भोपाल-अयोध्या बायपास परियोजना के लिए जो पेड़ काटे जाएंगे उनका असर केवल हरियाली पर नहीं होगा, बल्कि शहर का पूरा जल-तंत्र इससे प्रभावित होगा।

 

चित्र: चंद्रशेखर बिरादर

नीतियां और कानून

भोपाल अयोध्या बायपास: सड़कें होंगी चौड़ी पर सिकुड़ जाएंगे जल क्षेत्र

अगर आप यह सोच रहे हैं कि भोपाल-अयोध्या बायपास परियोजना के लिए जो पेड़ काटे जाएंगे, उनका असर केवल हरियाली पर होगा, तो ऐसा बिलकुल नहीं है। सच पूछिए तो इस कटाई का प्रभाव भोपाल शहर की मिट्टी, के भूजल, और स्थानीय जलवायु पर पड़ने वाला है। विस्तार से समझने के लिए पढ़ें पूरी रिपोर्ट…

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी
बायपास चौड़ीकरण परियोजना के तहत भोपाल में लगभग 8,000 पेड़ काटे जाएंगे।

परियोजना और विवाद: सड़क बनाम विकास का सवाल

अयोध्या बायपास चौड़ीकरण परियोजना के तहत भोपाल में लगभग 8,000 पेड़ काटे जाएंगे।

विकास परियोजना से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह कदम यातायात सुधार और भविष्य की जरूरतों के लिए ज़रूरी है।

लेकिन नागरिक समूहों और पर्यावरण कार्यकर्ता ऐसा नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि यह मामला केवल पेड़ों का नहीं है। बल्कि इसका संबंध शहर के जल-तंत्र, वर्षाजल के प्रवाह और भूजल रिचार्ज पर पड़ने वाले असर से है।

सड़कें केवल जमीन नहीं बदलतीं, वे पानी की दिशा भी बदलती हैं 

अयोध्या बायपास का यह पूरा क्षेत्र भोपाल के उत्तरी और उत्तर-पूर्वी जलग्रहण तंत्र का हिस्सा है। इसकी छोटी-बड़ी प्राकृतिक जलधाराएं आगे चलकर हलाली नदी और बेतवा बेसिन को पानी देती हैं। यह क्षेत्र शहर के उन प्रमुख मैदानी हिस्सों में शामिल माना जाता है जो मानसून के दौरान वर्षाजल को सोखने में योगदान देते हैं।

जब ऐसे संवेदनशील जलग्रहण क्षेत्र में पेड़ों और खुली मिट्टी की जगह डामर और कंक्रीट ले लेते हैं, तो बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय तेजी से सतही बहाव (runoff) बन जाता है।

दिल्ली, गुरुग्राम और बेंगलुरु जैसे शहरों में जलभराव और भूजल दबाव जैसी स्थितियों के रूप में सामने आया है

इसी संदर्भ में सवाल उठता है कि अयोध्या बायपास चौड़ीकरण के बाद क्या भोपाल में जल अवशोषण के प्राकृतिक रास्तों की भरपाई के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था बन पाएगी?

इस पर स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने लगातार चेतावनी दी है कि सड़क चौड़ीकरण केवल ट्रैफिक का सवाल नहीं है।

सड़कें चौड़ी होने के बाद भी ट्रैफिक खत्म नहीं होता, लेकिन हर बार शहर का हरित आवरण स्थायी रूप से घट जाता है।
उमाशंकर तिवारी, पर्यावरण कार्यकर्ता, भोपाल

पर्यावरण मामलों के याचिकाकर्ता नितिन सक्सेना के अनुसार, “यह पहली बार नहीं है, NGT से जुड़े मामलों की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टिंग और दस्तावेज़ (नितिन सक्सेना बनाम MoEFCC व अन्य) बताते हैं कि हाल ही में केवल कोलाड़ सिक्स-लेन और 11 मील-बांगरसिया रोड परियोजनाओं के कारण भोपाल ने अपने 5,482 परिपक्व पेड़ खो दिए हैं।”

पेड़ों का पारिस्थितिक मूल्य केवल हरियाली नहीं

NGT में प्रस्तुत दस्तावेज़ों के अनुसार जिन 7,871 पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई है, उनमें कई पेड़ 40 से 80 साल पुराने हैं। इनमें सागौन, शीशम, साल, महुआ, नीम और आम जैसे वृक्ष शामिल हैं।

ये पेड़ केवल कार्बन अवशोषण का माध्यम नहीं हैं। ये वर्षाजल को रोकने, मिट्टी में नमी बनाए रखने और स्थानीय तापमान नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसके अलावा, ये पुराने पेड़ पक्षियों और अन्य जीवों के आवास भी हैं। इसलिए उनका मूल्य केवल संख्या से नहीं, बल्कि उनके पारिस्थितिक कार्यों से तय होता है।

compensatory afforestation एक समाधान या भ्रम

NGT ने NHAI को लगभग 80,000 पौधे लगाने और 15 सालों तक उनकी निगरानी करने का निर्देश दिया है। 

लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) और कैम्पा (CAMPA) के ऑडिट मूल्यांकन बताते हैं कि प्रतिपूरक वनीकरण का ज़मीनी नतीजा उम्मीद पर खरा नहीं उतरा है। 

खुद राजस्थान CAMPA की आधिकारिक थर्ड-पार्टी मॉनिटरिंग और मूल्यांकन रिपोर्ट में यह देखा गया है कि कई रोपण क्षेत्रों में पौधों की उत्तरजीविता (survival rate) व्यापक रूप से असमान रही है। कुछ साइटों में यह दर 40 से 50 प्रतिशत के बीच भी दर्ज की गई है, जबकि बेहतर प्रबंधन वाले क्षेत्रों में यह अपेक्षाकृत अधिक रही।

भारत सरकार के National CAMPA पोर्टल पर प्रकाशित थर्ड-पार्टी इवैल्यूएशन रिपोर्टें यह संकेत देती हैं कि पौधारोपण की सफलता केवल संख्या पर नहीं, बल्कि साइट-विशिष्ट परिस्थितियों, संरक्षण व्यवस्था और जल-उपलब्धता पर निर्भर करती है।

इसके अलावा, भारत के नियंत्रक - महालेखापरीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में यह संकेत मिलता है कि CAMPA फंड्स के उपयोग में संरचनात्मक समस्याएं मौजूद हैं। कई राज्यों में यह फंड अपने मूल उद्देश्य प्राकृतिक वनों की पुनर्स्थापना से भटककर विभिन्न अन्य गतिविधियों में भी प्रयुक्त हुआ है।

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट-समर्थित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की रिपोर्टों में इसका ज़िक्र है। इनके अनुसार CAMPA के तहत बड़े पैमाने पर होने वाले monoculture plantations (एकल-प्रजाति आधारित) जैव-विविधता को सीमित कर सकते हैं। साथ ही ये प्राकृतिक वनों जैसी पारिस्थितिक जटिलता को पूरी तरह पुनः स्थापित नहीं कर पाते हैं।

इसलिए यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या नए पौधे उन परिपक्व वृक्षों की पारिस्थितिक सेवाओं की भरपाई कर सकते हैं जिन्हें विकसित होने में दशकों का समय लगा है।

भोपाल अकेला नहीं: भारतीय शहरी जल-संकट का साझा पैटर्न 

भोपाल की यह बहस किसी एक शहर की स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि भारत के तेजी से बदलते शहरी परिदृश्य का हिस्सा है। पिछले दो दशकों में देश के कई बड़े शहरों में विकास का स्वरूप इस तरह बदला है कि जल-निकाय, प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र और पारंपरिक निकासी प्रणालियाँ धीरे-धीरे शहरी ढांचे के दबाव में आ गई हैं।

दिल्ली में यमुना के बाढ़-क्षेत्रों पर लगातार बढ़ता निर्माण यह दिखाता है कि नदी-तंत्र केवल जल-स्रोत नहीं बल्कि शहरी भूमि उपयोग का हिस्सा बनता जा रहा है। जब बाढ़क्षेत्र सिकुड़ते हैं, तो न केवल बाढ़ का खतरा बढ़ता है, बल्कि भूजल रिचार्ज की प्राकृतिक क्षमता भी घट जाती है।

इसका एक दूसरा उदाहरण बेंगलुरु है, जहां ऐतिहासिक झीलों की श्रृंखला कभी शहर की जल-व्यवस्था का आधार थी। लेकिन अनियंत्रित शहरी विस्तार, झीलों के आपसी जल-प्रवाह के टूटने और अतिक्रमण ने इस प्राकृतिक नेटवर्क को कमजोर कर दिया है। परिणामस्वरूप, शहर एक साथ जलभराव और जल-संकट, दोनों स्थितियों का सामना करने लगा है।

हैदराबाद में भी जल निकायों पर अतिक्रमण और झीलों के कैचमेंट क्षेत्रों में निर्माण ने स्थानीय जल-चक्र को बाधित किया है। जो झीलें कभी वर्षाजल को नियंत्रित करती थीं, वे अब अक्सर अत्यधिक वर्षा की स्थिति में अनियंत्रित जल-स्तर और सूखे समय में न्यूनतम जल-स्तर की समस्या से जूझ रही हैं।

इन उदाहरणों के बीच भोपाल एक महत्वपूर्ण केस स्टडी बन जाता है, क्योंकि यह शहर अभी भी अपनी झील प्रणाली के साथ जीवित संबंध बनाए हुए है। ऐसे में अयोध्या बायपास जैसी परियोजनाएँ केवल स्थानीय बुनियादी ढांचे का विस्तार नहीं हैं, बल्कि यह प्रश्न भी उठाती हैं कि क्या भारत के शहर धीरे-धीरे अपने ही जल-आधार को कमजोर करते जा रहे हैं।

इस व्यापक संदर्भ में भोपाल का मामला एक चेतावनी की तरह देखा जा सकता है, जहां विकास की गति और जल-तंत्र की संवेदनशीलता के बीच संतुलन लगातार तनाव में है।

नीति का खाली स्थान: Water Impact Assessment की अनुपस्थिति

भारत में बड़े स्तर की विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment / EIA) एक अनिवार्य प्रक्रिया है। लेकिन इस ढांचे की एक महत्वपूर्ण सीमा यह है कि इसमें जल-प्रणाली पर प्रभाव अक्सर समग्र रूप में तो शामिल होता है, लेकिन स्वतंत्र और गहराई से विश्लेषित नहीं किया जाता।

व्यवहार में, भूजल पुनर्भरण, वर्षाजल का बहाव (runoff patterns), स्थानीय जलग्रहण क्षेत्रों की क्षमता और शहरी बाढ़ की संभावना जैसे पहलू कई बार विस्तृत और अलग अध्ययन का हिस्सा नहीं बन पाते। 

नतीजतन, किसी बुनियादी ढांचा परियोजना का वास्तविक 'जलवैज्ञानिक प्रभाव' (Hydrological Impact) नीति-निर्माण और योजना के स्तर पर पूरी तरह ओझल रहता है।

यही कारण है कि जल विशेषज्ञ और शहरी नियोजक लंबे समय से एक अलग और समर्पित Water Impact Assessment (WIA) ढांचे की मांग करते रहे हैं। इस प्रस्तावित ढांचे का उद्देश्य केवल इतना नहीं है कि परियोजना के बाद पानी पर क्या असर होगा। बल्कि इसका लक्ष्य यह भी समझना है कि निर्माण से पहले ही प्राकृतिक जल-प्रवाह में कौन-कौन से हस्तक्षेप होंगे।

एक प्रभावी Water Impact Assessment में निम्न पहलुओं का स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक माना जाता है:

  • किसी क्षेत्र की भूजल पुनर्भरण क्षमता पर प्रभाव

  • वर्षाजल के प्राकृतिक प्रवाह और निकासी पैटर्न में बदलाव

  • स्थानीय जल निकायों (झीलों, तालाबों, नालों) पर दीर्घकालिक दबाव

  • शहरी बाढ़ की संवेदनशीलता में संभावित वृद्धि

  • भूमि उपयोग परिवर्तन का जल-संतुलन पर प्रभाव

अयोध्या बायपास परियोजना जैसे मामलों में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या केवल वृक्षों की गणना और प्रतिपूरक वृक्षारोपण से जल-तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों को समझा जा सकता है।

वास्तव में, यह बहस केवल एक सड़क परियोजना की नहीं है, बल्कि उस नीति-ढांचे की भी है जिसमें विकास और जल-सुरक्षा को अक्सर अलग-अलग दृष्टियों से देखा जाता है। यदि शहरों को दीर्घकालिक रूप से जल-संवेदनशील बनाना है, तो विकास परियोजनाओं के मूल्यांकन में पानी को एक केंद्रीय और स्वतंत्र घटक के रूप में शामिल करना अनिवार्य हो जाता है।

शहरों को पानी के साथ जीना सीखना होगा 

भोपाल की झीलें केवल मानसून का परिणाम नहीं हैं, बल्कि एक जटिल और संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं, जहां पेड़, मिट्टी, जलग्रहण क्षेत्र और वर्षाजल का प्राकृतिक प्रवाह एक साथ काम करते हैं।

इसीलिए अयोध्या बायपास परियोजना पर बहस केवल पेड़ों की नहीं, बल्कि उस पानी की भी है जो शहर के भीतर और नीचे बहता है।

शहरों को अब केवल फैलना नहीं, बल्कि पानी के साथ संवाद करना सीखना होगा। क्योंकि सड़कें भविष्य बनाती हैं, लेकिन पानी तय करता है कि वह भविष्य टिकेगा या नहीं।

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