कथक सम्राट बिरजू महाराज को अपने लय व रसपूर्ण नृत्‍य के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। उनका आज भी अपने गांव के प्राचीन तालाब से खास लगाव है, जो ‘कथकों का तालाब' या ‘कथिक तालाब' नाम से मशहूर है।

 

स्रोत : विकी कॉमंस

लोक संस्कृति

कथक नृत्‍य के सुनहरे इतिहास से जुड़ा है यूपी का यह अनूठा तालाब, बिरजू महाराज के परिवार से है गहरा नाता

प्रयागराज की हंडिया तहसील के किचकिला गांव के इस तालाब किनारे रहते थे कभी करीब एक हज़ार कथक नर्तकों के परिवार, जिसके चलते ही इसका नाम पड़ा ‘कथकों का तालाब'

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

पोखर और तालाब न केवल हमारे जलस्रोत हैं, बल्कि अकसर यह हमारी परंपराओं और कुछ कहानियों से भी जुड़े होते हैं। आज हम आपको उत्तर प्रदेश के ऐसे ही एक तालाब के बारे में बताने जा रहे हैं। यूपी के प्रयागराज (इलाहाबाद) जिले की हंडिया तहसील के किचकिला गांव में स्थित यह तालाब अपने आप में एक समृद्ध परंपरा को समेटे हुए है। ‘कथकों का तालाब' या ‘कथिक तालाब' नाम से मशहूर यह तालाब भारत के शास्त्रीय नृत्य कथक के इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल है। यह गांव ‘कथक सम्राट' के नाम से दुनिया भर में मशहूर शास्‍त्रीय नर्तक पंडित बिरजू महाराज और उनके पूर्वजों की जन्मस्थली है। मुगलकाल से ही यह गांव कथक नृत्‍य का गढ़ माना जाता रहा है। उसके बाद ब्रिटिश काल में भी सन 1800 के आसपास यहाँ कथक कलाकारों के लगभग 989 परिवार निवास करते थे।

कथक नृत्‍य की परंपरा इसी गांव से शुरू हुई मानी जाती है। बताया जाता है कि इस गांव में मुगल काल से भी पहले मिश्र ब्राह्मण ईश्वरी प्रसाद रहते थे, जिन्हें इस शास्‍त्रीय नृत्य विधा का जनक माना जाता है।  बाद में उनके बेटों अड़गू महाराज, खड़गू महाराज व तुलगू महाराज ने उस विधा को आगे बढ़ाया। बिरजू महाराज को भी इसी घराने से जुड़ा माना जाता है। उनके अलावा लच्छू महाराज और सितारा देवी जैसी कथक की महान हस्तियां भी इसी गांव से ताल्लुक रखती थीं। गांव में कथकों की इस परंपरा के कारण ही यहां के तालाब का नाम ‘कथकों का तालाब' पड़ा। इस तालाब के पास ही ‘सती चौरा’ स्मारक स्थित है, जो बिरजू महाराज के दादा ईश्वरी प्रसाद की पत्नी (उनकी दादी) की स्मृति में 1978 में बनाया गया था।

अपने गांव के तालाब से बिरजू महाराज को था खास लगाव

शहर से लगभग 50 किलोमीटर दूर हंडिया तहसील का किचकिला गांव। इसी पावन माटी में 4 फरवरी 1938 को कथक सम्राट व पद्म विभूषण पंडित बिरजू महाराज का जन्म हुआ था। विश्व फलक पर कथक को समृद्ध करने वाले महान कलाकार के निधन से प्रयागराज का कला समाज और हंडिया में महाराज की विरासत से जुड़े लोग भी आहत हैं। पं. बिरजू महाराज अंतिम बार 2019 कुंभ में स्पिक मैके की ओर से आयोजित समारोह में आए थे। उस समय उन्होंने 60 कलाकारों के साथ मोहक प्रस्तुति की थी। पं. बिरजू महाराज अपनी माटी और गुरु-शिष्य की परम्परा को समृद्ध करने के लिए शहर में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में बराबर आते रहे। बिरजू महाराज 1983 में मां के निधन पर शहर आए थे। उनकी मां महादेवी का निधन 1983 में प्रयागराज में हुआ था, जब वे शहर में किसी परिचित के यहां दिल्ली से आई थीं। उसके बाद कथक सम्राट 1994, 1996 और 2011 में हंडिया माटी महोत्सव में शिरकत के दौरान अपने पुरखों से जुड़े इस तालाब के दर्शन करने आए थे।

पर्यटन स्थल के रूप में विकास की योजना

वर्तमान में इस क्षेत्र को एक पर्यटन स्थल और कथक स्मारक के रूप में विकसित करने की योजना है। केंद्रीय सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा इसका सर्वे भी किया जा चुका है ताकि इस प्राचीन कला परंपरा को सहेजा जा सके।

गोवा में मनाए जाने वाले 'साओ जोआओ' पर्व में कैथोलिक समाज के नवविवाहित युवक तालाब में छलांग लगाने की परंपरा निभाते हैं। 

तालाब में कूदने का अनोखा त्‍योहार ‘साओ जोआओ' 

तालाबों का सांस्‍कृतिक और पारंपरिक महत्‍व केवल हिन्‍दू धर्म तक ही सिमटा हुआ नहीं है। ईसाई धर्म में भी इसकी झलक देखने को मिलती है। गोवा में ईसाई समुदाय एक ऐसा ही त्‍योहार मनाता है। इस महोत्सव का नाम साओ जोआओ है। ये गोवा का प्रमुख कैथोलिक पर्व है। इस फेस्टिवल में फलों, फूलों और पत्तियों से बने मुकुट पहनकर लोग तालाबों और कुओं में छलांग लगाते हैं। इसे देखने और इसमें शामिल होकर रोमांचित होने के लिए लोग दूर दूर से आते हैं। साओ जोआओ को सैन जानव भी कहा जाता है। इसे हर साल 24 जून को गोवा में मनाया जाता है। युवा गोयन कैथोलिक पुरुष सेंट जॉन द बैपटिस्ट की याद में उन्‍हें श्रद्धांजलि के रूप में तालाब में छलांग लगाने की सदियों पुरानी परंपरा को आज भी निभाते हैं। पहले कुओं में छलांग लगाई जाती थी, पर चूंकि कुएं तेजी से गायब हो रहे हैं, इसलिए अब लोग तालाबों में कूदकर यह पर्व मनाते हैं। अंग्रेजी में इसे लीप ऑफ जॉय (Leap of Joy) कहा जाता है। यह त्योहार हर साल जून में राज्य में मानसून के मौसम की शुरुआत के रूप में मनाया जाता है।

यह त्योहार नवविवाहित युवाओं के लिए बेहद खास होता है। क्‍योंकि मान्‍यता है कि इस पर्व के दौरान नव विवाहित पुरुषों के कुएं में छलांग लगाने से उनकी प्रजनन क्षमताबेहतर होती है और पारिवारिक चीवन अच्छा रहता है। इसलिए इस त्योहार में अधिकतर नव विवाहित पुरुष ही तालाब में छलांग लगाते दिखाई देते हैं।

तालाब केवल जलस्रोत नहीं, सामाजिकता का जीवंत अड्डा

भारतीय गांवों और कस्बों में तालाब कभी सिर्फ पानी भरने की जगह नहीं थे, बल्कि लोकजीवन के सार्वजनिक मंच थे। यहां धर्म, उत्सव, श्रम और सामाजिक रिश्ते एक साथ दिखाई देते थे। अलग-अलग क्षेत्रों में तालाबों से जुड़ी परंपराएं आज भी सांस्कृतिक स्मृति में जीवित हैं -

  • छठ पर्व (बिहार-पूर्वांचल): सूर्योपासना का यह महापर्व तालाब, पोखर या नदी घाट के बिना अधूरा माना जाता है। अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के लिए तालाबों की विशेष सफाई होती थी।

  • कार्तिक पूर्णिमा स्नान: उत्तर भारत में तालाबों और सरोवरों पर दीपदान व स्नान की परंपरा रही, जिसे पुण्य और पितृशांति से जोड़ा गया।

  • गणगौर और तीज (राजस्थान): महिलाएं तालाब घाटों पर पूजा कर दांपत्य सुख और समृद्धि की कामना करती थीं।

  • मुंडन, जनेऊ और विवाह रस्में: कई ग्रामीण समाजों में तालाब घाट संस्कार स्थलों की भूमिका निभाते थे।

  • लोकसंगीत और अखाड़े: सावन-भादो में कजरी, बिरहा, आल्हा और लोकनृत्य तालाब किनारे आयोजित होते थे।

इस तरह सदियों तक तालाब हमारे सामाजिक जीवन की धुरी और सामुदायिक गतिविधियों का केंद्र बने रहे, जहां जल के साथ लोकसंस्कृति भी बहती थी। भारत में मुख्‍य रूप से कितने तालाब और झीलें हैं, विस्‍तार से जानने के लिए पढ़ें हमारी यह खास स्‍टोरी -

भारत में कितने तालाब और कितनी झीलें हैं?

तालाब खेती में भी बहुत अहम भूमिका निभाते हैं, क्‍योंकि भारत में लाखों गांवों में आज भी खेतों की सिंचाई तालाबों से ही होती है।

लोकरीति, आस्था और तालाबों की परंपराएं

भारतीय समाज में तालाबों को ‘पुण्य’ और ‘परमार्थ’ से जोड़कर देखा गया है। तालाब खुदवाना केवल उपयोगितावादी काम नहीं, बल्कि लोककल्याण का एक सामाजिक व धार्मिक दायित्व माना जाता था। राजस्थान, बुंदेलखंड और अवध क्षेत्र में राजा, जमींदार, मंदिर ट्रस्ट और समाजसेवी परिवार अकाल राहत या धर्मार्थ कार्य के रूप में तालाब बनवाते थे। कई जगह तालाब निर्माण को बेटी के विवाह, संतान प्राप्ति या स्मृति-निर्माण से भी जोड़ा गया। वर्षा से पहले गांवों में सामूहिक ‘घाट सफाई’ होती थी, जिसे आज की भाषा में जल संरक्षण अभियान कहा जा सकता है। नागपंचमी, देवउठनी एकादशी, पितृ विसर्जन और माघ स्नान जैसे पर्वों में तालाबों की विशेष भूमिका थी। पूर्वांचल और अवध में महिलाएं तालाब किनारे कजरी और सोहर गाकर सामाजिक-सांस्कृतिक जुड़ाव मजबूत करती थीं। तालाब इस प्रकार ग्रामीण सभ्यता में जल, धर्म और सामुदायिक अनुशासन का साझा संस्थान थे।

इतिहास में तालाब: सत्ता, समाज और संस्कृति के साक्षी

भारतीय इतिहास में तालाबों का निर्माण केवल जल प्रबंधन नहीं, बल्कि शासकीय क्षमता, सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक रहा। कई ऐतिहासिक तालाब अपने समय की राजनीति और लोकजीवन की कहानी कहते हैं -

  • राजा भोज का भोजताल (भोपाल, 11वीं सदी): परमार राजा भोज द्वारा निर्मित विशाल जलाशय, जिसे भारत की ऐतिहासिक जल इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।

  • चंदेल कालीन तालाब (बुंदेलखंड): महोबा और आसपास के क्षेत्रों में मदन सागर, कीरत सागर जैसे जलाशय जल-सुरक्षा और नगर नियोजन से जुड़े थे।

  • पुष्कर सरोवर (राजस्थान): धार्मिक तीर्थ के साथ व्यापारिक मेलों और सांस्कृतिक आयोजनों का केंद्र।

  • दक्षिण भारत के चोल टैंक: सिंचाई, मंदिर अर्थव्यवस्था और स्थानीय प्रशासन की रीढ़।

  • अवध में नवाबी दौर के तालाब : लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में कई तालाब केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक-सामाजिक जीवन के केंद्र बने। टिकैत राय तालाब (अयोध्या-लखनऊ क्षेत्र से जुड़ी परंपरा) का निर्माण नवाब आसफ-उद-दौला के प्रसिद्ध दीवान महाराजा टिकैत राय ने कराया था, जबकि बख्शी का तालाब का संबंध नवाबी प्रशासन के उच्च पदस्थ ‘बख्शी’ पद से माना जाता है। इसी तरह हैदर कैनाल और उससे जुड़े जलाशय, तालकटोरा क्षेत्र तथा कई स्थानीय पोखर नवाबी दौर में जल प्रबंधन के साथ-साथ मुशायरों, कथक प्रस्तुतियों, मेलों और सामाजिक आयोजनों के स्थल रहे। अवध की गंगा-जमुनी तहज़ीब में ऐसे तालाब केवल पानी की संरचना नहीं थे, बल्कि दरबारी संस्कृति, लोककला और सार्वजनिक जीवन के साझा मंच भी थे। 

इसी परंपरा में ‘कथकों का तालाब’ जैसी जगहें विशेष महत्व रखती हैं, क्योंकि यहां जलाशय केवल संसाधन नहीं, बल्कि कला साधना, सांस्कृतिक विरासत और समुदाय की पहचान का हिस्सा बन जाता है।

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