लखनऊ के मोहनलाल गंज में पुरातात्विक स्थल हुलास खेड़ा से सटी करेला झील का आकार बीते डेढ़ दशकों में 207 हेक्टेयर से सिमट कर महज़ 9.39 हेक्टेयर रह गया है।
स्रोत : विकी कॉमंस
लखनऊ की झीलों की बात हो, तो अकसर शहर के बीच स्थित कठौता, झील, बटलर झील, मोती झील का नाम लिया जाता है। इसके अलावा शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर मोहनलाल गंज की करैला झील के बारे में कम ही लोग जानते हैं।
मोहनलाल गंज में सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े पुरातात्विक स्थल हुलास खेड़ा से सटी करेला झील, एक अत्यंत प्राचीन झील है। आकार में काफी विशाल यह झील पूरे दक्षिणी लखनऊ की जलापूर्ति के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक जलस्रोत साबित हो सकती है। पर, देखरेख और संरक्षण के अभाव में इसका विशाल स्वरूप सिमटता जा रहा है। मानवीय गतिविधियों के कारण यह दिन पर दिन सिकुड़ती जा रही है। इसके साथ ही इसका पारिस्थितिक तंत्र भी सिमटता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस झील का सही ढंग से संरक्षण किया जाए, तो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जलापूर्ति की समस्या काफी हद तक हल हो सकती है, क्योंकि अपनी विशाल जल भंडारण क्षमता के चलते यह झील एक बड़े आकार को पीने का पानी मुहैया करा सकती है।
हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोबोटनी (बीएसआईपी) के वैज्ञानिकों ने हुए एक शोध में यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि हुलास खेड़ा की करेला झील का सही ढंग से संरक्षण किया जाए, तो जलापूर्ति के लिए यह दक्षिणी लखनऊ क्षेत्र के लिए जीवन रेखा बन सकती है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि तेजी से बढ़ती आबादी और भूजल दोहन के कारण लखनऊ के कई हिस्सों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। ऐसे में करैला जैसी बड़ी प्राकृतिक झीलें भविष्य की जल सुरक्षा के लिए रणनीतिक महत्व रखती हैं। जल विशेषज्ञों का कहना है कि यदि झील से अतिक्रमण हटाकर उसकी मूल जलग्रहण क्षमता बहाल की जाए, गाद निकाली जाए और वर्षा जल को व्यवस्थित तरीके से इसमें पहुंचाया जाए, तो यह लाखों लीटर अतिरिक्त पानी संग्रहित कर सकती है। इससे न केवल भूजल रिचार्ज बढ़ेगा बल्कि दक्षिणी लखनऊ में पेयजल आपूर्ति पर पड़ने वाला दबाव भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।
करेला झील की आकृति धनुषाकार (Oxbow) है, जो साल दर साल सिकुड़ती जा रही है। यह झील भी सई नदी की धारा का हिस्सा थी, जो बाद में नदी का दयरा सिमटने के कारण उससे अलग हो गई। इसका क्षेत्रफल पहले काफी बड़ा था, लेकिन समय के साथ घट गया। साइंस जर्नल स्प्रिंग नेचर में 31 जनवरी 2025 को ‘Assessing long-term and multiple land use/land cover transitions in a freshwater tropical lake using geospatial tools-a case study from North India’ (भू-स्थानिक उपकरणों का उपयोग करके एक मीठे पानी की उष्णकटिबंधीय झील में दीर्घकालिक और बहुविध भूमि उपयोग/भूमि आवरण संक्रमणों का आकलन) शीर्षक से प्रकाशित शोध-पत्र (research paper) के मुताबिक बीते पांच दशकों में करेला झील का दायरा बहुत तेजी से सिमटता चला गया है। यह अध्ययन लखनऊ की बाबासाहब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी (BBAU) के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर वेंकटेश दत्ता और उनके सहयोगी राकेश सिंह कुशवाहा, दिव्या दुबे ने किया है। इस शोध में 1976 से 2024 तक के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण करके करेला झील के क्षेत्रफल में बदलाव का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में पाया गया कि झील का क्षेत्रफल 1976 में 207.30 हेक्टेयर था, जो 1985 में घटकर लगभग 151.87 हेक्टेयर रह गया। उसके बाद घटते-घटते 2024 में यह महज 19.39 हेक्टेयर रह गया, यानी इसमें लगभग 90% कमी आई है। हालांकि यह आकार मौसम और जलस्तर के अनुसार बदलता रहता है। बारिश के दिनों में इसका आकार लगभग 40 हेक्टेयर (100 एकड़) के आसपास तक हो जाता है। इस तरह पिछले पांच दशक में करेला झील का दायरा 90% तक सिमट गया है।
शोधकर्ताओं ने इन दीर्घकालिक परिवर्तनों का सटीक मानचित्रण करने के लिए अमेरिका के जासूसी उपग्रह कोरोना (1976), लैंडसैट (1985), सेंटिनल-2 (2011) और एयरबस (2024) से प्राप्त उपग्रह डेटा का उपयोग किया। इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि इस क्रमिक परिवर्तन ने झील के पारिस्थितिकी तंत्र को स्थायी रूप से नुकसान पहुंचाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अब भी करैला झील को अतिक्रमण और अवैध कब्जों से मुक्त कराकर इसका सही ढंग से संरक्षण किया जाए, तो यह दक्षिण लखनऊ के भूजल पुनर्भरण की जीवनरेखा बन सकती है।
साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित ज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक करैला झील के स्वरूप में कुछ इस प्रकार से बदलाव देखने को मिला है।
जलस्तर में गिरावट के कारण बीते दशकों में झील सूखती गई, जिसके कारण इसके आसपास की ज़मीनों पर अवैध कब्ज़े होते गए। पहले झील से लगी ज़मीनों पर खेती शुरू हुई। आगे चलकर इस पर प्रॉपर्टी डीलरों की कुदृष्टि इसपर पड़ी। ज़मीन के हिस्सों पर कब्जा कर इन्हें बेचा जाने लगा और प्लॉटिंग तक हुई। राज्य की राजधानी लखनऊ में ज़मीनों की तेज़ी से बढ़ती कीमतों के बीच औने-पौने दामों में बेची गई झील की इस अवैध कब्ज़े वाली ज़मीनों को लोगों ने हाथो-हाथ खरीद भी लिया। झील पर किए गए वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक 1976 से 2024 के बीच करेला झील के वेटलैंड क्षेत्र में 90.64% की कमी मुख्य रूप से अतिक्रमण, खेती के विस्तार, प्रदूषण और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण हुई। टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक झील के आसपास के इलाके में पिछले लगभग पाँच दशकों में निर्मित क्षेत्र 147% बढ़ गया। तेजी से हो रहे शहरी विस्तार और आवासीय निर्माणने झील के प्राकृतिक जलक्षेत्र को दबा दिया। अध्ययन के अनुसार जैसे-जैसे झील सूखती गई, उसका सूखा तल पहले कृषि भूमि में बदला और बाद में आवासीय प्लॉटिंग में बदलने लगा। इससे झील का प्राकृतिक पुनर्भरण तंत्र कमजोर हो गया। प्रोफेसर दत्ता के शोध में मार्कोव-चेन मॉडल से झील के भविष्य का अनुमान भी लगाया गया है। इसके अनुसार यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही तो 2040 तक झील और आसपास की आर्द्रभूमि पर और दबाव बढ़ने से लगभग 269 हेक्टेयर क्षेत्र और शहरी व कृषि उपयोग में बदल सकता है। अध्ययन बताता है कि झील के बचे हुए जलक्षेत्र में अब जलकुंभी (Water hyacinth) जैसे आक्रामक पौधे तेजी से फैल रहे हैं, जिससे झील की जलधारण क्षमता और जैव विविधता दोनों प्रभावित हो रही हैं। अध्ययन में कहा गया है कि एक दर्जन से अधिक आसपास के गांवों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत और पारिस्थितिक तंत्र का आधार रही करेला झील अब तेजी से खत्म होने की ओर बढ़ रही है। अगर समय रहते झील को बचाने के लिए उचित कदम नहीं उठाए गए, तो यह सदियों पुराना जल स्रोत पूरी तरह से नष्ट हो सकता है।
लखनऊ के Birbal Sahni Institute of Palaeosciences (बीएसआईपी) की डॉ. बिनिता फरटियाल और उनके साथी वैज्ञानिकों की टीम ने भी करेला झील और उसकी आर्दभूमि (वेटलैंड) के क्षेत्र का अध्ययन किया है। टीम ने झील के तलछट प्रोफाइल और जलग्रहण क्षेत्र के कटाव का अध्ययन करने पर पाया कि इस क्षेत्र में पिछले 6,000 वर्षों की अवधि में वर्षा के पैटर्न में भारी बदलाव आए हैं, जिसके कारण यहां समय-समय पर सूखा और बाढ़ व जलभराव की स्थितियां भी रही हैं। ज़ाहिर है कि ऐसा मानसून के उतार-चढ़ाव और इलाके की जलवायु में बदलाव जैसी वजहों के चलते हुआ है। अध्ययन के मुताबिक ऐसे प्राकृतिक कारणों को भले ही बदला न जा सकता हो, लेकिन अतिक्रमण, प्रदूषण और भूजल के अत्यधिक दोहन जैसी मानवीय गतिविधियों के चलते झील को हो रहे नुकसान को रोका जा सकता है।
फरटियाल के शोध में जलवायु परिवर्तन स्पष्ट रूप से सामने आया है और मानसूनी उतार-चढ़ाव से पता चलता है कि करेला झील कई बार सिकुड़ी और फैली। झील और उसके आसपास के क्षेत्र के तलछट की खुदाई करके किए गए अध्ययन से पता चलता है कि तलछट के दानों के आकार और खनिजों के विश्लेषण से पता चला कि झील के आसपास की ढलानों और जलग्रहण क्षेत्र से कटकर आने वाली मिट्टी लगातार झील में जमा होती रही। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि मानसून की तीव्रता बढ़ने पर कटाव और तलछट संचय दोनों बढ़ जाते थे। करीब 5400-3000 वर्ष पूर्व की अवधि में यहां बाढ़ का मैदान होने के कारण गाद का जमाव हुआ था। मध्य गंगा मैदान और इसके हिस्से हुलास खेड़ा में बड़े पैमाने पर मानव बसावट रही है, जिसके कारण स्थलाकृति पर मानवजनित प्रभाव पड़ा है। अपने शोध में हमने मानसून और सूखे की अवधियों का सत्यापन किया। तीव्र मानसून के दौरान, पर्वत के निकट बेसिन में काफी मात्रा में सामग्री आई और सूखे के दौरान वनस्पति सूख जाती थी, जबकि झील के जलग्रहण क्षेत्र में तलछट में मोटे कण जमा हो जाते थे। वैज्ञानिकों का मानना है कि नीति निर्माताओं को करेला झील का संरक्षण करते हुए इसपर किए गए अतिक्रमण और प्रदूषण पर अंकुश लगाना चाहिए, ताकि झील को को बचाया जा सके और इस इलाके के भूजल स्तर को सुधारा जा सके।
बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोबोटनी (बीएसआईपी) के वैज्ञानिक अध्ययन में करैला झील के तलछट की परतों का अध्ययन किया गया ।
कभी बाढ़ नियंत्रण में भी निभाती थी अहम भूमिका : करैला झील का एक महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित पक्ष शहरी बाढ़ नियंत्रण से जुड़ा है। मानसून के दौरान यह झील आसपास के जलग्रहण क्षेत्र से आने वाले अतिरिक्त पानी को अपने भीतर समाहित कर लेती थी। इससे निचले इलाकों में जलभराव की स्थिति कम होती थी। शहरीकरण और झील के सिकुड़ने के कारण अब वर्षा जल के लिए पर्याप्त प्राकृतिक भंडारण क्षेत्र नहीं बचा है। यही वजह है कि हाल के वर्षों में दक्षिणी लखनऊ के कई इलाकों में थोड़ी देर की तेज बारिश के बाद भी जलभराव देखने को मिलता है। विशेषज्ञों का कहना है कि झील का पुनर्जीवन केवल जल संरक्षण का नहीं, बल्कि शहरी बाढ़ प्रबंधन का भी महत्वपूर्ण उपाय हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि करैला झील केवल सतही जल का स्रोत नहीं है, बल्कि यह दक्षिणी लखनऊ के लिए एक महत्वपूर्ण भूजल रिचार्ज ज़ोन भी है। बरसात के दौरान झील में जमा होने वाला पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर आसपास के एक्वीफर (भूजल भंडार) को भरता है। इससे आशियाना, कानपुर रोड, एलडीए कॉलोनी, बिजनौर और सरोजनीनगर क्षेत्र में भूजल स्तर को बनाए रखने में मदद मिलती है। लेकिन झील का क्षेत्रफल घटने, तल में गाद जमने और अतिक्रमण बढ़ने से इसकी जल धारण क्षमता लगातार कम हो रही है। परिणामस्वरूप वर्षा का पानी भूजल में जाने के बजाय तेजी से बहकर निकल जाता है, जिससे क्षेत्र में जल संकट का खतरा बढ़ रहा है।
पिछले पांच दशकों में करेला झील के क्षेत्र में 90% तक की कमी आई है। अगर इस इस झील का संरक्षण किया जाए, तो यह लखनऊ के दक्षिणी भाग के लिए भविष्य में एक महत्वपूर्ण जल भंडार बन सकता है। मोहनलाल गंज क्षेत्र में कई झीलें थीं। पर, शहर के अन्य हिस्सों की तरह अनियंत्रित विकास, अतिक्रमण और अंधाधुंध भूजल दोहन के कारण ये झीलें सिकुड़ गईं या खत्म हो गईं। करेला झील भी खत्म होने की कगार पर पहुंच चुकी है। हालांकि, यदि इसे बचाने के उपाय किए जाएं, तो यह बाढ़ के पानी और सूखे के दौरान जल स्रोतों को भरने का एक अच्छा स्रोत बन सकती है।-प्रो. वेंकटेश दत्ता, विभागाध्यक्ष, पर्यावरण विज्ञान विभाग (BBAU)
करैला झील कभी अपने विशाल आकार के साथ विविधतापूर्ण पारिस्थितिक तंत्र से समृद्ध थी और यह प्रवासी पक्षियों का ठिकाना भी हुआ करती थी।
करैला झील केवल जल संसाधन नहीं बल्कि स्थानीय पारिस्थितिकी का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। सर्दियों के मौसम में यहां कई स्थानीय और प्रवासी पक्षियों का आगमन होता रहा है। झील के आसपास की आर्द्रभूमि विभिन्न प्रकार की मछलियों, उभयचरों और जलीय वनस्पतियों को आवास प्रदान करती है। झील का सिकुड़ना और प्रदूषण बढ़ना इस पूरी जैव विविधता के लिए खतरा बनता जा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि झील का संरक्षण किया जाए तो यह क्षेत्र शहरी जैव विविधता संरक्षण का एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकता है, साथ ही स्थानीय लोगों के लिए प्रकृति आधारित पर्यटन और पर्यावरण शिक्षा का केंद्र भी विकसित किया जा सकता है।
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