भारत की कृषि व्यवस्था के केंद्र में स्थित हरियाणा वह जगह है, जहाँ सरकारी सहायता का सामना ज़मीन, पानी और खेती के लंबे और उतार-चढ़ाव भरे इतिहास से होता है।
फोटो - वंशिका सिंह
ग्रामीण भारत में सोलर पंपों को एक तरह की ‘खामोश क्रांति’ के रूप में देखा जा रहा है। इन्हें क्लीन एनर्जी से चलने वाला समाधान बताया जा रहा है। साथ ही किसानों पर बढ़ते आर्थिक बोझ को कम करने की कुंजी के रूप में देखा जा रहा है… लेकिन हरियाणा में मुफ्त की धूप से पानी की कीमत दिन प्रति दिन बढ़ रही है, क्योंकि सोलर पंपों के कारण यहां के तमाम इलाकों में जल संकट गहरा रहा है। खास बात यह है कि यहां के अधिकांश किसान आने वाले संकट से अपरिचित हैं।
हरियाणा वो राज्य है जहां जितना भूजल रिचार्ज होता है उसका 136 प्रतिशत पानी खेती व अन्य कार्यों के लिए निकाल लिया जाता है। ऐसे में किसानों के सामने कई सारी समस्याएं खड़ी हैं। पहले तो पानी नहीं, अगर भूजल को सिंचाई में इस्तेमाल करना है तो पंप चलाने के लिए बिजली चाहिए। शहरों में बढ़ती डिमांड के कारण राज्य के ग्रामीण इलाकों में पहले ही बिजली का संकट बरकरार है। डीजल भरवाने के लिए हर रोज मोटी रकम चाहिए।
हरियाणा के भालौत में लगाए गए एक छोटे ग्रिड से संचालित 5 हॉर्सपावर का सोलर पंप।
ऐसे में सोलर पंप ही हैं जो किसानों का एक सहारा बनकर उभरे हैं। कहा जा रहा है कि इससे किसानों का खर्च घटेगा और खेती में मदद मिलेगी।
अनियमित बिजली आपूर्ति की समस्या के बीच भी ये सोलर पंप निरंतर कार्य करते हैं। डीजल की कीमत अब ऊपर जाये चाहे नीचे गिरे कोई फर्क नहीं पड़ता। सिंचाई को लेकर बनी अनिश्चितता कम करने में इसे बेहतरीन उपाय के रूप में देखा जा रहा है।
पानी को लेकर किसानों की जद्दोजहद में सरकार के सहयोग की बात करें तो प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) जैसी योजनाओं के जरिए सौर ऊर्जा को बढ़ावा दिया जा रहा है। हरियाणा रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी (हरेडा) जैसी राज्य एजेंसियां भी इसमें अपनी भूमिका निभा रही हैं। इन पहलों के तहत सौर ऊर्जा को खेती के लिए हरित और ग्रामीण आजीविका के लिए मददगार तरीका बताया गया है।
कागज पर देखने पर यह सब बहुत ही सीधा और सरल लगता है। इन योजनाओं का उद्देश्य है कि जीवाश्म ईंधन की जगह किसान सूरज की रोशनी का इस्तेमाल करें, जिससे उनकी जेब पर पड़ने वाले दबाव में कमी आए और सिंचाई तक उनकी पहुंच बढ़े।
जल-संकट से जूझ रहे हरियाणा जैसे क्षेत्रों में यह बदलाव उस जमीन पर हो रहा है, जहां दशकों से भूजल के अतिदोहन की वजह से क्षेत्र के एक्विफर दम तोड़ रहे हैं। यहां सिंचाई केवल एक तकनीकी काम नहीं है बल्कि यह किसानों का बिजली और उनके खेतों के नीचे मौजूद भूजल के बीच एक गहरा रिश्ता है।
सालों तक सस्ती और अक्सर बाधित ग्रिड बिजली मिलने के कारण किसानों में बिजली मिलते ही लंबे समय तक पंप चलाने की आदत पड़ गई। नतीजतन, धीरे-धीरे जरूरत से ज्यादा पानी निकालना खेती के रोजमर्रा के काम का हिस्सा बन गया।
इस दौरान भूजल का स्तर लगातार कम होता चला गया। भले ही किसानों ने खेती के तरीक़ों को भी पानी की कमी और अनुपलब्धता के अनुसार ढालना शुरू कर दिया, लेकिन मूल समस्या जस की तस बनी रही। ऐसी परिस्थिति में सोलर पंप केवल एक तटस्थ और दृढ़ तकनीकी विकल्प भर नहीं हैं बल्कि उनमें पानी के निकालने के तरीके और समय दोनों को बदल देने की क्षमता भी है।
धीरे-धीरे ईंधन का खर्च और समय की पाबंदी कम होने से सोलर सिंचाई पंप चलाना सस्ता और आसान हो गया है। और देखते ही देखते गॉंव-गॉंव में सोलर पंप पहुंच गए। ऐसे में इसके इस्तेमाल के तरीके और मात्रा पर बहुत अधिक ध्यान भी नहीं जाता है, खासकर उन इलाकों में जहां भूजल पर पहले से ही दबाव बहुत है। इन जगहों पर बदलाव भूजल पर निर्भरता में नहीं, बल्कि इसे आसानी से इस्तेमाल करने के तरीके में आया है।
सिंचाई के लिए अब समय की पाबंदी नहीं
पीएम-कुसुम योजना के तहत सोलर पंप की कुल लागत का 25 प्रतिशत हिस्सा किसान को देना होता है। वहीं खर्च के 30 प्रतिशत हिस्से की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की और 45 प्रतिशत हिस्से की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है। आम तौर पर 5 हॉर्सपावर के एक सोलर पंप की कीमत 2.5 से 3 लाख रुपये के बीच होती है।
ऐसे में किसान को शुरु में ही 60,000 से 75,000 रुपये तक चुकाने होते हैं, जो छोटी जोत वाले किसानों के लिए छोटी रकम नहीं है। 3 से 10 हॉर्सपावर तक के पंपों के लिए यही शुरुआती योगदान 58,750 रुपये से लेकर 83,250 रुपये तक होता है।
सरकार किसानों के बीच बढ़ती मांग और गॉंव-गॉंव में लग रहे सोलर पंपों की संख्या को इस योजना की सफलता के रूप में देखते हैं। सफलता को अब भी ज्यादातर गिनती, इंस्टॉलेशन और जोड़े गए मेगावाट के आधार पर आंका जा रहा है। इस प्रक्रिया में पानी के इस्तेमाल में सोलर पंपिंग की भूमिका, जमीन से जुड़े रिश्तों पर इसके पड़ने वाले असर, और भूजल को लेकर नियम-कायदों और देखरेख की दिशा जैसे सवाल अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं।
क्या सोलर पंपिंग को एक ऐसी तकनीक के रूप में देखा जा सकता है, जो उस पारिस्थितिक और राजनीतिक इतिहास से अलग हो, जिसमें इसे लाया जा रहा है? कृषि विशेषज्ञ डॉ. गुरु कोप्पा का कहना है कि, उत्तर-पश्चिम भारत वह इलाका है जहां एक समय में बिजली लगभग 24 घंटे उपलब्ध रहती थी।
दशकों तक दी गई सस्ती बिजली ने खेती और जमीन के नीचे मौजूद भूजल के बीच एक गहरे रिश्ते को स्थापित कर दिया। लगातार पंप चलने से भूजल भंडार खाली होते चले गए और खेती का जोखिम बढ़ता गया। सस्ती और पर्याप्त मात्रा में मिलने वाली बिजली के कारण भूजल का दुरुपयोग एक आदत बन गई और इसका अति दोहन कोई अपवाद न रहकर खेती के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गया।
इस चलन के आम बनने का एक बड़ा कारण यह भी था कि किसान कृषि फीडरों से जुड़े बिजली चालित पंपों पर निर्भर थे। इन फ़ीडरों में तय समय पर बिजली मिलने की कोई गारंटी नहीं होती थी। बिजली कभी भी आ जाती थी, अक्सर देर रात या फिर बहुत कम समय के लिए।
इस हालात से निपटने के लिए किसान बिजली मिलते ही पंप को लंबे समय तक चलाए रखते थे। नतीजतन, जरूरत से ज्यादा पानी निकालना रोज की सिंचाई का हिस्सा बन गया। समय के साथ यह आदत खेती की लय में शामिल हो गई, जबकि भूजल का स्तर लगातार नीचे जाता रहा।
कुछ इस तरह लगाये जाते हैं सोलर पैनल
भूजल दोहन का यह इतिहास इलाके के लोक-हास्य में भी दिखाई देता है। हरियाणा के कबड्डी मैदानों में अक्सर ही “तुमने एक-एक बूंद पानी जमा कर लिया, अब जो बचा है उसके लिए तो सबमर्सिबल चलाना पड़ेगा” जैसे तंज सुनाई देते हैं। और इस तंज को सुनकर लोग इसलिए हंसते हैं क्योंकि उन्हें इसके पीछे की मानसिकता समझ में आती है। यह बात सब जानते हैं कि पानी निकाल पाने की क्षमता अपने आप में ताकत का संकेत है। इसका संबंध केवल तकनीक से नहीं है, बल्कि यह पहुंच, नियंत्रण और खेती की राजनीति से गहराई से जुड़ी हुई है।
पहले से ही पानी का संकट झेल रहे इस क्षेत्र में सोलर पंप का आना आज खुशी दे सकता है, लेकिन भविष्य इसके कई सारे दुष्परिणाम हो सकते हैं। सोलर से 24 घंटे बिजली का उपलब्ध होने की वजह से पंप को दिन भर चलाने की आदत और जमीन की गहराई में बोरिंग करने वाली मशीनें आने वाले समय में भूजल के संकट को और बढ़ा देंगे।
डीजल पंपों में जहां प्रति दिन 200 से 500 रुपए का खर्च आता था अब सोलर की वजह से ईंधन पर खर्च नहीं होता है, और ग्रिड बिजली की तरह न तो लोडशेडिंग की समस्या है और न ही तय समय पर बिजली मिलने की मजबूरी। इस कारण किसानों के पास लगातार पंप चलाने की सुविधा है। जहां भूजल पर दबाव पहले से ही बहुत ज्यादा है। ऐसे में किसानों को बहुत सूझ-बूझ से काम लेना होगा।
पीएम-कुसुम योजना के तहत खेती में सौर ऊर्जा के उपयोग को विस्तार देने के लिए तीन तरीक़ों को केंद्र में रखा गया है। इनमें से एक तरीक़े में ख़ाली, बेकार या अनुपजाऊ ज़मीन का इस्तेमाल सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए किए जाने की बात है। हालांकि इस तरीक़े की मुश्किल यह है कि इससे ज़मीन के इस्तेमाल और उसके मालिकाना हक़ का मुद्दा दोनों जटिल हो जाता है।
मालिकाना हक़ से जुड़े मामले जैसलमेर जैसे इलाक़ों में देखे गये हैं, जहां गांव वालों ने ऐसी ही ज़मीनों पर 1,500 मेगावाट के पावर प्लांट के प्रस्ताव का पुरज़ोर विरोध किया है। सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देने वाले बाक़ी के दो तरीक़ों का सीधा संबंध पानी से है। इन तरीक़ों में से एक में ऑफ-ग्रिड किसानों को डीजल पंप के बदले सोलर पंप देना, और दूसरे में, व्यक्तिगत और फ़ीडर दोनों ही स्तरों पर पहले से इस्तेमाल हो रहे ग्रिड-पंपों को चलाने के लिए सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।
रोहतक ज़िले के आसपास के गांवों के किसान मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से पंपों के संचालन में होने वाली आसानी और सुविधा की तरफ़ ध्यान दिलाते हैं। उनके अनुसार इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि अब पंपों को चलाने के लिए खेत में मौजूद रहना ज़रूरी नहीं है। हालांकि इस नई तकनीक से किसान अपनी ज़मीन और पानी दोनों से दूर होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं, इस सुविधा के कारण अब ज़रूरत से अधिक पानी का इस्तेमाल बड़ी समस्या बनती जा रही है क्योंकि पानी निकालने का काम अब पहले से अधिक आसान, सुविधाजनक और तेज हो गया है।
खेतों के बीच से गुजरती बिजली की लाइनें, जहां धान की कटाई होने वाली है।
हरियाणा की जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (डीआरडीए) में नवीकरणीय ऊर्जा के परियोजना अधिकारी सुबीर सांगवान का कहना है कि, राज्य सरकार ने ‘डार्क जोन’ में सब्सिडी पर रोक लगा दी है। ये वही गॉंव हैं जहां के भूजल का स्तर 100 फीट से नीचे चला गया है।
20 अक्टूबर 2023 के एक आदेश में इन इलाकों में सोलर पंप लगाने पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय उन्हें ‘व्यावहारिकता के आधार’ पर परखने की व्यवस्था के तहत रखा गया है।
इस अधिसूचना में भूजल की गहराई को लेकर एक तय सीमा रखी गई है। इसे लागू कर माइक्रो-इरिगेशन को अनिवार्य किया गया है। साथ ही, हर साइट पर कड़ी जांच और ऐप के जरिए सत्यापन की व्यवस्था की गई है।
पंप लगाते समय इन शर्तों का पालन करना विक्रेताओं की जिम्मेदारी है। ये नियम अंबाला, भिवानी, चरखी दादरी, फतेहाबाद, गुरुग्राम, जींद, कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, महेंद्रगढ़, नूंह, पंचकूला, रेवाड़ी, सिरसा, यमुनानगर और सोनीपत जैसे जिलों में लागू किए गये हैं।
राज्य स्तर पर अपनाए गए इस तरीके का सीधा संबंध केंद्रीय भूजल बोर्ड की रूपरेखा से है। इसके अन्तर्गत उन ब्लॉकों को ‘अति-दोहन’ वाली श्रेणी में रखा जाता है, जहां भूजल का निकास उसकी भरपाई से ज्यादा हो चुका है। हालांकि वर्गीकरण की यह प्रक्रिया नाकाम ही साबित हो रही है।
पीएम-कुसुम योजना की गाइडलाइन्स के अनुसार जून 2020 के गांव-स्तरीय आंकड़ों को इस चयन का आधार बनाया गया है। इससे अलग-अलग इलाक़ों की वास्तविक स्थिति ठीक से सामने नहीं आ पाती। मौसम के अनुसार होने वाले बदलाव और लंबे समय में भूजल पर पड़ने वाला असर इन आंकड़ों के पीछे छिपा रह जाता है। नतीजतन, जो इलाके कागज़ों पर सुरक्षित माने जाते हैं, वे भी ज़्यादा पानी निकालने के कारण जल्दी ही संकट में आ सकते हैं।
सब्सिडी कई सालों के आधार पर तय होती है, जबकि भूजल स्तर की निगरानी साल में चार बार की जाती है। ब्लॉक-स्तर का आकलन पास-पड़ोस के गांवों, यहां तक कि एक ही इलाके के खेतों के बीच के फर्क को भी छुपा देता है। जब तक ज़्यादा बारीक और स्थानीय लोगों की भागीदारी वाला डेटा नहीं होगा, तब तक पानी निकालने और उसे नियंत्रित करने के बीच का रिश्ता साफ़ नहीं हो पाएगा। इसी वजह से सोलर पंपिंग के असर को ठीक से समझना मुश्किल बना रहता है।
डीआरडीए कार्यालय
नीतियों में मौजूद अनिश्चितता को कम करने के लिए कुछ सुरक्षा प्रावधान जोड़े गए हैं। किसानों को ड्रिप, स्प्रिंकलर या भूमिगत पाइप जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियां अपनाने को कहा गया है, ताकि कम मात्रा में पानी निकले। बिजली उत्पादन, पंप के चलने और उसकी जगह की निगरानी के लिए रिमोट मॉनिटरिंग सिस्टम (आरएमएस) भी लगाया गया है।
लेकिन जमीनी हक़ीकत यह है कि ज्यादातर किसान शायद ही कभी आरएमएस से जुड़ पाते हैं। उनके लिए यह बस एक तकनीकी औपचारिकता है, जिसका रोज़मर्रा की खेती से कोई सीधा जुड़ाव नहीं है।
एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर काउंसिल (सीईईडब्ल्यू) की समीक्षाओं में भी यह बात सामने आई है कि केवल कुछ ही पंप भरोसेमंद तरीके से डेटा भेज पाते हैं। कई मामलों में जियो-टैगिंग और मालिकाना हक़ से जुड़ी जानकारी अधूरी रहती है, और तकनीकी नियमों का पालन भी ठीक से नहीं हो पाता है।
पीएम-कुसुम के तहत सोलर पंप के दुरुपयोग, उसके जगह के खिसकने और स्थान बदलने पर हरेडा के विभागीय आदेश से यह स्पष्ट होता है कि पंपों का इस्तेमाल आम बात है।
सितंबर 2025 तक, 2,000 से ज्यादा पंप छह महीने से भी ज्यादा समय तक बंद रहे। इसके अलावा, 2,000 से ज्यादा पंपों की पोर्टल पर दर्ज जगह उनके असली स्थान से 100 मीटर से ज्यादा अलग पाई गई।
रोहतक के किसानों का कहना है कि वे पंपों को अलग-अलग पानी के स्रोतों के बीच ले जाते हैं और इन्हें घरेलू और खेती दोनों कामों के लिए इस्तेमाल करते हैं। ये बदलाव काम की सुविधा और श्रम की जरूरत के कारण होते हैं, न कि नियम तोड़ने के लिए।
विक्रेता, मामलों की जांच के लिए रिपोर्ट करते हैं। इन जांचों से प्रशासनिक रिकॉर्ड को सही और दुरुस्त रखने में तो मदद मिलती है लेकिन ये पानी निकासी के पैटर्न को पकड़ने में सफल नहीं हो पाते हैं।
माइक्रो-इरिगेशन की शर्तें और रिमोट मॉनिटरिंग काग़ज पर नियमों को लागू करती हैं, लेकिन वास्तविक जमीनी जानकारी नहीं देती, जिससे कि भूजल के इस्तेमाल को ठीक से समझने में मदद मिल सके। नतीजा यह होता है कि औपचारिक निगरानी के बावजूद भी भूजल भंडार पर दबाव बना रहता है।
भारत में सोलर पर सब्सिडी इसलिए दी जाती हैं ताकि लोग इसे अपनाएं और इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। शोधकर्ता दीपक सांगरोया के अनुसार, सोलर पंप लगाना केवल पहला कदम है। उनका कहना है कि आर्थिक प्रोत्साहन यह तो बताते हैं कि लोग सोलर पंप क्यों लेते हैं, लेकिन यह नहीं दिखा पाते कि समय के साथ खेती के तरीके, जमीन के इस्तेमाल और भूजल निकालने के तरीकों में क्या और कैसे बदलाव हो रहे हैं।
यहीं एक बड़ी कमी सामने आती है। किसान अपनी जमीन, मिट्टी, मौसम और पानी के व्यवहार के बारे में गहराई से जानते हैं। उनमें इसके व्यावहारिक उपयोग को लेकर भी गहरी समझ होती है। लेकिन सोलर सिंचाई को बढ़ावा देने वाली योजनाओं में इस ज्ञान को मज़बूत करने या इसके सही इस्तेमाल पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। इसके बजाय, सफलता के आंकड़े इस बात से तय किए जाते हैं कि कितने सोलर पंप लगे, कितनी क्षमता बढ़ी या कितनी मेगावाट बिजली पैदा हुई।
तुषार शाह जैसे शोधकर्ताओं का कहना है कि भूजल खेती-बाड़ी में लिए जाने वाले हर दिन की छोटी-छोटी फैसलों से आकार लेता है। जब तक किसान की आदतें पर्यावरण की सीमाओं के साथ मेल नहीं खाएंगी, सिर्फ़ तकनीक के जरिए भूजल का इस्तेमाल टिकाऊ नहीं बनाया जा सकता। ऐसे में सोलर पंप पानी निकालने की गति हमारी समझ और उम्मीद से भी ज्यादा तेज हो सकती है।
जल बचाएं इसे व्यर्थ न बहाएं
हरियाणा जैसे राज्यों में ये चुनौतियां और स्पष्ट और गहरी से दिखाई देती हैं, जहां हर जिले की भूजल स्थिति एक दूसरे से बहुत अलग है। दरअसल दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम के जल-संकट वाले जिलों से लेकर उत्तर और पूर्व के नहर सिंचित इलाके तक यह राज्य कई अलग-अलग कृषि-पर्यावरणीय जोन में फैला है। एक दूसरे से एकदम सटे दो जिलों में भी मिट्टी, फसल के तरीके, पानी की भरपाई की क्षमता और भूजल का व्यवहार काफ़ी अलग है।
सभी जगहों के लिए सोलर सिंचाई को समाधान मान लेना दरअसल इस क्षेत्र की विविधता को नजरअंदाज करना है और ऐसा करने से पंपिंग की गति में बहुत तेजी से वृद्धि होती है और स्थिति स्थानीय पारिस्थितिकी के नियंत्रण से बाहर चली जाती है।
कुछ किसानों का मानना है कि इसे रोका जा सकता था। भालौत में जैविक फसल उगाने वाले वीरेंद्र सिंह बताते हैं, “अगर सोलर सिंचाई को धीरे-धीरे लागू किया जाता, तो हम इसके असर को पहले से देख पाते। अब नुकसान केवल तब दिखता है जब योजनाएं बड़े पैमाने पर फैल चुकी होती हैं।”
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर सफलता को फिर से परिभाषित नहीं किया गया, तो पीएम-कुसुम जैसी योजनाएं एक स्थिर और स्थायी विकास मॉडल होने की बजाय भूजल घटने को बढ़ावा देने वाली साबित हो सकती हैं।
उनक कहना है कि पंपों की संख्या या मेगावाट की गिनती करने के बजाय ऊर्जा लक्ष्य को सीधे पानी के परिणामों से जोड़ा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, प्रति मेगावाट बिजली के लिए भूजल के इस्तेमाल को ट्रैक करना एक कारगर कदम हो सकता है। ऐसा करने के लिए जरूरी है कि निगरानी को विकेंद्रीकृत किया जाए और ऊपर से मिलने वाली रिपोर्टिंग पर निर्भर रहने के बजाय किसानों के पारंपरिक ज्ञान और उनके पास उपलब्ध जानकारी को औपचारिक रूप से इसमें शामिल किया जाए।
जैसा कि नेचर कंजर्वेंसी के शिवप्रकाश नागाराजु ने बताया है, भारत में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़ी योजना अक्सर बिजली उत्पादन की क्षमता के आधार पर बनाई जाती है। इसके मुकाबले जमीन, पानी और सामाजिक संदर्भ पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। यह कमी सोलर सिंचाई में और भी स्पष्ट रूप से दिखती है।
अगर सोलर सिंचाई को वास्तव में स्थायी और टिकाऊ बनाना है, तो इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ सीखने की प्रक्रिया पर भी बराबर ध्यान दिया जाना चाहिए। हमारी जमीन और पानी को समझने और उसे सही ढंग से प्रबंधित करने की क्षमता से ऊर्जा तक हमारी पहुंच की गति तेज नहीं हो सकती। बिना ज्ञान के, मांग का अर्थ बिना किसी जवाबदेही और जिम्मेदारी के भूजल के दोहन तक सिमट कर रह जाता है।
यह लेख इंडिया वॉटर पोर्टल के रीजनल स्टोरी फेलोशिप 2025 के तहत अंग्रेजी में लिखी गई स्टोरी का अनुवाद है जो डॉ. कुमारी रोहिणी ने किया है।
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