कोन, चोपन (सोनभद्र, यूपी)। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के सैकड़ों गांवों में लोग एक ऐसी समस्या से जूझ रहे हैं जो सिर्फ उनके शरीर को नहीं, बल्कि उनके रिश्तों को भी प्रभावित कर रही है। यहां पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा इतना अधिक है कि अब यह पानी लोगों के लिए ‘मीठा ज़हर’ बन चुका है।
बीते कुछ ही वर्षों में सोनभद्र में फ्लोराइड का असर अचानक से दिखना नहीं शुरू हुआ। पहले दाँतों का रंग बदला औए फिर शरीर ने जवाब देना शुरू किया और आखिर में इसका असर रिश्तों और सामाजिक जीवन पर भी दिखने लगा।
जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर कोन ब्लॉक के रोहनवा दामर गाँव में पानी सिर्फ एक जरूरत नहीं, बल्कि यहाँ के लोगों के लिए डर बन चुका है। करीब 15 हजार की आबादी वाले इस इलाके में फ्लोराइड युक्त पानी ने लोगों के शरीर से लेकर उनके रिश्तों तक को प्रभावित किया है।
सोनभद्र निवासी बृज बिहारी शर्मा
इस गाँव में बच्चे पैदा होते ही उस पानी के साथ बड़े होते हैं जो उनके शरीर को धीरे-धीरे कमजोर करता है। दाँतों का पीला होना यहाँ पहचान बन चुका है और झुकी हुई कमर एक आम दृश्य। आपको गाँव घुमते ही डंडे के सहारे से चलते हुए दर्जनों लोग दिख जायेंगे। ज्यादातर घरों में एक दो आदमी चारपाई पर जरुर होगा। यह एक ऐसी त्रासदी है जो अचानक नहीं दिखती लेकिन हर घर में मौजूद है। जिन लोगों की जिंदगी इससे प्रभावित है, उनके लिए यह हर दिन का सच है। एक ऐसा सच, जिसमें पानी पीना भी जोखिम बन चुका है।
उत्तर प्रदेश का सोनभद्र जिला तीन राज्यों - मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड की सीमाओं से घिरा हुआ है। भूवैज्ञानिक दृष्टि से सोनभद्र जिला डुद्धी ग्रेनाइटॉइड कॉम्प्लेक्स, विंध्यन सुपरग्रुप, महाकोशल समूह तथा नवीन जलोढ़ निक्षेपों से निर्मित है, जो सोन नदी और अन्य धाराओं के किनारे संकीर्ण पट्टियों में पाए जाते हैं। यहां की मिट्टी में ऐसे रासायनिक उत्पाद पाये जाते हैं जिनमें प्राकृतिक रूप से फ्लोराइड की मात्रा अधिक होती है।
21 वर्षीय राहुल शर्मा कहते हैं, “गाँव के 250 घरों में से करीब 60 प्रतिशत लोग पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। यहाँ 10 साल की उम्र से ही दाँत पीले होने लगते हैं। 18–19 साल की उम्र में शरीर में दर्द शुरू हो जाता है। 40–50 साल तक आते-आते लोग चारपाई पकड़ लेते हैं।”
“जिस कॉलेज में पढ़ता हूँ वहां बहुत बेइज्जती महसूस होती है। मेरे दांत पीले हैं, इसलिए दोस्तों के सामने खुलकर हंस नहीं सकते। दूसरे गाँव के रिश्तेदार अगर घर आते तो उनसे कम बात करते हैं। हाँ, हूँ में जवाब देते हैं ताकि वो हमारे दांत न देख सकें। क्या-क्या बतायें आपको बहुत शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती है,” ये बताते हुए राहुल शांत हो गये।
सोनभद्र निवासी राहुल शर्मा
राहुल के गाँव के युवाओं की चिंता जायज भी है क्योंकि यहाँ के युवा पीले दांत और कम उम्र में शरीर के कमजोर होने से परेशान हैं जिस वजह से उन्हें मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है।
14 वर्षीय खुशबू कुमारी नौवीं कक्षा में पढ़ती हैं। वो कहती हैं, “मेरी सहेलियों की जल्दी शादी हो गयी। उनके दांत बहुत ज्यादा पील न दिखने लगें इसलिए उनके घरवालों ने पढ़ाई छुड़वाकर शादी कर दी। मुझे भी डर लगता है कि कहीं हमारी भी पढ़ाई न छुड़वा दी जाए। स्कूल में सहेलियाँ बात करती हैं कि अपने यहाँ तो दांत देखकर शादी होती है फिर तो हम लोगों की शादी में भी मुश्किल होगी।”
खुशबू अपनी उम्र से कहीं ज्यादा गंभीर बातें करती हैं। खुशबू ने यह भी कहा, “मुझे भी खुद डर लगता है कि मेरी शादी कैसे होगी? लेकिन मैं अभी शादी नहीं करना चाहती क्योंकि मुझे पढ़ना है।”
यह आपबीती सिर्फ राहुल और खुशबू की नहीं है बल्कि सोनभद्र जिले में फ्लोराइड युक्त पानी ने एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया है। गाँव के भोला शर्मा बताते हैं कि दांत पीले होने की वजह उनके भतीजे की शादी टूट गई। गाँव में कई लड़कों की शादी पीले दांत की वजह से टूटी है। मजबूरी में लोग लड़कियों की शादी 15 से 20 साल के अन्दर कर देते हैं क्योंकि दांतों का रंग धीरे-धीरे और गहराता जाता है।
सोनभद्र में पानी में फ्लोराइड का कहर
कोन, वभनी, म्योरपुर और दुद्धी ब्लॉकों के करीब 300 गांव इस समस्या से जूझ रहे हैं जहाँ भूजल में फ्लोराइड की मात्रा तय मानक से कई गुना अधिक पाई गई है। कई जगह एक लीटर पानी में फ्लोराइड की मात्रा 14 मिलीग्राम तक दर्ज की गई है जबकि सुरक्षित सीमा एक मिलीग्राम मानी जाती है।
पहाड़ों के बीच बसे कछनरवा गाँव के आख़िरी छोर पर एक घर के बाहर पिता और बेटा चारपाई पर लेटे थे। इस घर में हमारी मुलाक़ात मिश्री देवी से हुई। इनके भी कमर में दर्द रहता है ये बैठकर खाना नहीं बना पातीं।
मिश्री देवी ने बताया कि ये दोनो सालों से बिस्तर पर हैं। पिता बेटी की शादी के बाद से ऐसे बीमार पड़े कि बिस्तर से नहीं उठ पाए। बीच में एक बार ठीक हुए थे लेकिन दोबारा जबसे बिस्तर पर गये नहीं उठे। ठीक से साल याद नहीं पर 15-20 साल हो गये इन्हें लेटे हुए।
बेटे राजू के साथ मिश्री देवी
बेटे के बारे में मिश्री देवी ने बताया कि कुछ साल पले बेटा बीमार हुआ था। इलाज के बाद ठीक हुआ तो उसकी शादी कर दी। शादी के बाद बच्चे भी हुए लेकिन पांच साल पहले फिर खाट पकड़ ली। बेटे की पत्नी उन्हें छोड़कर चली गयी। यह बताते हुए मिश्री देवी बोलीं, “मैं तो माँ हूँ कहां जाऊं। इन दोनों लोगों की सेवा करते-करते बुड्डी हो गयी। अब मुझसे काम नहीं होता मुझे भी जोड़ों में दर्द की दिक्कत है पर क्या करूं।”
बिस्तर पर लेटे 35 वर्षीय राजू कहते हैं, “बीमार होने के बाद पत्नी छोड़कर चली गई। एक बेटी को साथ ले गयी बेटा मेरे पास ही है। उन्होंने बताया कि गाँव के कई और पुरुष हैं जिनके हाथ-पैरों ने काम करना कम कर दिया तो उनकी बीबियाँ छोड़कर चली गयीं। अब मुसीबत है क्या करें। अब कमाना तो दूर चल फिर ही नहीं पाते। जवानी में ही लग रहा है कि 80 साल का हो गया हूँ। बहुत लोग आते हैं फोटो खीचते, वीडियो बनाते पर होता कुछ नहीं।”
रोहनवा दामर और कछनरवा जैसे गाँवों में “हर घर जल” योजना के तहत टंकियाँ और पाइपलाइन तो बिछाई गई हैं लेकिन पानी की सप्लाई अनियमित है। लोग आज भी हैंडपंप और कुओं के सहारे पानी पीते हैं, जहाँ फ्लोराइड की मात्रा बेहद अधिक पाई गई है। स्थानीय लोग बताते हैं कि समस्या सिर्फ स्वास्थ्य की नहीं रही अब यह सामाजिक संकट बन चुकी है। शादी टूट रही हैं, परिवार बिखर रहे हैं, और युवा उम्र से पहले ही बूढ़े हो रहे हैं।
बुधि नारायण अपने बेटे राजू के साथ
35 वर्षीय वर्षीय बुधि नारायण कहते हैं, “पानी की वजह से मेरा बेटा विकलांग हो गया है। अब तो इसके मुँह से आवाज़ भी साफ नहीं निकलती। कुछ भी काम नहीं कर पाता। मेरा बड़ा बेटा है 15 साल उम्र है। मजदूरी करता हूँ शुरुआत में बेटे की बहुत इलाज करवाई लेकिन ठीक नहीं हुआ वो फिर बंद कर दी। मेरे हाथ-पैर भी कमजोर लगते हैं पर क्या करेन मजबूरी में मजदूरी करनी पड़ती है।”
आठवीं तक पढ़े बुधि नारायण मजदूरी करते हैं लेकिन अब उनका शरीर जवाब देने लगा है। वे बताते हैं कि दवा खाने से थोड़ी राहत मिलती है लेकिन फिर हालत बिगड़ जाती है कभी ठीक, कभी खराब बस यही चल रहा है।
एक महिला जो अपना नाम नहीं बताना चाहतीं वो कहती हैं, “शादी के कुछ साल बाद ही मेरे पति ने चारपाई पकड़ ली। डॉक्टरों ने बताया कि यह फ्लोराइड का असर है। अब इनका बिस्तर से उठाना मुश्किल है। घर चलाना मुश्किल हो गया था तो मुझे मायके आना पड़ा।”
एक 28 वर्षीय युवा ने नाम न छापने की बात कहते हुए अपनी आपबीती बताई, “मुझे पांच छह बार रिश्ता देखने वाले आये पर दांत देखकर मना कर दिया। पहले तो कम पीले थे तब नहीं हुई अब तो बहुत पीले हो गये अब कौन करेगा। हमने तो शादी की उम्मीद ही छोड़ दी पर बुरा लगता अहि कि सिर्फ दांत पीले होने की वजह से हमारे यहाँ के युवाओं की शादी नहीं हो रही।”
विजय कुमार शर्मा
इनके दाँतों पर जमी पीली परत सिर्फ एक बीमारी का संकेत नहीं बल्कि अब इनकी शादी के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट बन चुकी है। परिवार वाले बताते हैं कि पिछले तीन साल में कई रिश्ते आए लेकिन हर बार वजह एक ही रही दाँतों का रंग और शरीर की कमजोरी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे कई मामले हैं जहाँ बीमारी ने न सिर्फ शरीर को तोड़ा है, बल्कि रिश्तों को भी कमजोर कर दिया है। इलाके के कई गांवों में फ्लोराइड युक्त पानी ने न सिर्फ लोगों की सेहत को प्रभावित किया है, बल्कि उनके सामाजिक रिश्तों पर भी असर डाला है। 25 से 30 साल की उम्र में ही लोगों की कमर झुकने लगती है, दाँत पीले और कमजोर हो जाते हैं और शरीर धीरे-धीरे जवाब देने लगता है। ऐसे में शादी जैसे सामाजिक बंधन पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है। कई परिवार बताते हैं कि लड़कों की शादी तय होना मुश्किल हो गया है जबकि कुछ मामलों में शादियाँ टूट चुकी हैं।
सोनभद्र में फ्लोराइड का कहर
सोनभद्र में फ्लोराइड की समस्या नई नहीं है, लेकिन पिछले डेढ़ दशक में इसकी गंभीरता तेजी से बढ़ी है। पर्यावरण अध्ययन से जुड़ी संस्थाओं की रिपोर्ट बताती हैं कि यहाँ का भूजल लंबे समय से दूषित है। इस पानी के लगातार इस्तेमाल से फ्लोरोसिस नाम की बीमारी फैल रही है जो हड्डियों और दाँतों को स्थायी रूप से नुकसान पहुँचाती है।
डॉक्टरों के मुताबिक इसका असर सिर्फ शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और सामाजिक भी है। बच्चे जन्म से विकलांग हो रहे हैं और कम उम्र में ही लोगों की काम करने की क्षमता घट रही है।
55 वर्षीय रामचंद्र जायसवाल बताते हैं, “हमारे परिवार की तीन पीढ़ियाँ इस बीमारी से प्रभावित हैं। अब लोग रिश्ता करने से पहले ही मना कर देते हैं। नई बहुएं मायके वापस लौट रही हैं। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ बीमारी ने न सिर्फ शरीर को कमजोर किया है बल्कि परिवारों को भी तोड़ दिया है।”
विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि प्रबंधन की भी है। भूजल की लगातार निगरानी, वैकल्पिक जल स्रोत, और फ्लोराइड हटाने की तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने की जरूरत है। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक जब तक सुरक्षित पेयजल की स्थायी व्यवस्था नहीं होगी तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
राजकुमारी और सिकंदर
प्रशासन भी इस बात को मानता है की सोनभद्र के पांच ब्लॉक के 300 गाँव फ्लोराइड युक्त पानी से ग्रसित हैं। करीब 10,000 लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इससे प्रभावित हैं। इस इलाके में हवा और पानी दोनों में प्रदूषण है। फ्लोराइड की समस्या तो दिख जाती कि लोग विकलांग हो रहे और दांत पीले हो रहे पर मरकरी और लेड हमारे भीतर दीमक की तरह चाट रहे ये जायदा घातक हैं। इसका असर मानसिक विकलांगता पर पड़ता है जो कहीं दिखता नहीं। सोनभद्र में लगातार उद्योग धंधे लग रहे हैं जो विकास के लिए जरूरी है। पर यहाँ के लोगों के शारीरिक और मानसिक विकास की कौन सुध लेगा।जगत नारायण विश्वकर्मा, वनवासी सेवा आश्रम, सोनभद्र
सोनभद्र में रहने वाले जिन लोगों की पीड़ा हमने यहां साझा की है, वो उसके प्रमाण सरकारी रिपोर्ट में भी मिलते हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की वेबसाइट पर प्रकाशित एक रिसर्च पेपर के अनुसार सोनभद्र क्षेत्र में पाए जाने वाले सेमरी और कैमूर समूह की चट्टानें मुख्यतः चूना पत्थर (लाइमस्टोन) और बलुआ पत्थर (सैंडस्टोन) से बनी हैं। सेमरी समूह की शैल संरचना में आधारभूत कंकड़-पत्थरयुक्त निक्षेप (कांग्लोमरेट) और चूना पत्थर शामिल हैं, जो महाकोशल समूह की शिस्ट और फिलाइट चट्टानों के ऊपर तथा डुद्धी ग्रेनाइटॉइड कॉम्प्लेक्स के ग्रेनाइटों पर असंगत (अनकन्फॉर्मेबल) रूप से स्थित हैं।
अध्ययन क्षेत्र डुद्धी ब्लॉक में स्थित है, जहाँ अर्ध-शुष्क से शुष्क जलवायु पाई जाती है। यहाँ का औसत वार्षिक तापमान लगभग 9°C (न्यूनतम) से 48°C (अधिकतम) के बीच रहता है। इस क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण (रीचार्ज) का मुख्य स्रोत वर्षा है, जिसकी औसत वार्षिक मात्रा लगभग 750 मिमी है। अध्ययन क्षेत्र में भूजल की कमी पाई जाती है, इसलिए कृषि गतिविधियाँ मुख्यतः वर्षा पर निर्भर हैं।
सोनभद्र के बच्चों में फ्लोरोसिस
2022 में प्रकाशित मौसम विभाग के रिसर्च के अनुसार इस क्षेत्र की प्रमुख शैल इकाइयाँ ग्रेनाइट और फिलाइट चट्टानों से बनी हैं, जिनके ऊपर लाल रेतीली मिट्टी की परत पाई जाती है। जल निकासी प्रतिरूप (ड्रेनेज पैटर्न) डेंड्राइटिक से उप-डेंड्राइटिक प्रकार का है। द्वितीयक अंतःप्रवेशी संरचनाएँ जैसे डाइक, पेग्माटाइट और क्वार्ट्ज शिराएँ भी सीमित मात्रा में मिलती हैं। यहाँ भूजल अपक्षयित (वेदरड) और विदीर्ण (फ्रैक्चर्ड) क्षेत्रों में मुक्त जलस्तर (फ्रीएटिक) अवस्था में पाया जाता है।
भूजल स्तर भूमि सतह से लगभग 5.7 से 12.2 मीटर की गहराई पर स्थित है। क्षेत्र के कुओं की गहराई 8 से 13 मीटर तथा व्यास 2 से 8 मीटर के बीच पाया गया। हैंडपंपों की अधिकतम गहराई सामान्यतः भूजल स्तर से लगभग 40 मीटर नीचे तक होती है।
अध्ययन क्षेत्र के ग्रेनाइट की सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोपिक) जांच से पता चला कि इसमें एक-तिहाई से अधिक मात्रा में फेल्डस्पार (विशेषकर क्षारीय फेल्डस्पार), अभ्रक (मस्कोवाइट और बायोटाइट) तथा क्वार्ट्ज प्रमुख खनिजों के रूप में मौजूद हैं, जबकि एपाटाइट, मोनाजाइट और एप्लाइट गौण खनिजों के रूप में पाए जाते हैं।
सोनभद्र में फ्लोरोसिस की शिकार वृद्ध महिला
फ्लोराइड युक्त प्रमुख खनिजों में फ्लोरोएपाटाइट, फ्लोराइट (फ्लोरस्पार), क्रायोलाइट, अभ्रक (बायोटाइट, मस्कोवाइट और लेपिडोलाइट), टूरमलीन, हॉर्नब्लेंड समूह के खनिज, ग्लॉकोफेन-रीबेकाइट, एस्बेस्टस (क्राइसोटाइल, एक्टिनोलाइट और एन्थोफिलाइट), स्फीन, एपोफिलाइट तथा जिनवाल्डाइट आदि शामिल हैं। इन खनिजों की क्रिस्टलीय संरचना में पर्याप्त मात्रा में फ्लोरीन उपस्थित होता है। ऐसे फ्लोराइड-समृद्ध खनिजों से निर्मित मिट्टी भूजल में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ाने के लिए जिम्मेदार होती है।
भूजल के नमूने सभी आवश्यक सावधानियों का पालन करते हुए 36 हैंडपंपों और बोरवेलों से एकत्र किए गए। इनमें से 19 नमूनों में फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई गई।
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