नवरात्र में स्थापित कलश के चारों ओर अंकुरित जौ प्रकृति व हरियाली से प्रेम और उसके संरक्षण का संदेश देते हैं।
स्रोत : फ्रीपिक
चैत्र नवरात्र आज से शुरू हो रहा है। देशभर में बड़ी संख्या में लोग अपने घरों में कलश की स्थापना कर अगले नौ दिन उसकी पूजा-अर्चना करेंगे। पर, यह महत्वपूर्ण बात कम ही लोग समझते हैं कि नवरात्र दरअसल, भारतीय समाज का एक ऐसा पर्व है, जिसमें आस्था, परंपरा और प्रकृति के बीच गहरा संबंध देखने को मिलता है। नवरात्र में कलश की स्थापना देवी को प्रसन्न करने के उपाय के साथ ही पानी, प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण का संदेश भी देती है। नवरात्र की कलश स्थापना में मिट्टी के छोटे से घड़े (कलश) में पानी भर कर उसके चारों ओर मिट्टी में जौ के दाने बोए जाते हैं। कलश की सतह से धीरे-धीरे रिसता पानी जिस तरह मिट्टी में नमी बनाए रखते हुए जौ को उगने और पनपने का अवसर देता है वह कहीं न कहीं जल के संतुलित उपयोग और पानी व प्रकृति (मिट्टी) का अस्तित्व एक-दूसरे पर टिका होने की सीख देता है। इसी संतुलन को हमें बनाए रखना है, ताकि पानी, प्रकृति और पर्यावरण तीनों एक साथ विकसित और पल्लवित होते रहें। नवरात्र के कलश का यही प्राकृतिक संदेश है। मान्यता यह भी है कि कलश में भरा जल ब्रह्मांडीय ऊर्जा और जीवन शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। यही कारण है कि श्रद्धालु इस जल को अत्यंत पवित्र मानते हैं और पूजा के बाद इसे घर के सदस्यों में प्रसाद के रूप में वितरित करते हैं और घर में लगें पौधों, खासकर तुलसी में अर्पित करते हैं। इस तरह जल से भरे कलश की स्थापना केवल धार्मिक व आध्यात्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे संबंध को भी दर्शाती है। यही वजह है कि नवरात्र में देवी को “प्रकृति स्वरूपा” माना जाता है और जल के माध्यम से देवी यानी प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना के साथ मिट्टी में जौ या गेहूं बोए जाते हैं, जिन्हें रोज जल दिया जाता है। यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि कृषि और पर्यावरण से जुड़ी व्यावहारिक समझ का भी प्रतीक है। अंकुरित होते जवारों की हरियाली को समृद्धि और अच्छे मौसम का संकेत माना जाता है। नवरात्र के दौरान घरों में यह छोटी-सी “ग्रीन एक्टिविटी” लोगों को पौधों की वृद्धि और जल की भूमिका को करीब से समझने का अवसर देती है। क्योंकि, ज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो मिट्टी में डाले गए जौ के अंकुरण की प्रक्रिया जल, तापमान और प्रकाश के संतुलन पर निर्भर करती है। इस तरह यह परंपरा आज अपनी मिट्टी और जड़ों से दूर होते शहरी समाज को पर्यावरण की शिक्षा देने का एक सहज माध्यम बन सकती है।
नवरात्र में पूजा के लिए पवित्र नदियों का जल विशेष महत्व रखता है। कई श्रद्धालु गंगा, यमुना या अन्य स्थानीय जलस्रोतों से जल लाकर पूजा में उपयोग करते हैं। यह परंपरा भारतीय समाज में नदियों के प्रति भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाती है। हालांकि बदलते समय में नदियों की प्रदूषण समस्या भी सामने आई है। धार्मिक आस्था के कारण जल का संग्रह तो किया जाता है, लेकिन यदि नदियां स्वच्छ न हों तो यह परंपरा स्वयं पर्यावरणीय संकट की ओर इशारा करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि धार्मिक आयोजनों को नदी संरक्षण अभियानों से जोड़ना समय की जरूरत है, ताकि आस्था और पर्यावरण दोनों का संतुलन बना रहे।
नदी, तालाब और समुद्र जैसे जलाशयों में देवी की प्रतिमा के विसर्जन की परंपरा रही है। पर प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी और ज़हरीले रासायनिक रंगों से रंगी प्रतिमाएं आज जल स्रोतों को प्रदूषित कर रही हैं।
नवरात्र में बड़ी संख्या में लोग व्रत रखते हैं, जिसमें फलाहार और जल का ही सेवन किया जाता है। कुछ लोग तो केवल पानी पीकर ही उपवास रखते हैं। इस तरह व्रत के दिनों में पानी शरीर की ऊर्जा बनाए रखने, खनिजों और पोषण की आपूर्ति करने शरीर में मौजूद विषैले तत्वों यानी टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा में इस डिटॉक्सिफिकेशन का उल्लेख विषहरण प्रक्रिया के रूप में मिलता है, जिसका एक बेहतरीन अवसर हमें नवरात्र के व्रत के रूप में मिलता है। इस डिटॉक्सिफिकेशन के दौरान पानी हमारे शरीर को डिहाइड्रेशन से भी बचाए रखता है। यही वजह है कि आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों ही व्रत के दौरान पर्याप्त मात्रा में शुद्ध जल पीने को काफी महत्व दिया जाता है। इस दृष्टि से देखें, तो नवरात्र का व्रत एक तरह से “डिटॉक्स रिचुअल” भी बन जाता है, जिसे करने से जल शरीर की शुद्धि का माध्यम बनता है। इससे साल के बाकी दिनों में शरीर की पाचन क्रिया बेहतर रहती है और शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बना रहता है।
नवरात्र के दौरान देशभर में बड़े-बड़े पंडाल और मंदिरों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इस दौरान पेयजल, साफ-सफाई और अपशिष्ट प्रबंधन जैसी चुनौतियां सामने आती हैं। कई शहरों में अस्थायी जल टैंकरों और बोतलबंद पानी की व्यवस्था की जाती है, जिससे प्लास्टिक कचरे की समस्या बढ़ जाती है। इसके समाधान के लिए नवरात्र से जुड़े आयोजनों में वाटर रिफिल स्टेशनों, स्टील या मिट्टी के बर्तनों और वर्षा जल संचयन जैसी व्यवस्थाओं को शामिल किया जाए। इससे जल की बर्बादी कम होगी और पर्यावरणीय प्रभाव भी घटेगा। कुछ नगर निगम अब “ग्रीन पंडाल” की अवधारणा को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसमें जल संरक्षण एक प्रमुख मानदंड है।
नवरात्र के अंत में देश भर में देवी की विदाई नदी, तालाब जैसे जलाशयों में प्रतिमाओं का विसर्जन करके किया जाता है। सदियों पुरानी यह परंपरा जब बनाई गई थी उस समय प्रतिमाएं कच्ची मिट्टी से बनती थी और उन्हें रंगा भी चूने व प्राकृतिक रंगों से ही जाता था। इन देवी प्रतिमाओं का साज-शृंखार भी फूल, होली, हल्दी, चंदन और सिंदूर जैसी प्राकृतिक चीजों से ही किया जाता था। इसलिए जलाशयों में इनके विसर्जन से उन्हें कोई नुकसान नहीं होता था। बल्कि, यह चीजें नदी-तालाब में मौजूद मछलियों और जलीय जीवों के लिए भोजन का काम करती थीं। पर वक्त के साथ बदलते चलन ने इसे बिगाड़ कर रख दिया। लेकिन, आज के समय में मूर्तियां प्लास्टर ऑफ पेरिस, जिप्सम जैसी नुकसानदायक चीजों से बनने लगी हैं और इनकी रंगाई भी ज़हरीले रासायनिक रंगों से होने लगी है। प्रतिमा की सजावट में भी प्लास्टिक के फूलों व मालाओं का इस्तेमा होने लगा है। इस सबके चलते प्रमिमा विसर्जन करने पर जल प्रदूषण का खतरा बढ़ गया है।
ऐसे में ज़रूरी हो गया है कि हम एक बार फिर से मिट्टी की बनी और प्राकृतिक रंगों से रंगी प्रतिमाओं की ओर लौटें। केवल पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग किया जाए तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। साथ ही पर्यावरणविदों का मानना है कि प्रतिमा विसर्जन यदि कृत्रिम टैंकों या निर्धारित घाटों पर ही किया जाना चाहिए, जहां विसर्जन के बाद साफ-सफाई की व्यवस्था की गई हो। प्रतिमा की सजावट में भी कई राज्यों में इस दिशा में नियम भी बनाए गए हैं, लेकिन इसके लिए जनजागरूकता काफी जरूरी है।
प्रतिमाओं के साज-शृंगार में भी आज बड़े पैमाने पर प्लास्टिक से बनी चीजों का इस्तेमाल होने लगा है, जो विसर्जन के बाद लंबे समय तक नदी- तालाबों जैसे जल स्रोतों में तैरती रहती हैं।
ग्रामीण इलाकों में नवरात्र का पर्व जल और कृषि चक्र से गहराई से जुड़ा होता है। खरीफ फसल की स्थिति, वर्षा की मात्रा और जल स्रोतों की उपलब्धता को देखते हुए देवी की पूजा की जाती है। कुछ दशक पहले तक गांवों में नवरात्र की तैयारी के तहत गांवों के तालाबों और कुओं की सामूहिक रूप से सफाई का काम भी किया जाता था। पर, अब यह परंपरा विलुप्त हो चली है। अब तो बोरिंग के बढ़ते चलन के कारण गांवों में तालाब, पोखर और कुएं भी विलुप्त होते जा रहे हैं। पुराने समय में नवरात्र में गांव के कुओं व तालाबों की सफाई की परंपरा सामुदायिक जल प्रबंधन का एक अनौपचारिक मॉडल प्रस्तुत करती थी, जहां धार्मिक आस्था के माध्यम से लोगों को जल संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाता था। आज जब देश के कई हिस्सों में भूजल संकट बढ़ रहा है, इसे फिर से जिंदा किए जाने की जरूरत महसूस होती है। क्योंकि, जलस्रोतों के संरक्षण के ऐसे पारंपरिक मॉडल नई नीतियों के लिए प्रेरणा बन सकते हैं।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच नवरात्र का पर्व जल बचत का संदेश देने का भी अवसर है। पूजा-पाठ में अत्यधिक जल उपयोग की बजाय प्रतीकात्मक उपयोग, घरों में वर्षा जल संचयन और पौधारोपण जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
सोशल मीडिया और सामुदायिक अभियानों के जरिए यह संदेश फैलाया जा सकता है कि देवी की सच्ची पूजा प्रकृति की रक्षा में है। कई युवा समूह अब नवरात्र के दौरान “एक पौधा देवी के नाम” जैसे अभियान चला रहे हैं, जिसमें जल संरक्षण और हरित जीवनशैली को बढ़ावा दिया जाता है। इसके साथ ही नवरात्र के नौ दिन पर्यावरण शिक्षा के लिए भी एक प्रभावी मंच बन सकते हैं। स्कूलों और कॉलेजों में जल संरक्षण पर कार्यशालाएं, प्रदर्शनी और नुक्कड़ नाटक आयोजित किए जा सकते हैं। इससे नई पीढ़ी को यह समझने में मदद मिलेगी कि धार्मिक परंपराएं केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का मार्ग भी दिखाती हैं।
इस तरह हम नवरात्र की धार्मिक परंपरा को पर्यावरण सुरक्षा से जोड़कर इस त्योहार को एक हरियाली का पर्व यानी “ग्रीन फेस्टिवल” में बदला जा सकता है। आज जब जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट, अनियमित वर्षा और सूखे की घटनाएं बढ़ रही हैं, तब नवरात्र जैसे पर्वों की नई व्याख्या जरूरी हो गई है। देवी को शक्ति और प्रकृति का प्रतीक मानने वाली परंपरा हमें यह सिखाती है कि जल संसाधनों की रक्षा करना भी एक तरह की आध्यात्मिक जिम्मेदारी है।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें