हलमा की प्राचीन परंपरा के तहत सामूहिक श्रमदान के जरिये रतलाम की बजाना तहसील के तीन गांवों के अदिवासियों ने सुख चुके पानी के नालों को फिर से खोद कर जलाशय तैयार किया।
स्रोत : वागधारा
मध्य प्रदेश (एमपी) के रतलाम जिले के बजाना तहसील में स्थित घोड़ाखेडा, बगली, रामपुरिया और धावड़ादेह गांवों के लोगों की मशक्कत भरी कहानी जल संकट से जूझ रहे इलाकों के लोगों के लिए किसी प्रेरक-प्रसंग से कम नहीं। कुछ समय पहले तक यहां के किसान पानी की कमी के कारण मुश्किल से साल में केवल एक ही फसल उगा पाते थे। जानवरों के पीने के लिए भी पर्याप्त पानी नहीं था। पानी की इस कमी ने लोगों पलायन, कुपोषण और शोषण जैसी समस्याओं के दुष्चक्र में धकेल दिया था।
इस गंभीर जल संकट से निजात पाने के लिए यहां के ग्रामीणों ने आखिर का अपनी एक सदियों पुरानी लोक परंपरा ‘हलमा' का सहारा लिया और आपसी सहयोग व श्रमदान से गांव के एक बड़े तालाब को पुनर्जीवित कर दिया। इससे पानी के साथ ही उनकी जिंदगियों में एक बार फिर से खुशहाली भी लौट आई।
जल संकट एक विकराल समस्या बनकर इन ग्रामीणों के जीवन के हर पहलू को इस क़दर प्रभावित कर रहा था कि लोगों का जीवन इसी में जकड़ कर रह गया था। इस इलाके के गंभीर जल संकट के बारे में प्रकाशित एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक गांव की महिला किसान कांताबाई वालिया अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सुबह पानी लेने के लिए निकलती थीं, तो घटर लौटने में दोपहर हो जाती थी। काफ़ी मशक्कत के बाद भी महज़ दो मटके पानी मिल पाता था। इस स्थिति के चलते उनके परिवार के साथ ही पालतू गायों का जीना भी दूभर हो गया था, क्योंकि उन्हें बड़ी मुश्किल से दिनभर में केवल एक बार ही थोड़ा सा पानी पीने को मिल पाता था।
आखिरकार इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए स्थानीय समुदाय ने अपनी एक प्राचीन परंपरा ‘हलमा’ की ओर रुख किया। यह भील समाज की एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण परंपरा है, जो सामुदायिक श्रम और सामाजिक दायित्व की भावना पर आधारित है। इसके तहत लोगों ने श्रमदान करके धावड़ादेह, बगली, घोड़ाखेड़ा और रामपुरिया गांवों के बीच स्थित एक पूरी तरह से खत्म हो चुके बरसाती नाले की साफ-सफाई व खुदाई करके और मिट्टी के बोरे लगाकर इसके किनारों पर मेड़ बांध कर (बोरी बंधान) नाले को एक बार फिर से जिंदा कर दिया। इसका उद्देश्य बारिश के पानी को रोक कर नाले में एकत्र करना और इलाक़े के भूजल स्तर को बढ़ाना था, ताकि कुओं तथा हैंडपंपों में फिर से पानी आ जाए। यह कदम इन गांवों की जल समस्या को काफी हद तक कम करने में सहायक साबित हुआ।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 24 अप्रैल 2022 को प्रसारित अपने कार्यक्रम ''मन की बात" में जनजातीय बहुल क्षेत्र में ''हलमा" से जल संरक्षण के कार्य की प्रशंसा कर चुके हैं। उन्होंने भील जनजाति की इस अनूठी परंपरा की सराहना करते हुए इसे अन्य समुदायों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बताया था।
गगांवों में तालाबों के सूखने और विलुप्त होने से जल संकट गहराता जा रहा है, ऐसे में तालाबों की परंपरा को पुनर्जीवित करना ज़रूरी होता जा रहा है।
हलमा भील समुदाय के जनजातीय समाज की एक प्राचीन परंपरा है। इसका शाब्दिक अर्थ ‘साथ चलना’, ‘साथ काम करना’ या ‘मदद के लिए पुकारना’ होता है। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश के कई आदिवासी समुदायों में प्रचलित इस परंपरा के तहत तीन या अधिक गांवों और आसपास के क्षेत्रों के लोग किसी समस्या के समाधान के लिए स्वेच्छा से एकत्र होते हैं। इसके अलावा जब गांव का कोई व्यक्ति किसी संकट में फंस जाता है और अपनी पूरी कोशिश के बावजूद उससे बाहर नहीं निकल पाता, जैसे किसी की फसल कटाई के लिए तैयार है लेकिन मज़दूरों को मेहनताना देने के लिए पैसे नहीं हैं, किसी को घर बनवाना या कुआं खुदवाना होता है या खेती के लिए अपने खेत को तैयार करना होता है, तो वह हलमा का आह्वान करता है। इसके बाद लोग मिल कर इस काम को पूरा करते हैं। लोग आपसी सहयोग और सामुदायिक श्रमदान से समस्या के समाधान के लिए काम करते हैं। इस परिश्रम के लिए किसी को कोई भी मजदूरी या मेहनताना नहीं मिलता।
इस तरह हलमा की परंपरा समाज में सहयोग, एकता और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देती है। जब लोग मिलकर एकजुट होकर कोई कार्य करते हैं, तो वह न केवल आसान हो जाता है, बल्कि उसके परिणाम भी अधिक प्रभावी, स्थायी और दीर्घकालिक होते हैं। इस तरह हलमा की प्राचीन परंपरा पूरे समुदाय के जीवन की दुश्वारियों को दूर कर जीवन को बेहतर बनाती है। इसी परंपरा का सहारा लेकर धावड़ादेह, घोड़ाखेड़ा, बगली और रामपुरिया के ग्रामीणों ने वर्षों से चली आ रही जल संकट का समाधान किया। इसमें सभी ने बड़े उत्साह और समर्पण के साथ भागीदारी निभाई।
वर्तमान समय में सामूहिक सहयोग की हलमा परंपरा विलुप्त होती जा रही है, फिर भी इसके कुछ प्रेरक उदाहरण बीच-बीच में देश के विभिन्न भागों में जनजातीय समुदायों में देखने को मिल जाते हैं। रतलाम में इसके ज़रिये किए गए जल संरक्षण की तरह एमपी के ही झाबुआ ज़िले में भी करीब 12,000 हेक्टेयर में फैली हाथीपावा पहाड़ी पर पानी के संरक्षण और कृषि सुधार के लिए 2,35,000 कंटूर ट्रेंच बनाए गए। हलमा में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। वे कुआं खोदने, मिट्टी हटाने, जल स्रोतों के संरक्षण और पौधारोपण जैसे कार्यों में अहम योगदान देती हैं। झाबुआ में भी जल संकट से निपटने के लिए जब हलमा शुरू हुआ, तब महिलाओं ने तालाब खुदाई, जल स्रोतों की सफाई और जल प्रबंधन में सक्रिय भागीदारी निभाई।
लुप्त होती हलमा परंपरा को सन 2005 में एक गैर-सरकारी संगठन शिवगंगा ने पुनर्जीवित किया। महेश शर्मा और हर्ष चौहान की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। महेश शर्मा को भारत सरकार द्वारा उनके कार्यों के लिये 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। आज वो भील जनजातियों के बीच झाबुआ के गांधी बन चुके हैं। मध्य प्रदेश में हलमा को बड़े पैमाने पर 2008 में व्यवहारिक रूप दिया गया। परिणामस्वरूप साल 2009 के पहले हलमा में पानी के छोटे-छोटे गड्ढे बनाने के लिये आठ सौ लोग सामने आए और श्रम दान किया, अगले वर्ष यानि 2010 में सहभागिता बढ़कर 1600 हो गई। 2011 में दस हज़ार लोग इसमें शामिल हुए।
रतलाम जिले के बजाना तहसील में स्थित घोड़ाखेडा, बगली, रामपुरिया और धावड़ादेह गांवों में हुए हलमा के श्रमदान में कुल 183 लोगों ने हिस्सा लिया। इनमें 89 महिलाएं और 94 पुरुषों शामिल थे। इस तरह महिलाओं ने भी सामाजिक जिम्मेदारी के निर्वाह में कंधे से कंधा मिला कर योगदान दिया।
हलमा प्रथा के तहत श्रमदान में आदिवासी समाज की महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर श्रमदान करती हैं।
ग्रामीणों को हलमा के जरिये जल संकट के समाधान की प्रेरणा स्वयं सेवी संस्था ‘वागधारा’ से मिली। संस्था के सामुदायिक कार्यकर्ता मोहन भूरिया ने लोगों को हलमा के तहत काम शुरू करने के लिए प्रेरित किया। संस्था ने अपने कार्यक्रमों के दौरान जल संरक्षण के महत्व पर विशेष जोर दिया। वक्ताओं ने समझाया कि सामूहिक प्रयासों के माध्यम से जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है और जल संरक्षण के लिए समुदाय की एकता अत्यंत आवश्यक है। जल जीवन का आधार होने के साथ ही एक सामुदायिक संसाधन है। इसलिए, इसके संरक्षण की जिम्मेदारी पूरे समाज की है और जब समाज एकजुट होकर इस दिशा में काम करता है, तो परिणाम अत्यंत प्रभावी होते हैं। इसके साथ ही वागधारा द्वारा गठित ग्राम स्वराज समूह के सदस्य शांतिलाल पटेल ने इस पहल की शुरुआत की। उन्होंने सूखे और जल संकट से निपटने के लिए गांव में बोरी बंधान बनाने के लिए हलमा का आह्वान किया।
इस आह्वान पर गांव के सभी लोग एकजुट हुए और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से बोरी बंधान का निर्माण किया। इस तरह यह परंपरा एक पुरानी रवायत और आधुनिक जल संरक्षण तकनीकों के इस्तेमाल से जल संरक्षण का एक सुंदर उदराहरण बन गई। वागधारा ने इस पूरे कार्यक्रम का समन्वय करके पूरी प्रक्रिया को सुचारु बनाने में अहम भूमिका निभाई। संस्था के सामुदायिक सहजकर्ता मोहन भूरिया ने सुनिश्चित किया कि सभी गतिविधियां सुचारू रूप से संपन्न हों और सभी प्रतिभागी सक्रिय रूप से भाग लें।
श्रमदान के जरिये बरसाती नाले के संरक्षण का काम समाप्त करने के बाद बाकायदा एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में हर्षोल्लास के साथ सभी ग्रामीणों ने भाग लिया और परंपरागत तरीके से डोल, कुंडी और थाली बजाते हुए नृत्य किया। यह नृत्य और संगीत केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि यह उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक उत्सव का प्रतीक था।
कार्यक्रम के समापन पर सभी ग्रामवासियों ने जल संरक्षण की शपथ ली। यह शपथ केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह भविष्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी का प्रदर्शन थी। साथ ही उन्होंने संकल्प लिया कि वह हलमा की इस परंपरागत जल संरक्षण पद्धति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएंगे। क्योंकि, उन्होंने यह समझ लिया है कि जल संरक्षण एक सतत प्रक्रिया है और इसके लिए पीढ़ी दर पीढ़ी प्रयास करने की आवश्यकता है।
इस कार्यक्रम में रामपुरिया, बगली और घोड़ाखेड़ा के वागधारा द्वारा गठित ग्राम स्वराज समूहों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। ग्राम स्वराज समूह से फूलजी भूरिया, शांतिलाल पटेल, जालु, नाहर सिंह, हुकला, काली भूरिया, वालाराम चरपोटा, आभा चरपोटा, प्रवीण चरपोटा, वालचंद डामोर, मगन डोडियार, कपिल वसुनिया, रमेश चरपोटा, कैलाश चरपोटा, रविन्द्र हारी, रमेश चारेल जैसे अनेक सक्रिय सदस्यों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। साथ ही कांताबाई वालिया, मुनिया, परसराम, लुंजी बाई, हुमली, झाली, सुनीता जैसी महिला सदस्यों ने भी कार्यक्रम में शामिल होकर यह संदेश दिया कि जल संरक्षण की जिम्मेदारी केवल पुरुषों की नहीं है, बल्कि महिलाएं भी इसमें समान रूप से भागीदार हैं।
पहाड़ी ढलानों पर कैंटूर बनाकर बारिश के पानी के संचय का प्रयास करते ग्रामीण।
जल संरक्षण की इस पहल के परिणाम बहुत जल्द ही दिखाई देने लगे। अपनी गायों के लिए पीने के पानी का इंतज़ाम करने के लिए परेशान रहने वाली कांताबाई वालिया बताती हैं कि बोरी बंधान के निर्माण से पानी की स्थिति में सुधार आया है। अब उनके जानवरों को पीने के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो गया है। इस तरह यह महत्वपूर्ण बदलाव लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला रहा है। किसान मगन और वालचंद भी खेती में सुधार आने से काफ़ी खुश हैं। पहले सिंचाई के पानी की किल्लत के चलते यह लोग साल में एक फ़सल भी बहुत ही मुश्किल से ले पाते थे। अब नाले से तकरीबन साल भर पानी मिलने के कारण दो फ़सलें लेना भी मुमकिन हो गया है। यह बताते हैं कि वागधारा संस्था की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही है। क्योंकि, संस्था ने केवल इन लोगों को तकनीकी सहायता ही नहीं दी, बल्कि समुदाय को संगठित करने, उनके पारंपरिक ज्ञान को पहचानने और आधुनिक समाधानों के साथ जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
यह कार्यक्रम अन्य गांवों और समुदायों के लिए भी एक प्रेरणा है। यह दर्शाता है कि स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर ही संभव है। सरकारी योजनाओं के साथ-साथ समुदाय की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। जब समुदाय अपनी समस्याओं का स्वामित्व लेता है और उनके समाधान के लिए एकजुट होता है, तो परिणाम स्थायी और प्रभावी होते हैं। कहा जा सकता है कि रतलाम के इन गांवों में हुई यह पहल केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संदेश देती है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय, सामुदायिक एकता और सामूहिक प्रयास से किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है। हलमा परंपरा ने यह साबित कर दिया है कि हमारी प्राचीन परंपराएं न केवल सांस्कृतिक विरासत हैं, बल्कि वे आज की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान भी प्रदान कर सकती हैं।