साल 2026 के केंद्रीय बजट में सरकार ने जल संरक्षण को कृषि उत्पादकता और किसानों की आय से सीधे जोड़ने का संकेत दिया है।

 

चित्र साभार: पेक्सेल.कॉम 

नीतियां और कानून

बजट 2026-27: देश भर में 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों का होगा एकीकृत विकास

केंद्रीय बजट 2026-27 जल संरक्षण को कृषि उत्पादकता और किसानों की आय से जोड़ने का संकेत देता है। लेकिन बढ़ते आवंटन, 500 जलाशयों की घोषणा और मत्स्य-कृषि एकीकरण के बीच असली सवाल यह है कि क्या यह नीति बदलाव काग़ज़ से निकलकर ज़मीन पर टिकाऊ जल प्रबंधन में बदल पाएगा।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

केंद्र सरकार का जल जीवन मिशन (जेजेएम) ग्रामीण भारत में पेयजल पहुंचाने का अभियान तो जारी रखे हुए है, लेकिन अब जल नीति का फोकस केवल आपूर्ति तक सीमित नहीं दिखता। साल 2026 के केंद्रीय बजट में सरकार ने जल संरक्षण को कृषि उत्पादकता और किसानों की आय से सीधे जोड़ने का संकेत दिया है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 500 जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास की घोषणा इसी दिशा में एक अहम कदम है।

भारत में जल संकट केवल पानी की कमी का सवाल नहीं है, बल्कि प्रबंधन, वितरण और उपयोग के तरीके का संकट भी है। देश की लगभग 68 फ़ीसद आबादी आज भी खेती पर निर्भर है, जबकि कई क्षेत्रों में भूजल स्तर खतरनाक गति से नीचे जा रहा है। ऐसे में एकीकृत जल प्रबंधन अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है।

बजटीय प्राथमिकताएं: संख्याओं में बदलता रुख

जल जीवन मिशन के आंकड़े सरकार की प्राथमिकताओं की साफ़ तस्वीर पेश करते हैं।

वित्त वर्ष 2024-25 में JJM पर वास्तविक व्यय 22,612 करोड़ रुपये रहा, जबकि 2025-26 के लिए बजट अनुमान बढ़ाकर 67,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। यह वृद्धि जल क्षेत्र को दी जा रही केंद्रीय प्राथमिकता को दर्शाती है, लेकिन इसकी वास्तविक अहमियत इस बात पर निर्भर करेगी कि यह धन ज़मीनी स्तर पर किस तरह और किन शर्तों के साथ खर्च होता है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बढ़ा हुआ आवंटन राज्यों तक समय पर और पूरी राशि के रूप में पहुंच पाएगा? पिछले वर्षों का अनुभव बताता है कि बजटीय बढ़ोतरी हमेशा ज़मीनी क्रियान्वयन में तब्दील नहीं हो पाती, खासकर तब जब राज्य सरकारों की वित्तीय हिस्सेदारी और प्रशासनिक क्षमता असमान हो।

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 67,670 करोड़ रुपये का आवंटन इस निरंतरता को बनाए रखता है। हालांकि, 17,000 करोड़ रुपये का राजस्व अंतर यह भी दिखाता है कि केंद्र-राज्य समन्वय और वैकल्पिक वित्तीय संसाधनों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत बनी हुई है।

यह राजस्व अंतर केवल वित्तीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि जल आपूर्ति की मौजूदा योजनाएं अब किन संरचनात्मक सीमाओं से टकरा रही हैं। जब तक जल स्रोतों की स्थिरता, गुणवत्ता और दीर्घकालिक रखरखाव पर समान रूप से निवेश नहीं होता, तब तक बढ़ा हुआ बजट भी अल्पकालिक समाधान बनकर रह जाने का जोखिम रखता है।

राजस्व का अंतर यह दिखाता है कि केंद्र-राज्य समन्वय और वैकल्पिक वित्तीय संसाधनों पर गंभीरता से काम करने की जरूरत बनी हुई है।

इसी तरह प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के वाटरशेड डेवलपमेंट कंपोनेंट के लिए 2025-26 में 2,505 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह पिछले वर्ष की तुलना में मामूली वृद्धि है, लेकिन यहां भी 1,500 करोड़ रुपये का राजस्व अंतर एक संरचनात्मक चुनौती के रूप में सामने आता है।

यह अंतर इस सवाल को जन्म देता है कि क्या वाटरशेड विकास को अब भी सहायक योजना की तरह देखा जा रहा है, जबकि बदलते वर्षा पैटर्न और भूजल संकट के दौर में यही हस्तक्षेप खेती की टिकाऊ उत्पादकता की रीढ़ बन सकता है।

500 जलाशय: एक संसाधन, अनेक उपयोग

500 जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास की अवधारणा सिर्फ जल संरक्षण तक सीमित नहीं है। इसमें मत्स्य पालन, पशुपालन और उच्च मूल्य वाली कृषि को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है। यह मॉडल ‘एक जल स्रोत, अनेक आजीविकाएं’ के सिद्धांत पर आधारित है।

हालांकि, यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि इन जलाशयों का नियंत्रण और प्रबंधन किसके हाथ में होगा: स्थानीय समुदायों के, पंचायतों के या विभागीय एजेंसियों के। अनुभव बताते हैं कि बिना स्थानीय भागीदारी के ऐसे बहुउद्देशीय मॉडल अक्सर अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाते।

राजस्थान के अलवर जिले में तरुण भारत संघ द्वारा विकसित जोहड़ इसका व्यावहारिक उदाहरण हैं, जहां जल पुनर्भरण के साथ-साथ मत्स्य पालन और पशुपालन ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दी है।

मत्स्य पालन: ब्लू इकोनॉमी की ज़मीनी परत

बजट 2026-27 में मत्स्य पालन वैल्यू चेन को मजबूत करने और बाजार से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है। महिला समूहों और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को केंद्र में रखने का दृष्टिकोण इस क्षेत्र को सामाजिक-आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाता है।

केरल के कुट्टनाड क्षेत्र में महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा संचालित मत्स्य इकाइयां इस मॉडल की व्यवहारिक सफलता को दिखाती हैं।

तकनीकी स्तर पर बजट जिन नवाचारों की बात करता है, उनमें शामिल हैं:

  • बायोफ्लॉक तकनीक

  • केज कल्चर का विस्तार

  • कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर

  • डिजिटल मार्केट प्लेटफॉर्म

हालांकि, इन तकनीकों का विस्तार जल गुणवत्ता, जैव विविधता और स्थानीय जल उपयोगकर्ताओं पर क्या असर डालेगा, इस पर स्पष्ट पर्यावरणीय दिशा-निर्देशों का अभाव अब भी एक चिंता का विषय है।

ये पहलें मत्स्य पालन के व्यवसाय को परंपरागत गतिविधि से उच्च उत्पादकता वाले सेक्टर में बदलने की दिशा में कदम हैं।

कर्नाटक के चिकमगलूर जिले में कॉफी, काली मिर्च और चंदन आधारित मिश्रित खेती से किसानों की आय में 300 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। यही मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी संभावनाएं खोलता है।

उच्च मूल्य कृषि: कम पानी, अधिक आय

नारियल, काजू, कोको और चंदन जैसी फसलों के लिए समर्पित कार्यक्रमों की घोषणा यह दिखाती है कि सरकार कम पानी में अधिक मुनाफा देने वाली खेती को आगे बढ़ाना चाहती है।

कर्नाटक के चिकमगलूर जिले में कॉफी, काली मिर्च और चंदन आधारित मिश्रित खेती से किसानों की आय में 300 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। यही मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी संभावनाएं खोलता है।

बागवानी क्षेत्र में माइक्रो इरिगेशन और प्रिसिजन फार्मिंग को बढ़ावा देने का प्रस्ताव भी इसी सोच का हिस्सा है। महाराष्ट्र के अंगूर उत्पादकों द्वारा ड्रिप इरिगेशन का सफल उपयोग इसका उदाहरण है।

बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जलवायु परिवर्तन, घटते संसाधन और बढ़ती जनसंख्या के दबाव में पुराने मॉडल अब पर्याप्त नहीं रह गए हैं।

नीति में बदलाव: सब्सिडी से उत्पादकता की ओर

बजट 2026-27 कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में उत्पादकता-आधारित वृद्धि पर जोर देता है। यह पारंपरिक इनपुट-सब्सिडी मॉडल से हटकर दीर्घकालिक और टिकाऊ विकास की ओर संकेत करता है।

अब नीति का फोकस: 

  • इनपुट सब्सिडी से आउटपुट-लिंक्ड इंसेंटिव की ओर

  • फसल-विशिष्ट योजनाओं से एकीकृत फार्मिंग सिस्टम की ओर

  • व्यक्तिगत लाभ से सामुदायिक विकास की ओर

  • अल्पकालिक राहत से दीर्घकालिक स्थिरता की ओर

यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जलवायु परिवर्तन, घटते संसाधन और बढ़ती जनसंख्या के दबाव में पुराने मॉडल अब पर्याप्त नहीं रह गए हैं।

चुनौतियां: नीति से ज़मीन तक

जेजेएम में 17,000 करोड़ रुपये का वित्तीय अंतर संसाधन जुटाने की चुनौती को उजागर करता है। इसके समाधान के रूप में सामाजिक प्रभाव बॉन्ड, पीपीपी मॉडल, कार्बन क्रेडिट और तर्कसंगत जल उपयोग शुल्क जैसे विकल्पों पर गंभीर विचार जरूरी है।

तकनीकी स्तर पर पोलावरम जैसी बड़ी परियोजनाओं और छोटे जलाशयों के बीच तालमेल, रीयल-टाइम डेटा साझा करने की व्यवस्था और फ्लड-ड्राउट मैनेजमेंट का एकीकरण आवश्यक होगा।

साथ ही, मत्स्य पालन और जैव विविधता संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है।

आगे की राह

बजट 2026-27 जल, कृषि और उत्पादकता को एक साथ जोड़ने की कोशिश तो करता है, लेकिन यह कोशिश तभी टिकाऊ होगी जब जल स्रोतों की गुणवत्ता, स्थिरता और स्थानीय भागीदारी को केंद्र में रखा जाए। जल जीवन मिशन से लेकर अमृत सरोवर तक, सवाल केवल आवंटन का नहीं, बल्कि इसे लागू करने और उसके बाद जवाबदेही तय करने का है।

किसानों की आय बढ़ाने की बहस तब अधूरी रह जाती है, जब पानी को केवल एक इनपुट की तरह देखा जाता है। बजट 2026-27 यह संकेत देता है कि सरकार दिशा बदलना चाहती है, लेकिन पुरानी परियोजनाओं और घोषणाओं की मौजूदा हालत के आधार पर यह देखना रोचक होगा कि बदलाव काग़ज़ से ज़मीन तक कितनी दूरी तय कर पाता है।

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