शहडोल के गांवों में पानी घट रहा है, हैंडपंप और कुएं कमजोर पड़ रहे हैं।
चित्र: Al Jazeera
गर्मियों की शुरुआत के साथ ही शहडोल के सेंदुरी-बैगाटोला गांव में कई हैंडपंपों में पानी की धार कमजोर पड़ने लगी थी। ग्रामीण जल संकट और मौसमी भूजल गिरावट को लेकर केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के मौसमी जलस्तर आकलन भी कई क्षेत्रों में मानसून के पहले पानी की कमी को दर्शाते हैं।
गांवों में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ रही थी और इसी बीच बिछापुरी कोयला खदान से जुड़े जल-संकट के दबाव की शिकायतें राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुंचीं।
इसके बाद NGT ने अल्ट्राटेक सीमेंट को निर्देश दिया कि वह खदान के आसपास के गांवों में भूजल रिचार्ज ढांचे विकसित करे और अतिरिक्त उपचारित पानी का इस्तेमाल स्थानीय जल जरूरतों के लिए सुनिश्चित करे।
यह मामला केवल एक औद्योगिक परियोजना या पर्यावरणीय आदेश भर नहीं है। यह उस बड़े संकट की ओर इशारा करता है, जहां भारत के कई खनन-प्रधान क्षेत्रों में भूजल धीरे-धीरे विकास की सबसे बड़ी कीमत बनता जा रहा है। भारत के खनन-प्रधान जिलों जैसे सिंगरौली, कोरबा और झारखंड के कोयला क्षेत्रों में भी समान भूजल दबाव दर्ज किया गया है
शहडोल जिला मध्य प्रदेश के उन क्षेत्रों में आता है जहां भूजल पर ग्रामीण निर्भरता बहुत अधिक है।
जनगणना 2011 के अनुसार शहडोल जिले में ST जनसंख्या लगभग 36 से 40 फ़ीसद के बीच दर्ज है, और ग्रामीण आबादी 80 फ़ीसद से ज़्यादा है। नतीजतन आजीविका कृषि, वन और जल संसाधनों पर आधारित रहती है।
भारत में जब भी खनन परियोजनाओं पर चर्चा होती है, तो आमतौर पर उसका ध्यान जंगल, धूल, विस्थापन और वायु प्रदूषण पर केंद्रित रहता है। लेकिन भूजल और स्थानीय जल प्रणालियों पर पड़ने वाला असर अक्सर पीछे छूट जाता है।
CGWB के राष्ट्रीय जल गुणवत्ता विश्लेषण में 700 से अधिक जिलों में से कई में नाइट्रेट 45 mg/L से अधिक और फ्लोराइड 1.5 mg/L से अधिक दर्ज किया गया है। खनन एवं औद्योगिक गतिविधियां इसके प्रमुख स्थानीय कारणों में शामिल हैं।
कई बार खदानों से लगातार पानी बाहर निकालने की प्रक्रिया आसपास के गांवों के हैंडपंप और कुओं पर भी असर डालती है। बिछापुरी कोयला खदान भी इसी व्यापक परिदृश्य का हिस्सा है।
IIT-ISM Dhanbad और CSIR-CIMFR के खनन-जल अध्ययनों के अनुसार ओपन-कास्ट खनन भूजल के प्राकृतिक प्रवाह और रिचार्ज जोन को बाधित कर सकता है।
ओपन-कास्ट खदानों में लगातार होने वाली डी-वॉटरिंग (खनन क्षेत्र से पानी बाहर निकालना) आसपास के कुओं और हैंडपंपों के जलस्तर को प्रभावित कर सकती है, जिससे स्थानीय जल उपलब्धता पर सीधा असर पड़ता है।
ग्लोबल सीमेंट की रिपोर्ट और बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, यह खदान लगभग 29 मिलियन टन निकालने योग्य भंडार (extractable reserves) वाली परियोजना है, जहां 2021 से खनन गतिविधियां शुरू हुईं।
कोयला और खनिज आधारित उद्योगों में पानी का उपयोग धूल नियंत्रण, प्रसंस्करण और संचालन के विभिन्न चरणों में बड़े पैमाने पर होता है।
विश्व बैंक और IFC के खनन एवं जल संसाधन दिशानिर्देश भी बताते हैं कि जल-गहन औद्योगिक गतिविधियां उन क्षेत्रों में अतिरिक्त दबाव पैदा करती हैं, जहां भूजल ही प्राथमिक स्रोत होता है।
CPCB की National Water Quality Monitoring Programme (NWMP) रिपोर्टों में खनन और औद्योगिक क्षेत्रों के कई जल नमूनों में गुणवत्ता मानकों से विचलन दर्ज किया गया है।
इनमें TDS, आयरन और अन्य घुले ठोस तत्वों का स्तर कई स्थानों पर मानक सीमा से अधिक पाया गया है।
हालांकि यह प्रभाव हर क्षेत्र में समान नहीं होता, लेकिन यह स्थानीय जल गुणवत्ता जोखिम की ओर संकेत करता है।
अब पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया में भूजल प्रभाव आकलन और जल बजटिंग को अधिक सख्ती से शामिल करने की मांग तेज हो रही है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परियोजना स्तर पर जल उपयोग और उसके दीर्घकालिक प्रभाव का वास्तविक मूल्यांकन किया जा सके।
NGT के केंद्रीय पीठ ने संयुक्त समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए यह निर्देश दिया कि परियोजना क्षेत्र के आसपास रिचार्ज ढांचे बनाए जाएं और अतिरिक्त उपचारित पानी का उपयोग गांवों की जल जरूरतों के लिए किया जाए।
सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से यह भी कहा गया कि रिचार्ज ढांचे बनाने और अतिरिक्त उपचारित पानी उपलब्ध कराने के लिए स्थानीय प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता होगी।
यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जवाबदेही के साथ-साथ जल पुनर्भरण को समाधान का हिस्सा बनाता है।
रिचार्ज ढांचे वे संरचनाएं होती हैं जिनका उद्देश्य बारिश या अतिरिक्त सतही जल को जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल स्तर को फिर से भरना होता है। इनमें चेक डैम, रिचार्ज गड्ढे, पर्कोलेशन टैंक और रिचार्ज ट्रेंच (खाइयाँ) शामिल हो सकते हैं।
CGWB के अनुसार भूजल रिचार्ज ढांचें स्थानीय जल स्तर को स्थिर करने में सहायक हो सकती हैं। लेकिन खनन-प्रभावित क्षेत्रों में उनकी प्रभावशीलता भूगर्भीय संरचना, मिट्टी की पारगम्यता और लगातार जल निकासी पर निर्भर करती है।
भारत में जल असुरक्षा से जूझ रहे कई इलाकों में अब भूजल रिचार्ज को लंबी अवधि वाला और टिकाऊ समाधान के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन खनन-प्रभावी क्षेत्रों में इसकी चुनौती अधिक जटिल होती है क्योंकि वहां भूगर्भीय संरचना पहले ही प्रभावित हो चुकी होती है।
दिलचस्प बात यह है कि अल्ट्राटेक सीमेंट अपनी सस्टेनेबिलिटी केस से जुड़े अध्ययनों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग और खदान जल पुनर्भरण परियोजनाओं का उल्लेख करता रहा है। कंपनी के नीमच स्थित विक्रम सीमेंट वर्क्स में माइन बेंच के जरिए वर्षाजल संचयन का मॉडल भी सामने रखा गया है, जहां लाखों घन मीटर पानी रिचार्ज करने का दावा किया गया।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसे सीएसआर और टिकाऊ दिखने वाले मॉडल खदानों के सबसे करीब स्थित गांवों तक वास्तव में जल सुरक्षा को पहुंचा पा रहे हैं?
NGT के आदेश में उपचारित खदान जल को गांवों की जरूरतों में उपयोग करने की बात कही गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पानी लंबे समय तक सुरक्षित माना जा सकता है।
खनन प्रभावित क्षेत्रों में जल गुणवत्ता को लेकर CPCB की निगरानी रिपोर्टें और WHO के पेयजल मानक यह संकेत देते हैं कि कई स्थानों पर TDS, आयरन, मैंगनीज़ और फ्लोराइड जैसे तत्व सुरक्षित सीमा के आसपास या उससे अधिक पाए जाते हैं।
यह स्थिति हर क्षेत्र में समान नहीं है, लेकिन यह स्थानीय स्तर पर जल गुणवत्ता जोखिम की एक स्पष्ट चेतावनी देती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बिना नियमित और सार्वजनिक जल गुणवत्ता निगरानी के, उपचारित खदान जल की सुरक्षा का आकलन मुश्किल है।
असली चुनौती तकनीक नहीं, बल्कि पारदर्शिता और लगातार निगरानी की है, जिसमें स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी जरूरी है।
खनन प्रभावित क्षेत्रों में जल संकट का असर सबसे अधिक उन ग्रामीण और आदिवासी समुदायों पर पड़ता है जिनकी आजीविका स्थानीय जल स्रोतों पर निर्भर होती है।
शहडोल और आसपास का इलाका आदिवासी बहुल क्षेत्र है। 2011 जनगणना के अनुसार शहडोल जिले में अनुसूचित जनजाति आबादी लगभग आधी से अधिक है। इसलिए यह क्षेत्र जल, वन और कृषि आधारित आजीविका पर अत्यधिक निर्भर बनता है। ऐसे में भूजल में मामूली गिरावट भी सीधे घरेलू उपयोग और खेती दोनों को प्रभावित करती है।
स्थानीय लोगों की शिकायतें भी इसी ओर इशारा करती हैं कि परियोजनाओं के बीच गांवों की बुनियादी जल जरूरतें पीछे छूट जाती हैं।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि गर्मियों के दौरान कई इलाकों में हैंडपंपों का जलस्तर पहले की तुलना में जल्दी नीचे चला जाता है। गांवों के लोगों के अनुसार, पानी की उपलब्धता में आए बदलाव ने घरेलू जरूरतों के साथ खेती और पशुपालन पर भी असर डाला है। हालांकि इन दावों के विस्तृत वैज्ञानिक सत्यापन की आवश्यकता बनी हुई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर जल असुरक्षा की भावना लगातार मजबूत हुई है।
भारत के सिंगरौली, कोरबा, अंगुल और बेल्लारी जैसे कई खनन-प्रभावी इलाक़ों में भी समय-समय पर इसी तरह के सवाल उठते रहे हैं कि विकास की कीमत आखिर कौन चुका रहा है।
नीति आयोग की Composite Water Management Index (CWMI) रिपोर्ट के अनुसार भारत के कई राज्य उच्च जल तनाव की स्थिति में हैं। यह स्थिति खनन-प्रधान जिलों में जल संकट की संवेदनशीलता को और बढ़ा देती है।
सिंगरौली, कोरबा और झारखंड के कई खनन क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों और शोध अध्ययनों ने भूजल भंडार में गिरावट तथा जल गुणवत्ता में बदलाव की ओर संकेत किया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि खनन परियोजनाओं के संचयी भूजल प्रभाव का आकलन नहीं किया गया, तो आने वाले सालों में जल संघर्ष और तेज हो सकते हैं।
भारत में पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया में जल प्रबंधन योजनाएं शामिल हैं, लेकिन भूजल प्रभाव आकलन अब भी सबसे कमजोर हिस्सों में से एक माना जाता है। अक्सर परियोजनाओं में जल दोहन, रिचार्ज क्षमता और संचयी भूजल दबाव का पूरा मूल्यांकन नहीं हो पाता।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की सभी खनन और औद्योगिक गतिविधियों के संयुक्त जल प्रभाव का आकलन जरूरी है। लेकिन मौजूदा मंजूरी प्रणाली में यह कुल प्रभाव अभी भी सीमित रूप से ही शामिल होता है।
यही कारण है कि कई बार परियोजनाएं शुरू होने के कुछ सालों बाद पानी की कमी स्थानीय संघर्ष का रूप लेने लगता है।
NGT का हालिया आदेश इस बात का संकेत है कि अब निगरानी करने वाली संस्थाएं भी “खनन के बाद पानी संबंधी ज़िम्मेदारियों” पर अधिक ध्यान देने लगी हैं।
आज कई बड़ी कंपनियां खुद को “जल-सकारात्मक” या “पानी बचाने वाली” संस्थाओं के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इसके तहत वे वर्षाजल संचयन, छोटे बांध और भूजल रिचार्ज जैसी परियोजनाओं को अपने पर्यावरणीय दायित्व का हिस्सा बताती हैं।
कंपनियों के अनुसार वे जितना पानी उपयोग करती हैं, उतना या उससे अधिक पानी भूजल प्रणाली में वापस जोड़ने का प्रयास करती हैं, हालांकि इन दावों का स्वतंत्र मूल्यांकन अक्सर सीमित होता है।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन दावों की असली परीक्षा रिपोर्टों में नहीं, बल्कि जमीन पर इस तथ्य से होती है कि क्या खदानों के आसपास बसे गांवों में सचमुच पानी की उपलब्धता बेहतर हुई है या नहीं।
भारत की ऊर्जा और निर्माण अर्थव्यवस्था में कोयला और सीमेंट उद्योग अभी भी केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन, जल संकट और पारिस्थितिक तनाव के इस दौर में अब विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल उत्पादन क्षमता से नहीं किया जा सकता।
बिछापुरी का मामला इस बात की याद दिलाता है कि भूजल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि ग्रामीण जीवन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता की बुनियाद है।
यदि माइनिंग प्रशासन में जल सुरक्षा को केंद्र में नहीं रखा गया, तो आने वाले वर्षों में ऐसे संघर्ष और बढ़ सकते हैं।
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