दुनिया भर में ज़मीन के नीचे भूजल के कई बड़े भंडार मौजूद हैं, जिनमें पीने लायक मीठा पानी मौजूद है। पर, इनके दोहन में धैर्य और सावधानी बरतने की ज़रूरत है, वर्ना यह जल्‍द ही खत्‍म हो सकते हैं। 

 

स्रोत : विकी कॉमंस

भूजल

धरती पर मिला मीठे पानी का नया भूमिगत भंडार

अमेरिका के यूटा राज्य में स्थित ग्रेट सॉल्ट लेक के नीचे मीठे पानी का विशाल भंडार होने के संकेत मिले हैं। उपग्रह चित्रों और फील्ड रिसर्च के मुताबिक झील के किनारों पर सरकंडों से ढके गोलाकार टीले के नीचे करीब लगभग 1100 ट्रिलियन लीटर मीठा भूजल मौजूद है, जो सतह की ओर रास्ता बना रहा है।

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

22 मार्च को अंतरराष्ट्रीय जल दिवस पर दुनिया भर में जल संकट, घटते भूजल स्तर, सूखती नदियों और प्रदूषण जैसे मुद्दों पर चर्चाएं होती हैं। लगातार गिरते भूजल स्‍तर, जल प्रदूषण और ग्‍लोबल वॉर्मिंग के कारण पिघलते जलस्‍तर व महासागरों के बढ़ते जल स्‍तर जैसी चीजों पर गंभीर चिंता जताई जाती हैं। इसकी वजह यह है कि हमारी धरती पर पानी का संतुलन बहुत नाज़ुक दौर से गुज़र रहा है। यूं तो हमारी धरती का करीब तीन चौथाइ हिस्‍सा महासागरों के रूप में पानी से भरा हुआ है, पर पृथ्‍वी पर मौजूद पानी का करीब 97% हिस्सा खारा है और केवल लगभग 3% पानी ही मीठा यानी पीने लायक है। इसमें से भी अधिकांश बर्फ या गहरे भूजल के रूप में है। ऐसे चिंताजनक माहौल में हाल की नासा के वैज्ञानिकों द्वारा धरती पर मीठे पानी के एक बड़े भंडार की खोज नई उम्मीद जगाती है। वैज्ञानिकों ने दुनिया की सबसे बड़ी खारी झीलों में से एक अमेरिका की ग्रेट सॉल्ट लेक के नीचे मीठे पानी के विशाल भंडार के संकेत पाए हैं। यह खोज केवल एक भूगर्भीय रहस्य नहीं, बल्कि जल संसाधनों की समझ, जल प्रबंधन की रणनीतियों और भविष्य की जल सुरक्षा के लिए एक नई दिशा भी दिखाती है।

ग्रेट सॉल्ट लेक : खारेपन के बीच मीठे पानी का खज़ाना 

अमेरिका के यूटा राज्य में स्थित ग्रेट सॉल्ट लेक अपनी अत्यधिक लवणता (खारेपन) के लिए प्रसिद्ध है। इसलिए यह झील स्थानीय अर्थव्यवस्था, प्रवासी पक्षियों और खनिज उद्योग के लिए भी बेहद अहम है। साथ ही यह पर्यावरणीय दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है। हालांकि पिछले कुछ दशकों में झील का जल स्तर लगातार घट रहा है। सूखा, जल मोड़ (diversion), और जलवायु परिवर्तन जैसे कारणों से झील सिकुड़ती गई। इसके परिणामस्वरूप झील के तल के कई हिस्से उजागर हो गए। यही उजागर हुए क्षेत्र वैज्ञानिकों के लिए एक नई खोज का द्वार बने।उपग्रह चित्रों और फील्ड रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने झील के किनारों पर सरकंडों से ढके गोलाकार टीले (mounds) देखे। आगे के अध्ययन से पता चला कि ये टीले वास्तव में उन स्थानों को दर्शाते हैं जहां दबावयुक्त मीठा भूजल सतह की ओर रास्ता बनाता है।

हजारों वर्षों में बना मीठे पानी का यह भंडार

अमेरिकी स्‍पेस एजेंसी नासा की रिपोर्ट के मुताबिक भूवैज्ञानिकों का मानना है कि यह मीठा पानी हजारों वर्षों में बना है। आसपास के पहाड़ों से आने वाली बर्फ के पिघलने से पानी धीरे-धीरे मिट्टी और अवसादों की परतों में रिसता गया और गहराई में जमा होता रहा। इस पानी के ऊपर लगभग 30 फीट मोटी नमक की परत है, जो इसे सतह पर आने से रोकती है। यही कारण है कि इतना बड़ा जल भंडार लंबे समय तक वैज्ञानिकों की नजर से ओझल रहा। लेकिन, जहां-जहां प्राकृतिक दरारें या खुले रास्ते बने, वहां यह मीठा पानी ऊपर की ओर दबाव बनाते हुए छोटे द्वीप जैसे टीले बनाता दिखाई दिया। वै‍ज्ञानिकों द्वारा की गई मीठे पानी के विशाल भूमिगत भंडार की यह खोज इस धारणा को चुनौती देती है कि खारी झीलों के नीचे केवल खारा या अत्यधिक खनिज युक्त पानी ही होता है।

उपग्रह चित्रों और रिमोट सेंसिंग तकनीक से खुला रहस्य

इस खोज में आधुनिक रिमोट सेंसिंग तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। नासा के लैंडसैट उपग्रहों से ली गई तस्वीरों ने झील के बदलते जल स्तर और नए उभरे भू-आकृतिक पैटर्न को दर्ज किया। जैसे-जैसे पानी घटा, झील के तल के कई हिस्सों में सरकंडों से ढके गोलाकार उभार दिखाई देने लगे। वैज्ञानिकों ने इन्हें संभावित जल स्रोत मानकर विस्तृत अध्ययन शुरू किया। नासा के अनुसार, ये टीले वास्तव में मीठे पानी के उन झरनों का संकेत हैं जो सीधे झील के बेसिन में प्रवेश करते हैं। इस तरह अंतरिक्ष से मिली जानकारी और जमीन पर किए गए परीक्षणों ने मिलकर धरती की गहराई में मौजूद मीठे पानी के विशाल भंडार के इस भूगर्भीय रहस्य को उजागर किया।

न्यूयॉर्क शहर की 800 साल की जरूरत जितना पानी
वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार समुद्र तल के नीचे मिला मीठे पानी का यह विशाल भंडार इतना बड़ा हो सकता है कि सैद्धांतिक रूप से यह New York City जैसे महानगर की करीब 800 साल की जल जरूरत पूरी कर सके। न्यूयॉर्क में रोजाना लगभग 1 अरब गैलन (करीब 3.8 अरब लीटर) पानी की खपत होती है। इस आधार पर देखा जाए तो इस भूमिगत भंडार में संभावित रूप से करीब 1100 ट्रिलियन लीटर (2.9 × 10¹⁴ गैलन) मीठा पानी मौजूद हो सकता है।

अमेरिकी अं‍तरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा ग्रेट सॉल्‍ट लेक के उस हिस्‍से का चित्र, जहां भूमिगत मीठे भूजल भंडार होने के संकेत मिले हैं। 

भूजल विज्ञान के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज

यह खोज केवल अमेरिका और उसके यूटा राज्‍य के लिए  एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि भूमिगत जल भंडार की यह खोज भूजल विज्ञान (hydrogeology) के कई स्थापित सिद्धांतों को नए सिरे से देखने का अवसर देती है। यह दिखाती है कि खारे जलाशयों के नीचे भी विशाल मीठे जल भंडार हो सकते हैं। साथ ही यह बताती है कि भूजल की आवाजाही (groundwater flow) अपेक्षा से कहीं अधिक जटिल है। तीसरे, यह इस बात का भी संकेत देती है कि जलवायु परिवर्तन और मानव गतिविधियों से उजागर हो रहे भूभागों में ऐसे छिपे संसाधन मिल सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के भंडार दुनिया के अन्य शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में भी मौजूद हो सकते हैं, जिन्हें अब तक खोजा नहीं गया है।

क्या यह पानी उपयोग के लिए उपलब्ध हो सकता है?

इतने बड़े जलभंडार की खोज के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या इस मीठे पानी का उपयोग मानव जरूरतों के लिए किया जा सकता है? फिलहाल, वैज्ञानिक इले लेकर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। क्योंकि, यह पानी बहुत गहराई में है और उसकी गुणवत्ता, मात्रा तथा रिचार्ज दर (recharge rate) को समझना अभी बाकी है। ऐसे में अगर इसके दोहन में जल्‍दबाज़ी की गई या इस पानी का अत्यधिक दोहन किया गया, तो झील के पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए, वैज्ञानिक इसे एक तात्‍का‍लिक समाधान की बजाय भविष्य की जल सुरक्षा के संभावित स्रोत के रूप में देखने की बात कह रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन और सूखती झीलों के बीच नई उम्मीद

दिलचस्प बात यह है कि यह महत्वपूर्ण खोज उस समय सामने आई जब ग्रेट सॉल्‍ट लेक स्वयं गंभीर जल संकट से गुजर रही है। पिछले कई दशकों में झील में आने वाले जल प्रवाह में लगातार कमी दर्ज की गई है, जिसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। तेजी से बढ़ती सिंचाई जरूरतें, शहरी विस्तार, नदियों के जल का मोड़ और जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते वर्षा-बर्फबारी के पैटर्न। इन सबके चलते झील का जल स्तर ऐतिहासिक रूप से निम्न स्तर तक पहुंच गया और इसका क्षेत्रफल भी काफी सिमट गया। हालांकि इस संकट का एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया। जैसे-जैसे पानी पीछे हटा, झील के तल के बड़े हिस्से उजागर हुए, जिससे वैज्ञानिकों को वहां की भूगर्भीय परतों, जलभृद (एक्‍वीफर) संरचनाओं और जल प्रवाह के रास्तों को समझने का दुर्लभ अवसर मिला। यही परिस्थितियां मीठे भूजल के संभावित स्रोतों की पहचान में सहायक बनीं। इस तरह, जलवायु संकट के बीच यह खोज भविष्य के जल संसाधन अनुसंधान के लिए नई उम्मीद और दिशा दोनों प्रस्तुत करती है।

धरती के पानी में सिर्फ 0.5% ही सीधे इस्‍तेमाल के लायक
वैश्विक जल आंकड़ों के अनुसार पृथ्वी पर मौजूद कुल पानी का लगभग 97% हिस्सा खारा है, जबकि करीब 3% ही मीठा पानी है। लेकिन इसमें से भी अधिकांश बर्फ, ग्लेशियर या गहरे भूजल के रूप में बंद है। विशेषज्ञों के अनुसार मानव उपयोग के लिए कुल वैश्विक जल का लगभग 0.5% से भी कम हिस्सा ही आसानी से उपलब्ध है। ऐसे में भूमिगत छिपे मीठे जल भंडारों की खोज को भविष्य की जल सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यूटा प्रांत स्थित ग्रेट साल्‍ट लेक में पानी की कमी होने पर उभरे टीलों के ऊपर लहलहाती जंगली घास की हरियाली टीले के नीचे मीठे पानी के भंडार की मौजूदगी का संकेत दे रही है। 

पारिस्थितिक तंत्र के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत

मीठे पानी के इन संभावित स्रोतों का महत्व केवल मानव उपयोग की दृष्टि से नहीं, बल्कि झील के पूरे पारिस्थितिक तंत्र के लिए भी अत्यंत अहम माना जा रहा है। अत्यधिक लवणता वाले जल में जीवित रहने वाले सूक्ष्मजीव, शैवाल और ब्राइन श्रिम्प जैसे जीव इस झील की खाद्य शृंखला की नींव हैं। इन पर निर्भर लाखों प्रवासी पक्षी हर वर्ष यहां आते हैं। ऐसे में यदि झील के भीतर या किनारों पर मीठे पानी के छोटे-छोटे स्रोत मौजूद हैं, तो वे स्थानीय स्तर पर जीवन-अनुकूल सूक्ष्म आवास (micro-habitats) बना सकते हैं। इससे जैव विविधता को सहारा मिल सकता है और कुछ प्रजातियों के लिए यह कठिन परिस्थितियों में जीवनरेखा साबित हो सकता है। इसके अलावा, मीठे और खारे पानी के मिश्रण से झील की रासायनिक संरचना, पोषक तत्वों का चक्र और तलछट की गतिशीलता भी प्रभावित हो सकती है। लंबे समय में इससे पारिस्थितिक संतुलन और झील की पुनर्जीवन क्षमता पर सकारात्मक या जटिल प्रभाव पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

वैश्विक जल नीति पर पड़ सकता है असर

इस तरह की खोजें केवल वैज्ञानिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वैश्विक जल नीति और संसाधन प्रबंधन की सोच को भी प्रभावित करती हैं। दुनिया के कई हिस्से, विशेषकर शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं, जहां पारंपरिक जल स्रोत तेजी से दबाव में हैं। ऐसे में गहरे भूजल भंडारों की पहचान, उनकी वैज्ञानिक मैपिंग और दीर्घकालिक निगरानी भविष्य की जल सुरक्षा रणनीतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जल नीति को अब बहु-स्तरीय दृष्टिकोण अपनाना होगा, जिसमें सतही जल, वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण यानी वेस्‍ट वाटर रीसाकलिंग के साथ-साथ भूगर्भीय जल संसाधनों का सतत उपयोग भी शामिल हो। साथ ही, इन संसाधनों के अनियंत्रित दोहन से बचने के लिए सख्त नियामक ढांचे और पर्यावरणीय आकलन जरूरी होंगे। इस खोज ने यह संकेत दिया है कि धरती के भीतर छिपे जल भंडार भविष्य की जल योजनाओं में नई संभावनाएं और नई जिम्मेदारियां, दोनों लेकर आ सकते हैं।

इस खोज की सबसे बड़ी सीख यह है कि आधुनिक विज्ञान अब बहु-विषयक हो चुका है। यहां भूगर्भ विज्ञान, उपग्रह तकनीक, जलवायु विज्ञान और पारिस्थितिकी, सभी ने मिलकर काम किया। यूनिवर्सिटी ऑफ यूटा, यूएस जियोलॉजिकल सर्वे और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिक मिलकर इस प्रणाली का अध्ययन कर रहे हैं, ताकि इसके आकार, प्रवाह और भविष्य की संभावनाओं को बेहतर समझा जा सके।

दुनिया में भूजल का सबसे ज्‍यादा इस्‍तेमाल हो रहा भारत में
भारत दुनिया में सबसे अधिक भूजल उपयोग करने वाला देश है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार भारत हर साल लगभग 250–260 घन किलोमीटर (यानी करीब 2.5–2.6 × 10¹⁴ लीटर) भूजल निकालता है, जो अमेरिका और चीन के कुल भूजल उपयोग से भी ज्यादा माना जाता है। देश की करीब 60% सिंचाई और 85% पेयजल जरूरतें भूजल पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि भविष्य में शुष्क क्षेत्रों या पुराने झील बेसिनों के नीचे नए मीठे जल भंडारों की वैज्ञानिक पहचान हो पाती है, तो यह भारत की जल सुरक्षा रणनीति के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

बारिश और सतही जल स्रोतों से पानी ज़मीन के भीतर रिस कर पहुंचने से कुछ इस तरह बनते हैं भूमिगत भूजल भंडार। 

क्या भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में भी मिल सकते हैं ऐसे भंडार?

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि शुष्क क्षेत्रों, पुराने झील बेसिनों और तटीय खारे जलाशयों के नीचे ऐसे छिपे जल भंडार मिल सकते हैं। उदाहरण के तौर पर, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और भारत सहित एशिया के कई हिस्सों में प्राचीन झीलों के अवशेष मौजूद हैं, जहां भूगर्भीय परिस्थितियां इस तरह के जल संचयन के लिए अनुकूल हो सकती हैं। यदि इनकी वैज्ञानिक मैपिंग की जाए तो वैश्विक जल संकट को कम करने में बड़ी मदद मिल सकती है। 

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों, पुराने झील बेसिनों तथा तटीय खारे जलाशयों के नीचे ऐसे छिपे मीठे जल भंडार मिलना असंभव नहीं है। भारत जैसे भूगर्भीय रूप से विविध देश में भी इसकी संभावनाएं जताई जाती हैं। उदाहरण के तौर पर राजस्थान का थार मरुस्थल और कच्छ का रण जैसे क्षेत्र प्राचीन समुद्री और झीलनुमा भू-आकृतिक इतिहास से जुड़े माने जाते हैं, जहां गहराई में बंद भूजल परतों (confined aquifers) के संकेत पहले भी अध्ययन में सामने आए हैं। इसी तरह तटीय राज्यों, जैसे तमिलनाडु और ओडिशा में खारे और मीठे जल के जटिल भूजल तंत्र पर कई वैज्ञानिक सर्वे हो चुके हैं, जो बताते हैं कि समुद्र के समीप भी मीठे जल की परतें मौजूद रह सकती हैं।

भारत में केंद्रीय भूजल बोर्ड और विभिन्न शोध संस्थान उपग्रह आधारित मैपिंग, भू-भौतिकीय सर्वे और आइसोटोप अध्ययन के जरिए ऐसे संभावित जल भंडारों की पहचान की दिशा में काम कर रहे हैं। यदि इन प्रयासों को और व्यवस्थित व दीर्घकालिक बनाया जाए, तो न केवल जल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों को राहत मिल सकती है, बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा योजनाओं के लिए एक मजबूत वैज्ञानिक आधार भी तैयार हो सकता है।

निष्कर्ष : उम्मीद की कहानी, लेकिन जिम्मेदारी भी

ग्रेट सॉल्ट लेक के नीचे मीठे पानी का यह संभावित विशाल भंडार जल संकट के दौर में उम्मीद की कहानी जरूर है। लेकिन, यह हमें एक चेतावनी भी देता है कि प्रकृति के संसाधन सीमित हैं और उनका दोहन सोच-समझकर करना होगा। अंतरराष्ट्रीय जल दिवस पर यह खोज हमें यह संदेश देती है कि जल संकट की कहानी केवल नकारात्मक नहीं है। विज्ञान, तकनीक और सतत प्रबंधन के जरिए हम नए समाधान खोज सकते हैं। धरती के भीतर छिपे ये जल भंडार हमें यह याद दिलाते हैं कि उम्मीद हमेशा मौजूद रहती है। जरूरत है उसे खोजने, समझने और जिम्मेदारी से उपयोग करने की।

इसके साथ ही यह खोज हमें यह भी सिखाती है कि जल प्रबंधन केवल संकट की प्रतिक्रिया नहीं होना चाहिए, बल्कि संसाधनों की खोज और संरक्षण की सक्रिय प्रक्रिया होनी चाहिए। वर्षा जल संचयन, जल पुनर्चक्रण और पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन के साथ-साथ भूगर्भीय खोज और वैज्ञानिक अनुसंधान भी उतने ही जरूरी हैं।

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