूप में इस्‍तेमाल करने के बजाय कम लागत में ग्रे वाटर का थोड़ा उपचार करके इस पानी को कृषि और औद्योगिक इस्‍तेमाल में लाना आर्थिक रूप से व्‍यावहारिक (Economically viable) विकल्‍प हो सकता है। हमारे देश में करोड़ों लोग अब भी सीवेज नेटवर्क से महरूम हैं और बड़ी मात्रा में सीवेज अनट्रीटेड रह जाता है। ऐसे में सीवेज नेटवर्क का विस्‍तार करके और सीवेज ट्रीटमेंट प्‍लांट्स की संख्‍या बढ़ा कर भारी मात्रा में यूज्‍़ड वाटर को दोबारा इस्‍तेमाल करने की संभावनाएं मौजूद हैं। यह हमारे देश के जल संकट को दूर करने में 'गेम चेंजर' साबित हो सकता है। 

ODF के मॉडल में सुधार की ज़रूरत

बीते दो दशकों में देश के ग्रामीण इलाकों में विभिन्‍न सरकारी योजनाओं के तहत गांवों में शौचालयों के निर्माण पर काफी फोकस किया गया है। इससे स्‍वच्‍छता को बढ़ावा मिला है। साथ ही लोगों के व्‍यवहार और आदतों में बदलाव आया है। पर, एक सच्‍चाई यह भी है कि गांव में बनाए जा रहे शौचालय मल और मलजल प्रबंधन की दृष्टि से उपयुक्‍त नहीं हैं। शौचालयों में अबतक सिंगल पिट टैंक का इस्‍तेमाल हो रहा है, जिससे शौचालयों का अपशिष्‍ट सही ढंग से विघटित नहीं हो पा रहा है। सही ढंग से डीकंपोज होने की व्‍यवस्‍था न होने के कारण शौचालयों की गंदगी कई जगह एक बड़ी समस्‍या बनती जा रही है और संक्रामक बीमारियों का कारण भी बन रही है। शौचालयों में सिंगल पिट की जगह डबल पिट सेप्टिक टैंक के मॉडल को अपना करने से न केलव इस समस्‍या से निजात पाई जा सकती है, बल्कि खेतों में इस्‍तेमाल के लिए अच्‍छी कंपोस्‍ट खाद भी मिल सकती है। यह रासायनिक उर्वरकों और दवाओं के लगातार इस्‍तेमाल से मिट्टी की घटती उर्वरता की समस्‍या को दूर करने के साथ ही खेती की लागत को भी घटा कर किसानों की आय बढ़ाने में भी मददगार हो सकती है। इसलिए ग्रामीण इलाकों में खुले में शौच मुक्ति की योजना यानी Open Defecation Free (ODF) के अगले चरण में डबल पिट सेप्टिक टैंक के मॉडल का इस्‍तेमाल किया जाना चाहिए। अर्घ्‍यम व अन्‍य स्‍वयंसेवी संस्‍थाएं (एनजीओ) इस काम में हाथ बंटा कर सरकार की मदद कर सकती हैं। 

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