मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में बहने वाली सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर बिहार और झारखंड के बीच दशकों से चल रहा विवाद एक समझौते के जरिये खत्म हो गया है।
फोटो : विकीकॉमंस
बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर दशकों से चली आ रही खींचतान आखिरकार एक समझौते के ज़रिये खत्म हो गई है। केंद्र सरकार के पत्र सूचना कार्यालय ने (पीआईबी) ने इस बारे में एक सूचना जारी कर बताया है कि 31 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में दोनों राज्यों ने सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर समझौता ज्ञापन यानी MoU पर हस्ताक्षर किए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस समझौते में सोन नदी के 7.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF) पानी को दोनों राज्यों के बीच बांटने की व्यवस्था तय की गई है। उपलब्ध आधिकारिक और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस हिस्से में बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2 MAF पानी मिलेगा।
केंद्र सरकार ने इसे सहकारी संघवाद की मिसाल बताया है। इस समझौते से बिहार के भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना जैसे जिलों को इसका लाभ मिलने की बात कही गई है। झारखंड में पलामू, गढ़वा और आसपास के क्षेत्रों को लाभ मिलने की संभावना बताई गई है।
दोनों राज्यों के बीच हुए इस बहुप्रतीक्षित समझौते की बदौलत अब 53 साल से अटकी इंद्रपुरी जलाशय परियोजना का रास्ता साफ हो गया है, जिसे पहले कधवन जलाशय परियोजना कहा जाता था, पर पड़ेगा। इंद्रपुरी/कधवन परियोजना की जड़ें 1970 के दशक में जाती हैं। लेकिन बिहार-झारखंड के बीच मौजूदा जल बंटवारा विवाद 2000 में झारखंड के गठन के बाद उभरा और करीब 25-26 साल चला।
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार जल बंटवारे का विवाद परियोजना के लिए प्रमुख अंतरराज्यीय अड़चन बन गया था। झारखंड की सहमति और आवश्यक अंतरराज्यीय मुद्दे के समाधान के बाद अब इस परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता खुला है। इससे बिहार और झारखंड के बड़े ग्रामीण इलाकों में सिंचाई तथा पेयजल की उपलब्धता बेहतर हो सकती है।
31 अगस्त 2026 के MoU ने इस विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी को सुलझा दिया है। कुल 7.75 MAF पानी, जो 1973 में अविभाजित बिहार को आवंटित था, अब बिहार और झारखंड के बीच बांटने की व्यवस्था तय हुई है। बिहार का हिस्सा 5.75 MAF और झारखंड का हिस्सा 2 MAF रखा गया है। इसका अर्थ यह है कि 1973 के बाणसागर समझौते को खत्म नहीं किया गया, बल्कि उसके तहत अविभाजित बिहार को मिले जल हिस्से को बिहार और झारखंड के बीच बांट दिया गया है। यही वह बिंदु है जिसने लंबे समय से अटकी परियोजना के लिए अंतरराज्यीय सहमति का रास्ता खोला है।
केंद्र सरकार के मुताबिक समझौते से दोनों राज्यों में सिंचाई और पेयजल आपूर्ति को बढ़ावा मिलेगा। बिहार में दक्षिण और मध्य बिहार के कई जिलों को लाभ मिलने की उम्मीद है, जबकि झारखंड के पलामू-गढ़वा क्षेत्र में भी पानी की उपलब्धता बढ़ाने की संभावना है।
नदी : सोन
उद्गम : अमरकंटक क्षेत्र, मध्य प्रदेश
संगम : गंगा, पटना के निकट
1973 बाणसागर समझौते में अविभाजित बिहार का हिस्सा : 7.75 MAF
31 अगस्त 2026 की स्थिति : बिहार-झारखंड के बीच MoU के बाद प्रमुख जल बंटवारा विवाद का समाधा
31 अगस्त 2026 के नए समझौते में बिहार का हिस्सा : 5.75 MAF
झारखंड का हिस्सा : 2 MAF
मूल परियोजना का नाम : कधवन जलाशय परियोजना
वर्तमान नाम : इंद्रपुरी जलाशय परियोजना
प्रस्तावित स्थान : कधवन, गढ़वा, झारखंड और मटियावां, रोहतास, बिहार के आसपास
प्रस्तावित बिजली क्षमता, 2018 PPR : 4 × 75 MW = 300 MW
प्रस्तावित FRL : 169 मीटर
प्रस्तावित MWL : 171 मीटर
मुख्य उद्देश्य : मानसूनी पानी का भंडारण, सोन नहर प्रणाली को स्थिर जल आपूर्ति, सिंचाई और जलविद्युत
मौजूदा मुख्य बाधा : अंतरराज्यीय जल बंटवारा और सहमति
विवाद की जड़ 1973 के बाणसागर समझौते में है। 16 सितंबर 1973 को तत्कालीन बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच सोन नदी के पानी और मध्य प्रदेश में बाणसागर बांध के निर्माण की लागत को लेकर त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। इस समझौते में अविभाजित बिहार के लिए सोन नदी के पानी का आवंटन 7.75 MAF तय किया गया था।
उस समय झारखंड अलग राज्य नहीं था। वह बिहार का हिस्सा था। इसलिए समझौते में “बिहार” से आशय उस समय के अविभाजित बिहार से था। 2000 में बिहार के पुनर्गठन के बाद झारखंड अलग राज्य बन गया। यहीं से एक नया सवाल खड़ा हुआ कि 1973 में अविभाजित बिहार के लिए तय 7.75 MAF पानी में अब बिहार और झारखंड का हिस्सा कितना होगा।
बिहार का तर्क था कि 1973 के समझौते में 7.75 MAF पानी बिहार के लिए निर्धारित किया गया था और इसलिए वह आवंटन उसके अधिकार में है। दूसरी ओर झारखंड का तर्क था कि राज्य के गठन के बाद अविभाजित बिहार के हिस्से का पानी केवल बिहार को नहीं मिल सकता। सोन का उद्गम क्षेत्र और उसका बड़ा जलग्रहण क्षेत्र झारखंड से भी जुड़ा है, इसलिए उसे अपने हिस्से का पानी मिलना चाहिए। यही मूल विवाद करीब 25 साल तक चलता रहा।
सोन नदी को घड़ियालों का एक प्रमुख आवास माना जाता है। जहां इनके संरक्षण के प्रयास भी चल रहे हैं।
1973 के समझौते में मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश के बीच हुए बाणसागर समझौते को समझे बिना सोन जल विवाद को समझना मुश्किल है। मूलत: इस समझौते के जरिये ही तीनों राज्यों के बीच सोन के पानी के उपयोग की व्यवस्था की गई थी। इसमें बाणसागर नियंत्रण बोर्ड के ज़रिये पानी का बंटवारा कुछ इस प्रकार किया गया था -
बिहार - 7.75 MAF
मध्य प्रदेश - 5.25 MAF
उत्तर प्रदेश - 1.25 MAF
बिहार के 7.75 MAF में बाणसागर जलाशय से मिलने वाला 1 MAF भी शामिल था। उत्तर प्रदेश को 1.25 MAF में से 0.25 MAF कनहर से और शेष बाणसागर तथा सोन से मिलने वाला था। बाणसागर परियोजना की लागत को पानी के उपयोग के अनुपात में लगभग 2:1:1 के अनुपात में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच बांटने की व्यवस्था भी थी।
इस समझौते में एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह भी था कि यदि सोन का सालाना प्रवाह 14.25 MAF से कम या ज्यादा होता है तो निर्धारित हिस्सों में अनुपातिक कटौती या वृद्धि की जा सकती है। साथ ही पुराने सोन बैराज की सिंचाई आवश्यकताओं के लिए 5 MAF को प्राथमिकता दी गई थी। यानी बाणसागर समझौते में बिहार को 7.75 MAF आवंटित किया गया था, लेकिन यह “सोन नदी के पूरे पानी का मालिकाना हक” देने वाला समझौता नहीं था। यह तीन राज्यों के बीच सोन के जल के उपयोग का एक अंतरराज्यीय समझौता था। यही अंतर आज के विवाद को समझने में महत्वपूर्ण है।
सन 2000 में झारखंड के बिहार से अलग होकर नया राज्य बनने के बाद परिस्थितियां बदल गईं। 1973 के समझौते में बिहार को जो 7.75 MAF पानी आवंटित किया गया था, वह अब दो राज्यों में बंटना था। लेकिन, पुराने समझौते में झारखंड के लिए अलग जल हिस्सा निर्धारित नहीं था।
इस बीच बिहार ने सोन नदी के अतिरिक्त मानसूनी पानी को संग्रहित करने और सोन नहर प्रणाली को स्थिर जल आपूर्ति देने के लिए कधवन जलाशय योजना को इंद्रपुरी जलाशय परियोजना के नाम से आगे बढ़ाया गया। परियोजना का स्थान बिहार और झारखंड की सीमा के निकट होने के कारण झारखंड की सहमति जरूरी थी। झारखंड ने पहले यह सवाल उठाया कि जब तक 1973 में अविभाजित बिहार को मिले पानी में उसकी हिस्सेदारी का मसला नहीं सुलझता, तब तक कधवन/इंद्रपुरी परियोजना को आगे कैसे बढ़ाया जा सकता है?
केंद्रीय जल आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक बिहार ने दिसंबर 2018 में परियोजना की Preliminary Project Report यानी PPR प्रस्तुत की थी। लेकिन, अंतरराज्यीय विवाद का समाधान नहीं होने के कारण आयोग ने मार्च 2022 में प्रस्ताव वापस करते हुए सह-बेसिन राज्यों की सहमति यानी NoC के साथ परियोजना दोबारा प्रस्तुत करने को कहा गया।
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार इंद्रपुरी जलाशय परियोजना के तहत सोन नदी पर कधवन और मटियावां गांवों के आसपास बांध बनाने का प्रस्ताव है। यह दोनों गांव आसपास होने के बावजूद दो अलग राज्यों में हैं। कधवन गांव झारखंड के गढ़वा जिले में जबकि, मटियावां बिहार के रोहतास जिले में पड़ता है। परियोजना स्थल मौजूदा सोन बैराज से लगभग 70 किलोमीटर ऊपर प्रस्तावित है। 2000 में झारखंड के गठन के बाद इस परियोजना का नाम बदलकर इंद्रपुरी जलाशय परियोजना किया गया। इसका मूल उद्देश्य मानसून के दौरान सोन में आने वाले अतिरिक्त पानी को संग्रहित करना और सोन नहर प्रणाली को साल भर अधिक स्थिर जल उपलब्ध कराना है। केंद्रीय जल आयोग के रिकॉर्ड में यह भी कहा गया है कि बिहार के सोन नहर तंत्र की जल उपलब्धता मानसून पर काफी निर्भर है और ऊपरी हिस्से में पर्याप्त भंडारण क्षमता न होने के कारण मानसून का अतिरिक्त पानी कई बार उपयोग में नहीं आ पाता।
परियोजना के 2018 के आरंभिक प्रस्ताव (PPR) में 169 मीटर FRL, 171 मीटर MWL और 160.50 मीटर MDDL का प्रावधान किया गया था। इसमें चार बिजली उत्पादन इकाइयों के लिए प्रत्येक 75 MW यानी कुल 300 MW की क्षमता का प्रस्ताव दर्ज है। हालांकि परियोजना का अंतिम स्वरूप आगे विस्तृत प्रस्ताव (DPR) और केंद्रीय मूल्यांकन के बाद ही निश्चित होगा।
इंद्रपुरी/कधवन परियोजना की जड़ें 1970 के दशक में जाती हैं। लेकिन बिहार-झारखंड के बीच मौजूदा जल बंटवारा विवाद 2000 में झारखंड के गठन के बाद उभरा और करीब 25-26 साल चला। इस तरह बिहार झारखंड के बीच अब यह समझौता होने पर करीब 53 साल से अटकी पड़ी इंद्रपुरी/कधवन परियोजना का रास्ता साफ हो गया है।
इंद्रपुरी परियोजना केवल बिहार और झारखंड के बीच पानी का मामला नहीं है। परियोजना के अंतरराज्यीय पहलुओं में उत्तर प्रदेश भी शामिल रहा है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार उत्तर प्रदेश ने परियोजना के प्रस्तावित Full Reservoir Level (FRL) को लेकर आपत्ति जताई थी, क्योंकि जलाशय का Backwater प्रभाव उसके ओबरा पावर हाउस के Tail Water Level को प्रभावित कर सकता था। इसी वजह से FRL को 173 मीटर से घटाकर 169 मीटर करने पर चर्चा हुई।
पुराने रिकॉर्ड में यह परियोजना बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और तत्कालीन मध्य प्रदेश से जुड़े अंतरराज्यीय पहलुओं वाली परियोजना के रूप में भी दर्ज रही है। इसका मतलब है कि बिहार-झारखंड समझौता बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए तकनीकी, पर्यावरणीय, पुनर्वास और अन्य वैधानिक मंजूरियां भी जरूरी होंगी।
बिहार और झारखंड की अन्य साझा नदियां : बिहार और झारखंड की भौगोलिक सीमा और पुराने बिहार राज्य की साझा नदी प्रणालियों के कारण दोनों राज्यों के बीच कई नदी परियोजनाएं अंतरराज्यीय स्वरूप रखती हैं। सोन के अलावा उत्तर कोयल, बटाने और गंगा आधारित बटेश्वरस्थान पंप नहर जैसी परियोजनाएं दोनों राज्यों से जुड़ी रही हैं। 2006 में बिहार और झारखंड ने उत्तर कोयल जलाशय परियोजना, बटाने जलाशय परियोजना और बटेश्वरस्थान पंप नहर परियोजना के निर्माण, संचालन, रखरखाव और लागत तथा लाभों के बंटवारे को लेकर समझौता किया था। उत्तर कोयल परियोजना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह सोन की सहायक नदी उत्तर कोयल पर बनी अंतरराज्यीय परियोजना है। बांध और बैराज झारखंड में हैं, जबकि इसकी नहर प्रणाली बिहार तक जाती है। 2023 में केंद्र सरकार ने परियोजना के शेष कार्यों को पूरा करने के लिए 2,430.76 करोड़ रुपये की संशोधित लागत को मंजूरी दी। परियोजना पूरी होने पर बिहार और झारखंड के सूखा प्रभावित जिलों में अतिरिक्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। बटाने जलाशय परियोजना भी बिहार के औरंगाबाद तथा झारखंड के पलामू क्षेत्र से जुड़ी है। वहीं बटेश्वरस्थान पंप नहर गंगा के पानी को पंप कर बिहार और झारखंड के क्षेत्रों में पहुंचाने वाली अंतरराज्यीय परियोजना है। दोनों राज्यों के बीच 2006 के समझौते में इन परियोजनाओं के साझा घटकों के निर्माण, संचालन और लाभों को लेकर व्यवस्था बनाई गई थी।
सोन नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक क्षेत्र में होता है। यह मध्य प्रदेश से निकलने के बाद उत्तर प्रदेश और झारखंड से गुजरती हुई बिहार में प्रवेश करती है और अंततः पटना के निकट गंगा में मिलती है। सोन का बेसिन गंगा नदी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बिहार के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में सोन की भूमिका खास तौर पर सिंचाई के लिहाज से महत्वपूर्ण रही है।
सोन नदी बिहार की कृषि में अहम भूमिका निभाती है। डेहरी के पास सोन पर विकसित सिंचाई व्यवस्था देश की पुरानी बड़ी नहर प्रणालियों में शामिल है। बाद में इसी प्रणाली को मजबूत करने के लिए इंद्रपुरी बैराज का निर्माण किया गया। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार इंद्रपुरी बैराज का निर्माण 1960 के दशक में शुरू हुआ और 1968 में यह चालू हुआ। यह बैराज सोन नदी के पानी को नहर प्रणाली में ले जाकर बड़े कृषि क्षेत्र को सिंचाई उपलब्ध कराता है।
सोन का महत्व केवल बिहार तक सीमित नहीं है। इसकी सहायक नदियों में उत्तर कोयल, कनहर और रिहंद जैसी नदियां शामिल हैं। खासकर उत्तर कोयल और कनहर जैसी नदियों का जल सोन के प्रवाह और क्षेत्रीय सिंचाई योजनाओं से जुड़ा है। यही वजह है कि सोन को लेकर कोई बड़ा जलाशय या जल बंटवारा केवल एक राज्य का मामला नहीं रह जाता।
सोन नदी में जगह-जगह भारी मात्रा में किए जा रहे अवैध रेत खनन के कारण इसके बहाव और पारिस्थितिक पर काफी बुरा असर पड़ रहा है।
सोन नदी पर नया बड़ा जलाशय बनने का अर्थ केवल पानी का भंडारण बढ़ना नहीं है। बांध नदी के प्राकृतिक प्रवाह, तलछट स्थानांतरण यानी sediment transport, मछलियों की आवाजाही और डाउनस्ट्रीम पारिस्थितिकी को प्रभावित कर सकता है। इस लिहाज से इंद्रपुरी परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का स्वतंत्र और वैज्ञानिक आकलन जरूरी होगा।
यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मौजूदा इंद्रपुरी बांध के अनुभव पर 2026 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन ने मछली जैव विविधता में बड़े बदलाव की ओर संकेत किया है। अध्ययन में उपलब्ध पुराने और नए आंकड़ों की तुलना करते हुए बताया गया कि इंद्रपुरी बांध बनने से पहले उसके बेसिन में दर्ज 95 मछली प्रजातियों की तुलना में 2017 में केवल 25 प्रजातियां दर्ज की गईं। हालांकि इस तरह के बदलावों को केवल बांध के कारण मानने से पहले अन्य पर्यावरणीय दबावों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
नई परियोजना के मामले में नदी का पर्यावरणीय प्रवाह, मछली प्रजातियों की आवाजाही, जलाशय में गाद का जमाव, डाउनस्ट्रीम खेती, नदी किनारे की आर्द्रभूमियां और स्थानीय जैव विविधता महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे। इसके अलावा जलाशय बनने से जिन क्षेत्रों में भूमि डूब सकती है, वहां विस्थापन और पुनर्वास भी बड़ा सामाजिक-पर्यावरणीय प्रश्न होगा।
सोन नदी के जल बंटवारे पर बनी यह सहमति परियोजना के लिए एक बड़ी अंतरराज्यीय बाधा दूर करती है। लेकिन, इसके बाद भी बांध का निर्माण अपने आप शुरू नहीं हो सकता। कई चीजों को अब भी सुलझाने की ज़रूरत पड़ेगी। अभी इस परियोजना को संशोधित DPR, केंद्रीय जल आयोग की तकनीकी जांच, पर्यावरणीय और वन संबंधी मंजूरियों, भूमि तथा पुनर्वास से जुड़े प्रावधानों और अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।
केंद्रीय जल आयोग के उपलब्ध स्टेटस नोट में hydrology, sediment, dam design, irrigation planning और power potential से संबंधित कई तकनीकी टिप्पणियां दर्ज हैं। आयोग ने पहले भी परियोजना को विभिन्न तकनीकी पहलुओं पर टिप्पणियां भेजी थीं। इसलिए मौजूदा समझौते को परियोजना निर्माण की अंतिम मंजूरी के बजाय सबसे बड़ी अंतरराज्यीय अड़चन दूर होने के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।
सबसे बड़ा बदलाव सोन बेसिन में जल संग्रहण और सिंचाई की योजना में हो सकता है। बिहार के लिए इंद्रपुरी जलाशय मानसून के दौरान उपलब्ध पानी को संग्रहित कर सोन नहर प्रणाली को अधिक स्थिर जल आपूर्ति देने का साधन बन सकता है। इससे दक्षिण बिहार के कृषि क्षेत्र में सिंचाई की विश्वसनीयता बढ़ सकती है।
झारखंड के लिए 2 MAF का हिस्सा सोन बेसिन के अपने क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल और अन्य जल उपयोगों की योजना बनाने का आधार बन सकता है। खासकर पलामू और गढ़वा जैसे अपेक्षाकृत सूखे क्षेत्रों के लिए इसका महत्व अधिक हो सकता है।
लेकिन भविष्य की सफलता केवल बांध बनाने पर निर्भर नहीं करेगी। जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अनिश्चितता, लंबे सूखे और अचानक भारी बारिश की घटनाओं के बीच जलाशय संचालन की रणनीति महत्वपूर्ण होगी। इसलिए दोनों राज्यों के बीच साझा जल निगरानी, वास्तविक समय के प्रवाह आंकड़ों का आदान-प्रदान और पारिस्थितिक प्रवाह की व्यवस्था इस समझौते को टिकाऊ बनाने में अहम होगी।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें